मालंच
साथियो, रिजेक्ट माल अब मैं नियमित देखता हूँ. अधिकतर चीजें इसकी मुझे पसंद भी आती हैं. कुमार विनोद की कवितायें शानदार थीं. अनिल सिंह और दिलीप मंडल मे आपसी संबंध कैसे हैं, उनमे कोई निजी खुन्नस है या नही, मुझे नही पता (उलझन इसीलिए भी हुयी क्योंकि उस बारे मे दोनों के दावे अलग-अलग हैं), मगर इसमे दो राय नही कि निजी खुन्नस की बात पहले निकाली अनिलजी ने, वह भी दिलीपजी की टिप्पणी के जवाब मे. जबकि दिलीपजी की टिप्पणी मे सारे सरोकार सार्वजनिक थे.
अगर और किसी आधार पर नही तो इसी आधार पर अनिलजी का पक्ष हल्का साबित हो जाता है. अमूमन हम एक बात पूरी हुए बगैर दूसरी बात पर जाने को मजबूर तभी होते हैं जब उस पहली बात पर अपने को कमजोर पाते हैं. वैसे सच यह है कि अनिल जी वैचारिक ही नही भावनात्मक दृष्टि से भी कच्चे निकले. वरना आलोचना का तार्किक जवाब देने के बदले बिफरते हुए यह न कहते कि निजी खुन्नस निकालना हो तो अपने रिजेक्ट माल पर निकालिए. मोहल्ला सिर्फ आपका नही सबका है, मेरा भी है.
यह तो वैसी ही बात हुयी जैसे कोई बच्चा क्रिकेट मे आउट हो जाने पर बौलर को धमकाने लगे कि बैट तो मेरा है बौल भी मेरा है तुम मुझे आउट कैसे कर सकते हो? अगर रिजेक्ट माल दिलीप का है तो क्या वे उस पर कुछ भी अतार्किक बात लिख सकते हैं? और लिखने के बाद विरोध से बचे भी रह सकते हैं? अगर ऐसा ही है तो फिर ब्लौग की ज़रूरत ही क्या है? सब अपने-अपने घरों मे कागज़ काले करते रहें!
बहरहाल, इस विवाद मे उलझने का मेरा कोई इरादा नही है. मैं आप सबको यह बताना चाहता था कि रिजेक्ट माल ने रिजेक्ट और सेलेक्ट समूह की जो श्रेणी बनाई है वह मुझे बेहद सटीक लगती है. सचमुच रिजेक्ट समूह (यानी वे सब लोग जो अपनी आजीविका के लिए अपना श्रम बेचने को मजबूर हैं) और सेलेक्ट समूह (यानी वे सब लोग जो लाभ कमाने के मकसद से दूसरों का श्रम खरीदते हैं) के बीच हितों का सीधा टकराव है. जो एक के हित मे है वह दूसरे के खिलाफ पड़ता है और जो दूसरे के हित मे है वह पहले के प्रतिकूल पड़ता है. सच पूछें तो जाति, धर्म, लिंग आदि के सारे विभाजन सेकंडरी हैं. सबसे तगडा और सबसे प्रभावी विभाजन यही है.
बावजूद इसके, यह विभाजन कई बार हमे उलझन मे डाल देता है. बडे-बडे ऑफिसर, बड़ी कंपनियों मे ऊंची कुर्सियों पर बैठे लोग, फिल्मी सितारे आदि हैं तो रिजेक्ट समूह के ही, मगर किसी भी कोण से नही दिखते. बल्कि वे खुद भी शायद ही अपने को रिजेक्ट समूह का माने. फिर आखिर हम किस बिना पर उन्हें रिजेक्ट समूह का मानते रहें? और अगर हम माने भी रहें तो उनकी बातें तो सेलेक्ट समूह जैसी ही होती हैं. इसी रिजेक्ट माल पर किसी मित्र की टिप्पणी आई थी कि हड़ताल के संबंध मे हमे बरगलाने की कोशिश हमारे समूह के ही लोग करते हैं? सवाल यह है कि हम ऐसे लोगों को अपने समूह मे रखे रहें तो उससे किसका फायदा होगा? क्या उनकी बातों से हम और हमारे लोग ही गुमराह नही होंगे?
यह सब कहने का तात्पर्य यह है कि मेरे मन मे रिजेक्ट और सेलेक्ट समूह की पहचान का एक और आधार आया है. क्यों न सबसे, यानी जिस किसी इकाई (गाँव, जिला, राज्य, देश या फिर विश्व) को माने उसके सभी सदस्यों से एक सवाल पूछा जाये. वह यह कि क्या ऐसी व्यवस्था की जानी चाहिए कि हर इंसान की छह प्राथमिक जरूरतें बिना शर्त पूरे हो -
१) भोजन
२) वस्त्र
३) आवास
४) शिक्षा
५) स्वास्थ्य और
६) मनोरंजन
जो भी इस सवाल का जवाब हाँ में दे उसे रिजेक्ट समूह का माना जाये और जो इसके खिलाफ मत जाहिर करे उसे सेलेक्ट समूह का मान लिया जाये.
ऐसा करने का आधार यह है कि जो भी अपनी ज़रूरतों के आधार पर जिन्दगी बिताना चाहता है वह इसके लिए सहजता से तैयार हो जायेगा, लेकिन जो दूसरों की ज़िंदगी अपने नियंत्रण मे रखना चाहता है वह तत्काल इसके खिलाफ राय जाहिर करेगा. इतना ही नहीं जो दूसरों की ज़िंदगी नियंत्रित करने मे किसी शक्तिशाली की मदद करते हैं और इसी मे अपने आपको धन्य मानते हैं वे भी इस प्रस्ताव का विरोध करेंगे और सहज ही सेलेक्ट समूह मे शामिल हो जायेंगे. इसी प्रकार चाय की दुकान चलाने, पान का ठेला लगाने, साईकिल का पंक्चर बनाने वाले या इन जैसे अनेक लोग रिजेक्ट समूह जैसी हालत मे रहते हुए भी तकनीकी रूप से सेलेक्ट समूह का हिस्सा मान लिए जाते है. अगर ऊपर बताये आधार को माना जाये तो ये भी अपनी-अपनी प्रवृत्तियों के हिसाब से बिना किसी कठिनाई के सेलेक्ट या रिजेक्ट समूह मे शामिल किये जा सकते हैं.
बहरहाल, यह एक प्रस्ताव है. मैं इस पर आप लोगों की राय जानना चाहता हूँ. अगर यह प्रस्ताव किसी लायक लगे तो इसके पक्ष या विपक्ष मे तर्क सहित अपनी बात जरूर रखें.