Sunday, December 30, 2007

इंतजार कीजिए इस साल की मेरी आखिरी पोस्ट का!

- दिलीप मंडल

दिसंबर, 2007 मेरे लेखकीय जीवन का शायद पहला महीना है, जब मैंने प्रिंट के लिए कुछ भी नहीं लिखा। नए साल से पहले का रिजोल्यूशन है कि ऐसा महीना फिर कभी नहीं आने दूंगा। बल्कि ऐसा कोई अलिखा हफ्ता भी, उम्मीद है कि फिर कभी नहीं आएगा। अपने आप से मैंने कहा है कि प्रिंट के लिए लिखना बंद तभी होना चाहिए, जब प्रिंट पूरी तरह निरर्थक हो जाएगा। प्रिंट के लिए एक महीने तक न लिख पाना समय की कमी की वजह से नहीं हुआ, बल्कि इसकी वजह था मानसिक आलस्य। इस आलस्य ने मुझे एक महीने तक प्रिंट के लिए मार डाला। इसलिए इस साल मेरी टेबल पर लिखा होगा - आदमी परिश्रम से नहीं मरता, आलस से मरता है।

बहरहाल ये महीना भारतीय समाज के बारे में कुछ रचनाएं पढ़ने, भविष्य के लिए योजनाएं बनाने, ब्लॉग चर्चा में शामिल होने, खास तौर पर अजित वडनेरकर, विजय शंकरऔर आलोक पुराणिक का ब्लॉग पढ़ने और इरफान तथा अशोक पांडे का ब्लॉग सुनने के नाम रहा। ईस्निप्स से बांग्ला के गाने भी खूब सुने। सलिल चौधुरी से लेकर सुमन कबीर तक। दो वार-मूवी देखी। दूसरे विश्वयुद्ध वाली। बंद होने से ठीक पहले चाणक्य सिनेमा की तीर्थयात्रा भी कर आया। वाणी प्रकाशन पहुंचकर तस्लीमा का समर्थन कर आया। नंदीग्राम पीड़ितों से मुलाकात भी हो गई।

इस बीच उत्तर प्रदेश बिहार और झारखंड की राजनीति पर नजर बनी हुई है। दवाओं का देसी-विदेशी खेल, अमेरिका की घरेलू राजनीति और इराक - अफगानस्तान - पाकिस्तान हमेशा की तरह रडार पर रहे। पश्चिम बंगाल के समाज और वहां की राजनीति पर लगभग साल भर से लगा हूं। इस विषय पर भी कुछ महत्वपूर्ण मिला तो आप तक पहुंचाऊंगा।

यहां शायद ये सफाई देने की जरूरत है कि बहुत सारे लोगों की तरह लिखना मेरे लिए हॉबी या लक्जरी नहीं है। मेरा ज्यादातर लेखन मजबूरी का लेखन है। जब लिखने की जरूरत आ जाती है तो न लिखने तक सो नहीं पाता हूं। आस पास कुछ न कुछ ऐसा हो जाता है या दिख जाता है कि लिखे बगैर नहीं रहा जाता। वही सब आप लोगों को झेलना पड़ता है। आप लोग नहीं पढ़ेंगे तो भी लिखना पड़ेगा।

साल के आखिरी दिनों की तंद्रा हर्षवर्धन की एक पोस्ट और उसपर आई टिप्पणियों ने भगा दी है। इसका नतीजा ये हुआ है कि सेल्फ से कुछ ग्रंथ निकलकर टेबल और बिस्तर पर पहुंच गए हैं। फिर नोट्स बनने लगे हैं। कुछ ऑनलाइन सामग्री मिली है, कुछ की तलाश है। नेशनल आर्काइव से कुछ तथ्य चाहिए। धन्यवाद हर्ष, इस पोस्ट के लिए क्योंकि वो न होता तो ये सब कहां होता!

Friday, December 28, 2007

11 साल के बच्चे की पहली हिंदी पोस्ट

- अरिंदम कुमार, कक्षा - 6

तारेजमीं पर फिल्म देखी। वो भी चाणक्या में। सिनेमा हॉल हमेशा के लिए बंद होने से एक दिन पहले। फिल्म अच्छी थी। लेकिन और अच्छी हो सकती थी। इसका अंत दूसरी तरह से होना चाहिए था।

ईशान या ईनू पढ़ने लिखने में तेज नहीं है। लेकिन फिल्म के अंत में दिखाते हैं कि वो पेंटिंग में सबसे तेज है। इसलिए सारे बच्चे और टीचर्स भी उसके लिए क्लैप करते हैं। उसके माता पिता भी उसे बहुत प्यार करने लगते हैं क्योंकि वो पेंटिंग कॉम्पिटीशन में जीत जाता है।

लेकिन फिल्म तो अच्छी तब बनती जब ईशान अच्छा पेंटर भी नहीं बनता या कुछ भी अच्छा नहीं कर पाता तो भी लोग उसे समझते और प्यार देते। हर बच्चा कुछ न कुछ बहुत अच्छा करे ये उम्मीद नहीं करना चाहिए। ये जरूरी तो नहीं है कि वो कुछ बढ़िया करे ही। कोई भी बच्चा एवरेज हो सकता है, एवरेज से नीचे भी हो सकता है। लेकिन इस वजह से कोई उसे प्यार न दे ये तो गलत है।

सलामत रहे दोस्ताना नताशा-अनुराधा का (भाग-2)

आर. अनुराधा

नताशा को आखिर बेटा हुआ जो अब कोई तीन साल का हो चला है। घर भर का दुलारा, दादा-दादी की आंखों का तारा। बहनें भी उसे गोद में उठाकर गौरव का अनुभव करती हैं। आखिर वह है भी एक बेशकीमती बच्चा, उन तीनों से कई दर्जा ऊपर। मैंने और नताशा ने तय किया कि इस बार बच्चों की छुट्टियों में हम वापस अपने शहर जाएंगे और पुरानी यादें ताजा करेंगे। अपने परिवारों को भी दिखाएंगे वो महुए के पेड़ जिनके कोटरों में हम छुपाया करते थे अपने नायाब, बेशकीमती पंचगुट्टे, वो बेर के पेड़ जिनसे पत्थर मार कर बेर तोड़ते हमने जाने कितनी बार डांट खाई जिस-तिस से, वो अमरूद के पेड़ जिनकी डालियों पर हम बंदर की तरह फुदकते और फिर फलों को अपने फ्रॉक की झोली में भर कर डालों के सहारे खपरैलों वाली ढलवां छत पर चढ़ कर उन्हें खाने में सर्दियों की दोपहरें बिताते, छोटे नाले पर बनी वो पुलिया जिस पर बैठ कर हम मच्छरों के बीच गर्मियों की पूरी शाम बिता देते बेबात की बातों पर बेवजह ठहाके लगाते हुए, घरों के वो बड़े-बड़े कंपाउंड जिनमें बादल वाले दिनों में चुन्नियां फहराते निर्लक्ष्य दौड़ा करते गिल्ली-डंडा, कंचे और पिट्टुल खेलते, वो झूले जिन पर आमने-सामने झूलते हम हर कुछ मिनट में एक-दूसरे को याद दिलाते कि हममें कुट्टी है फिर क्यों बात करें, और वह सब कुछ जो हमारे बचपन का हस्सा था, साझा था और हमारे दिलो-दिमाग पर गहरे दर्ज हो चुका है।

हमने फोन पर हुए कई संवादों में पुराने दिनों को याद किया और कई बार कल्पनाओं में साथ-साथ वहां पहुंच भी गए। लेकिन वहां जाने के कुछ दिन पहले उसने बताया कि उसके पति को उन्ही दिनों में कुछ जरूरी काम है इसलिए वे नहीं आ सकेंगे। इधर मेरे पति के भी साथ न आ पाने की स्थिति बन रही थी। तो मैंने प्रस्ताव किया कि हम ही चलें अपने बच्चों को लेकर बचपन की सैर पर। उसने घर में बात की और बताया कि दो बच्चों को उनकी नानी के पास छोड़ेगी और दो को साथ लेकर आएगी। बेहतर।

फिर अगले दिन उसका फोन आया तो वह फूट ही पड़ी -"मैं नहीं आ सकती। कोई आने नहीं दे रहा है। सबको लगता है मैं अकेले कैसे पहुंच पाऊंगी वहां और हम ' अकेले-अकेले' कैसे घूमेंगे एक 'नए' शहर में वो भी बच्चों को लेकर। इन लोगों ने तो मुझे साड़ी में लिपटी गुड़िया बना कर रख दिया है। इन्हें लगता है मैं अकेले कुछ नहीं कर सकती। अब मैं इन्हें कैसे समझाऊं मैं क्या थी यहां आने के पहले।" मैं सुन रही थी 20 साल पहले बॉटनी में एम एस सी, कंप्यूटर एप्लिकेशंस में डिप्लोमा लेने वाली की व्यथा और याद कर रही थी एक और नताशा को जो पेड़ों की कठिन डालों पर भी हम सबसे पहले चढ़ जाती, किसी ' बाहरी ताकत' से लड़ाई में हम डरपोकों के सामने कमर पर हाथ रखे तन कर खड़ी हो जाती मजबूत दीवार बनकर, कभी स्कार्ट-शर्ट पर छोटी सी टाई लगाती तो कभी ट्राउजर्स पहने बजाज स्कूटर दौड़ाती उसकी छोटी-मोटी मरम्मत करती और किसी टक्कर में दांत तुडाकर अगले दिन फिर तैयार रहती उसी स्कूटर की सवारी को, जबकि हम पिद्दी सी लूना (मोपेड) से ही संतुष्ट रहते, हर खेल में लड़कों से मुकाबले को तैयार रहती, स्कूल की दौड़ों में अपने हाउस को जितवाती...

Thursday, December 27, 2007

टुकड़े जिंदगी के

आर अनुराधा


मेरी, आपकी और हमारे आस-पास बिखरी जिंदगियों के कुछ टुकड़ों को, जो ध्यान देने लायक लगे, शब्दों के जरिए सामने रखने की कोशिश। इसमें घटना और उसके संदर्भों को सीधे-सीधे बयान करने पर जोर होगा, टिप्पणी-विमर्श-मीमांसा का पक्ष आपके जिम्मे रहेगा। दरअसल प्रणव प्रियदर्शी (इस ब्लॉग के संस्थापक साथी) ने मुझे उकसाया महिला मुद्दों पर कुछ लिखने के लिए। तो मैंने अंगुली से पोहंचे तक पहुंचने के ख्वाब देख डाले।


सलामत रहे दोस्ताना नताशा-अनुराधा का (भाग-1)


नताशा मेरी बचपन की सहेली है। उस बचपन की जब हम दोस्ती का मतलब नहीं जानते थे। बस, खेलने के लिए हर शाम घर से निकलते, जम कर खेलते और संझा-बाती होते ही (हमें हिदायत थी- कालोनी में एक भी घर की या सड़क किनारे की बत्ती जली तो फौरन घर लौटो) अपने-अपने घरों की तरफ दौड़ जाते। मेरी उम्र थी तीन साल और नताशा की, इससे कोई आठ महीने ज्यादा। हम साथ बड़े हुए, शादियां और बच्चे भी हुए और सब कुछ ठीक-ठाक रहा।

मैं दिल्ली में सरकारी नौकरी में,एकल परवार में और वह उज्जैन में एक संयुक्त व्यापारी परिवार में। बीच-बीच में, दो-तीन साल में मुलाकातें होती रहीं और चिट्ठी-पत्री भी जारी रही। उसकी तीन बेटियां हुईं। फिर एक दिन बातों बातों में उसने जाहिर किया कि उसे परिवार को और बढ़ाने में कोई गुरेज नहीं, बेटे की चाह में, और दरअसल वह जल्द ही यह कर गुजरने की तैयारी में है। "घर में सब कहते हैं इतना बड़ा कारोबार है, उसे चलाने वाला भी तो कोई चाहिए न! और फिर इस बार उज्जैन के सिंहस्थ मेले में एक बाबाजी ने मेरा माथा देखकर ही बता दिया था कि मेरी चौथी संतान बेटा होगी। "

इतना पढ़-लिख कर भी घर-समाज के सामने सर झुकाए चलती जा रही है मेरी बाल सखी। क्या उसके परिवार को लगता है कि बड़ी होकर तीनों बेटियों में से एक भी इतनी काबिल न होगी कि उस कारोबार को संभाल सके, और इसलिए वह दुबली-पतली चपला एक बेटे की बारी आने तक बच्चे पैदा करते जाने और अपनी सेहत बिगाड़ते जाने को तैयार है?

मैं इस ख्याल से ही आतंकित हो उठी और वही सहज सवाल कर बैठी- "अगर फिर बेटी हुई तो?" "तो तुझे दे दूंगी, तू भी तो एक बेटी चाहती थी जबकि हुआ बेटा। " उसकी मासूमियत अब तक बरकरार है। "पता है, हमारे पड़ोस में ऐसा ही हुआ दो सहेलियों में। एक को लड़की हुई तो उसकी सहेली ने दस दिन बाद ही उसे गोद ले लिया। मेरी बेटी तेरे पास पलेगी दिल्ली में।"

मैंने हामी भर दी- "ठीक है, मैं तुम्हारी बेटी को जरूर अपने पास रखूंगी, बड़ा करूंगी लेकिन एक शर्त पर कि फिर तुम और बच्चों के बारे में नहीं सोचोगी।" उस वक्त हमारी बात-चीत वहीं खत्म हो गई।

Tuesday, December 25, 2007

क्यो हमसे ज्यादा प्रामाणिक मानी जाती है मोदी की आवाज?

प्रणव प्रियदर्शी


कुछ लोगों को नरेन्द्र मोदी की जीत पर पुलकित होने वालो की बुद्धि पर तरस आता है तो कुछ अन्य को इस बात पर हैरत होती है कि कोई मोदी जैसे व्यक्ति की निंदा भी कर सकता है, वह भी उसकी जीत के वक़्त. दिलीप मंडल ने बिलकुल ठीक लिखा कि चुनाव जीतना और सही या गलत होना - दोनों दो अलग बातें हैं.

मगर इस बात मे भी दो राय नही कि लोकतंत्र मे किसी भी फैसले या नीति के लिए अन्तिम कसौटी जनता की अदालत को माना जाता है. ऐसे मे अगर आज मोदी समर्थक हालिया जनादेश को अपने सही होने का प्रमाण बताना चाहें तो उसे सीधे खारिज नही किया जा सकता. हाँ लोकतंत्र ही हम सबको बहुमत से असहमत होने का अधिकार और असहमति का आदर करने की तमीज भी देता है. (यह अलग बात है कि मोदी लोकतंत्र की इसी खूबी को सबसे ज्यादा खतरनाक मानते हैं और इसे ही नष्ट करने पर आमादा हैं). इसीलिए दिलीप ने कहा है कि जिन आधारों पर वे मोदी को गलत मानते हैं वे आधार मोदी की चुनावी जीत के बावजूद कायम हैं, और यह कि इसीलिए वे अपनी इस राय पर कायम रहेंगे भले मोदी दसियों चुनाव जीत जाएं.


मगर यहाँ सवाल सिर्फ एक दिलीप मंडल का या कुछ दिलीप मंडलों का नही है. दिलीप मंडल जिन्दगी भर मोदी से असहमत रह सकते हैं और उनकी इस पूरी जिन्दगी के दौरान नरेन्द्र मोदी गोधरा के सहारे दंगे करवाने का सिलसिला लगातार जारी भी रख सकते हैं. सवाल यह है कि दिलीप मंडल जैसे लोगों की बातें क्यों असरहीन साबित हो रही हैं और क्यों मोदी जैसे लोगों की बातें गुजरात के मतदाता के एक बडे हिस्से को प्रभावित करती दिख रही हैं?

जवाब शायद यह है कि जिसे हम धर्मनिरपेक्ष राजनीति कहते हैं वह भी आज अपने तर्क उसी साम्प्रदायिक राजनीति से ग्रहण करती है. ऊपरी तौर पर ऐसा न भी दिखे तो मूलतः दोनों के तर्कों मे अंतर नही है. अगर पेड़ के उदाहरण से समझा जाये तो राजनीति की उक्त दोनों धाराओं के लोग एक ही पेड़ की अलग-अलग डालो पर बैठे हैं. वे अपनी डाल को काटने की 'मूर्खता' नही करते, दूसरे की डाल काटने की कोशिश करते हैं, लेकिन इस क्रम मे पेड़ की जड़ तक पहुंच कर उस पर वार करने का उनका दावा खोखला साबित हो जाता है.

इतना ही नही चूँकि दोनों राजनीति मूलतः एक ही है तो जो उसे ज्यादा साफ शब्दों मे प्रकट करे वही ज्यादा प्रामाणिक माना जायेगा. नतीजा यह होता है कि कथित साम्प्रदायिक राजनीति करने वाली भाजपा और उसमे भी कट्टर हिंदुत्व की बात करने वाले मोदी ज्यादा प्रमाणिकता प्राप्त कर लेते हैं. शंकर सिंह वाघेला जैसे लोग न इधर के रहते हैं न उधर के.
लेकिन बात सिर्फ वाघेला की नही कथित छद्म धर्मनिरपेक्ष राजनीति की वकालत करने वाले पूरे समूह की है. हम बुद्धिजीवी भी इससे बाहर नही हैं.

कई असुविधाजनक सवालों के जवाब हमे भी देने होंगे. हमे यह बताना होगा कि हिन्दू के रूप मे कोई सवाल उठाना अगर साम्प्रदायिक सोच का प्रतीक है तो मुस्लिम सवाल को उठाना प्रगतिशीलता का प्रमाण क्यों मान लिया जाता है? अगर सवर्ण दृष्टि दोषपूर्ण है तो दलित दृष्टि प्रगतिशील कैसे हो सकती है? अगर राजनीति या समाज को धर्म के चश्मे से देखना हानिकारक है तो जाति के चश्मे से देखना लाभदायक कैसे हो सकता है?

क्या ये सब एक ही सिक्के के दो पहलू नहीं हैं? हिदू दृष्टि और मुस्लिम दृष्टि मे मूलतः क्या अंतर हो सकता है? (कृपया हिन्दू या मुस्लिम के रूप मे इसका उत्तर न ढूंढें). इसी प्रकार सवर्ण और दलित सोच भी एक ही सिक्के के दो पहलू हैं.

चूंकि हमारी मूल आपत्ति इस बात पर है कि भावनाओं के सहारे लोगों को हांकने की कोशिश नही होनी चाहिए और उपरोक्त सभी मुद्दे हमारी भावनात्मक पहचानो से जुडे हैं, इसीलिए इन पर आधारित बहस हमे किसी सर्वथा अलग निष्कर्ष की ओर नही ले जायेगी. वैसे ही जैसे इन पर आधारित राजनीति किसी बुनियादी तौर पर अलग, बेहतर समाज की नींव नही रख पायेगी.

और आज की तारीख मे हम न तो बुनियादी तौर पर अलग बहस शुरू कर पा रहे हैं, ना ही ऐसी राजनीति की जमीन बना पा रहे हैं. इसीलिए नरेन्द्र मोदियों के मुकाबले हमारी-आपकी आवाज नक्कारखाने मे तूती की आवाज ही साबित होनी है.

Monday, December 24, 2007

हे मोदी की जीत पर पुलकित होने वालों...

...चुनाव हिटलर ने भी जीता था, चुनाव बुद्धदेव भी जीतते हैं। जीतना और सही होना समानार्थी नहीं है! आप कहेंगे सही और गलत कौन तय करेगा? सही और गलत तो हमेशा समय की प्रभावशाली धारा ही तय करती है। लेकिन हम में से हरेक को सही और गलत की अपनी अपनी परिभाषाएं बनाने का अधिकार है और नहीं है तो होना चाहिए।

मेरी परिभाषा कहती है कि मोदी जिस बुनियाद पर खड़े हैं, मोदी जिसके लिए देश और दुनिया में जाने जाते हैं, लोकतंत्र में उस विचार की नैतिक सत्ता नहीं है। चुनाव तो शाहबुद्दीन भी जीतता है, सूरजभान भी जीतता है, मदन भैया भी जीत जाता है, गवली भी जीतता है, सारे डॉन चुनाव जीतते हैं, शराब माफिया, तस्कर सभी तो चुनाव जीतते हैं, तो क्या आप उनकी भी इसलिए जय जयकार करेंगे कि उन्होंने जनादेश हासिल कर लिया है। दुनिया के ज्यादातर तानाशाह चुनाव जीत कर ही तो आते हैं। तो लगाइए हिटलर जिंदाबाद के नारे।

जो मोदी गोधरा कांड के बाद की हिंसा को सही ठहराता है, वो मोदी धिक्कार के ही योग्य है और शर्म आनी चाहिए उन लोगों को जो हिटलर के लिए जिंदाबाद करते हैं। (ये नहीं भूलना चाहिए कि गोधरा कांड की निंदा करने में में जिन्हें शर्म आती है, उनसे मोदी को ताकत मिलती है।) लोकतंत्र में राजकाज को जिस नैतिक बल के आधार पर चलना चाहिए, वो बल मोदी उस समय खो देते हैं जब वो सोहराबुद्दीन की एनकाउंटर में हत्या को सही ठहराते हैं। सोहराबुद्दीन अपराधी था, व्यापारयों से हफ्ता वसूली करता था तो भी क्या पूरे देश में जिन पर भी ऐसे आरोप हैं उन्हें पुलिस गोली मार दे। और कौन साबित करेगा कि ये आरोप सही हैं। क्या इसके लिए शहरों में जनमत संग्रह कराएंगे?

मोदी की आलोचना करने का मतलब ये नहीं है कि कांग्रेस कोई पाक साफ है। मोदी के काल में जितना बड़ा दंगा हुआ, उससे बड़े दंगे कांग्रेस ने कराए हैं। गुजरात में भी और गुजरात के बाहर भी। दंगे कभी मुसलमानों के खिलाफ तो कभी सिखों के खिलाफ। दंगे कराने में मोदी तो कांग्रेसियों के मुकाबले बच्चे हैं। अभी के दिनों को देखें तो हत्या एं कभी पूर्वोत्तर में कराई जाती है तो कहीं नक्सली के नाम पर आदिवासियों का संहार कर रही है कांग्रेस। वामपंथियों का कारनामा आप पश्चिम बंगाल में लगातार देख ही रहे हैं। ऐसे लोग जब मोदी की निंदा करते हैं तो वो प्रहसन से ज्यादा कुछ नहीं है।

तेल निकालने वाली जाति के मोदी के खिलाफ इस बार कांग्रेस ने सवर्ण गोलबंदी की कोशिश की थी। कांग्रेस गुजरात में सेकुलर राजनीति के लिए नहीं जानी जाती है। इस बार भी वो सेकुलर राजनीति नहीं कर रही थी। वो जाति की राजनीति कर रही थी। मोदी भी पटेल वर्चस्व के खिलाफ जाति की ही राजनीति कर रहे थे। जाति की राजनीति में मोदी ने कांग्रेस को पीट दिया। सांप्रदायिक नारों के साथ मोदी ने सवर्णों के बड़े हिस्से को भी गोलबंद कर लिया और केशुभाई से लेकर गोवर्धन झड़फिया और कांग्रेसी मुंह ताकते रह गए।

बहरहाल मोदी की जीत के समय में भी मैं मोदी की निंदा करता हूं। वैसी तमाम विचारधाराओं के क्षय की कामना करता हूं जो किसी समुदाय के खिलाफ घृणा पर कायम है। मोदी और बुद्धदेव जीवन पर्यंत चुनाव जीतते रहे तो भी मैं उनसे असहमत होने के अपने अधिकार का इस्तेमाल करना चाहता हूं। जो भी नेता और व्यक्ति ऐसा देश बनाना चाहते हैं, जहां हमारे बच्चे और बच्चियां चैन से न जी सकें, उनके और उनके विचार के नाश की कामना करता हूं। - दिलीप मंडल

Sunday, December 23, 2007

हमारी संस्कृति और जाति व्यवस्था को मत छेड़ो प्लीज़...

...गुलामी भी हम बर्दाश्त कर लेंगे

क्या देश के बीते लगभग एक हजार साल के इतिहास की हम ऐसी कोई सरलीकृत व्याख्या कर सकते हैं? ऐसे नतीजे निकालने के लिए पर्याप्त तथ्य नहीं हैं। लेकिन हाल के वर्षों में कई दलित चिंतक ऐसे नतीजे निकाल रहे हैं और दलित ही नहीं मुख्यधारा के विमर्श में भी उनकी बात सुनी जा रही है। इसलिए कृपया आंख मूंदकर ये न कहें कि ऐसा कुछ नजर नहीं आ रहा है।

भारत में इन हजार वर्षों में एक के बाद एक हमलावर आते गए। लेकिन ये पूरा कालखंड विदेशी हमलावरों का प्रतिरोध करने के लिए नहीं जाना जाता है। प्रतिरोध बिल्कुल नहीं हुआ ये तो नहीं कहा जा सकता लेकिन समग्रता में देखें तो ये आत्मसमर्पण के एक हजार साल थे। क्या हमारी पिछली पीढ़ियों को आजादी प्रिय नहीं थी? या फिर अगर कोई उन्हें अपने ग्रामसमाज में यथास्थिति में जीने देता था, उनकी पूजा पद्धति, उनकी समाज संरचना, वर्णव्यवस्था आदि को नहीं छेड़ता था, तो वो इस बात से समझौता करने को तैयार हो जाते थे कि कोई भी राजा हो जाए, हमें क्या?

ऐतिहासिक साक्ष्यों के आधार पर इसका जवाब ढूंढने की कोई कोशिश अगर हुई है, तो वो मेरी जानकारी में नहीं है। देश की लगभग एक हजार साल की गुलामी की समीक्षा की बात शायद हमें शर्मिंदा करती है। हम इस बात का जवाब नहीं देना चाहते कि हजारों की फौज से लाखों की फौजें कैसे हार गई। हम इस बात का उत्तर नहीं देना चाहते कि कहीं इस हार की वजह ये तो नहीं कि पूरा समाज कई स्तरों में बंटा था और विदेशी हमलावरों के खिलाफ मिलकर लड़ने की कल्पना कर पाना भी उन स्थितियों में मुश्किल था? और फिर लड़ने का काम तो वर्ण व्यवस्था के हिसाब से सिर्फ एक वर्ण का काम है!

इतिहास में झांकने का मकसद अपनी पीठ पर कोड़े मारकर खुद को लहूलुहान कर लेना कतई नहीं हो सकता, लेकिन हमें ये भी नहीं भूलना चाहिए कि गलतियों से न सीखने वाले दोबारा और अक्सर ज्यादा बड़ी गलतियां करने को अभिशप्त होते हैं।

भारत पर राज करने शासकों में से शुरूआती मुगल शासकों ने अपेक्षाकृत निर्बाध तरीके से (हुमायूं के शासनकाल के कुछ वर्षों को छोड़कर) देश पर राज किया। मुगल शासकों ने बाबर के समय से ही तय कर लिया था कि इस देश के लोग अपना जीवन जिस तरह चला रहे हैं, उसमें न्यूनतम हस्तक्षेप किया जाए। जजिया टैक्स लगाना उस काल के हिंदू जीवन में एकमात्र ऐसा मुस्लिम और शासकीय हस्तक्षेप था, जिससे आम लोगों को कुछ फर्क पड़ता था। ये पूरा काल अपेक्षाकृत शांति से बीता है। औरंगजेब ने जब हिंदू यथास्थिति को छेड़ा तो मुगल शासन के कमजोर होने का सिलसिला शुरू हो गया।

उसके बाद आए अंग्रेज शासकों ने भारतीय जाति व्यवस्था का सघन अध्ययन किया। उस समय के गजेटियर इन अध्ययनों से भरे पड़े हैं। जाति व्यवस्था की जितनी विस्तृत लिस्ट आपको अंग्रेजों के लेखन में मिलेगी, उसकी बराबरी समकालीन हिंदू और हिंदुस्तानी लेखन में भी शायद ही कहीं है। एक लिस्ट देखिए जो संयुक्त प्रांत की जातियों का ब्यौरा देती है। लेकिन अंग्रेजों ने भी आम तौर पर भारतीय परंपराओं खासकर वर्ण व्यवस्था को कम ही छेड़ा।

मैकाले उन चंद अंग्रेज अफसरों में थे, जिन्होंने जाति व्यवस्था और उससे जुड़े भेदभाव पर हमला बोला। समान अपराध के लिए सभी जातियों के लोग समान दंड के भागी बनें, इसके लिए नियम बनाना एक युगांतकारी बात थी। पहले लॉ कमीशन की अध्यक्षता करते हुए मैकाल जो इंडियन पीनल कोड बनाया, उसमें पहली बार ये बात तय हुई कि कानून की नजर में सभी बराबर हैं और अलग अलग जातियों को एक ही अपराध के लिए अलग अलग दंड नहीं दिया जाएगा। शिक्षा को सभी जाति समूहों के लिए खोलकर और शिक्षा को संस्कृत और फारसी जैसी आभिजात्य भाषाओं के चंगुल में मुक्त करने की पहल कर मैकाले ने भारतीय जाति व्यवस्था पर दूसरा हमला किया।

गुरुकुलों से शिक्षा को बाहर लाने की जो प्रक्रिया मैकाले के समय में तेज हुई, उससे शिक्षा के डेमोक्रेटाइजेशन का सिलसिला शुरू हुआ। अगर आज देश में 50 लाख से ज्यादा (ये संख्या बार बार कोट की जाती है, लेकिन इसके स्रोत को लेकर मैं आश्वस्त नहीं हो, वैसे संख्य़ा को लेकर मुझे संदेह भी नहीं है) दलित मिडिल क्लास परिवार हैं, तो इसकी वजह यही है कि दलितों को भी शिक्षा का अवसर मिला और आंबेडकर की मुहिम और पूना पैक्ट की वजह से देश में आरक्षण की व्यवस्था हुई।

ये शायद सच है कि मैकाले इन्हीं वजहों से आजादी के बाद देश की सत्ता पर काबिज हुई मुख्यधारा की नजरों में एक अपराधी थे। भारतीय संस्कृति पर हमला करने के अपराधी। देश को गुलाम बनाने वालों से भी बड़े अपराधी। हम विदेशी हमलावरों को बर्दाश्त कर लेते हैं, लेकिन हमारी जीवन पद्धति खासकर वर्णव्यवस्था से छेड़छाड़ करने वाला हमारे नफरत की आग में जलेगा।

वीपी सिंह की मिसाल लीजिए। उन्होंने जीवन में बहुत कुछ किया। उत्तर प्रदेश में डकैत उन्मूलन के नाम पर पिछड़ों पर जुल्म ढाए, राजीव गांधी की क्लीन इमेज को तार तार कर दिया, बोफोर्स में रिश्वतखोरी का पर्दाफाश किया, लेकिन मुख्यधारा उन्हें इस बात के लिए माफ नहीं करेगी कि उन्होंने मंडल कमीशन की रिपोर्ट लागू करने की कोशिश की। हालांकि वीपी सिंह ने ये कदम राजनीतिक मजबूरी की वजह से उठाया था और वो पिछड़ों के हितैषी कभी नहीं रहे फिर भी वीपी सिंह सवर्ण मानस में एक विलेन हैं और पूरी गंगा के पानी से वीपी सिंह को धो दें तो भी उनका ये 'पाप' नहीं धुल सकता। ये चर्चा फिर कभी।

जाहिर है मैकाले को लेकर दो एक्सट्रीम चिंतन हैं। लेकिन सवाल ये उठता है कि क्या इसके लिए मैकाले की पूजा होनी चाहिए या उनकी तस्वीर को गोली मार देनी चाहिए। इस अतिवाद को छोड़कर देखें तो मैकाले के समय का द्वंद्व नए और पुराने के बीच, प्राच्य और पाश्चात्य के बीच का था। मैकाले उस द्वंद्व में नए के साथ थे, पाश्चत्य के साथ थे। अंग्रेजी शिक्षा के लिए उनके दिए गए तर्क उनके समग्र चिंतन से अलग नहीं है। इसलिए ये मानने का कोई आधार नहीं है कि मैकाले ने साजिश करके भारत में अंग्रेजी शिक्षा की नींव डाली। उनका मिनिट ऑन एजुकेशन (1835) पढ़ जाए। भारत के प्रति मैकाले में न प्रेम है न घृणा। एक शासक का मैनेजेरियल दिमाग है, जो अपनी मान्यताओं के हिसाब से शासन करने के अपने तरीके को जस्टिफाई कर रहा है।

मैकाले की इस बात के लिए प्रशंसा करना विवाद का विषय है कि उनकी वजह से देश में अंग्रेजी शिक्षा आई और भारत आज आईटी सेक्टर की महाशक्ति इसी वजह से बना हुआ है और इसी ज्ञान की वजह से देश में बीपीओ इंडस्ट्री फल फूल रही है। चीन में मैकाले जैसा कई नहीं गया। चीन के लोगों ने अंग्रेजी को अपनाने में काफी देरी की, फिर भी चीन की अर्थव्यवस्था भारत से कई गुना बड़ी है। लेकिन चीन का आर्थिक और सामाजिक परवेश हमसे अलग है और ये तुलना असमान स्थितियों के बीच की जा रही है और भाषा का आर्थिक विकास में योगदान निर्णायक भी नहीं माना जा सकता। - दिलीप मंडल

Friday, December 21, 2007

भारतीय इतिहास का दा विंची कोड

मैकाले पुराण इस समय छेड़ने की वजह अक्टूबर महीने में यूनिवर्सिटी ऑफ पेंसिलवेनिया से मेरे पास आया एक निमंत्रण है। निमंत्रण एक पार्टीनुमा कार्यक्रम में शामिल होने का था। कार्यक्रम 26 अक्टूबर के लिए था। ये पढ़कर मैं चौंका कि ये निमंत्रण मैकाले का जन्मदिन मनाने के लिए किया जा रहा है। इसे डे ऑफ रिजन यानी तर्क-दिवस नाम दिया गया था। कार्यक्रम मैकाले के जन्मदिन के एक दिन बाद के लिए था। निमंत्रण में ये साफ लिखा था कि इसमें फिलाडेल्फिया की कंपनी टेंपसॉल्यूशंस के मालिक माइकल थेवर भी शामिल होंगे। माइकल थेवर मुंबई के स्लम में बड़े हुए और और अब वो अमेरिका में अफर्मेटिव एक्शन के चैंपियन हैं।

उस निमंत्रण पत्र की कुछ पंक्तियां यहां रख रहा हूं। पार्टी में मैं जा नहीं पाया, इसलिए वहां क्या हुआ, इसका ब्यौरा देना संभव नहीं है। आप भी पढ़िए और चौंकने के लिए तैयार हो जाइए -

मैकाले शायद पहला शख्स था जिसने भारत के स्वतंत्र होने की कल्पना की थी। मैकाले का 10 जुलाई, 1833 को ब्रिटिश संसद में दिया गया भाषण देखिए - "भारत के लोग कुशासन में रहें और हमारे गुलाम रहें, इससे बेहतर है कि वो आजाद हों और अपना शासन अच्छे से चलाएं।"

इसी भाषण में मैकाले कहते हैं- "हमें कहा जाता है कि ऐसा समय कभी नहीं आएगा जब भारतीय लोग सिविल और मिलिट्री सर्विस में ऊंचे पदों पर आसीन होंगे। मैं इस सोच का कड़ा प्रतिवाद करता हूं।"

रंग में भारतीय पर विचार में अंग्रेज वाला बार बार दोहराया जाने वाला पूरा कोट इस तरह है-

“"In point, I fully agree with the gentlemen to whose general views I am opposed to. I feel with them that it is impossible for us, with our limited means, to attempt to educate the body of the people. We must at present do our best to form a class who may be interpreters between us and the millions whom we govern; a class of persons, Indian in blood and colour, but English in taste, in opinions, in morals, and in intellect. To that class we may leave it to refine the vernacular dialects of the country, to enrich those dialects with terms of science borrowed from the Western nomenclature, and to render them by degrees fit vehicles for conveying knowledge to the great mass of the population”.

भारतीय इतिहास की हर किताब में इस कोटेशन की पहली और आखिरी लाइन का जिक्र नहीं होता। पहली लाइन में इस बयान का संदर्भ है कि "जब तक हम भारत के सभी लोगों को शिक्षा दे पाने में समर्थ नहीं हो पाते हैं" जबकि आखिरी लाइन में बताया गया है कि किस तरह भारतीय भाषाओं में पश्चिमी शब्दावलियों का समावेश किया जाएगा ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगों तक ज्ञान पहुंचाया जा सके।

भारतीय और अरबी साहित्य को नीचे दर्जे का मानने वाले मैकाले अपने देश के पुराने साहित्य के बारे में भी अच्छी राय नहीं रखते थे। इसलिए इस बारे में उनका विचार नस्लीय भेदभाव से कहीं ज्यादा नवीन और प्राचीन के टकराव का नतीजा है।

मैकाले का भारत पर दो कारणों से निर्णायक असर हुआ है। पहला तो शिक्षा के क्षेत्र में उनके विचारों को अंग्रेजी सरकार ने माना और देश में उच्च शिक्षा के लिए अंग्रेजी माध्यम को मान्यता मिली। उनका दूसरा योगदान देश में आईपीसी और सीआरपीसी लागू करने की दिशा में था, जिसकी वजह से लगभग कई हजार साल बाद भारत में अलग अलग जाति के द्वारा किए गए समान अपराध के लिए समान दंड के कानून का चलन शुरू हुआ।
(मेरी टिप्पणी- मैकाले से नफरत करने के बावजूद भारत में आज भी ये दो चीजें बदली नहीं हैं।)

1933 के उसी भाषण के ये अंश देखिए।

"…सबसे बुरी व्यवस्था वो है जिसमें ब्राह्मणों के लिए हल्के दंड का प्रावधान है क्योंकि वो सृष्टिकर्ता के मुंह से उत्पन्न हुए हैं। जबकि पैरों से उत्पन्न शूद्रों के लिए कड़े दंड का प्रावधान हैं। जाति विभेद और भेदभाव के कारण भारत का काफी नुकसान हो चुका है।"

हिंदू धर्म और शिक्षा के बारे में मैकाले प्राच्यविदों को जवाब देते हैं -

" (आपकी बात मानें तो) हमें उन्हें गलत इतहास, गलत खगोलशास्त्र, गलत चिकित्साशास्त्र पढ़ाना होगा क्योंकि गलत बातें सिखाने वाला धर्म इनसे जुड़ा है... भारतीय युवकों को ये सिखाना उनका समय नष्ट करना होगा कि गधे को छूने के कैसे खुद के पवित्र करें और बकरी मारने के पाप से मुक्त कैसे मिलेगी।"

इस निमंत्रण पत्र के मुताबिक क्लाइव ने हिंदुस्तानियों को हराकर उन्हें गुलाम बनाया, ये बात हिंदू मुख्यधारा (सवर्ण चिंतन) बर्दास्त कर सकती है, करती है। इसलिए क्लाइव से नफरत करने की बात हमें नहीं सिखाई जाती। लेकिन भारतीय संस्कृति, जातिव्यवस्था, शिक्षा प्रणाली और धर्म को चुनौती देने वाला मैकाले को बर्दास्त कैसे किया जा सकता है?

(मेरी टिप्पणी)
एक सवाल है आपसे। आज कल्पना कीजिए अगर ब्रिटिश संसद की उस बहस में मैकाले की हार हो गई होती और प्राच्यविद जीत गए होते। उस आधुनिक भारत कि कल्पना कीजिए जहां के सभी विश्वविद्यालयों और इंस्टिट्यूट में संस्कृत और फारसी और ऊर्दू में पढ़ाई हो रही हो। और कल्पना कीजिए उस भारत की जहां एक ही अपराध के लिए ब्राहा्ण, क्षत्रीय, वैश्य और शूद्र अलग-अलग सजाएं भुगत रहे होते।

यानी इस मैकाले में अभी बहुत जान है! कई सवाल खड़े करता है ये मसला। बहस में बने रहिए हमारे साथ। आगे इस निमंत्रण पत्र में लिखी बातों की सच्चाई जानेंगे और उस कोड को ब्रेक करने की कोशिश करेंगे, जिसका नाम आधुनिक भारतीय इतिहास है। अभी किसी फैसले पर मत पहुंचिए। मानस खुला रखिए और हो सके तो किसी कोने में पड़ी इतिहास की किताबों की धूल झाड़िए। क्योंकि हमारे ही देश के कुछ लोग मैकाले की तस्वीर को जूते नहीं मार रहे हैं, उसकी पूजा कर रहे हैं।

तो दोस्त, सतरंगी भारतीय समाज जितने जवाब देता है उससे कहीं ज्यादा सवाल खड़े करता है। हम सभी भाग्यशाली है कि इतने रोचक और तेजी से बदलते समय को देख पा रहे हैं। जारी रहेगी ये चर्चा।

क्या आपने "क्लाइव की औलाद" जैसी कोई गाली सुनी है?

लेकिन सवाल ये है कि आज क्लाइव और मैकाले की बात ही क्यों करें? सही सवाल है। समय का पहिया इतना आगे बढ़ गया है। ऐसे में इतिहास के खजाने से या कूड़ेदान से कुछ निकालकर लाने का औचित्य क्या है? चलिए इसका जवाब भी मिलकर ढूंढेंगे, अभी जानते हैं इतिहास के इन दो पात्रों के बारे में। आप ये सब वैसे भी पढ़ ही चुके होंगे। स्कूल में नहीं तो कॉलेज में।

कौन था क्लाइव


क्लाइव न होता तो क्या भारत में कभी अंग्रेजी राज होता? इतिहास का चक्र पीछे लौटकर तो नहीं जाता इसलिए इस सवाल का कोई जवाब नहीं हो सकता। लेकिन इतिहास हमें ये जरूर बताता है कि क्लाइव के लगभग एक हजार यूरोपीय और दो हजार हिंदुस्तानी सिपाहयों ने पलासी की निर्णायक लड़ाई (22 जून, 1757) में बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला को हरा कर भारत में अंग्रेजी राज की नींव रखी थी। वो लड़ाई भी क्या थी? सेनानायक मीरजाफर ने इस बात का बंदोबस्त कर दिया था कि नवाब की ज्यादातर फौज लड़ाई के मैदान से दूर ही रहे। एक दिन भी नहीं लगे थे उस युद्ध में। उस युद्ध के बाद अंग्रेजों ने भारतीय संपदा की लूट का जो सिलसिला शुरू किया, उसकी बराबरी दक्षिण अमेरिका में स्पेन के युद्ध सरदारों की मचाई लूट से ही की जा सकती है।

और कौन था मैकाले

मैकाले को भारतीय इतिहास का हर छात्र एक ऐसे शख्स के रूप में जानता है जिसने देश को तो नहीं लेकिन भारतीय मानस को जरूर गुलाम बनाया। हमारी सामूहिक स्मृति में इसका असर इस रूप में है कि हम जिसे विदेशी मिजाज का, देश की परंपरा से प्रेम न करने वाला, विदेशी संस्कृति से ओतप्रोत मानते हैं उसे मैकाले पुत्र, मैकाले की औलाद, मैकाले का मानस पुत्र, मैकाले की संतान आदि कहकर गाली देते हैं।

लेकिन भारत में अंग्रेजी राज की स्थापना के सबसे महत्वपूर्ण प्रतीक क्लाइव को लेकर हमारे यहां घृणा का ऐसा भाव आश्चर्यजनक रूप से नहीं है। आखिर ऐसा क्यों है। मैकाले जब भारत आया तो भारत में अंग्रेजी राज जड़ें जमा चुका था। मैकाले को इस बात के लिए भी दोषी नहीं ठहराया जा सकता है कि उसने क्लाइव की तरह तलवार और बंदूक के बल पर एक देश को गुलाम बनाया। या कि उसने छल से बंगाल के नवाब को हरा दिया। मैकाले अपने हाथ में तलवार नहीं कलम लेकर भारत आया था।

लेकिन मैकाले फिर भी बड़ा विलेन है।

मैकाले हमारी सामूहिक स्मृति में घृणा का पात्र है तो ये अकारण नहीं है। मैकाले के कुछ चर्चित उद्धरणों को देखें। उसका दंभ तो देखिए

"मुझे एक भी प्राच्यविद (ओरिएंटलिस्ट) ऐसा नहीं मिला जिसे इस बात से इनकार हो कि किसी अच्छी यूरोपीय लाइब्रेरी की किताबों का एक रैक पूरे भारत और अरब के समग्र साहित्य के बराबर न हो।"

और उनके इस कथन को कौन भूल सकता है। प्रोफेसर बिपिन चंद्रा की एनसीईआरटी की इतिहास की किताब में देखिए।

" फिलहाल हमें भारत में एक ऐसा वर्ग बनाने की कोशिश करनी चाहिए जो हमारे और हम जिन लाखों लोगों पर राज कर रहे हैं, उनके बीच इंटरप्रेटर यानी दुभाषिए का काम करे। लोगों का एक ऐसा वर्ग जो खून और रंग के लिहाज से भारतीय हो, लेकिन जो अभिरूचि में, विचार में, मान्यताओं में और विद्या-बुद्धि में अंग्रेज हो।"

इतिहासकार सुमित सरकार मैकाले को कोट करते हैं-

"अंग्रेजी में शिक्षित एक पढ़ा लिखा वर्ग, रंग में भूरा लेकिन सोचने समझने और अभिरुचियों में अंग्रेज।"

भारतीय इतिहास की किताबों में मैकाले इसी रूप में आते हैं। पांचजन्य के एक लेख में मैकाले इस शक्ल में आते हैं-

लार्ड मैकाले का मानना था कि जब तक संस्