कृपया आप सब लोग अपने ब्लॉग से वो पोस्ट और टिप्पणियां हटाइए, जो आपको लगता है कि आपके ब्लॉग पर नहीं होनी चाहिए। ये आपका अपना फैसला होगा। अधिकार के साथ जिम्मेदारियां भी साथ आती हैं। कृपया कभी कभी दूसरों की जीत का सुख लेने की भी कोशिश कीजिए। अपनी जीत पर तो बच्चे भी खुश हो लेते हैं।
अपने दोस्तों को निराश मत कीजिए। आपकी परिपक्वता कसौटी पर है। इस इम्तेहान से सफल होकर निकलिए। काम पर चलिए। आपके ढेरों दोस्त आपकी जीत की कामना कर रहे हैं।
नमस्ते।
दिलीप मंडल
Friday, February 29, 2008
Thursday, February 28, 2008
बाल ठाकरे से आगे बढ़ गए राज ठाकरे
प्रणव प्रियदर्शी
महाराष्ट्र मे राज ठाकरे ने पिछले कुछ अरसे से हंगामा मचा रखा है. ऐसा कि हजारों की संख्या मे उत्तर भारतीय अपने रोजगार की चिंता छोड़ अपने-अपने मुलुक को लौट रहे हैं. उन्हें मालूम है कि गाँव जाकर वे फिर उन्ही समस्याओं से दो-चार होंगे जिनकी वजह से उन्हें अपना घर-बार छोड़ परदेस आना पड़ा था. इसके बावजूद जान बचाने की चिंता उन्हें बरसों की मेहनत पर पानी फेरने से भी नही हिचकने दे रही.
उन पर हमले कर रहे हैं वे लोग जो उन जैसे ही बेचारे हैं. जो महाराष्ट्र मे जन्मे यही पले-बढे हैं. जिनके माँ-बाप भी महाराष्ट्रियन हैं. इसके बावजूद उन्हें ढंग की नौकरी नही मिल पा रही. वे बहुत ज्यादा नही चाहते. 'साई इतना दीजिये जामे कुटुंब समय, मैं भी भूखा ना रहूँ, साधू न भूखा जाये.' बस इतनी ही इनकी जरूरत है. उतना ही पाने की इच्छा भी है. किसी का मुहताज न हों. इज्जत से अपना और अपने परिवार का पालन-पोषण कर सके. मगर यह भी नही मिलता. इन लोगों को.
उन लोगों को भी यह अपने राज्य मे नही मिला, जिन पर ये 'बेचारे' लोग हमले कर रहे हैं. तभी तो उन्हें यहाँ आना पडा दूसरों की गालियाँ सुनने.
मगर, जो राज ठाकरे बाहर से आये बेचारों से स्थानीय बेचारों को लड़ा रहे हैं, वे बेचारे नही हैं. उनके पास अथाह सम्पत्ति है. मगर उन्हें और चाहिए. पैसा भी, ताकत भी. उनके चाचा ने भी ठीक यही काम किया था. पिछले चार दशक से करते आ रहे हैं. इस क्रम मे उन्होने अपने लिए, अपने परिवार के लिए, अपने चेलो के लिए बेशुमार दौलत कमाई. वे और उनसे जुडे लोग मालामाल हो गए. आम लोग नही, उनसे जुडे खास लोग. लेकिन आज तक बाल ठाकरे आम लोगों की नज़र मे बेनकाब नही हुए. उनकी पोल नही खुली. महाराष्ट्र के कथित आम लोग आज भी उनके आदेश के आगे नतमस्तक हैं. इन्ही आम लोगों के बूते सीनियर ठाकरे राजाओं जैसा रूतबा रखते हैं. वैसा ही कुछ राज ठाकरे भी हासिल करना चाहते हैं और बहुत संभव है कि वे कर भी लेंगे. बाल ठाकरे की ही तरह उन्हें भी अन्दर ही अन्दर सरकार का समर्थन प्राप्त है.
गौर करने की बात है कि राज ठाकरे इतिहास को ज्यों का त्यों नही दोहरा रहे हैं. वे बाल ठाकरे के (कु)कृत्यों को आगे बढा रहे हैं. बाल ठाकरे ने भी मुम्बई के दक्षिण भारतीयों के मन मे खौफ पैदा किया था. उनमे से बहुतों को भागने पर मजबूर किया था. इन कार्यों के जरिये उन्होने स्थानीय आबादी के मन मे यह भाव जगाया कि वे उनके हितों की रक्षा कर सकते हैं. उनका असली मकसद उद्योगों को ट्रेड यूनियनों से छुटकारा दिलाना था. कामगारों की एकता के चलते उद्योगपति कर्मचारियों के खिलाफ मनमाने ढंग से फैसले नही कर पाते थे. बाल ठाकरे की अगुवाई मे और कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों के सहयोग से शिव सेना ने इस काम को बखूबी अंजाम दिया. कामगार समुदाय क्षेत्र के आधार पर बंट गया. उसकी ताकत बिखर गयी.
लेकिन राज ठाकरे अब एक कदम आगे बढ़ गए हैं. 'समय की जरूरत' देखते हुए. सीनियर ठाकरे के दौर मे कम ही सही, नौकरियां थीं. यूनियनों की ताकत बची हुयी थी. लेकिन अब मौजूदा साम्राज्यवादी अर्थव्यवस्था के दौर मे नौकरिया नाम मात्र को ही रह गयी हैं. इसलिए राज ठाकरे उस तरफ ध्यान नही दे रहे. टैक्सी यूनियनों मे जरूर वे अपनी पैठ बना रहे हैं हिंसात्मक उपायों से, लेकिन अन्य क्षेत्रों मे वे आजीविका के साधनों को एक से छीन कर दूसरे को देने का काम हाथ मे ले चुके हैं. शुरुआत दूध वितरण से हुयी है. 'भैयों' को भगा कर उनकी जगह दूध बेचने का काम मराठी युवकों को देने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है. इसके लिए वे एक संगठन श्री कृष्ण दूध वितरण संस्था बना चुके हैं जिसकी औपचारिक घोषणा नौ मार्च को होनी है. यही काम अन्य पेशों - जैसे पानी पूरी, भेल पूरी, सेव पूरी बेचने - मे भी होना है.
गौर कीजिए. मराठी युवकों को रोजगार दिलाने की मांग राज ठाकरे सरकार से नही कर रहे. वे इन युवकों से कह रहे हैं कि जाओ पडोसी का काम उससे छीन लो.
आप इसे असंवैधानिक वगैरह कहते रहिये. सरकार अन्दर से उनके साथ है. उनका कुछ बिगड़ना नही है. अब जिनकी जीविका छीनी जा रही है, आज नही तो कल वे उठेंगे. उन्हें उठना ही होगा. संगठित होंगे और इन लोगो को इन्ही की भाषा मे जवाब देंगे. जैसे राज ठाकरे हैं वैसे ही कोई अमर सिंह या कोई अबू आजमी इनका भी 'रक्षक' बनने का दावा करेगा.
राज और अबू तो राजनीति मे अपनी औकात बढा कर अपना मकसद पूरा कर लेंगे. जो बडा मकसद इन्हें बढावा देने वालों का है वह भी पूरा होगा. बेचारे लोग, हम अपनी शब्दावली मे कहे तो रिजेक्ट समुदाय कभी एक होकर इनसे नौकरी की मांग नही कर पायेगा. यह समुदाय आपस मे एक दूसरे से लड़ता और मरता रहेगा. यही उस सेलेक्ट समूह की जरूरत है जिसका प्रतिधिनिधित्व राज ठाकरे और अबू आजमी कर रहे हैं. खास कर इसलिए कि अब उस सेलेक्ट समूह के पास हमे देने को कुछ नही रह गया है. न नौकरी और न ही कोई अन्य बड़ी रियायत.
ऐसा नही कि उसके संसाधन कम हो गए हैं. सेलेक्ट समूह के पास आज भी अकूत सम्पत्ति है. लेकिन उसका इस्तेमाल और ज्यादा कमाने मे होना है. इसीलिए उन पैसो को विदेशो मे निवेश किया जायेगा. उनसे विदेशी कंपनियों का अधिग्रहण होगा. इस तरह के तमाम दूसरे काम होंगे. मगर अपना श्रम बेच कर आजीविका चलाने वाले रिजेक्ट समूह के लिए उस सेलेक्ट समूह के पास कुछ नही है.
(अगली किस्त : राज ठाकरे ने तो वक्त को पहचान लिया, हम कब पहचानेंगे?)
महाराष्ट्र मे राज ठाकरे ने पिछले कुछ अरसे से हंगामा मचा रखा है. ऐसा कि हजारों की संख्या मे उत्तर भारतीय अपने रोजगार की चिंता छोड़ अपने-अपने मुलुक को लौट रहे हैं. उन्हें मालूम है कि गाँव जाकर वे फिर उन्ही समस्याओं से दो-चार होंगे जिनकी वजह से उन्हें अपना घर-बार छोड़ परदेस आना पड़ा था. इसके बावजूद जान बचाने की चिंता उन्हें बरसों की मेहनत पर पानी फेरने से भी नही हिचकने दे रही.
उन पर हमले कर रहे हैं वे लोग जो उन जैसे ही बेचारे हैं. जो महाराष्ट्र मे जन्मे यही पले-बढे हैं. जिनके माँ-बाप भी महाराष्ट्रियन हैं. इसके बावजूद उन्हें ढंग की नौकरी नही मिल पा रही. वे बहुत ज्यादा नही चाहते. 'साई इतना दीजिये जामे कुटुंब समय, मैं भी भूखा ना रहूँ, साधू न भूखा जाये.' बस इतनी ही इनकी जरूरत है. उतना ही पाने की इच्छा भी है. किसी का मुहताज न हों. इज्जत से अपना और अपने परिवार का पालन-पोषण कर सके. मगर यह भी नही मिलता. इन लोगों को.
उन लोगों को भी यह अपने राज्य मे नही मिला, जिन पर ये 'बेचारे' लोग हमले कर रहे हैं. तभी तो उन्हें यहाँ आना पडा दूसरों की गालियाँ सुनने.
मगर, जो राज ठाकरे बाहर से आये बेचारों से स्थानीय बेचारों को लड़ा रहे हैं, वे बेचारे नही हैं. उनके पास अथाह सम्पत्ति है. मगर उन्हें और चाहिए. पैसा भी, ताकत भी. उनके चाचा ने भी ठीक यही काम किया था. पिछले चार दशक से करते आ रहे हैं. इस क्रम मे उन्होने अपने लिए, अपने परिवार के लिए, अपने चेलो के लिए बेशुमार दौलत कमाई. वे और उनसे जुडे लोग मालामाल हो गए. आम लोग नही, उनसे जुडे खास लोग. लेकिन आज तक बाल ठाकरे आम लोगों की नज़र मे बेनकाब नही हुए. उनकी पोल नही खुली. महाराष्ट्र के कथित आम लोग आज भी उनके आदेश के आगे नतमस्तक हैं. इन्ही आम लोगों के बूते सीनियर ठाकरे राजाओं जैसा रूतबा रखते हैं. वैसा ही कुछ राज ठाकरे भी हासिल करना चाहते हैं और बहुत संभव है कि वे कर भी लेंगे. बाल ठाकरे की ही तरह उन्हें भी अन्दर ही अन्दर सरकार का समर्थन प्राप्त है.
गौर करने की बात है कि राज ठाकरे इतिहास को ज्यों का त्यों नही दोहरा रहे हैं. वे बाल ठाकरे के (कु)कृत्यों को आगे बढा रहे हैं. बाल ठाकरे ने भी मुम्बई के दक्षिण भारतीयों के मन मे खौफ पैदा किया था. उनमे से बहुतों को भागने पर मजबूर किया था. इन कार्यों के जरिये उन्होने स्थानीय आबादी के मन मे यह भाव जगाया कि वे उनके हितों की रक्षा कर सकते हैं. उनका असली मकसद उद्योगों को ट्रेड यूनियनों से छुटकारा दिलाना था. कामगारों की एकता के चलते उद्योगपति कर्मचारियों के खिलाफ मनमाने ढंग से फैसले नही कर पाते थे. बाल ठाकरे की अगुवाई मे और कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों के सहयोग से शिव सेना ने इस काम को बखूबी अंजाम दिया. कामगार समुदाय क्षेत्र के आधार पर बंट गया. उसकी ताकत बिखर गयी.
लेकिन राज ठाकरे अब एक कदम आगे बढ़ गए हैं. 'समय की जरूरत' देखते हुए. सीनियर ठाकरे के दौर मे कम ही सही, नौकरियां थीं. यूनियनों की ताकत बची हुयी थी. लेकिन अब मौजूदा साम्राज्यवादी अर्थव्यवस्था के दौर मे नौकरिया नाम मात्र को ही रह गयी हैं. इसलिए राज ठाकरे उस तरफ ध्यान नही दे रहे. टैक्सी यूनियनों मे जरूर वे अपनी पैठ बना रहे हैं हिंसात्मक उपायों से, लेकिन अन्य क्षेत्रों मे वे आजीविका के साधनों को एक से छीन कर दूसरे को देने का काम हाथ मे ले चुके हैं. शुरुआत दूध वितरण से हुयी है. 'भैयों' को भगा कर उनकी जगह दूध बेचने का काम मराठी युवकों को देने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है. इसके लिए वे एक संगठन श्री कृष्ण दूध वितरण संस्था बना चुके हैं जिसकी औपचारिक घोषणा नौ मार्च को होनी है. यही काम अन्य पेशों - जैसे पानी पूरी, भेल पूरी, सेव पूरी बेचने - मे भी होना है.
गौर कीजिए. मराठी युवकों को रोजगार दिलाने की मांग राज ठाकरे सरकार से नही कर रहे. वे इन युवकों से कह रहे हैं कि जाओ पडोसी का काम उससे छीन लो.
आप इसे असंवैधानिक वगैरह कहते रहिये. सरकार अन्दर से उनके साथ है. उनका कुछ बिगड़ना नही है. अब जिनकी जीविका छीनी जा रही है, आज नही तो कल वे उठेंगे. उन्हें उठना ही होगा. संगठित होंगे और इन लोगो को इन्ही की भाषा मे जवाब देंगे. जैसे राज ठाकरे हैं वैसे ही कोई अमर सिंह या कोई अबू आजमी इनका भी 'रक्षक' बनने का दावा करेगा.
राज और अबू तो राजनीति मे अपनी औकात बढा कर अपना मकसद पूरा कर लेंगे. जो बडा मकसद इन्हें बढावा देने वालों का है वह भी पूरा होगा. बेचारे लोग, हम अपनी शब्दावली मे कहे तो रिजेक्ट समुदाय कभी एक होकर इनसे नौकरी की मांग नही कर पायेगा. यह समुदाय आपस मे एक दूसरे से लड़ता और मरता रहेगा. यही उस सेलेक्ट समूह की जरूरत है जिसका प्रतिधिनिधित्व राज ठाकरे और अबू आजमी कर रहे हैं. खास कर इसलिए कि अब उस सेलेक्ट समूह के पास हमे देने को कुछ नही रह गया है. न नौकरी और न ही कोई अन्य बड़ी रियायत.
ऐसा नही कि उसके संसाधन कम हो गए हैं. सेलेक्ट समूह के पास आज भी अकूत सम्पत्ति है. लेकिन उसका इस्तेमाल और ज्यादा कमाने मे होना है. इसीलिए उन पैसो को विदेशो मे निवेश किया जायेगा. उनसे विदेशी कंपनियों का अधिग्रहण होगा. इस तरह के तमाम दूसरे काम होंगे. मगर अपना श्रम बेच कर आजीविका चलाने वाले रिजेक्ट समूह के लिए उस सेलेक्ट समूह के पास कुछ नही है.
(अगली किस्त : राज ठाकरे ने तो वक्त को पहचान लिया, हम कब पहचानेंगे?)
क्या हुआ तेरा वादा - दैनिक भास्कर में एक लेख
बजट से ठीक पहले सरकार के पुराने वादों और दावों की पड़ताल करता मेरा एक लेख आज के दैनिक भास्कर (राष्ट्रीय संस्करण) के ऑप-एड पेज पर छपा है। सोशल सेक्टर, खासकर शिक्षा और स्वास्थ्य में सरकार के अब तक के कामकाज का लेखा जोखा है। आखिर ये वो सेक्टर है, जिससे हममें से हर एक का वास्ता है। लेख आप दैनिक भास्कर के ई-पेपर में नेशनल एडीशन के पेज -9 पर पढ़ सकते हैं। - दिलीप मंडल
वामपंथी = प्रगतिशील? जरूरी नहीं है
भारत में कम्युनिस्ट नामधारी पार्टियों के बारे में अरसे से कई लोगों में ये भ्रम रहा है कि ये पार्टियां अल्पसंख्यकों और कमजोर तबकों की विरोधी नहीं होती हैं। ऐसी किसी पार्टी की सदस्यता को अक्सर प्रगतिशीलता का पर्याय मान लेने की जिद होती है। ऐसी किसी पार्टी में थोड़ा या ज्यादा समय बिताने वाले भी जीवन भर इसी आधार पर प्रगतिशील कहलाते रहते हैं। लेकिन भारतीय संदर्भ में, खासकर पश्चिम बंगाल के हमारे अनुभव बता रहे हैं कि अल्पसंख्यक और वंचितों का हक मारने में वामपंथी कॉमरेड किसी और पार्टी से पीछे नहीं हैं। बल्कि बाकी पार्टियों को इस मामले में उनसे कुछ गुर सीखने को मिल सकते हैं।
आइए देखते हैं कैसे :
- मुसलमानों की आबादी 25 फीसदी, सरकारी नौकरियों में हिस्सा 2.1 फीसदी। उच्च पदों पर मुसलमान नदारद।
- देश में एससी-एसटी-ओबीसी मिलाकर सबसे कम आरक्षण किस राज्य में। पश्चिम बंगाल में।
- देश में सबसे कम ओबीसी आरक्षण कहां, पश्चिम बंगाल में और कहां।
- मंडल कमीशन की रिपोर्ट को किस राज्य ने सबसे बाद में लागू किया। क्या अब ये भी बताना होगा?
- देश में एससी छात्रों का सबसे ज्यादा ड्रॉप आउट रेट कहां? एक और अश्लील सवाल! आप जरूर वामपंथ विरोधी हैं, सांप्रदायिक हैं, बीजेपी या तृणमूल कांग्रेस या फिर नक्सलियों के एजेंट हैं, जातिवादी हैं, देश की एकता और अखंडता के दुश्मन हैं, कहीं आप अमेरिका के एजेंट तो नहीं।
25 फीसदी मुस्लिम आबादी वाले राज्य पश्चिम बंगाल में मुसलमानों की हालत देश में सबसे बुरी है। ये बात काफी समय से कही जाती थी, लेकिन प्रधानमंत्री द्वारा गठित सच्चर कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में इस बात का प्रमाण जगजाहिर कर दिया है। राज्य सरकार से मिले आंकड़ों के आधार पर सच्चर कमेटी ने बताया है कि पश्चिम बंगाल में राज्य सरकार की नौकरियों में सिर्फ 2.1 फीसदी मुसलमान हैं। जबक केरल में मुस्लिम आबादी का प्रतिशत लगभग बराबर है पर वहां राज्य सरकार की नौकरियों में साढ़े दस फीसदी मुसलमान हैं। पश्चिम बंगाल में मुसलमानों का पिछड़ापन सिर्फ नौकरियों और न्यायिक सेवा में नहीं बल्कि शिक्षा, बैंकों में जमा रकम, बैंकों से मिलने वाले कर्ज जैसे तमाम क्षेत्रों में है।
साथ ही पश्चिम बंगाल देश के उन राज्यों में है, जहां सबसे कम रिजर्वेशन दिया जाता है। पश्चिम बंगाल में दलित, आदिवासी और ओबीसी को मिलाकर 35 प्रतिशत आरक्षण है। वहां ओबीसी के लिए सिर्फ सात फीसदी आरक्षण है। मौजूदा कानूनों के मुताबिक, मुसलमानों को आरक्षण इसी ओबीसी कोटे के तहत मिलता है। पश्चिम बंगाल देश के उन राज्यों में है, जहां मंडल कमीशन की रिपोर्ट आखिर में लागू की गई और पश्चिम बंगाल की वामपंथी सरकार अरसे तक ये कहती रही कि राज्य में कोई पिछड़ा नहीं है।
सच्चर कमेटी की रिपोर्ट आने के बाद से ही पश्चिम बंगाल के मुस्लिम बौद्धिक जगत में हलचल मची हुई है। इस हलचल से सीपीएम नावाकिफ नहीं है। कांग्रेस का तो यहां तक दावा है कि 30 साल पहले जब कांग्रेस का शासन था तो सरकारी नौकरियों में इससे दोगुना मुसलमान हुआ करते थे। सेकुलरवाद के नाम पर अब तक मुसलमानों का वोट लेती रही सीपीएम के लिए ये विचित्र स्थिति है। उसके लिए ये समझाना भारी पड़ रहा है कि राज्य सरकार की नौकरियों में मुसलमान गायब क्यों हैं।( जारी)
आइए देखते हैं कैसे :
- मुसलमानों की आबादी 25 फीसदी, सरकारी नौकरियों में हिस्सा 2.1 फीसदी। उच्च पदों पर मुसलमान नदारद।
- देश में एससी-एसटी-ओबीसी मिलाकर सबसे कम आरक्षण किस राज्य में। पश्चिम बंगाल में।
- देश में सबसे कम ओबीसी आरक्षण कहां, पश्चिम बंगाल में और कहां।
- मंडल कमीशन की रिपोर्ट को किस राज्य ने सबसे बाद में लागू किया। क्या अब ये भी बताना होगा?
- देश में एससी छात्रों का सबसे ज्यादा ड्रॉप आउट रेट कहां? एक और अश्लील सवाल! आप जरूर वामपंथ विरोधी हैं, सांप्रदायिक हैं, बीजेपी या तृणमूल कांग्रेस या फिर नक्सलियों के एजेंट हैं, जातिवादी हैं, देश की एकता और अखंडता के दुश्मन हैं, कहीं आप अमेरिका के एजेंट तो नहीं।
25 फीसदी मुस्लिम आबादी वाले राज्य पश्चिम बंगाल में मुसलमानों की हालत देश में सबसे बुरी है। ये बात काफी समय से कही जाती थी, लेकिन प्रधानमंत्री द्वारा गठित सच्चर कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में इस बात का प्रमाण जगजाहिर कर दिया है। राज्य सरकार से मिले आंकड़ों के आधार पर सच्चर कमेटी ने बताया है कि पश्चिम बंगाल में राज्य सरकार की नौकरियों में सिर्फ 2.1 फीसदी मुसलमान हैं। जबक केरल में मुस्लिम आबादी का प्रतिशत लगभग बराबर है पर वहां राज्य सरकार की नौकरियों में साढ़े दस फीसदी मुसलमान हैं। पश्चिम बंगाल में मुसलमानों का पिछड़ापन सिर्फ नौकरियों और न्यायिक सेवा में नहीं बल्कि शिक्षा, बैंकों में जमा रकम, बैंकों से मिलने वाले कर्ज जैसे तमाम क्षेत्रों में है।
साथ ही पश्चिम बंगाल देश के उन राज्यों में है, जहां सबसे कम रिजर्वेशन दिया जाता है। पश्चिम बंगाल में दलित, आदिवासी और ओबीसी को मिलाकर 35 प्रतिशत आरक्षण है। वहां ओबीसी के लिए सिर्फ सात फीसदी आरक्षण है। मौजूदा कानूनों के मुताबिक, मुसलमानों को आरक्षण इसी ओबीसी कोटे के तहत मिलता है। पश्चिम बंगाल देश के उन राज्यों में है, जहां मंडल कमीशन की रिपोर्ट आखिर में लागू की गई और पश्चिम बंगाल की वामपंथी सरकार अरसे तक ये कहती रही कि राज्य में कोई पिछड़ा नहीं है।
सच्चर कमेटी की रिपोर्ट आने के बाद से ही पश्चिम बंगाल के मुस्लिम बौद्धिक जगत में हलचल मची हुई है। इस हलचल से सीपीएम नावाकिफ नहीं है। कांग्रेस का तो यहां तक दावा है कि 30 साल पहले जब कांग्रेस का शासन था तो सरकारी नौकरियों में इससे दोगुना मुसलमान हुआ करते थे। सेकुलरवाद के नाम पर अब तक मुसलमानों का वोट लेती रही सीपीएम के लिए ये विचित्र स्थिति है। उसके लिए ये समझाना भारी पड़ रहा है कि राज्य सरकार की नौकरियों में मुसलमान गायब क्यों हैं।( जारी)
Wednesday, February 27, 2008
एक चर्चा, डेढ़ सौ से ज्यादा टिप्पणियां...
...और वो कहते हैं कि ये भी कोई मुद्दा है
पांच फरवरी को ये चर्चा शुरू हुई थी। मोहल्ला और रिजेक्टमाल में देर तक चली। सवाल ये था कि क्या मीडिया के उच्च पदों पर एक भी दलित नहीं है? क्या कुछ सोशल-रिलीजियस-जेंडर ग्रुप की हिस्सेदारी लोकतंत्र के चौथे खंभे में निराशजनक रूप से कम है? इस लेकर बात तनी तो तनती चली गई।
बहस इंटेंस थी। नाराजगी, गुस्सा, छल-फरेब, कान के नीचे बजाने का उल्लास, प्रपंच - यानी हर तरह का सामान। बेनामी भी आए और नामधारी भी। साधुवाद नुमा ही नहीं बड़ी-बड़ी टिप्पणियां। दर्जनों टिप्पणियां ऐसी, जिन्हे पोस्ट होना चाहिए। कुछ ने तो अलग से पूरी की पूरी पोस्ट लिख डाली। बहस का स्पिलओवर दूसरे कई ब्लॉग पर नजर आया। अब भी दिख रहा है।
क्या ये हिंदी ब्लॉगिंग के क्रमश: वयस्क होने के संकेत हैं? ये बहस ब्लॉग के अलावा किस और माध्यम पर देखने की बात आप सोच सकते हैं?
पांच फरवरी को ये चर्चा शुरू हुई थी। मोहल्ला और रिजेक्टमाल में देर तक चली। सवाल ये था कि क्या मीडिया के उच्च पदों पर एक भी दलित नहीं है? क्या कुछ सोशल-रिलीजियस-जेंडर ग्रुप की हिस्सेदारी लोकतंत्र के चौथे खंभे में निराशजनक रूप से कम है? इस लेकर बात तनी तो तनती चली गई।
बहस इंटेंस थी। नाराजगी, गुस्सा, छल-फरेब, कान के नीचे बजाने का उल्लास, प्रपंच - यानी हर तरह का सामान। बेनामी भी आए और नामधारी भी। साधुवाद नुमा ही नहीं बड़ी-बड़ी टिप्पणियां। दर्जनों टिप्पणियां ऐसी, जिन्हे पोस्ट होना चाहिए। कुछ ने तो अलग से पूरी की पूरी पोस्ट लिख डाली। बहस का स्पिलओवर दूसरे कई ब्लॉग पर नजर आया। अब भी दिख रहा है।
क्या ये हिंदी ब्लॉगिंग के क्रमश: वयस्क होने के संकेत हैं? ये बहस ब्लॉग के अलावा किस और माध्यम पर देखने की बात आप सोच सकते हैं?
मीडिया का सोशल-जेंडर प्रोफाइल क्यों चाहिए?
पत्रकारिता के सोशल-जेंडर प्रोफाइल की इस समय बात क्यों हो रही है? क्या ये बेसुरा-असमय का राग है। अब इस बारे में स्पष्टीकरण देने के जरूरत है। इसलिए क्योंकि इस बहस से कुछ लोगों में एक भय का वातावरण बना है। कुछ भद्र लोग गाली गलौज पर उतारू हैं। वैसे गालियों के समाजशास्त्र पर मेरी एक पोस्ट है। देखिए।
दरअसल आने वाले महीनों में आपको भारत में एक नई चीज नजर आएगी। उसका नाम तय होना है पर वो बनेगा पश्चिमी देशों के इक्वल ऑपुर्चुनिटी कमीशन की तर्ज पर। ये कमीशन इस बात का अध्ययन कर सरकार को नियमित अपनी रिपोर्ट देगा कि लोकजीवन के अलग अलग अंगों खासकर रोजगार में अलग अलग मजहबी, जातीय समूहों और महिलाओं की क्या स्थिति है। अभी इस कमीशन के गठन के बारे में विचार-विमर्श जारी है। लेकिन ये तय है कि कमीशन इस साल के अंत तक बन जाएगा।
भारत जैसे विविधता वाले देश में, जहां सामाजिक असमानता का इतिहास रहा है, इक्वल ऑपुर्चुनिटी कमीशन का न होना अपने आप में आश्चर्य की बात है। देर से ही सही, लेकिन सरकार इस बात के लिए तैयार हो गई है कि ऐसा एक कमीशन होगा। इस कमीशन को किसी भी सरकारी विभाग या निजी कंपनी से कर्मचारियों के सोशल-जेंडर प्रोफाइल की जानकारी मांगने का अधिकार होगा। कमीशन जिनके पास भी जानकारी मांगने जाएगा, उन्हें मांगा गया ब्यौरा देना होगा।
इस कमीशन के दायरे में न्यायपालिका और मीडिया होंगे या नहीं, इसे लेकर बातचीत चल रही है। आप जो भी लोग ब्लॉग पर चली इस चर्चा में शरीक हुए हैं वो खुद को उस बड़ी चर्चा का हिस्सा मानें। इस बहस में जो भी शरीक हुए उन्हें धन्यवाद। आपको एतराज न हो तो इस बहस को मैं उन लोगों तक पहुंचा दूंगा जो कमीशन बनाने की चर्चा से जुड़े हैं।
दरअसल आने वाले महीनों में आपको भारत में एक नई चीज नजर आएगी। उसका नाम तय होना है पर वो बनेगा पश्चिमी देशों के इक्वल ऑपुर्चुनिटी कमीशन की तर्ज पर। ये कमीशन इस बात का अध्ययन कर सरकार को नियमित अपनी रिपोर्ट देगा कि लोकजीवन के अलग अलग अंगों खासकर रोजगार में अलग अलग मजहबी, जातीय समूहों और महिलाओं की क्या स्थिति है। अभी इस कमीशन के गठन के बारे में विचार-विमर्श जारी है। लेकिन ये तय है कि कमीशन इस साल के अंत तक बन जाएगा।
भारत जैसे विविधता वाले देश में, जहां सामाजिक असमानता का इतिहास रहा है, इक्वल ऑपुर्चुनिटी कमीशन का न होना अपने आप में आश्चर्य की बात है। देर से ही सही, लेकिन सरकार इस बात के लिए तैयार हो गई है कि ऐसा एक कमीशन होगा। इस कमीशन को किसी भी सरकारी विभाग या निजी कंपनी से कर्मचारियों के सोशल-जेंडर प्रोफाइल की जानकारी मांगने का अधिकार होगा। कमीशन जिनके पास भी जानकारी मांगने जाएगा, उन्हें मांगा गया ब्यौरा देना होगा।
इस कमीशन के दायरे में न्यायपालिका और मीडिया होंगे या नहीं, इसे लेकर बातचीत चल रही है। आप जो भी लोग ब्लॉग पर चली इस चर्चा में शरीक हुए हैं वो खुद को उस बड़ी चर्चा का हिस्सा मानें। इस बहस में जो भी शरीक हुए उन्हें धन्यवाद। आपको एतराज न हो तो इस बहस को मैं उन लोगों तक पहुंचा दूंगा जो कमीशन बनाने की चर्चा से जुड़े हैं।
Monday, February 25, 2008
एड्स: कंडोम, कारोबार और रोजगार
(पिछली दो पोस्ट में आपने पढ़ा कि किस तरह एड्स से साल में 2000 से कम लोग मरते हैं और मरने वालों की संख्या बढ़ भी नहीं रही है, लेकिन एड्स से लड़ने के नाम पर आने वाला पैसा लगातार बढ़ता जा रहा है। आपने ये भी पढ़ा कि एड्स की एक मौत को टालने पर सवा करोड़ रुपए खर्च होते हैं जबकि कैंसर जैसी बीमारियों से होने वाली मौत से निबटने के लिए औसत खर्च 3181 रुपए है। पैसा किन स्रोत से आ रहा है इसकी भी बात हो चुकी है। अब जानते हैं ये पैसा जा कहां रहा है। - दिलीप मंडल)
एड्स के नाम पर आ रहे अंधाधुंध पैसे का सबसे बड़ा हिस्सा (73%) खर्च किया जा रहा है लोगों को अवेयर बनाने के लिए। यानी पोस्टर, पर्चे, नुक्कड़ नाटक, बुकलेट, विज्ञापन आदि पर। प्रधानमंत्री की राष्ट्रीय सलाहकार परिषद को दिए प्रेजेंटेशन में नेशनल एड्स कंट्रोल ऑर्गनाइजेशन यानी नैको ने बताया है कि एड्स जागरूकता के विज्ञापन 2006 में 19,250 बार टेलीविजन चैनलों पर दिखाए गए।
इसी प्रेजेंटेशन में बताया गया है कि नेशनल रूरल हेल्थ मिशन के तहत 2007 से 2012 के बीच सरकार देश में 2031 करोड़ रुपए के कंडोम बांटेगी। ये रकम तो सिर्फ एनएचआरएम के तहत कंडोम खरीदने पर खर्च होनी है। नेशनल एड्स कंट्रोल प्रोग्राम (एनएसीपी) का खर्च इससे अलग है। एनएसीपी के तहत देश में कंडोम की कुल खपत 3.5 अरब सालाना पर ले जाने का इरादा है। देश की कुल जनसंख्या में आधी आबादी और बच्चों और बूढ़ों के साथ उन लोगों की संख्या घटा दें जो अपना कंडोम खुद खरीदतें हैं, तो प्रति व्यक्ति कंडोम की खपत का रोचक आंकड़ा निकलेगा। आप भी कैलकुलेट करके देखिए।
एड्स : कारोबार भी है और रोजगार भी
बहरहाल कंडोम की गिनती से आगे बढ़ते हैं। एड्स के नाम पर हो रहे खर्च में चूंकि अस्पतालों की खास भूमिका नहीं है (क्योंकि मरीज कहां से आएंगे)। ये खर्च हो रहा है एनजीओ के माध्यम से। एड्स की जागृति फैलाने में एक लाख बीस हजार सेल्फ हेल्प ग्रुप को ट्रेनिंग दी जा रही है। आप इससे अंदाजा लगा सकते हैं कि एड्स के लिए पैसा आता रहे और स्वास्थ्य पर खर्च की प्राथमिकताएं न बदलें इसमें कितने लोगों का स्वार्थ जोड़ दिया गया है।
संख्या का हिसाब देखें तो अभी पौने तीन लाख लोग फील्ड वर्कर के तौर पर एड्स की जागरूकता फैला रहे हैं। नेशनल एड्स कंट्रोल प्रोग्राम के तहत 2012 तक इनकी संख्या बढ़ाकर साढ़े तीन लाख करने का इरादा है। एडस कंट्रोल कार्यक्रम से एक लाख तेरह हजार डॉक्टरों और लगभग एक लाख नर्सों को भी जोड़ा जा हा है। यानी हमारे देश में एड्स बेशक बड़ी बीमारी नहीं है लेकिन ये बहुत बड़ा रोजगार जरूर है। ये सरकारी आंकड़े तो बता रहे हैं कि एड्स से मिलने वाला रोजगार बीपीओ सेक्टर के रोजगार से भी ज्यादा है।
नेशनल एड्स कंट्रोल प्रोग्राम के तहत 1151 बड़े एनजीओ ऐसे हैं जो हाईरिस्क ग्रुप के बीच 1231 कार्यक्रम चला रहे हैं जबकि 107 एनजीओ देश भर में 122 कम्युनिटी केयर सेंटर चला रहे हैं। संसद में इस बारे में सवाल उठे हैं कि क्या ये एनजीओ फंड का घपला कर रहे हैं। स्वास्थ्य मंत्री का जवाब आप खुद ही पढ़ लीजिए।
जाहिर है एड्स से लड़ने के नाम पर चल रहे कार्यक्रमों के जरिए बड़ी संख्या में ऐसे स्टेकहोल्डर्स पैदा हो गए हैं जो चाहेंगे कि हेल्थ सेक्टर पर हो रहे खर्च में एड्स को सबसे ऊपर का दर्जा मिलता रहे। एड्स की लॉबी कितनी प्रभावशाली है, और उनमें कौन-कौन शामिल है, इसपर फिर कभी।
एड्स के नाम पर आ रहे अंधाधुंध पैसे का सबसे बड़ा हिस्सा (73%) खर्च किया जा रहा है लोगों को अवेयर बनाने के लिए। यानी पोस्टर, पर्चे, नुक्कड़ नाटक, बुकलेट, विज्ञापन आदि पर। प्रधानमंत्री की राष्ट्रीय सलाहकार परिषद को दिए प्रेजेंटेशन में नेशनल एड्स कंट्रोल ऑर्गनाइजेशन यानी नैको ने बताया है कि एड्स जागरूकता के विज्ञापन 2006 में 19,250 बार टेलीविजन चैनलों पर दिखाए गए।
इसी प्रेजेंटेशन में बताया गया है कि नेशनल रूरल हेल्थ मिशन के तहत 2007 से 2012 के बीच सरकार देश में 2031 करोड़ रुपए के कंडोम बांटेगी। ये रकम तो सिर्फ एनएचआरएम के तहत कंडोम खरीदने पर खर्च होनी है। नेशनल एड्स कंट्रोल प्रोग्राम (एनएसीपी) का खर्च इससे अलग है। एनएसीपी के तहत देश में कंडोम की कुल खपत 3.5 अरब सालाना पर ले जाने का इरादा है। देश की कुल जनसंख्या में आधी आबादी और बच्चों और बूढ़ों के साथ उन लोगों की संख्या घटा दें जो अपना कंडोम खुद खरीदतें हैं, तो प्रति व्यक्ति कंडोम की खपत का रोचक आंकड़ा निकलेगा। आप भी कैलकुलेट करके देखिए।
एड्स : कारोबार भी है और रोजगार भी
बहरहाल कंडोम की गिनती से आगे बढ़ते हैं। एड्स के नाम पर हो रहे खर्च में चूंकि अस्पतालों की खास भूमिका नहीं है (क्योंकि मरीज कहां से आएंगे)। ये खर्च हो रहा है एनजीओ के माध्यम से। एड्स की जागृति फैलाने में एक लाख बीस हजार सेल्फ हेल्प ग्रुप को ट्रेनिंग दी जा रही है। आप इससे अंदाजा लगा सकते हैं कि एड्स के लिए पैसा आता रहे और स्वास्थ्य पर खर्च की प्राथमिकताएं न बदलें इसमें कितने लोगों का स्वार्थ जोड़ दिया गया है।
संख्या का हिसाब देखें तो अभी पौने तीन लाख लोग फील्ड वर्कर के तौर पर एड्स की जागरूकता फैला रहे हैं। नेशनल एड्स कंट्रोल प्रोग्राम के तहत 2012 तक इनकी संख्या बढ़ाकर साढ़े तीन लाख करने का इरादा है। एडस कंट्रोल कार्यक्रम से एक लाख तेरह हजार डॉक्टरों और लगभग एक लाख नर्सों को भी जोड़ा जा हा है। यानी हमारे देश में एड्स बेशक बड़ी बीमारी नहीं है लेकिन ये बहुत बड़ा रोजगार जरूर है। ये सरकारी आंकड़े तो बता रहे हैं कि एड्स से मिलने वाला रोजगार बीपीओ सेक्टर के रोजगार से भी ज्यादा है।
नेशनल एड्स कंट्रोल प्रोग्राम के तहत 1151 बड़े एनजीओ ऐसे हैं जो हाईरिस्क ग्रुप के बीच 1231 कार्यक्रम चला रहे हैं जबकि 107 एनजीओ देश भर में 122 कम्युनिटी केयर सेंटर चला रहे हैं। संसद में इस बारे में सवाल उठे हैं कि क्या ये एनजीओ फंड का घपला कर रहे हैं। स्वास्थ्य मंत्री का जवाब आप खुद ही पढ़ लीजिए।
जाहिर है एड्स से लड़ने के नाम पर चल रहे कार्यक्रमों के जरिए बड़ी संख्या में ऐसे स्टेकहोल्डर्स पैदा हो गए हैं जो चाहेंगे कि हेल्थ सेक्टर पर हो रहे खर्च में एड्स को सबसे ऊपर का दर्जा मिलता रहे। एड्स की लॉबी कितनी प्रभावशाली है, और उनमें कौन-कौन शामिल है, इसपर फिर कभी।
Sunday, February 24, 2008
औरतों का कम्युनिटी ब्लॉग और कम्युनिटी ब्लॉग में औरत
(हर बातचीत का कोई नतीजा निकले ये जरूरी नहीं है। हर समस्या का समाधान भी नहीं होता। हिंदी ब्लॉगिंग के शैशव काल में कम्युनिटी ब्लॉग के चरित्र को लेकर एक अच्छी बातचीत की गुंजाइश है। इसके सूत्र आपको यहां दिखेंगे। ये वो टिप्पणियां हैं जो रिजेक्ट माल में चोखेर बाली के बारे में डाली गई एक पोस्ट पर आई हैं। - दिलीप मंडल)
swapandarshi said...
इतना मानती हू कि बिना समझे-बूझे मै चोखेर बाली मे कूद पडी, पर बाहर सोच समझ कर निकली हू. मेरे पास ब्लोग के लिये बहुत ही सीमीत समय है, और उस समय का बेहतर उपयोग किस तरह हो यही मेरी सोच का केन्द बिन्दु है.
बाकी जीवन मे कई तरह के प्रयोग चलते रहते है, इसे भी इसी स्पिरिट से लिया जाय.
मेरी शुभ्कामानाये भी चोखेर बाली के साथ है. फिल्हाल एक -दो लोगो के आने जाने से किसी सामूहिक प्रयास की मौत नही होती. एक जायेगा तो दस नये आयेंगे.
और कोई भी सामूहिक प्रयास अंतिम प्रयास भी नही होता. उम्मीद है कि चोखेर बाली जैसे अभी कई प्रयास ब्लोग मे होंगे.
आशीष said...
साहब मुझे तो लगता है कि चोखेर बाली को फालतू की बातों पर कान ही नहीं देना चाहिए, बस धीरे धीरे अपने लक्ष्य की ओर बढ़े। कई ब्लॉगरों के सामने चोखेर बाली एक चुनौती बन कर उभरी है, जो कि अच्छी बात है
दिलीप मंडल said...
स्वपनदर्शी की बात मुझे सही लगती है।
विखंडन said...
भाई हम भी यही मानते की चोखेर बाली क्या किसी भी ब्लोग की मौत की कामना नही करनी चाहिए । जितने ज्याद ब्लोग उतने ही विचार ओर जितने ज्याद विचार उतना ही विम्रश का मजा आएगा । ओर अगर किसी के विचार से सहमत नही है तो उसे वैचारिक स्तर ही ज्वाब देना चाहिए न की खुद या उसे वहा से भगाने की कोशिश करे ओर न ही जिस व्यक्ति , स्त्री या फिर पुरुष , को कोसना शुरु कर दे।
दिलीप मंडल said...
किसी भी ब्लॉग की मौत की कामना नहीं करनी चाहिए - सही कहा है।
masijeevi said...
ऑंख में कुछ चुभता है तो तकलीफ तो होती ही है होने दीजिए...सच भी चुभता है उसे भी चुभने दें।
एक बात स्वप्नदर्शी से मुझे नहीं लगता कि जो एक दो मित्र किसी भी वजह से फिलहाल चोखेरबाली से अलग हो रहे हैं उन्हें कोई गलत स्पिरिट में ले सकता है...न केवल उन्हें ऐसा करने का पूरा हक है वरन उनका ऐसा करना इसी चोखेरबाली स्पिरिट को ही दिखाता है। वे जहॉं या जिस भी रूप में विमर्श को जारी रखेंगीं यह इसी भावना का ही प्रसार होगा। उनका खुलकर अपनी बात कहने का जज्बा भी ता चोखेरबाली भावना का ही हिस्सा है। कम से कम एक पाठक के रूप में मुझे तो ऐसा ही लगता है।
दिनेशराय द्विवेदी said...
दिलीप भाई। परेशान होने की कोई आवश्यकता नहीं है। जो मरेगा वह अपनी कमजोरियों के कारण और जो जिएगा,फलेगा-फूलेगा अपनी खूबियों के कारण। आप तो मानते हैं न कि अन्तर्वस्तु ही प्रमुख है। वाद प्रतिवाद न होगा तो संवाद कहाँ से आएगा। बस इतनी कोशिश बनी रहे कि संवाद न टूटे। मन्थन से ही अमृत और विष की अलग अलग पहचान बनेगी।
सुजाता said...
दिलीप जी
आप की और बहुतों की शुभकामनाएँ साथ हैं । धक्के से चोखेर बाली और मज़बूत होकर निकलेगी । मरेगी नही । क्योंकि यह एक सामूहिक ब्लॉग है इसलिए सामूहिक ब्लॉग आत्महत्या नही कर सकता । और हत्या तो उसकी हो ही नही सकती ।और यह तो अंतत: स्वप्नदर्शी जी ने भी मान लिया कि यह एक सामूहिक ब्लॉग है :-) उनकी शुभकामनाओं का हृदय से सम्मान करती हूँ और उम्मीद करती हूँ कि वे बनी रहें । धन्यवाद !!
swapandarshi said...
एक और बात, चोखेर बाली की शुरुआत औरतो के पहले सामूहिक ब्लोग की तरह हुयी थी,
पर अब ये सिर्फ एक सामूहिक ब्लोग बचा है, जिसका संचालन सुजाता कर रही है.
दिलीप मंडल said...
औरतों का ब्लॉग और कम्युनिटी ब्लॉग जिसमें मेन मॉडरेटर औरत हो, दोनों के लिए ही और न जाने कितने ही और वेरायटी के लिए ब्लॉग में जगह है। चोखेर बाली के बारे में मेरी कल्पना ऐसे कम्युनिटी (पोस्ट करने का अधिकार सभी सदस्यों के पास हो, तो वो कम्युनटी ब्लॉग बन जाता है)ब्लॉग की थी, जहां आधुनिक स्त्री विमर्श के लिए जगह होगी। चोखेर बाली क्या बनेगा, इस बारे में किसी के भी विचार हो सकते हैं, लेकिन ये बनेगा वही, जो आप चाहती हैं।
बहरहाल जमकर लिखिए अपनी कामयाबी की, संघर्ष की, गुस्से की और पीड़ा की और प्यार दुलार की कहानियां। यहां नहीं तो कहीं और सही, कहीं और नहीं तो कहीं और सही।
किसी के आने जाने से फर्क सचमुच नहीं पड़ता है, बस थोड़ी देर के लिए मन कड़वा हो जाता है। आप लोग जो भी करना चाहें, उसके लिए शुभकामनाएं।
swapandarshi said...
इतना मानती हू कि बिना समझे-बूझे मै चोखेर बाली मे कूद पडी, पर बाहर सोच समझ कर निकली हू. मेरे पास ब्लोग के लिये बहुत ही सीमीत समय है, और उस समय का बेहतर उपयोग किस तरह हो यही मेरी सोच का केन्द बिन्दु है.
बाकी जीवन मे कई तरह के प्रयोग चलते रहते है, इसे भी इसी स्पिरिट से लिया जाय.
मेरी शुभ्कामानाये भी चोखेर बाली के साथ है. फिल्हाल एक -दो लोगो के आने जाने से किसी सामूहिक प्रयास की मौत नही होती. एक जायेगा तो दस नये आयेंगे.
और कोई भी सामूहिक प्रयास अंतिम प्रयास भी नही होता. उम्मीद है कि चोखेर बाली जैसे अभी कई प्रयास ब्लोग मे होंगे.
आशीष said...
साहब मुझे तो लगता है कि चोखेर बाली को फालतू की बातों पर कान ही नहीं देना चाहिए, बस धीरे धीरे अपने लक्ष्य की ओर बढ़े। कई ब्लॉगरों के सामने चोखेर बाली एक चुनौती बन कर उभरी है, जो कि अच्छी बात है
दिलीप मंडल said...
स्वपनदर्शी की बात मुझे सही लगती है।
विखंडन said...
भाई हम भी यही मानते की चोखेर बाली क्या किसी भी ब्लोग की मौत की कामना नही करनी चाहिए । जितने ज्याद ब्लोग उतने ही विचार ओर जितने ज्याद विचार उतना ही विम्रश का मजा आएगा । ओर अगर किसी के विचार से सहमत नही है तो उसे वैचारिक स्तर ही ज्वाब देना चाहिए न की खुद या उसे वहा से भगाने की कोशिश करे ओर न ही जिस व्यक्ति , स्त्री या फिर पुरुष , को कोसना शुरु कर दे।
दिलीप मंडल said...
किसी भी ब्लॉग की मौत की कामना नहीं करनी चाहिए - सही कहा है।
masijeevi said...
ऑंख में कुछ चुभता है तो तकलीफ तो होती ही है होने दीजिए...सच भी चुभता है उसे भी चुभने दें।
एक बात स्वप्नदर्शी से मुझे नहीं लगता कि जो एक दो मित्र किसी भी वजह से फिलहाल चोखेरबाली से अलग हो रहे हैं उन्हें कोई गलत स्पिरिट में ले सकता है...न केवल उन्हें ऐसा करने का पूरा हक है वरन उनका ऐसा करना इसी चोखेरबाली स्पिरिट को ही दिखाता है। वे जहॉं या जिस भी रूप में विमर्श को जारी रखेंगीं यह इसी भावना का ही प्रसार होगा। उनका खुलकर अपनी बात कहने का जज्बा भी ता चोखेरबाली भावना का ही हिस्सा है। कम से कम एक पाठक के रूप में मुझे तो ऐसा ही लगता है।
दिनेशराय द्विवेदी said...
दिलीप भाई। परेशान होने की कोई आवश्यकता नहीं है। जो मरेगा वह अपनी कमजोरियों के कारण और जो जिएगा,फलेगा-फूलेगा अपनी खूबियों के कारण। आप तो मानते हैं न कि अन्तर्वस्तु ही प्रमुख है। वाद प्रतिवाद न होगा तो संवाद कहाँ से आएगा। बस इतनी कोशिश बनी रहे कि संवाद न टूटे। मन्थन से ही अमृत और विष की अलग अलग पहचान बनेगी।
सुजाता said...
दिलीप जी
आप की और बहुतों की शुभकामनाएँ साथ हैं । धक्के से चोखेर बाली और मज़बूत होकर निकलेगी । मरेगी नही । क्योंकि यह एक सामूहिक ब्लॉग है इसलिए सामूहिक ब्लॉग आत्महत्या नही कर सकता । और हत्या तो उसकी हो ही नही सकती ।और यह तो अंतत: स्वप्नदर्शी जी ने भी मान लिया कि यह एक सामूहिक ब्लॉग है :-) उनकी शुभकामनाओं का हृदय से सम्मान करती हूँ और उम्मीद करती हूँ कि वे बनी रहें । धन्यवाद !!
swapandarshi said...
एक और बात, चोखेर बाली की शुरुआत औरतो के पहले सामूहिक ब्लोग की तरह हुयी थी,
पर अब ये सिर्फ एक सामूहिक ब्लोग बचा है, जिसका संचालन सुजाता कर रही है.
दिलीप मंडल said...
औरतों का ब्लॉग और कम्युनिटी ब्लॉग जिसमें मेन मॉडरेटर औरत हो, दोनों के लिए ही और न जाने कितने ही और वेरायटी के लिए ब्लॉग में जगह है। चोखेर बाली के बारे में मेरी कल्पना ऐसे कम्युनिटी (पोस्ट करने का अधिकार सभी सदस्यों के पास हो, तो वो कम्युनटी ब्लॉग बन जाता है)ब्लॉग की थी, जहां आधुनिक स्त्री विमर्श के लिए जगह होगी। चोखेर बाली क्या बनेगा, इस बारे में किसी के भी विचार हो सकते हैं, लेकिन ये बनेगा वही, जो आप चाहती हैं।
बहरहाल जमकर लिखिए अपनी कामयाबी की, संघर्ष की, गुस्से की और पीड़ा की और प्यार दुलार की कहानियां। यहां नहीं तो कहीं और सही, कहीं और नहीं तो कहीं और सही।
किसी के आने जाने से फर्क सचमुच नहीं पड़ता है, बस थोड़ी देर के लिए मन कड़वा हो जाता है। आप लोग जो भी करना चाहें, उसके लिए शुभकामनाएं।
Saturday, February 23, 2008
चोखेर बाली की मौत की कामना करने वालों से...
-दिलीप मंडल
पिछले दिनों मैं और आर अनुराधा एक प्रदर्शनी देखने इंडिया इंटरनेशनल सेंटर गए थे। प्रदर्शनी उस महिला ने लगाई थी, जो मेरी जानकारी में आज के समय की सबसे बहादुर औरतों में एक है। प्रदर्शनी बच्चों के बारे में थी, बच्चों के फोटोग्राफ्स की प्रदर्शनी। बदलते समय के साथ बच्चों के बदलते बचपन की कहानी। वहीं अनुराधा को ख्याल आया कि फोटो जर्नलिस्ट सर्वेश की कहानी अखबारों में और ब्लॉग पर शेयर की जानी चाहिए। और जानते हैं इस कहानी को जिस एक ब्लॉग पर डालने की बात सबसे पहले दिमाग में आई वो ब्लॉग कौन सा है? वो ब्लॉग है - चोखेर बाली। वो कहानी चोखेर बाली में छपी।
अब कुछ लोग चाहते हैं कि चोखेरबाली का अंत हो जाए। वो साफ-साफ कह नहीं रहे हैं, पर उनकी आवाज का चौतरफा शोर ब्लॉग में गूंज रहा है। कृपया उन्हें सफल न होने दें। ईश्वर पर यकीन है तो ईश्वर के लिए और खुद पर यकीन है तो खुद के लिए, कृपया कामयाब होकर दिखाएं। ऐसे हमलों से भागेंगी तो कहां जाकर छिपेंगी। रागदरबारी में कहा गया है न कि शिवपालगंज कहां नहीं है। कहां भागोगे। और भागना क्यों। भागने का समय तो उनका है जो आपकी मौत का ख्वाब बुन रहे हैं।
आज मैने उस फ्लोर को देखा जहां मैं काम करता हूं। वहां आधी आबादी की लगभग आधी उपस्थिति देखने के बाद मुझे यकीन हो गया है कि चोखेर बाली की हार नहीं होगी। आईसीआईसीआई के टॉप मैनेजमेंट में पांच में तीन पदों पर महिलाओं को देखने और ऐसे उदाहरणों की बढ़ती संख्या को देखने के बाद चोखेर बाली की जीत का यकीन पक्का हो जाता है। 21वीं सदी तो चोखेर बाली की जीत की सदी है।
ऐसे हमले कबाड़खाना पर हुए। दो-एक मामले और भी जानता हूं। कबाड़खाना बंद हुआ। हम सबके आग्रह से फिर खड़ा हुआ और आज मजबूत कदमों से उसे चलता हुआ आप सब देख रहे हैँ। मेरे खिलाफ ब्लॉग में जितने हमले हुए - निजी, अश्लील, गंदे, उसकी क्या कोई और मिसाल है। लेकिन क्या मैं अपनी हार पर किसी और को खुश होने का मौका दूंगा? क्या मैं इसलिए लिखना बंद कर दूं कि कुछ लोग मुझे चोखेर बाली समझ रहे हैं?
अगर मेरा लिखा पोंगापंथियों, जातिवादियों, ढोंगियों को खटकता है तो ये मेरे लेखन की सार्थकता है। मैने तो अपने जीवन में कभी वनिला या आलू बनने की कल्पना नहीं की है। मैं तो मानवता के विरोधियों के लिए मिर्च ही बनना चाहता हूं। मैं तो पलटकर आऊंगा। ज्यादा धमक के साथ। कबाड़खाना के अशोक भाई ने भी यही किया। आपके सामने भी पीछे भागने का रास्ता नहीं है।
और जो लोग चोखेर बाली का अंत देखना चाहते हैं, मैं उनकी हार की कामना करता हूं।
पिछले दिनों मैं और आर अनुराधा एक प्रदर्शनी देखने इंडिया इंटरनेशनल सेंटर गए थे। प्रदर्शनी उस महिला ने लगाई थी, जो मेरी जानकारी में आज के समय की सबसे बहादुर औरतों में एक है। प्रदर्शनी बच्चों के बारे में थी, बच्चों के फोटोग्राफ्स की प्रदर्शनी। बदलते समय के साथ बच्चों के बदलते बचपन की कहानी। वहीं अनुराधा को ख्याल आया कि फोटो जर्नलिस्ट सर्वेश की कहानी अखबारों में और ब्लॉग पर शेयर की जानी चाहिए। और जानते हैं इस कहानी को जिस एक ब्लॉग पर डालने की बात सबसे पहले दिमाग में आई वो ब्लॉग कौन सा है? वो ब्लॉग है - चोखेर बाली। वो कहानी चोखेर बाली में छपी।
अब कुछ लोग चाहते हैं कि चोखेरबाली का अंत हो जाए। वो साफ-साफ कह नहीं रहे हैं, पर उनकी आवाज का चौतरफा शोर ब्लॉग में गूंज रहा है। कृपया उन्हें सफल न होने दें। ईश्वर पर यकीन है तो ईश्वर के लिए और खुद पर यकीन है तो खुद के लिए, कृपया कामयाब होकर दिखाएं। ऐसे हमलों से भागेंगी तो कहां जाकर छिपेंगी। रागदरबारी में कहा गया है न कि शिवपालगंज कहां नहीं है। कहां भागोगे। और भागना क्यों। भागने का समय तो उनका है जो आपकी मौत का ख्वाब बुन रहे हैं।
आज मैने उस फ्लोर को देखा जहां मैं काम करता हूं। वहां आधी आबादी की लगभग आधी उपस्थिति देखने के बाद मुझे यकीन हो गया है कि चोखेर बाली की हार नहीं होगी। आईसीआईसीआई के टॉप मैनेजमेंट में पांच में तीन पदों पर महिलाओं को देखने और ऐसे उदाहरणों की बढ़ती संख्या को देखने के बाद चोखेर बाली की जीत का यकीन पक्का हो जाता है। 21वीं सदी तो चोखेर बाली की जीत की सदी है।
ऐसे हमले कबाड़खाना पर हुए। दो-एक मामले और भी जानता हूं। कबाड़खाना बंद हुआ। हम सबके आग्रह से फिर खड़ा हुआ और आज मजबूत कदमों से उसे चलता हुआ आप सब देख रहे हैँ। मेरे खिलाफ ब्लॉग में जितने हमले हुए - निजी, अश्लील, गंदे, उसकी क्या कोई और मिसाल है। लेकिन क्या मैं अपनी हार पर किसी और को खुश होने का मौका दूंगा? क्या मैं इसलिए लिखना बंद कर दूं कि कुछ लोग मुझे चोखेर बाली समझ रहे हैं?
अगर मेरा लिखा पोंगापंथियों, जातिवादियों, ढोंगियों को खटकता है तो ये मेरे लेखन की सार्थकता है। मैने तो अपने जीवन में कभी वनिला या आलू बनने की कल्पना नहीं की है। मैं तो मानवता के विरोधियों के लिए मिर्च ही बनना चाहता हूं। मैं तो पलटकर आऊंगा। ज्यादा धमक के साथ। कबाड़खाना के अशोक भाई ने भी यही किया। आपके सामने भी पीछे भागने का रास्ता नहीं है।
और जो लोग चोखेर बाली का अंत देखना चाहते हैं, मैं उनकी हार की कामना करता हूं।
Friday, February 22, 2008
एड्स : बरस रहे पैसे का सच
-दिलीप मंडल
पांच साल में 11,585 करोड़ रुपए। आपको एड्स न हो जाए, इसके लिए ये रकम पांच साल में खर्च की जाएगी। पैसा सरकार भी खर्च कर रही है और दुनिया भर से बरस भी रहा है। और देश में मची है इस पैसे की लूट। इस लूट में कई हिस्सेदार हैं। लूट तो देश-दुनिया में और भी कई किस्म की हो रही है, लेकिन भारत जैसे गरीब देश में जहां 30-40 रुपए के आयरन टैबलेट न मिलने के कारण न जाने कितनी गर्भवती महिलाएं और नवजात बच्चे दम तोड़ देते हैं, वहां ये लूट मानवता के खिलाफ अपराध है।
देखिए एड्स के लिए आ रहे पैसे का ऑफिशियल लेखाजोखा :
बिल और मिलेंडा गेट्स फाउंडेशन से आएंगे 1425 करोड़ रुपए।
ग्लोबल फंड टू फाइड एड्स, ट्यूबरकलोसिस एंड मलेरिया से मिलेंगे 1787 करोड़ रुपए।
वर्ल्ड बैंक देगा 1125 करोड़ रुपए।
डीएफआईडी से आएंगे 862 करोड़ रुपए।
क्लिंटन फाउंडेशन ज्यादा पैसे नहीं दे रहा है, वहां से आएंगे 113 करोड़ रुपए।
यूएसएड से 675 करोड़ रुपए आ रहे हैं।
यूरोपियन यूनियन को भी भारत के एड्स पीड़तों से हमदर्दी है और वो 77 करोड़ रुपए दे रहा है।
संयुक्त राष्ट्र की अलग अलग एजेंसियों 323 करोड़ रुपए दे रही हैं।
दूसरे विदेशी स्रोतों से 741 करोड़ रुपए आ रहे हैं, जिसमें अमेरिकी सरकार से मिलने वाले 450 करोड़ रुपए शामिल हैं।
भारत सरकार के बजटीय आवंटन को जोड़ दें तो ये रकम हो जाती है 11,585 करोड़ रुपए।
ये वो रकम है जो पांच साल के राष्ट्रीय एड्स कंट्रोल प्रोग्राम फेज-3 पर खर्च होनी है। प्रधानमंत्री की सलाहकार समिति के एक प्रेजेंटेशन के पेज 44-45 पर आप पूरा हिसाब देख सकते हैं। संसद की साइट पर भी विदेश से आने वाले पैसे का हिसाब किताब आपको इस लिंक पर दिखेगा। वैसे ये तो सीधा साधा हिसाब हैं वरना राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन जैसे कार्यक्रम में भी फोकस एड्स पर ही कर दिया गया है।
पांच साल में 11,585 करोड़ रुपए यानी साल में 2,317 करोड़ रुपए हर साल एक ऐसी बीमारी से लड़ने के नाम पर खर्च होंगे जिससे साल में 2000 से कम लोग मरते हैं और जिस रोग से मरने वालों की संख्या बढ़ भी नहीं रही है। देखिए पिछली पोस्ट - एड्स का अर्थशास्त्र और राजनीति।
इसके मुकाबले नेशनल कैंसर कंट्रोल प्रोग्राम पर 2006-2007 में 42 करोड़ रुपए खर्च किए गए। मौजूदा साल में इसे बढ़ाकर 140 करोड़ रुपए कर दिया गया है। मत भूलिए कि कैंसर वो बीमारी है जिससे हर साल 4 लाख 40 हजार लोग मरते हैं। देखिए इस जानकारी का स्रोत।
और टीबी की बात करें तो तेजी से फैलती इस बीमारी के लड़ने के लिए सरकार ने 2006-2007 में 226 करोड़ रुपए खर्च किए। टीबी से हर साल 3 लाख 70 हजार लोग मरते हैं। देखिए इस जानकारी का स्रोत।
तो ये हिसाब रहा -
बीमारी का नाम- एड्स। सालाना मौतें- 1786। नियंत्रण पर खर्च- 2,317 करोड़ रुपए।
बीमारी का नाम- कैंसर। सालाना मौतें- 4.40 लाख। नियंत्रण पर खर्च- 140 करोड़ रुपए।
बीमारी का नाम- टीबी। सालाना मौतें- 3.70 लाख। नियंत्रण पर खर्च- 226 करोड़ रुपए।
यानी एड्स से होने वाली एक मौत को टालने का बजट है एक करोड़ 29 लाख रुपए। जबकि कैंसर के लिए यही आंकड़ा 3,181 रुपए का है। लेकिन क्या एड्
पांच साल में 11,585 करोड़ रुपए। आपको एड्स न हो जाए, इसके लिए ये रकम पांच साल में खर्च की जाएगी। पैसा सरकार भी खर्च कर रही है और दुनिया भर से बरस भी रहा है। और देश में मची है इस पैसे की लूट। इस लूट में कई हिस्सेदार हैं। लूट तो देश-दुनिया में और भी कई किस्म की हो रही है, लेकिन भारत जैसे गरीब देश में जहां 30-40 रुपए के आयरन टैबलेट न मिलने के कारण न जाने कितनी गर्भवती महिलाएं और नवजात बच्चे दम तोड़ देते हैं, वहां ये लूट मानवता के खिलाफ अपराध है।
देखिए एड्स के लिए आ रहे पैसे का ऑफिशियल लेखाजोखा :
बिल और मिलेंडा गेट्स फाउंडेशन से आएंगे 1425 करोड़ रुपए।
ग्लोबल फंड टू फाइड एड्स, ट्यूबरकलोसिस एंड मलेरिया से मिलेंगे 1787 करोड़ रुपए।
वर्ल्ड बैंक देगा 1125 करोड़ रुपए।
डीएफआईडी से आएंगे 862 करोड़ रुपए।
क्लिंटन फाउंडेशन ज्यादा पैसे नहीं दे रहा है, वहां से आएंगे 113 करोड़ रुपए।
यूएसएड से 675 करोड़ रुपए आ रहे हैं।
यूरोपियन यूनियन को भी भारत के एड्स पीड़तों से हमदर्दी है और वो 77 करोड़ रुपए दे रहा है।
संयुक्त राष्ट्र की अलग अलग एजेंसियों 323 करोड़ रुपए दे रही हैं।
दूसरे विदेशी स्रोतों से 741 करोड़ रुपए आ रहे हैं, जिसमें अमेरिकी सरकार से मिलने वाले 450 करोड़ रुपए शामिल हैं।
भारत सरकार के बजटीय आवंटन को जोड़ दें तो ये रकम हो जाती है 11,585 करोड़ रुपए।
ये वो रकम है जो पांच साल के राष्ट्रीय एड्स कंट्रोल प्रोग्राम फेज-3 पर खर्च होनी है। प्रधानमंत्री की सलाहकार समिति के एक प्रेजेंटेशन के पेज 44-45 पर आप पूरा हिसाब देख सकते हैं। संसद की साइट पर भी विदेश से आने वाले पैसे का हिसाब किताब आपको इस लिंक पर दिखेगा। वैसे ये तो सीधा साधा हिसाब हैं वरना राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन जैसे कार्यक्रम में भी फोकस एड्स पर ही कर दिया गया है।
पांच साल में 11,585 करोड़ रुपए यानी साल में 2,317 करोड़ रुपए हर साल एक ऐसी बीमारी से लड़ने के नाम पर खर्च होंगे जिससे साल में 2000 से कम लोग मरते हैं और जिस रोग से मरने वालों की संख्या बढ़ भी नहीं रही है। देखिए पिछली पोस्ट - एड्स का अर्थशास्त्र और राजनीति।
इसके मुकाबले नेशनल कैंसर कंट्रोल प्रोग्राम पर 2006-2007 में 42 करोड़ रुपए खर्च किए गए। मौजूदा साल में इसे बढ़ाकर 140 करोड़ रुपए कर दिया गया है। मत भूलिए कि कैंसर वो बीमारी है जिससे हर साल 4 लाख 40 हजार लोग मरते हैं। देखिए इस जानकारी का स्रोत।
और टीबी की बात करें तो तेजी से फैलती इस बीमारी के लड़ने के लिए सरकार ने 2006-2007 में 226 करोड़ रुपए खर्च किए। टीबी से हर साल 3 लाख 70 हजार लोग मरते हैं। देखिए इस जानकारी का स्रोत।
तो ये हिसाब रहा -
बीमारी का नाम- एड्स। सालाना मौतें- 1786। नियंत्रण पर खर्च- 2,317 करोड़ रुपए।
बीमारी का नाम- कैंसर। सालाना मौतें- 4.40 लाख। नियंत्रण पर खर्च- 140 करोड़ रुपए।
बीमारी का नाम- टीबी। सालाना मौतें- 3.70 लाख। नियंत्रण पर खर्च- 226 करोड़ रुपए।
यानी एड्स से होने वाली एक मौत को टालने का बजट है एक करोड़ 29 लाख रुपए। जबकि कैंसर के लिए यही आंकड़ा 3,181 रुपए का है। लेकिन क्या एड्