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Tuesday, August 18, 2009

किसके नाम पर जलाएं उम्मीद के दीये



शुरुआत पूजा प्रसाद की इन पंक्तियों से...

आइये उम्मीद जगाएं

ईश्वर के नाम पर जलाएं कुछ दीये
और इन दीयों से असंख्य देहरी टिमटिमाने की
आस बनाएं...
आइये उम्मीद जगाएं।


कविता आगे बढ़ती है, पूरी कविता आप उनके ब्लॉग पर पढ़ सकते हैं, पर यहाँ मैं आपका ध्यान इस पर आयी अनुराग अन्वेषी की टिप्पणी की तरफ़ खींचना चाहता हूँ :

गुम हुए हजारों नट और सपेरे की तरह ही हो गए हैं आस्था और भरोसा। और अफसोस है कि मिनट भर का करतब दिखाने वाले ईश्वर (वैसे अबतक उसका कोई करतब देखा नहीं हूं, सिर्फ सुनता आया हूं दूसरों के मुंह से) के नाम पर ही दीये जलाए जाते हैं। आइए, आस्था और भरोसे के साथ हम इनसान बने रहने की कसम खाते हुए दिये जलाएं। :-)

अपनी बात मैं अनुराग जी की टिप्पणी से शुरू करना चाहता हूँ। उनका यह अफ़सोस समझ में आता है कि दीये ईश्वर के नाम पर ही जलाये जाते हैं। अफ़सोस ज्यादा गहन इसलिए भी हो जाता है यह पहल पूजा प्रसाद जैसे लोगों की तरफ़ से होती है। उम्मीद के दिए जलाना हर समाज के लिए जरूरी होता है। हर दौर में और हर तरह की परिस्थिति में यह एक जरूरी काम होता है। स्थिति जितनी प्रतिकूल हो उम्मीद के दीये जलाना उतना ही महत्वपूर्ण हो जाता है। यह समाज के लिए संजीवनी का काम करता है, उसे मुर्दा बन जाने से रोकता है।

कहने की जरूरत नही कि ऐसी महत्वपूर्ण भूमिका समाज का वही हिस्सा अपने हाथ में लेता है जो उसका सबसे संवेदनशील, सबसे समझदार और सबसे जिम्मेदार हिस्सा होता है। मौजूदा दौर में पूजा प्रसाद जैसे थोड़े से लोग इस भूमिका में दिख रहे हैं। यह हम सब के लिए सुकून देने वाली बात है कि घनघोर निराशा के इस दौर में भी कुछ लोग उज्जवल भविष्य की तरफ़ हमारा ध्यान खींच कर हमें आगे बढ़ने की ताकत दे रहे हैं। लेकिन यही वह बिन्दु है जहाँ अनुराग जी का अफ़सोस सामने आता है और पूरे औचित्य के साथ आता है। अनुराग अन्वेषी का सवाल यह है कि आख़िर दीये ईश्वर के नाम पर ही क्यो जलाए जाते हैं।

अफ़सोस की वजह यह है कि हमारे समाज का सबसे संवेदनशील, समझदार और जिम्मेदार हिस्सा भी इंसानी समाज को इस लायक नही मानता कि उसके नाम पर, इंसानियत के नाम पर उम्मीद के दीये जलाए। उसे इंसानियत नाकाफी लगती है, भरपूर रौशनी वाले उम्मीद के दीये के लिए उसे एक काल्पनिक ही सही, पर ईश्वर चाहिए। ऐसा ईश्वर जिसे इंसानी समाज का सशर्त नही, पूर्ण समर्पण चाहिए होता है। उसे यानी ईश्वर को इंसान का ऐसा मन -मस्तिष्क चाहिए जो सवाल न करता हो, तर्क न करता हो, संदेह न करता हो। जो बस इस बात को अन्तिम सत्य के रूप में स्वीकार कर चुका हो कि ईश्वर जो करता है (और सब कुछ ईश्वर ही करता है ) वह अच्छा ही करता है।


संदेश साफ़ है यह पूरी दुनिया ईश्वर की है, पत्ता भी खड़क रहा है तो उसकी मर्जी से खड़क रहा है। इसीलिये आपको समझ में आए या न आए वह आपके और हर व्यक्ति के भले के लिए ही हो रहा है। तो अब अगर आप उससे असंतुष्ट हैं तो यह या तो आपकी नासमझी है या फ़िर ईश्वर में आपके भरोसे की कमी। दोनों ही स्थितियों में दोष आपका है।

और अगर आप हद से ज्यादा पीड़ित हैं तो उसकी शरण में जाइए, उससे अपनी प्रार्थना बताइये। अगर आप उसके सच्चे भक्त हैं तो वह कभी आपको निराश नही करेगा। यानी पहली बात तो यह कि जो उसके भक्त हैं उन्ही की सुनवायी होगी। जो उसे चुनौती देते हैं उनकी शिकायत का कोई मतलब ही नही बनता। और इस करुणा सागर के दरबार में पहुँच कर भी अगर आपकी शिकायत सुनने लायक नही मानी गयी तो भी आप सर्वशक्तिमान ईश्वर का कोई दोष साबित नही कर सकते। इसका मतलब सिर्फ़ यह होता है कि आप उसके सच्चे भक्त नही हैं। यानी दोष एक बार फ़िर आपका।

मतलब यह कि इस परम परमेश्वर की व्यवस्था में इंसान के अस्तित्व का मतलब सिर्फ़ इतना है कि जो कुछ हो रहा है उसे ईश्वर का आदेश मान चुपचाप स्वीकार करते जाओ। बस उसके गुण गाओ, उसकी तारीफ में कसीदे पढो, हर बात में उसकी शान देखो। भूल कर भी किसी बात पर सवाल मत करो, न ही संदेह करो। और उसके आदेश की अवज्ञा? ऐसा तो सोचो भी मत।
कमाल तो यह है कि इस व्यवस्था को स्वीकारने वाले भक्तों को भी हम मानसिक और भावनात्मक गुलाम नही मानते बल्कि उन्हें ईश्वर का करीबी और इस नाते शक्तिशाली मानते हैं।


मगर यह मूल तर्क के ख़िलाफ़ नही है। चूंकि इस व्यवस्था में ईश्वर सर्वशक्तिमान है और हर तरह की ताकत का स्रोत वही है इसीलिये ताकतवर उसे ही माना जाएगा जो उसका करीबी होगा। और, स्वाभाविक रूप से करीबी वही होगा जो उसकी व्यवस्था को ज्यों का त्यों स्वीकार करेगा।


सोचने समझने वाले जो लोग यह कहते हैं कि आख़िर ईश्वर या धर्म पर सवाल उठाना क्यो जरूरी है, और यह कि धर्म और ईश्वर से टकराए बगैर या दूसरे शब्दों में भारत की श्रद्धालु जनता की आस्था को चोट पहुंचाए बगैर भी तो काम किया जा सकता है, उनके लिए निवेदन है कि यहाँ सवाल किसी की आस्था को चोट पहुंचाने का नही है, सवाल सिर्फ़ यह है कि हमारा इंसानी समाज कैसा होगा, इंसान कैसा होगा। जैसा इंसान होगा इंसानी समाज भी वैसा ही होगा।


ऊपर कही गयी बातों से हमारी यह मान्यता तो स्पष्ट हो ही जाती है कि ईश्वरीय व्यवस्था को पूर्णतया समर्पित, कमजोर बल्कि मानसिक और भावनात्मक तौर पर गुलाम इंसान ही भाते हैं।


हमारी आपत्ति इसी बात को लेकर है। और इसमे बीच का कोई रास्ता नही हो सकता। इंसान या तो स्वतंत्र रूप से सोचने समझने वाला, बिना झिझक सवाल पूछने वाला, तर्क और तथ्य के आधार पर सही उत्तर तलाशने वाला होगा या फ़िर बिना कोई सवाल किए दूसरों की कही बातों को मान लेने वाला, कुछ ख़ास धर्मग्रंथो में दिए गए उत्तरों पर सोचने का भी जोखिम न उठाते हुए ज्यों का त्यों स्वीकार कर लेने और ज़िन्दगी भर स्वीकार किए रहने वाला।


बस यही दोनों विकल्प हैं और इन्हीं दो में से कोई एक हमें चुनना है। धर्म और आस्था ने पहले से बता रखा है कि उसे कैसा इंसान चाहिए। तर्क ने भी पहले से बता रखा है कि वह कैसा इंसानी समाज चाहता है। हमें और आपको तय करना है कि हम दो में से कौन सा रास्ता चुनते हैं। अगर हम में से कुछ लोग किसी भी एक रास्ते को छोड़ने का जोखिम नही लेना चाहते तो यह उनकी निजी समस्या है जिसका हल ख़ुद उन्हें ढूँढना होगा। (प्रसंगवश, अनुराग जी की टिप्पणी का यह हिस्सा कि आइये आस्था और भरोसे के साथ हम इंसान बने रहने की कसम खाते हुए दीये जलाएं ज्यादा सतर्कता की मांग करता है। अनुराग जी को जितना मैं समझ पाया हूँ उसमे उनका यह मतलब कतई नही होगा, लेकिन इससे ऐसा आभास होता है कि शायद दोनों रास्तो पर एक साथ चलना सम्भव है।)
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