Tuesday, September 21, 2010
कॉमनवेल्थ, मीडिया और एक पहेली
यह आलेख 16 अगस्त को लिखा गया था, जब मीडिया में कॉमनवेल्थ गेम्स को लेकर पर्दाफाश पर पर्दाफाश हो रहे थे। कथादेश के कॉलम अखबारनामा में यह छपा है। उस समय यह अंदाजा लगाने की कोशिश की गयी थी कि जब खेल करीब होंगे तो देश का प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया किस तरह से एक्ट करेगा। आप ही बताएं कि क्या इस आलेख में जतायी गयी चिंताएं आपको अब वास्तविकता के करीब लगती हैं?
कॉमनवेल्थ गेम्स शुरू होने में अब चंद रोज बचे हैं और जब कथादेश का यह अंक आप पढ़ रहे होंगे तो मीडिया के बड़े हिस्से में कॉमनवेल्थ गेम्स के कवरेज का रंग-ढंग बदल चुका होगा। मेरा अनुमान है (जिसके गलत होने पर मुझे बेहद खुशी होगी) कि कॉमनवेल्थ खेलों को लेकर नकारात्मक या आलोचनात्मक खबरें कम होती चली जाएंगी। कॉमनवेल्थ खेलों के आयोजन में भ्रष्टाचार की खबरें शायद न छपें। हालांकि तैयारियां न होने या स्टेडियम की दीवार गिर जाने जैसी घटनाओं-दुर्घटनाओं को दर्ज करने की मजबूरी मीडिया के सामने जरूर होगी। टाइम्स ऑफ इंडिया जैसे एक दुक्का बड़े समूह, जिनकी विज्ञापनों से आमदनी अरबों रुपये में है, कॉमनवेल्थ के विज्ञापनों की अनदेखी कर सकते हैं। लेकिन ऐसे समूह अपवाद ही होंगे।
वर्ष 2010 की पूरी जुलाई और अगस्त के पहले पखवाड़े तक देश के राष्ट्रीय कहे जाने वाले ज्यादातर समाचार पत्रों में कॉमनवेल्थ खेलों को लेकर नकारात्मक खबरें प्रमुखता से छपीं। कॉमनवेल्थ खेलों के कवरेज में मुख्य रूप से दो बातों को प्रमुखता मिली। एक, कॉमनवेल्थ गेम्स को लेकर बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार और दो कॉमनवेल्थ गेम्स की अधूरी तैयारियां और दिल्ली शहर में टूट-फूट को समेट पाने में सरकारी एजेंसियों की नाकामी। इन खेलों के आयोजन में सरकारी पैसे की लूट और सरकारी मशीनरी की अक्षमता को लेकर समाचार पत्रों ने जमकर लिखा। कॉमनवेल्थ खेलों के कवरेज में तस्वीरों का खूब इस्तेमाल किया गया और इनके जरिए यह बताया गया कि किस तरह से न स्टेडियम तैयार हैं, न शहर दिल्ली।
अगर मैं यह अनुमान लगा रहा हूं कि आने वाले दिनों में कॉमनवेल्थ को लेकर मीडिया कवरेज की दिशा बदल जाएगी, तो इसका आधार यह है कि आयोजन समिति इस बीच अपना विज्ञापन अभियान शुरू कर चुकी होगी। छवि निर्माण की बड़े अभियानों के अब तक अनुभवों के आधार पर कहा जा जा सकता है कि मीडिया या इसके बड़े हिस्से का प्रबंधन मुमकिन है। सरकार में पत्र सूचना कार्यालय यानी पीआईबी से लेकर डीएवीपी, जनसंपर्क विभाग यह काम करते हैं। निजी कंपनियों में भी मीडिया रिलेशन, कॉरपोरेट कम्युनिकेशन के विभाग होते हैं। सैकड़ों की संख्या में मीडिया मैनेजमेंट और पब्लिक रिलेशन कंपनियां देश और विदेश में मीडिया का प्रबंधन करती हैं। यानी क्या छपेगा और क्या नहीं छपेगा का निर्धारण अक्सर समाचार कक्ष से बाहर तय होता है।
कॉमनवेल्थ खेलों के आयोजन और इसके लिए दिल्ली को संवारने पर अलग अलग अनुमानों के मुताबिक 35,000 करोड़ से लेकर 85,000 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे। कुछ लोग तो इस रकम को एक लाख करोड़ के ऊपर तक बता रहे हैं। इस रकम का एक हिस्सा मीडिया प्रबंधन पर खर्च होना है। मीडिया में छोटे पैमाने पर कॉमनवेल्थ का प्रचार अभियान शुरू भी हो चुका है। क्वींस बैटन रिले की शुरुआत के दौरान छिटपुट विज्ञापन मीडिया में आए। लेकिन उसके बाद यह विज्ञापन अभियान रोक दिया गया। मीडिया में कॉमनवेल्थ खेलों को लेकर नकारात्मक खबरों को आप एक हद तक आयोजन समिति के मीडिया कुप्रबंधन या मिसमैनेजमेंट का नतीजा मान सकते हैं। यह बात पूरी तरह से सही न हो, लेकिन इसमें एक सीमा तक सच्चाई है कि अगर आयोजन समिति ने मीडिया प्रबंधन को गंभीरता से लिया होता और अरबों की लूट का एक हिस्सा मीडिया पर भी लुटाया होता तो कॉमनवेल्थ खेलों की इतनी बुरी छवि न बनती। कल्पना कीजिए कि पांच अधबने स्टेडियम की जगह पांच तैयार स्टेडियम या अधबने स्टेडियम के तैयार हिस्सों की चमचमाती तस्वीर हर दिन अखबारों में छपती, तो कॉमनवेल्थ गेम्स को लेकर लोगों के मन में क्या छवि बनती! कॉमनवेल्थ आयोजन समिति मीडिया को इसके लिए तैयार न कर सकी, यह आयोजन समिति के मीडिया प्रबंधन विभाग की बड़ी नाकामी है।
इस देश में किसी भी बड़े विज्ञापनदाता के खिलाफ मीडिया में आम तौर पर कुछ नहीं छपता। मिसाल के तौर पर हिंदुस्तान लीवर, मारुति-सुजूकी, प्रोक्टर एंड गैंबल, टाटा, रिलायंस इंडस्ट्रीज, हीरो होंडा, एयरटेल, बिगबाजार-पेंटालून आदि के खिलाफ शायद ही आपने कभी कोई खबर देखी होगी। कोला कंपनियां इस देश के बच्चों और नौजवानों की सेहत बिगाड़ रही हैं और उन्हें मोटा बना रही हैं, लेकिन सेहत के किसी टीवी कार्यक्रम या किसी अखबारी पन्ने पर कोला ड्रिंक्स के खिलाफ पढ़ने को शायद ही मिलेगा। पिज्जा –बर्गर बेचने वाली कंपनियों के खिलाफ भी शायद ही कुछ छपता है क्योंकि वे बड़ी विज्ञापनादाता कंपनियां हैं। कुछ साल पहले जब सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट ने यह बताया कि कोला ड्रिंक्स में पेस्टिसाइड हैं तो कोला कंपनियों ने अपने बचाव में लगभग 40 करोड़ रुपये का विज्ञापन अभियान शुरू कर दिया और मीडिया में कोला ड्रिंक्स के खिलाफ खबरें बंद हो गईं। हाल ही में जब छत्तीसगढ़ में आदिवासी बहुल इलाके में खनन को लेकर विवाद तेज हुआ तो दुनिया की सबसे बड़ी माइनिंग कंपनियों में से एक वेदांता ने अखबारों में पूरे पन्ने के कई विज्ञापन दिये। अब अखबारों में आपको खनन को लेकर विरोध की खबरें पढ़ने को शायद ही मिलेंगी।
पिछले लोकसभा चुनाव से पहले 2008-2009 में केंद्र सरकार ने अपना विज्ञापन बजट दो गुना बढ़ा दिया था। मीडिया प्रबंधन का यह सरकारी तरीका था। भारत सरकार के दृश्य और श्रव्य प्रचार निदेशालय (डीएवीपी) से जारी होने वाले विज्ञापन के लिए किया गया भुगतान 2007-8 में 246.5 करोड़ रु था जो 2008-9 में 472.1 करोड़ हो गया।(1) इसी तरह रेल मंत्रालय का प्रिंट माध्यमों को दिए गये विज्ञापनों पर खर्च 2007-8 में 159.1 करोड़ रु था जो 2008-9 में बढ़कर 208 करोड़ रु हो गया। (2) बाकी सरकारी विभागों और सरकारी कंपनियों का विज्ञापन खर्च भी चुनावी साल में अचानक काफी तेजी से बढ़ गया। डीएवीपी से विज्ञापनों के लिए ज्यादा भुगतान किए जाने के बारे में पूछे गये सवाल के जवाब में सरकार ने संसद को जानकारी दी कि ऐसा विज्ञापनों की दर बढ़ाए जाने और मंत्रालयों और विभागों द्वारा ज्यादा विज्ञापन जारी किए जाने की वजह से हुआ। सरकार चुनाव से ठीक पहले मीडिया संस्थानों पर विज्ञापन की शक्ल में पैसों की बारिश करके क्या हासिल करना चाहती है, इसे समझना कठिन नहीं है।
कॉमनवेल्थ खेलों की आयोजन समिति से गलती यह हुई है कि उससे समय पर अपना विज्ञापन अभियान शुरू नहीं किया। अगर वह 400 से 500 करोड़ का विज्ञापन अभियान चला रही होती तो मीडिया को नियंत्रित करना उसके लिए मुश्किल नहीं होता। इस समय जबकि अखबार जिंदा रहने से लेकर मुनाफे के लिए विज्ञापनों पर पूरी तरह निर्भर हैं, विज्ञापन बंद करने की धमकी से बड़ा सेंसरशिप कुछ भी नहीं है। इससे न बचा जा सका है न ही इसके विरोध की कोई परंपरा बन पायी है।
बाजार के दबावों की वजह से मीडिया का निष्पक्ष और निरपेक्ष रह पाना अब मुमकिन नहीं है। मीडिया का कारोबार लगभग पूरी तरह विज्ञापनों पर निर्भर है। मीडिया विश्लेषक परंजय गुहाठाकुरता की राय में खास मीडिया संगठनों के कुल राजस्व का 90 फीसदी तक विज्ञापनों से आ रहा है। (3) इस वजह से कंटेंट तैयार करने की उसकी स्वायत्तता पर पाबंदियां लग जाती है। कई बार विज्ञापनदाता मामूली सी आलोचना से नाराज होकर तमाम विज्ञापन रोक लेते हैं। जरूरी नहीं है कि ऐसा सिर्फ आलोचनात्मक खबरें छापने या दिखाने के लिए किया गया हो। कई बार किसी कंपनी के वित्तीय नतीजे और बाजार में कंपनी के कामकाज को कमजोर माने जाने की खबर पर भी ऐसी कार्रवाई की जाती है।(4)
कई विश्लेषक ये कहने लगे हैं कि खबरों में की जा रही इस तरह की मिलावट मीडिया इंडस्ट्री के लिए ठीक है और लंबी अवधि में ये विज्ञापनदाताओं के लिए भी फायदेमंद नहीं रहेगा। ये सोने के अंडे के लालच में मुर्गी को मारने वाली हरकत है। कोई भी उद्योग थोड़े समय के फायदे के लिए अपने उत्पाद को खराब नहीं करता। खासकर अपने किसी ऐसे उत्पाद के साथ कोई कंपनी छेड़छाड़ नहीं करती, या क्वालिटी के साथ समझौता नहीं करती, जो ग्राहक की आदत में शामिल हो। अखबार, पत्रिकाएं, चैनल ये सब लोग आदत के मुताबिक देखते हैं। पत्रकारिता के लिए समाचार और विज्ञापन का घालमेल किस हद तक खतरनाक हो सकता है इस बारे में पत्रकार सुरेंद्र किशोर की टिप्पणी गौरतलब है। हालांकि ये टिप्पणी लोकसभा चुनाव 2009 के दौरान कुछ अखबारों द्वारा समाचार के स्पेस को विज्ञापनों से भरने यानी पेड न्यूज के संदर्भ में है:
“यदि मीडिया की ताकत ही नहीं रहेगी तो कोई अखबार मालिक किसी सरकार को किसी तरह प्रभावित नहीं कर सकेगा। फिर उसे अखबार निकालने का क्या फायदा मिलेगा। यदि साख नष्ट हो गयी तो कौन सा सत्ताधारी नेता, अफसर या फिर व्यापारी मीडिया की परवाह करेगा। इसलिए व्यवहारिक दृष्टि से देखा जाए तो यह अखबार के संचालकों के हक में है कि छोटे-मोटे आर्थिक लाभ के लिए पैकेज पत्रकारिता को बढ़ावा न दें।” (5)
सुरेंद्र किशोर दरअसल भारतीय पत्रकारिता को एक नयी बीमारी पैकेज पत्रकारिता या पेड न्यूज से बचने की नसीहत देते हुए अखबार निकालने के पीछे भारतीय मीडिया उद्योग के व्यवसाय के अलावा बाकी हितों और स्वार्थों की चर्चा भी वे यहां कर रहे हैं। वे यह नहीं चाहते कि मीडिया अपनी साख इस हद तक गंवा दे कि उसकी हैसियत की खत्म हो जाए क्योंकि अगर मीडिया की साख ही नहीं बचेगी, तो मीडिया के जरिए वे स्वार्थ पूरे नहीं पाएंगे, जिसके लिए कोई व्यवसायी मीडिया कारोबार शुरू करता है। अखबार मालिकों द्वारा सरकार को प्रभावित करने वाली उनकी बात के मायने गंभीर हैं। सुरेंद्र किशोर पेड न्यूज का विरोध इस आधार पर नहीं कर रहे हैं कि ये अनैतिक है या पत्रकारिता और लोकतंत्र को इससे कोई नुकसान होगा, वे एक व्यावहारिक पक्ष लेते हैं और बताते है कि ऐसा करना मीडिया मालिकों के हित में भी नहीं होगा।
विज्ञापन में बसी है मीडिया की जान
भारत में मीडिया और मनोरंजन व्यवसाय के विकास के पीछे मुख्य ताकत विज्ञापनों से मिले पैसे की ही है। 2006-2008 के बीच का समय भारतीय विज्ञापन बाजार में तेज विकास का दौर रहा। इस दौरान विज्ञापनों से होने वाली आमदनी में हर साल औसतन 17.1 फीसदी की दर से बढ़ोतरी हुई। (6) 2009 में भारतीय विज्ञापन कारोबार 22,000 करोड़ रुपये का हो गया। वैश्विक मंदी और भारत पर उसके असर की वजह से 2008 के मुकाबले 2009 में विज्ञापन कारोबार में मामूली (0.4%) की गिरावट आई। लेकिन 2009-2014 के दौरान विज्ञापन कारोबार की औसत सालाना विकास दर 14 फीसदी से ज्यादा होने का अनुमान है। आर्थिक माहौल के बदलने से विज्ञापनों से होने वाली आमदनी पर असर जरूर पड़ा है लेकिन विज्ञापन कारोबार के बढ़ने की दर जीडीपी विकास दर के किसी भी अनुमान से ज्यादा है।
मीडिया के अलग अलग माध्यमों की बात करें तो प्रिंट माध्यम के विज्ञापन का बाजार 2009 में 10,300 करोड़ रुपये का था जिसके 2014 में बढ़कर 17,640 करोड़ रुपये हो जाने का अनुमान है। यानी अगले कुछ वर्षों में प्रिंट के विज्ञापनों का कारोबार सालाना 11.4 फीसदी की औसत रफ्तार से बढ़ेगा। वहीं, टीवी विज्ञापनों का बाजार 2009 में 8,800 करोड़ रुपये था जिसके 2014 में बढ़कर 18,150 करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान है। प्रतिशत के हिसाब से सालाना बढ़ोतरी का आंकड़ा 15.6 फीसदी का रहेगा। (7) बढ़ोतरी का ये सिलसिला वैश्विक आर्थिक मंदी के कारण विज्ञापन बाजार में आयी शिथिलता के बावजूद है।
ऐडेक्स इंडिया की रिपोर्ट के एक्सचेंज फॉर मीडिया में छपे विश्लेषण के मुताबिक 2009 में प्रिंट को सबसे ज्यादा विज्ञापन शिक्षा क्षेत्र से मिले। इसके बाद सेवा क्षेत्र और बैंकिग फाइनैंस सेक्टर का नंबर है। वैसे किसी एक कंपनी की बात करें तो सबसे ज्यादा विज्ञापन टाटा मोटर्स ने दिए। इसके बाद एलजी, मारुति सुजूकी, प्लानमैन कंसल्टेंट, स्टेट बैंक, सैमसंग, बीएसएनएल, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय और जनरल मोटर्स ने दिए। इसी दौरान ऑटो कंपनियों का विज्ञापन 7 परसेंट बढ़ गया। कुल विज्ञापनों में 95 फीसदी अखबारों के हिस्से आए, जबकि 5 फीसदी विज्ञापन पत्रिकाओं को मिले। (8)
विज्ञापन है असली किंग
अखबारों में विज्ञापनों के बढ़ते महत्व और कंटेंट पर उसके असर के बारे में प्रेस परिषद के चेयरमैन जस्टिस जी एन रे ने भी चिंता जताई है। उन्होंने कहा है कि प्रेस के लिए विज्ञापन आमदनी का मुख्य स्रोत बन गये हैं। महानगरों में तो प्रेस की कुल आमदनी का 70 से 80 फीसदी विज्ञापनों से आ रहा है। इस वजह से अखबारों में विज्ञापन ज्यादा ही जगह घेरने लगे हैं। समाचार और विज्ञापन का अनुपात लगातार विज्ञापनों के पक्ष में झुक रहा है। समाचार पत्रों की नीति और विचारों पर विज्ञापनों का दखल, जितना लगता है, उससे ज्यादा हो चुका है। कॉरपोरेट कम्यूनिकेशंस और ग्राहकों को लुभाने के लिए दिए जा रहे विज्ञापनों में तेजी से बढ़ोतरी के साथ अखबारों की आमदनी जोरदार होती है। इस वजह से अखबारों में पन्ने बढ़े हैं, दूसरी ओर अखबारो की कीमत घटी है। (9)
ऐसे समय में जब अखबारों और चैनलों की जान विज्ञापन नाम के तोते में बसी हो तब, कॉमनवेल्थ आयोजन समिति ने इस तोते को दाना खिलाने में देर करने की गलती की। इस गलती का सुधार करते ही कॉमनवेल्थ गेम्स की इमेज बदल सकती है। कॉमनवेल्थ खेलों की खबर को इस नजरिए से भी देखने-पढ़ने की जरूरत है।
संदर्भ:
(1) लोकसभा, अतारांकित प्रश्न संख्या-4014, जवाब की तारीख-15 दिसंबर, 2009
(2) लोकसभा में तारांकित प्रश्न संख्या-472, जवाब की तारीख-6 अगस्त, 2009
(3) मीडिया एथिक्स: ट्रूथ, फेयरनेस एंड ऑब्जेक्टिविटी, ऑक्सफोर्ड, 2009
(4) इंडियन मीडिया बिजनेस, विनीता कोहली, 2003, पेज-33
(5) पत्रकार प्रमोद रंजन का पैकेज पत्रकारिता पर आलेख, www.janatantra.com
(6) पीडब्ल्यूसी इंडियन एंटरटेनमेंट ऐंड मीडिया आउटलुक 2009, पेज-16
(7) फिक्की-केपीएमजी इंडियन मीडिया ऐंड एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री रिपोर्ट, 2010, पेज-150
(8) www.exchange4media.com
(9) 16 नवंबर 2009 को नेशनल प्रेस डे पर प्रेस परिषद के चेयरमैन जस्टिस जी एन रे का हैदराबाद में भाषण
Monday, February 1, 2010
जब सवाल जाति का हो तो क्या सेकुलर(?) और क्या संघी
जब वर्धा में प्रोफेसर अनिल चमड़िया की नियुक्ति निरस्त करने का आदेश जारी किया जा रहा था, लगभग उन्हीं दिनों दूर दक्षिण में मैंगलोर यूनिवर्सिटी में भी ऐसा ही एक फैसला हो रहा था। एक यूनिवर्सिटी केंद्र सरकार की है और दूसरी यूनिवर्सिटी एक ऐसे राज्य में चल रही है, जहां बीजेपी का शासन है। एक यूनिवर्सिटी को तथाकथित प्रगतिशील का गौरवशाली नेतृत्व हासिल है तो दूसरे पर संघ की ध्वजा लहरा रही है। लेकिन जब लोकतांत्रिक आचरण की धज्जियां उड़ाने की बात हो तो दोनों विश्वविद्यालयों में अद्भुत समानताएं दिखती हैं। आप खुद ही पढ़ लीजिए। -दिलीप मंडल
बेंगलुरू: हिंदुत्व से जुड़े संगठनों के दबाव में मैंगलोर यूनिवर्सिटी ने पत्रकारिता के एक लेक्चरर से पढ़ाने-लिखाने का काम छीन लिया है। लेक्चरर एम. पी. उमेशचंद्र को पत्रकारिता के छात्रों को पढ़ाने की जगह विश्वविद्यालय के एससी/एसटी सेल में स्पेशल अफसर का काम सौंप दिया गया है। इससे पहले
विश्वविद्यालय सिंडेकेट ने उन्हें क्लास न लेने का आदेश दिया था।
मैंगलोर से बीजेपी के सांसद नलिन कुमार कतील ने मांग की है कि उमेशचंद्र के ब्राह्मण विरोधी बयानों की जांच कराई जाए। एबीवीपी ने आरोप लगाया है कि उमेशचंद्र संघपरिवार के संगठनों के खिलाफ बोलते हैं और दलित मुद्दों पर अतिवादी रुख रखते हैं।
मैंगलोर यूनिवर्सिटी के मास कम्युनिकेशन के पोस्ट ग्रेजुएशन के कुछ छात्र लेक्चरर उमेशचंद्र को विश्वविद्यालय से निकालने की मांग कर रहे थे। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद यानी एबीवीपी इस आंदोलन का समर्थन कर रही थी। आंदोलनकारी 10 दिनों से उमेशचंद्र की कक्षा का बहिष्कार कर रहे थे।
उमेशचंद्र को लेक्चरर के पद से हटाने का फैसला सिंडेकेट की बैठक में किया गया, जिसकी अध्यक्षता कार्यकारी वाइस चांसलर के के आचार ने की। बैठक के बाद रजिस्ट्रार के चिनप्पा गौड़ा ने बयान जारी करके कहा है कि सिंडिकेट उमेशचंद्र को निर्देश देती है कि अगले आदेश तक वो क्लास न लें। जब तक सिंडिकेट अगला फैसला नहीं करती है तब तक संबंधित विषयों की पढ़ाई के लिए कोई और व्यवस्था की जाएगी।
उमेशचंद्र ने कहा है कि छात्रों को राजनीतिक ताकतों ने बहकाया है और छात्रों से उन्हें कोई शिकायत नहीं है। इससे पहले हिंदुत्ववादी संगठनों ने इंग्लिश के लैक्चरर पट्टाबिरम सौमय्याजी के खिलाफ भी अभियान चलाया था क्योंकि उन्होंने इलाके में नैतिकता को लेकर जबर्दस्ती करने वालों को विरोध किया था। (द हिंदू, सकाल टाइम्स और मैंगलोरियन डॉट कॉम से मिली सूचनाओं के आधार पर।)
स्रोत:
http://www.sakaaltimes.com/
http://beta.thehindu.com/news/
http://mangalorean.com/news.
Tuesday, September 1, 2009
वक्त बदल गया है, आप भी बदलिए!
मेरे करीबी रिश्तेदारों में कई जातियों के लोग हैं। ब्राह्मण से लेकर कायस्थ और नायर से लेकर दलित तक। ये सभी सभी परिवार प्रेम से रह रहे हैं। आपके परिवारों में भी लोगों ने प्रेम किया होगा और कई ने जाति से बाहर शादियां भी की होंगी। अब आप जाति पर अपने शर्मसार करने वाले विचारों को अपने रिश्तेदारों पर लागू करके देखिए और हिसाब लगाइए कि कौन सी बच्ची या बच्चा कवि बनेगा और कौन कहानीकार और कौन आत्मकथा बेहतर लिखेगा। या हिसाब लगाइए इस बात का कि कौन बैटिंग करेगा और कौन बॉलिंग और कौन टिक कर खेलेगा और कौन टिक कर नहीं खेलेगा या फिर कौन बेहतर नेतृत्व क्षमता दिखाएगा और कौन नहीं दिखाएगा। आपको अपने ही विचारों से शायद नफरत होने लगे और आप अपने बच्चों और पोते-पोतियों से माफी मांगने के अलावा कुछ और नहीं कर पाएं। बड़े लोग जब इस तरह अश्लील और समाज में नफरत फैलाने वाली बातें करने लगें, तो हमारा सिर शर्म से झुक जाता है।
मैं ये सोचने की कोशिश कर रहा हूं कि ये दोनों बुज़ुर्ग बीमार क्यों हैं। इसका एक कारण तो मुझे समझ में आ रहा है। इन्हें दुनिया की शायद खबर ही नहीं है। प्रभाष जोशी इंटरनेट नहीं देखते। वो ऑर्कुट पर नहीं हैं। वो फेसबुक में भी नहीं हैं। मुझे नहीं मालूम कि उनके पास ई-मेल आईडी है या नहीं। कुछ समय पहले तक उनके पास मोबाइल फोन भी नहीं था। एसएमएस पता नहीं वो करते हैं या नहीं। वो ट्विटर पर ट्विट भी नहीं करते। उनका कोई ब्लॉग भी नहीं है। राजेंद्र यादव का भी कमोबेश यही हाल है। वैसे तो इस गरीब देश के ज्यादातर लोगों की प्रोफाइल नेटवर्किंग साइट पर नहीं हैं, वो ईमेल भी नहीं करते, न ही कंप्यूटर से उनका कोई वास्ता है। देश में इस समय लगभग 6 करोड़ लोग ही इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं (देखें मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन ऑफ इन्फॉर्मेशन टेक्नॉलॉजी की सालाना रिपोर्ट)। तो अगर राजेंद्र यादव या प्रभाष जोशी देश के छह करोड़ कनेक्टेड लोगों में नहीं हैं तो क्या फर्क पड़ता है?
फर्क पड़ता है। इसलिए क्योंकि ये दोनों कम्युनिकेशन यानी संवाद के धंधे में हैं। और ऐसे लोग अगर दीन-दुनिया से अपडेट न रहें तो फर्क पड़ता है। ये बेखबर लोग अगर अपनी बात खुद तक ही रखें तो हमें धेले भर की परवाह नहीं। लेकिन वो बोल रहे हैं और बेहद बेतुका और बेहूदा बोल रहे हैं। ये दोनों लोग ऐसी बातें बोल रहे हैं, जो उनके चेलों के अलावा हर किस को अखर रही है। मैं एक भी ऐसे आदमी को नहीं जानता, जो जातिवाद के समर्थन में उनके विचारों का कम से कम सार्वजनिक तौर पर समर्थन करें। इन दोनों महान लोगों के चेलों के पास भी बचाव में देने को कोई तर्क नहीं हैं। आखिर इनके चेलों में से भी कई ने जाति से बाहर शादी की है। उन्हें मालूम है कि उनकी अगली पीढ़ी क्या करने वाली है। हर जाति के लोगों को ये लेखन आउटडेटेड और सड़ा हुआ लग रहा है। 21वीं सदी के लगभग 10 साल बीतने के बाद ये अज्ञानी लेखन हमारी देवभाषा में ही संभव है। इस समय पश्चिम में आप कल्पना नहीं कर सकते कि कोई जाति या वर्ण या नस्ल या रंग के आधार पर श्रेष्ठता का ऐसा खुल्लमखुल्ला और अश्लील समर्थन करे। उसे पूरा देश दौड़ा लेगा।
बहरहाल ये इस बात का प्रमाण है कि ये दोनों लोग दुनिया में चल रहे आधुनिक विमर्श से वाकिफ ही नहीं हैँ। ये महानगर में रहते हैं। आर्थिक रूप से समर्थ हैं। लेकिन नेट पर नहीं हैं। पता नहीं की-बोर्ड पर काम करना इन्हें आता भी है या नहीं। ऐसे में दोनों को पता ही कैसे चलेगा कि नॉम चॉमस्की ने अपने ब्लॉग पर ताजा क्या लिखा है या फिर फ्रांसिस फुकोयामा के बारे में ब्लॉग में क्या चल रहा है। उन्हें पता ही नहीं कि दुनिया कितनी बदल गयी है। नहीं, ये एलीट होने या जेब में ढेर सारे पैसे होने की बात नहीं है। 10 रुपये में कोई भी आदमी आधे से लेकर एक घंटे तक इंटरनेट कैफे में कनेक्ट हो सकता है। प्रभाष जोशी और राजेंद्र यादव भी ये कर सकते हैं। वो ऐसा नहीं करते, इस वजह से उनका अपने पाठकों की दुनिया से जबर्दस्त डिस्कनेक्ट है।
भारत में इतने हमलावर आये हैं (उनमें से ज्यादातर अपने साथ परिवार लेकर नहीं आये) और समाज व्यवस्था में इतनी उथल-पुथल हुई है कि रक्त शुद्धता की बात कोई कूढ़मगज इंसान ही कर सकता है। हिमालय के किसी बेहद दुर्गम गांव में या किसी द्वीप या किसी बीहड़ जंगल में बसी बस्ती के अलावा रक्त अब शायद ही कहीं शुद्ध बचा होगा। ऐसे में कोई ये कहे कि कोई खास जाति किसी खास काम को करने में इसलिए ज्यादा सक्षम और समर्थ है कि उसका जन्म किसी खास जाति में हुआ है, तो इस पर आप हंसने के अलावा क्या कर सकते हैं। आप रो भी सकते हैं कि जिन लोगों को हिंदी भाषा ने नायक कह कर सिर पर बिठाया है, उनकी मेधा का स्तर ये है।
प्रभाष जोशी और राजेंद्र यादव, क्या आपको अपने घरों में नयी पीढ़ी की हंसी की आवाज़ सुनाई दे रही है? पता लगाइए कि कहीं वो आप पर तो नहीं हंस रहे हैं।
प्रभाष जोशी तो खुद को ब्राह्मण ही मानते होंगे। उनमें वो सारे गुण होंगे, जिनका जिक्र उन्होंने ब्राह्मणों के बारे में अपने इंटरव्यू में किया है। अगर उनका जन्म मिथिलांचल या मालवा के किसी बेहद गरीब ब्राह्मण परिवार में हुआ होता, तो भी क्या ये तय था कि वो संपादक ही बनते। इस बात की काफी संभावना है कि वो पटना या इंदौर के किसी सरकारी दफ्तर में चपरासी होते और लोगों को पानी पिला रहे होते। राजेंद्र यादव किस जातीय गुण की वजह से संपादक बन गये?
तो प्रभाष जोशी और राजेंद्र यादव,
बात सिर्फ इतनी सी है कि किसी को कितना मौका मिला है। बात अवसर की है। ये न होता तो आप अपने बच्चों को किसी गांव के सरकारी स्कूल में पढ़ाते। फिर हम भी देखते धारण क्षमता का चमत्कार। यादव जी का ये कहना गलत है कि “ब्राम्हणों में कुछ चीज़ें से अभ्यास आयी हैं जैसे कि अमूर्तन पर विचार-मनन और इसीलिए कविताई में उनका वर्चस्व है। इन्हीं वजहों से विश्वविद्यालयों और अकादमियों में भी वे काबिज़ हैं।” वो वहां काबिज इसलिए हैं, क्योंकि उन्हें वहां तक पहुंचने का मौका मिला है। पढ़ाई-लिखाई को लेकर चेतना अलग-अलग जातियों और समूहों में कुछ जादू नेटवर्किंग का भी है। नरेंद्र जाधव और बीएल मुणगेकर को मौका मिला तो दलित होते हुए भी वो पुणे और मुंबई जैसे बड़े विश्वविद्यालयों में कुलपति बन गये। कोई भी बन सकता है।
किसी जाति में कोई अलग गुण नहीं होता। कुछ पुरानी बातें अब लागू नहीं होतीं। सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने गीता का भाष्य करते हुए 18वें अध्याय में यही कहा है। पढ़ लीजिएगा। 21वीं सदी में जातीय श्रेष्ठता की बात करेंगे तो घृणा के नहीं हंसी के पात्र बनेंगे।
ये वक्त के साथ खुद को बदल नहीं पाए!
मेरे करीबी रिश्तेदारों में कई जातियों के लोग हैं। ब्राह्मण से लेकर कायस्थ और नायर से लेकर दलित तक। ये सभी सभी परिवार प्रेम से रह रहे हैं। आपके परिवारों में भी लोगों ने प्रेम किया होगा और कई ने जाति से बाहर शादियां भी की होंगी। अब आप जाति पर अपने शर्मसार करने वाले विचारों को अपने रिश्तेदारों पर लागू करके देखिए और हिसाब लगाइए कि कौन सी बच्ची या बच्चा कवि बनेगा और कौन कहानीकार और और कौन आत्मकथा बेहतर लिखेगा। या हिसाब लगाइए इस बात का कि कौन बैटिंग करेगा और कौन बॉलिंग और कौन टिक कर खेलेगा और कौन टिककर नहीं खेलेगा या फिर कौन बेहतर नेतृत्व क्षमता दिखाएगा और कौन नहीं दिखाएगा। आपको अपने ही विचारों से शायद नफरत होने लगे और आप अपने बच्चों और पोते-पोतियों से माफी मांगने के अलावा कुछ और नहीं कर पाएं। बड़े लोग जब इस तरह अश्लील और समाज में नफरत फैलाने वाली बातें करने लगें तो हमारा सिर शर्म से झुक जाता है।
मैं ये सोचने की कोशिश कर रहा हूं कि ये दोनों बुजुर्ग बीमार क्यों हैं। इसका एक कारण तो मुझे समझ में आ रहा है। इन्हें दुनिया की शायद खबर ही नहीं है। प्रभाष जोशी इंटरनेट नहीं देखते। वो ऑर्कुट पर नहीं हैं। वो फेसबुक में भी नहीं हैं। मुझे नहीं मालूम कि उनके पास ई-मेल आईडी है या नहीं। कुछ समय पहले तक उनके पास मोबाइल फोन भी नहीं था। एसएमएस पता नहीं वो करते हैं या नहीं। वो ट्विटर पर ट्विट भी नहीं करते। उनका कोई ब्लॉग भी नहीं है। राजेंद्र यादव का भी कमोबेस यही हाल है। वैसे तो इस गरीब देश के ज्यादातर लोगों के प्रोफाइल नेटवर्किंग साइट पर नहीं हैं, वो ईमेल भी नहीं करते, न ही कंप्यूटर से उनका कोई वास्ता है। देश में इस समय लगभग 6 करोड़ लोग ही इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं (देखें मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन ऑफ इन्फॉर्मेशन टेक्नॉलॉजी की सालाना रिपोर्ट)। तो अगर राजेंद्र यादव या प्रभाष जोशी देश के छह करोड़ कनेक्टेड लोगों में नहीं हैं तो क्या फर्क पड़ता है?
फर्क पड़ता है। इसलिए क्योंकि ये दोनों कम्युनिकेशन यानी संवाद के धंधे में हैं। और ऐसे लोग अगर दीन-दुनिया से अपडेट न रहें तो फर्क पड़ता है। ये बेखबर लोग अगर अपनी बात खुद तक ही रखें तो हमें धेले भर की परवाह नहीं। लेकिन वो बोल रहे हैं और बेहद बेतुका और बेहूदा बोल रहे हैं। ये दोनों लोग ऐसी बातें बोल रहे हैं जो उनके चेलों के अलावा हर किस को अखर रही है। मैं एक भी ऐसे आदमी को नहीं जानता जो जातिवाद के समर्थन में उनके विचारों का कम से कम सार्वजनिक तौर पर समर्थन करें। इन दोनों महान लोगों के चेलों के पास भी बचाव में देने को कोई तर्क नहीं हैं। आखिर इनके चेलों में से भी कई ने जाति से बाहर शादी की है। उन्हें मालूम है कि उनकी अगली पीढ़ी क्या करने वाली है। हर जाति के लोगों को ये लेखन आउटडेटेड और सड़ा हुआ लग रहा है। 21वीं सदी के लगभग 10 साल बीतने के बाद ये अज्ञानी लेखन हमारी देवभाषा में ही संभव है। इस समय पश्चिम में आप कल्पना नहीं कर सकते कि कोई जाति या वर्ण या नस्ल या रंग के आधार पर श्रेष्ठता का ऐसा खुल्लमखुल्ला और अश्लील समर्थन करे। उसे पूरा देश दौड़ा लेगा।
बहरहाल ये इस बात का प्रमाण है कि ये दोनों लोग दुनिया में चल रहे आधुनिक विमर्श से वाकिफ ही नहीं हैँ। ये महानगर में रहते है। आर्थिक रूप से समर्थ हैं। लेकिन नेट पर नहीं है। पता नहीं की-बोर्ड पर काम करना इन्हें आता भी है या नहीं। ऐसे में दोनों को पता ही कैसे चलेगा कि नॉम चॉमस्की ने अपने ब्लॉग http://www.zmag.org/blog/noamchomsky पर ताजा क्या लिखा है या फिर फ्रांसिस फुकोयामा के बारे में ब्लॉग में क्या चल रहा है http://en.wordpress.com/tag/francis-fukuyama/। उन्हें पता ही नहीं कि दुनिया कितनी बदल गई है। नहीं, ये एलीट होने या जेब में ढेर सारे पैसे होने की बात नहीं है। 10 रुपए में कोई भी आदमी आधे से लेकर एक घंटे तक इंटरनेट कैफे में कनेक्ट हो सकता है। प्रभाष जोशी और राजेंद्र यादव भी ये कर सकते हैं। वो ऐसा नहीं करते इस वजह से उनका अपने पाठकों की दुनिया से जबर्दस्त डिस्कनेक्ट हैं।
भारत में इतने हमलावर आए हैं (उनमें से ज्यादातर अपने साथ परिवार लेकर नहीं आए) और समाज व्यवस्था में इतनी उथल पुथल हुई है कि रक्त शुद्धता की बात कोई कूढ़मगज इंसान ही कर सकता है। हिमालय के किसी बेहद दुर्गम गांव में या किसी द्वीप या किसी बीहड़ जंगल में बसी बस्ती के अलावा रक्त अब शायद ही कहीं शुद्ध बचा होगा। ऐसे में कोई ये कहे कि कोई खास जाति किसी खास काम को करने में इसलिए ज्यादा सक्षम और समर्थ है कि उसका जन्म किसी खास जाति में हुआ है तो इस पर आप हंसने के अलावा क्या कर सकते हैं। आप रो भी सकते हैं कि जिन लोगों को हिंदी भाषा ने नायक कहकर सिर पर बिठाया है, उनकी मेधा का स्तर ये है।
प्रभाष जोशी और राजेंद्र यादव, क्या आपको अपने घरों में नई पीढ़ी की हंसी की आवाज सुनाई दे रही है। पता लगाइए कि कहीं वो आप पर तो नहीं हंस रहे हैं।
प्रभाष जोशी तो खुद को ब्राह्मण ही मानते होंगे। उनमें वो सारे गुण होंगे जिनका जिक्र उन्होंने ब्राह्मणों के बारे में अपने इंटरव्यू में किया है। अगर उनका जन्म मिथिलांचल या मालवा के किसी बेहद गरीब ब्राह्मण परिवार में हुआ होता तो भी क्या ये तय था कि वो संपादक ही बनते। इस बात की काफी संभावना है कि वो पटना या इंदौर के किसी सरकारी दफ्तर में चपरासी होते और लोगों को पानी पिला रहे होते। राजेंद्र यादव किस जातीय गुण की वजह से संपादक बन गए?
तो प्रभाष जोशी और राजेंद्र यादव,
बात सिर्फ इतनी सी है कि किसी को कितना मौका मिला है। बात अवसर की है। ये न होता तो आप अपने बच्चों को किसी गांव के सरकारी स्कूल में पढ़ाते। फिर हम भी देखते धारण क्षमता का चमत्कार। यादव जी का ये कहना गलत है कि “ब्राम्हणों में कुछ चीज़ें से अभ्यास आई हैं जैसे कि अमूर्तन पर विचार-मनन और इसीलिए कविताई में उनका वर्चस्व है। इन्हीं वजहों से विश्वविद्यालयों और अकादमियों में भी वे काबिज़ हैं। “ वो वहां काबिज इसलिए हैं क्योंकि उन्हें वहां तक पहुंचने का मौका मिला है। पढ़ाई लिखाई को लेकर चेतना अलग अलग जातियों और समूहों में कुछ जादू नेटवर्किंग का भी है। नरेंद्र जाधव और बीएल मुणगेकर को मौका मिला तो दलित होते हुए भी वो पुणे और मुंबई जैसे बड़े विश्वविद्यालयों में कुलपति बन गए। कोई भी बन सकता है।
किसी जाति में कोई अलग गुण नहीं होता। कुछ पुरानी बातें अब लागू नहीं होतीं। सर्वपल्ली राधाकृष्णन मे गीता का भाष्य करते हुए 18वें अध्याय में यही कहा है। पढ़ लीजिएगा। 21वीं सदी में जातीय श्रेष्ठता की बात करेंगे तो घृणा के नहीं हंसी के पात्र बनेंगे।
Sunday, July 5, 2009
टाइम मशीन में लालगढ़ और एसपी सिंह
यहां हम एक ऐसे न्यूजरूम की कल्पना करते हैं जहां टाइम मशीन में डालकर लालगढ़ के संघर्ष और एसपी सिंह को एक साथ इकट्ठा कर दिया गया हो। इस घटना के पात्र वास्तविक हो सकते हैं, सिर्फ नाम बदल दिए हैं क्योंकि इससे पूरी बात पर कोई फर्क नहीं पड़ता है।
जून 2009 के आखिरी हफ्ते का कोई दिन
स्थान-एक न्यूज चैनल का दफ्तर
"लालगढ़ में पुलिस के खिलाफ सभा कर रहे 10,000 लोगों को कल आतंकवादी किसने लिखा था?" एसपी की संयत लेकिन थोड़ी तीखी आवाज के साथ ही न्यूजरूम में सन्नाटा छा गया। सुबह साढ़े 9 बजे का समय था। कनॉट प्लेस में टीवी चैनल के एक दफ्तर में रात की शिफ्ट वाले जा रहे थे और अगली शिफ्ट वाले आ रहे थे। हर ओर हलचल मची थी। एसपी सिंह 3 दिन शहर से बाहर रहकर लौटे थे। ज्यादातर लोगों को तो पहली बार में समझ में ही नहीं आया कि लालगढ़ में पुलिस से लड़ रहे लोगों को आतंकवादी नहीं तो और क्या लिखा जाएगा। पूरा मीडिया तो लालगढ़ में जो हो रहा है उसे माओवादी आतंकवादी बनाम सुरक्षा बलों के संघर्ष के तौर पर देख रहा है। ऐसे में एसपी आखिर कहना क्या चाहते हैं।
"भाई ऐसा है कि 10,000 लोग अगर आतंकवादी हो गए हैं और 140 गांवों की पूरी जनता आतंकवादी हो गई है तब तो उन्हें गिरफ्तार करना होगा या मारना होगा", एसपी बोले, " आप सब लोग पत्रकार हैं और इस नाते समझदार भी, क्या ये संभव है।"
न्यूजरूम का सन्नाटा और गहरा हो गया क्योंकि बुलेटिन में आतंकवादी शब्द कई बार आया था और ये खबर कई हाथों से गुजरी थी, जिसमें सीनियर लोग भी शामिल थे। न्यूजरूम की सबसे युवा सदस्य सुनयना ने पूछा, "सर, आतंकवादी नहीं तो क्या लिखें? बंदूक तो उनके पास होती है। हमारे पास जो फुटेज आ रहे हैं उनमें आदिवासियों के हाथों में कुल्हाड़ी, लाठी और दो-चार बंदूकें भी दिखती हैं। उन्होंने लैंडमाइन ब्लास्ट भी तो किए हैं।"
"देखिए अगर हथियार होने से कोई आतंकवादी होता है तो देश में सबसे ज्यादा हथियार तो पुलिस और सेना के पास हैं। उनके काम करने का तरीका भी हिंसक ही होता है। आपकी परिभाषा से तो देश में आतंकवादियों का सबसे बड़ा गिरोह सेना और पुलिस हो गई। मेरे ख्याल से लालगढ़ में जो हो रहा है वो एक पॉपुलर आंदोलन हैं, जिसमें कुछ माओवादी भी घुसे हुए हैं। आप हद से हद इन्हें माओवादी या उग्रवादी या अतिवादी कहें। हिंसक तौर तरीके अपनाने वाले भगत सिंह को ब्रिटेन का इतिहास आतंकवादी कहता है और हम क्रांतिकारी कहते हैं। यानी भाषा के ऐसे सवाल इस बात से तय होते हैं कि आप किस पक्ष में खड़े हैं। मेरी राय है कि पत्रकारों में इस लड़ाई में जनता के पक्ष में खड़ा होना चाहिए। देखिए आप जैसे ही अपना पक्ष तय करेंगे आपकी भाषा और आपके शब्दों का संस्कार तय हो जाएगा, " एसपी की बात अब कुछ लोगों को समझ में आने लगी थी।
लेकिन सुनयना के जेहन में अभी भी कई सवाल आ रहे थे। वो बोली, "सर, ये लोग सरकार को नहीं मानते, पुलिस को इलाके में घुसने नहीं देते, ऐसे लोगों को आतंकवादी और देशद्रोही क्यों नहीं माना जाए।
एसपी अब गहरी सोच में डूब गए। सुनयना को बाकी सीनियर्स समझाने में जूट गए। कई तरह के तर्क वितर्क होते रहे। अचानक एसपी बोले, सुनयना आपकी राय में लालगढ़ में हंगामा कब शुरू हुआ है। सुनयना के साथ ही कई और लोग बोले लगभग 15-20 दिनों से।
एसपी ने कहा, यही तो हमारे पेशे के लोगों की मुश्किल है। सब कुछ इंस्टेंट होता है आप लोगों के लिए। देखिए अगर पश्चिम बंगाल और देश की बड़ी खबरों पर आपकी नजर होगी तो आपको याद होगा कि पिछले साल नवंबर महीने में इसी इलाके में एक माइन ब्लास्ट हुआ था, जिसमें पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य और उस समय के केंद्रीय स्टील मंत्री रामविलास पासवान बाल बाल बचे थे। वो इलाके में एक स्टील प्लांट के निर्माण का उद्घाटन करने जा रहे थे। इस प्लान्ट के लिए बड़े पैमाने पर जमीन का अधिग्रहण होना है और पश्चिम बंगाल में नंदीग्राम और सिंगुर के अनुभव के बाद कोई भी किसान सरकार को निजी प्रोजेक्ट के लिए सरकारी कीमत पर जमीन बेचने के तैयार नहीं है। खैर आप सबने भी अपने ही चैनल पर खबर चलाई थी ब्लास्ट के बाद बड़े पैमाने पर लोगों की गिरफ्तारी हुई थी। इस घटना को जाने बगैर आप लालगढ़ के बारे में अगर लिखेंगे या बोलेंगे तो खबर के साथ और साथ ही उस इलाके की जनता के साथ अन्याय करेंगे। लालगढ़ माओवाद का नहीं जमीन अधिग्रहण और विरोध का मुद्दा है।
इस चर्चा के दौरान दिन की शिफ्ट के ज्यादातर लोग ऑफिस पहुंच चुके थे। कॉन्फ्रेंस रूम में न्यूजमीटिंग के लिए लोग जुटने लगे। चाय के साथ खबरें तय करने का सिलसिला शुरू हुआ...
...न्यूजरूम में लालगढ़ और एसपी सिंह
न्यूज मीटिंग में सभी ब्यूरो से आए आइडिया की लिस्ट और एएनआई और दूसरी समाचार एजेंसियों के दिन के एजेंडे की सूची बांट दी गई। चूंकि लालगढ़ से बेहद एक्साइटिंग विजुअल आ रहे थे। इसलिए ये सब समझ रहे थे कि ये खबर ही आज बिकेगी। लेकिन एसपी ने आतंकवाद और उग्रवाद के बीच फर्क को लेकर जिस तरह अपनी बातें रखीं थी, उससे साफ जाहिर था कि लालगढ़ अब वैसे कवर नहीं होगा, जिस तरह से उसे पिछले तीन-चार दिनों से कवर किया जा रहा था।
एसपी ने बांग्ला के एक अखबार में छपी एक फोटो लोगों को दिखाई। "देखिए ये चार फोटो हैं हमारी आज की सबसे बड़ी स्टोरी।" इसके साथ छपी खबर को पढ़ने के लिए उन्होंने अखबार छवि विश्वास की ओर बढ़ाया। छवि ने जो खबर पढ़ी उसके मुताबिक चूंकि सुरक्षा बलों के पास लैंडमाइन डिटेक्टर सिर्फ दो ही हैं, इसलिए वो आदिवासियों को लोहे की छड़े पकड़ा देते हैं और सुरक्षा बलों के आगे आगे चलने को मजबूर करते हैं। उन्हें कहा जाता है कि वो जमीन को बीच बीच में कोंचकर देखते रहें कि कोई बारूदी सुरंग तो नहीं है।
एसपी ने कहा मुझे कोलकाता से किसी ने बताया है कि वहां के लोकल चैनल के पास इसकी फुटेज है। चैनल के संपादक से मेरी बात हो गई है। कोलकाता की रिपोर्टर से कहिए कि वहां से फुटेज ले आए। इस फुटेज पर बांग्ला चैनल का एक्सक्लूसिव जरूर चलाएं। साथ ही एक रिपोर्टर को फुटेज के साथ मानवाधिकार आयोग भेजिए और वहां से रिएक्शन लाइए। बंगाल के मुख्यमंत्री या चीफ या होम सेक्रेटरी जहां भी मिले उन्हें पकड़िए और सवाल के जवाब में जो भी कहें या चुप रहें, उसे दिखाइए। कोई बात न करे तो रिपोर्टर को राइटर्स बिल्डिंग के बाहर खड़ा कीजिए और उसके रिएक्शन लेने के प्रयासों के बारे में पीटीसी करवाइए। मानवाधिकार आयोग और मुख्यमंत्री कार्यालय में अगले एक घंटे में फैक्स भेजकर रिएक्शन मांगिए।
पिछले तीन दिनों से होम मिनिस्ट्री से आ रहे बयानों और बाइट के आधार पर लालगढ़ की रिपोर्टिंग करने वाले रिपोर्टर प्रकाश चंद्रा को समझ में आ रहा था कि अब उसके आराम के दिन गए। एसपी ने प्रकाश की ओर मुड़कर कहा, "मंत्री और सेक्रेटरी तो बहुत बयान दे रहे हैं। इस बारे में उनसे सवाल पूछिए। जो भी वो कहते हैं उसे स्टोरी के हिस्से के तौर पर डालिए। सरकार असहज सवाल पूछने वालों को ही पूछती है। इसलिए जरा डटकर पूछिए। भरोसा रखिए आपका सोर्स खराब नहीं होगा"
एसपी ने एसाइनमेंट हेड नवीन कुमार से पूछा-लालगढ़ कौन कवर कर रहा है। जवाब मिला कोलकाता की रिपोर्टर श्रुति वहां गई है। वो सुरक्षा बलों के साथ लगातार लगी हुई है और हर पल की खबर चैनल को मिल रही है। इस मामले में हमारा चैनल किसी भी चैनल से पीछे नहीं है।
एसपी ने कहा- अगर सभी चैनलों के रिपोर्टर सुरक्षा बलों के साथ लगे हैं और सारी सूचनाएं सुरक्षा बलों से ही मिल रही है तो कोई भी चैनल पीछे कैसे हो सकता है। लेकिन मुश्किल ये है कि कोई भी चैनल आगे भी नहीं हो सकता। वहां हमारे कम से कम तीन रिपोर्टर और कैमरा टीम होनी चाहिए। एक श्रुति को सुरक्षा बलों से साथ रहने दीजिए। पटना से आशीष और दिल्ली से छवि विश्वास को लालगढ़ भेजिए। दोनों को बांग्ला आती है। ये दोनो रिपोर्टर गांववालों के साथ रहकर उनके नजरिए को सामने लाएंगे। इस तरह हम न सिर्फ बैलेंस रिपोर्टिंग कर रहे होंगे बल्कि बाकी चैनलों को जब तक ये बात समझ में आएगी तब तक हम लीड ले चुके होंगे। हमारे पास अलग तरह के फुटेज होंगे अलग तरह की साउंड बाइट होगी।
एसपी सिंह इस पूरी बातचीत के दौरान बांग्ला और कोलकाता से छपने वाले बाकी अखबारों को पढ़ते भी जा रहे थे। उन्होंने कहा- ये जो खबर इस बांग्ला अखबार में छपी है, इसे देखिए। गांव वाले सुरक्षा बलों को खाने पीने का सामान नहीं बेच रहे हैं। सुरक्षा बलों को उनके साथ जबर्दस्ती करनी पड़ रही है। ये स्टोरी बताती है कि लोगों को सुरक्षा बलों को लेकर कितनी नाराजगी है और दिल्ली के अखबारों में जो छप रहा है कि गांव वालों ने सुरक्षा बलों का स्वागत किया, उसकी हकीकत क्या है।
इसके बाद एसपी डेस्क के लोगों की ओर मुड़े और कहा- देखिए लालगढ़ को पूरे कॉन्टेस्ट में देखिए। ये सिर्फ कानून-व्यवस्था का मामला नहीं है। जमीन अधिग्रहण को लेकर देश भर में जो गुस्सा है, उसके हिस्से के तौर पर भी लालगढ़ को देखा जाना चाहिए। आप लोग कोलकाता के अखबारों को जरूर देखें। उससे आपको ज्यादा पक्षों को समझने में आसानी होगी। दिल्ली में बैठकर आपको ये कैसे अंदाजा लग पाएगा कि वहां के ज्यादातर स्कूलों में फौज भरी है। जीवन अस्तव्यस्त है। वहां लगभग युद्ध जैसे हालात हैं। अपने ही देश की सबसे गरीब जनता के विरुद्ध युद्ध। मैं निजी तौर पर हिंसा के खिलाफ हूं। लेकिन हर तरह की हिंसा का। सरकारी हिंसा का समर्थन मैं नहीं कर सकता। किसान की जमीन मनमानी कीमत पर लेकर उसे उद्योगपतियों को जबरन सौंप देना हिंसा है। दुनिया भर में उद्योगपति खुद जमीन खरीदते हैं। जबरन जमीन ले लेने का ये कानून अंग्रेजों के समय बना। लेकिन आजाद भारत की सरकारें इसका इस्तेमाल करती रहती हैं। ये कानून जनता और किसानों के खिलाफ हिंसा है। हिंसा का विरोध करना है तो इस सरकारी हिंसा का भी विरोध करना चाहिए। ये आश्चर्यजनक है कि सरकार की बंदूकें ऐसे मामलों में हमेशा किसानों के खिलाफ ही चलती हैं। यूरोप या अमेरिका जैसे विकसित लोकतंत्र में इसकी कल्पना आप नहीं कर सकते। ये हमारे जैसे अविकसित देशों में ही हो सकता है।
इस बातचीत को बहुत देर से खामोशी से सुन रहा अभिषेक थोड़ा बेचैन दिख रहा था। अभिषेक ने कहा, "लेकिन सर, माओवादियों को सरकार बैन कर चुकी है। बाजार की ताकतें उनके खिलाफ हैं ही। ऐसे में क्या आपको लगता है कि हमारे जैसा मीडिया इस मुद्दे पर जनता के पक्ष में स्टैंड ले सकता है।"
एसपी के माथे पर चिंता की लकीरें नजर आने लगीं। वो चुप रहे। ऐसा लगा कि वो इस सवाल का जवाब नहीं देना चाहते। वो धीरे से बोले, "अभिषेक दरअसल आप वो सवाल उठा रहे हैं जो मैं अपने आप से अक्सर पूछता हूं। देखिए आप यहां इतने महीनों से काम कर रहे हैं। चैनल के जनता के या कमजोरों के पक्ष में खड़े होने से आपको शायद ही कभी रोका गया होगा। लेकिन ये तो मानना ही पड़ेगा कि जिसने इस चैनल के चलाने के लिए पैसे खर्च किए हैं वो धर्मार्थ चैनल नहीं चला रहा है। उसे अपने निवेश पर मुनाफा चाहिए। हमें उसने काम पर इसलिए रखा है कि हम उसके लिए मुनाफा कमाएं। इसके लिए जरूरी है कि ढेर सारे लोग हमारा चैनल देखें। अगर आप जनपक्षीय होकर भी दर्शक जुटा पा रहे हैं तो शायद ही आपको कभी टोका जाएगा। बिजनेसमैन की पहली और आखिरी प्राथमिकता पैसे कमाना है। इस गणित को हमें समझना होगा। बिजनेस मैन के पैसे से चल रहे चैनल को हम माओवादियों का मुखपत्र या लघुपत्रिका बनाना चाहेंगे तो वो ऐसा नहीं करने देगा। वो इस चैनल को सरकार का भोंपू भी नहीं बनने देगा अगर ऐसा करने पर दर्शक हमें छोड़ जाएं। इस समय की असली चुनौती है कि कैसे जनपक्षीय होते हुए भी पॉपुलर बने रहा जाए। ये काम कठिन है। लेकिन मुमकिन है। गणेश जी को दूध पिलाने वाली घटना को अंधविश्वास के तौर पर दिखाकर भी दर्शक जुटाए जा सकते थे और अंधविश्वास का खंडन करके भी। हमने मोची के औजार को दूध पिलाकर अंधविश्वास का खंडन किया और पॉपुलर भी बने रहे। ये पत्रकारों के सामने मौजूद सबसे बड़ी चुनौती है।
अभिषेक बीच में ही बोल पड़ा, " लेकिन सर, अगर हमारी रिपोर्टिंग ज्यादा ही जनपक्षीय हो गई तो क्या सरकार और देश के सत्ता इसकी इजाजत देगी। एसपी अब और परेशान नजर आ रहे थे। उन्होंने कहा- "मैं जानता हूं कि इसकी इजाजत संस्थागत मीडिया में नहीं है। मैं संस्थानों के अंदर लोकतांत्रिक और जनपक्षीय स्पेस के लिए गुरिल्ला लड़ाई लड़ रहा हूं। लेकिन ये भी सच है कि महीने के आखिर में मिलने वाली तनख्वाह और संस्थान में होने से आने वाला रुतबा और दबदबा भी शायद मुझे प्रिय है। ये मेरे अंदर का अंतर्विरोध है। कभी कभी मन करता है कि सब छोड़कर चल दूं और अपने मन का काम करूं। लेकिन जो कुछ भी हासिल हो रहा है वो मुझे पीछे खींचता है। इसलिए कई बार मैं समझौते करता हूं। कई बार नहीं करता। कई बार जनता के लिए लड़ रहे संगठनों को पैसे देकर अपना अपराधबोध मिटाता हूं। लेकिन आखिरकार मैं इसी व्यवस्था के अंदर का एक पत्रकार हूं। अपना सच और अपनी सीमाएं मैं जानता हूं। अपनी सीमाएं मैं बढ़ाने की कोशिश में लगा रहता हूं। लेकिन एक लिमिट है, जिसे मैं पार नहीं करता। मुझे कृपया आप लोग इस कमजोरी या सीमा के साथ ही स्वीकार करें।
सुबह की चमक अब एसपी के चेहरे से पूरी तरह गायब हो गई थी। वो थके हुए दिख रहे थे। न्यूजरूम में अब अफरातफरी शुरू हो चुकी थी। इस भाषणबाजी के चक्कर में लगभग डेढ़ घंटे "खराब" हो चुके थे।
Friday, June 26, 2009
12 साल बाद क्यों याद करें एसपी को
जैसा कि एसपी यानी सुरेंद्र प्रताप सिंह ने अपने आखिरी बुलेटिन में कहा था कि ...”लेकिन जिंदगी तो चलती रहती है” और बकौल संवेदनशील कहे जाने वाले कवि अशोक वाजपेयी के, “मरने वाले के साथ कोई मर नहीं जाता,” इस निर्मम-निष्ठुर समय में कुछ लोग एसपी को याद करना चाहते हैं।
एक आदमी जो मठ बनाने में यकीन नहीं करता था और अक्सर हमारे जैसे युवा पत्रकारों से कहता था कि जो घर फूंके आपनो, चले हमारे साथ, वैसे एसपी की याद को लोग आखिर अब तक क्यों जिंदा रखने पर तुले हैं। एसपी कोई चेला मंडली नहीं छोड़ गए। कोई जाति या इलाकाई समूह एसपी के साथ जुड़ा नहीं रहा। उनकी रचनाओं का संकलन या संचयन प्रकाशित कराने वाला कोई नहीं है। ये सवाल तो पूछा ही जाएगा कि एसपी की रचनाओं का संग्रह क्यों नहीं छप पाया।
ये सवाल कई और सवालों की ऋंखला को जन्म देता है। ये असहज करने वाली बाते हैं। एसपी के लेख हिंदी और इंग्लिश में खूब छपे। नवभारत टाइम्स छोड़ने से लेकर टेलिग्राफ ज्वाइन करने के बीच उन्होंने मूल रूप से लिखकर जीवन यापन किया। वो इससे पहले और बाद भी लिखते रहे। इंडिया टुडे से लेकर बिजनेस स्टेंडर्ड में उनके कॉलम छपे। उनके सिंडिकेटेड लेख तो देश भर में छपे। सारा लेखन उपलब्ध है। कोई भी प्रकाशक ये सब छापना चाहेगा। लेकिन ये हो नहीं पाया है।
उनसे कमतर संपादकों की रचनाओं के संकलन देखते-देखते आ गए। बिके न बिके अलग बात है। लेकिन एसपी का लेखन अब भी संकलित रूप में सामने नहीं आ पाया है। ये अफसोस की बात है।
एसपी पिछले कुछ दशकों में हिंदी पत्रकारिता के सबसे बड़े हीरो हैं। लोकप्रियता में उनके आसपास कोई नहीं पहुंच पाया है। लेकिन उनकी स्मृति में डाक टिकट नहीं आया। कई और लोगों के डॉक टिकट आ गए। उनकी स्मृति में कोई महत्वपूर्ण पुरस्कार नहीं है। टेक्स्ट बुक्स में उनका यथोचित उल्लेख नहीं है। उनकी रचनों का संकलन नहीं है। पत्रकारिता की अगली पीढ़ी तक ये बात पहुंचाने का कोई जरिया नहीं है कि एक शख्स ने किस तरह हिंदी पत्रकारिता को आधुनिक बनाने के लिए पायोनियरिंग काम किया। हिंदी टीवी पत्रकारिता की तो एक तरह से विधिवत शुरुआत ही एसपी से होती है। लेकिन क्या ये सब स्मृतियों में ही रहेगा या इसका कोई डॉक्यूमेंटेशन भी होगा।
जो समाज अपने नायकों का सम्मान नहीं करता, वो आगे भी नायकों के लिए तरसते रहने को अभिशप्त होता है। क्या हिंदी का समाज अपनी इस नियति से उबर पाएगा। या टांग खिंचाई और मूर्तियों का खंडन ही इसकी नियति है?
इन बातों पर विचार हम करें या न करें, लेकिन एसपी को याद तो कर ही सकते हैं। इसलिए शनिवार को शाम तीन बजे एसपी को याद करने की योजना कुछ लोगों ने बनाई है। स्थान है प्रेस क्लब ऑफ इंडिया, रायसीना रोड, नई दिल्ली। आप सब आएं तो कुछ बात बने, कुछ बात बढ़े। वरना जिंदगी तो चलती ही रहती है...
Saturday, May 9, 2009
पहाड़ की खुशी और गम को समझने का नया मंच
देखिए उनका ब्लॉग
Tuesday, March 31, 2009
डायवर्सिटी, चुनाव और मायावती का सस्पेंस
Thursday, June 19, 2008
हत्या पत्रकार की या खबर की
युद्ध की रिपोर्टिंग एक खतरनाक काम है। रॉयटर्स के साउंड रिकॉर्डिस्ट की मौत से ये बात साबित होती है। लेकिन इस मौत की जांच और उसके नतीजे से ये भी साबित होता है कि ऐसे मामलों में हत्या का अपराध और दंड मरने वाले और मारने वाले की राष्ट्रीयता समेत कई और बातों से तय होता है।
अमेरिकी रक्षा विभाग के इंस्पेक्टर जनरल ने रिपोर्ट दी है कि जिन अमेरिकी सैनिकों ने तीन साल पहले इराक में कवरेज कर रहे रॉयटर्स के पत्रकार को गोली मार दी थी, उन्होंने कुछ भी गलत नहीं किया था। रॉयटर्स ने इस जांच पर निराशा जताई है, लेकिन इस बात का स्वागत किया है कि इंस्पेक्टर जनरल ने इस बात की सिफारिश की है कि इराक में पत्रकारों की सुरक्षा के लिए अमेरिकी फौज को मीडिया के साथ मिलकर काम करना चाहिए।
खालिद 2005 में कवरेज के सिलसिले में रॉयटर्स के सदस्य के तौर पर एक कार में जा रहे थे। कैमरापर्सन कार के अंदर से शूट कर रहा था। जब अमेरिकी सैनिकों ने सामने से फायरिंग की तो रायटर्स की टीम ने अपनी कार धीरे- धीरे पीछे करने का फैसला किया। इसे अमेरिकी सैनिकों ने खतरनाक माना और कार पर फायरिंग कर दी, जिसमें खालिद समेत दो लोग मारे गए।
जाहिर है इराक में रिपोर्टिंग का एक ही तरीका है, अमेरिकी सैनिकों के साथ चलने का और अमेरिका के पक्ष में लिखने और खबर दिखाने का। इससे आप इस बात का भी अंदाजा लगा सकते हैं कि इराक का कितना एकपक्षीय कवरेज हमने और पूरी दुनिया ने देखा है। इराक के लोगों की पीड़ा दुनिया तक न पहुंचे, इसका अमेरिका ने पुख्ता इंतजाम कर रखा है।
Wednesday, April 9, 2008
युद्ध के खिलाफ एक गीत
डिलन के गीतों को साहित्य माना जाए या नहीं, इस पर दुनिया को बहस करते रहने दीजिए। फिलहाल सुना रही हूं उनका यह मीठा गीत जो मैं बचपन से सुनती आई हूं। नीचे गीत के बोल भी दे रही हूं।
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Blowin' In The Wind
How many roads must a man walk down
Before you call him a man?
Yes, 'n' how many seas must a white dove sail
Before she sleeps in the sand?
Yes, 'n' how many times must the cannon balls fly
Before they're forever banned?
The answer, my friend, is blowin' in the wind,
The answer is blowin' in the wind.
How many years can a mountain exist
Before it's washed to the sea?
Yes, 'n' how many years can some people exist
Before they're allowed to be free?
Yes, 'n' how many times can a man turn his head,
Pretending he just doesn't see?
The answer, my friend, is blowin' in the wind,
The answer is blowin' in the wind.
How many times must a man look up
Before he can see the sky?
Yes, 'n' how many ears must one man have
Before he can hear people cry?
Yes, 'n' how many deaths will it take till he knows
That too many people have died?
The answer, my friend, is blowin' in the wind,
The answer is blowin' in the wind.
Sunday, August 5, 2007
रोइए जार जार क्यूं?
या किसी को रोने की आदत हो गई है
हाय, सब कुछ कितना खराब हो गया! हम ये कैसी पत्रकारिता कर रहे हैं! खबरों का हमने तमाशा बना दिया! आखिर टीवी न्यूज चैनल कितनी गंदगी दिखाएंगे। टीवी न्यूज चैनलों ने भूत प्रेतों में जान डाल दी है। मटुकनाथ ना होते, राखी सावंत ना होती तो टीवी चैनलों का क्या होता! गंभीर पत्रकारिता की तो मौत हो गई है! अच्छी पत्रकारिता का दौर कब लौटेगा!
टेलीविजन न्यूज के स्टैंडर्ड को लेकर हाल के वर्षों में ऐसा चिरंतन रूदन आपको लगातर सुनाई देगा। ये रोना पीटना बुद्धिजीवी कहे जाने वाले भी कर रहे हैं और टीवी पत्रकारों का एक हिस्सा भी अपने पीठ पर कोड़े मारकर खुद को लहूलुहान कर रहा। देश के हर चैनल के न्यूजरूम में ये बात सुनाई देगी कि अच्छी पत्रकारिता या कहें पत्रकारिता की मौत हो गई है।
पत्रकारिता में कुछ बदल तो गया है। जैसी पत्रकारिता अब होती है, वैसे पहले नहीं होती थी। लेकिन ये कहना तथ्यों से परे है कि कभी पत्रकारिता का कोई स्वर्ण युग था या कि पहले कोई महान पत्रकारिता हुआ करती थी। यहां तक कि आजादी से पहले के गणेश शंकर विद्यार्थी या पराड़कर युग की जिस पत्रकारिता की वाह वाह के बारे में पत्रकारिता सिखाने वाले इंस्टिट्यूट पढ़ाते हैं, उस दौर का मुख्य स्वर पुरातन, पोंगापंथी, संस्कारी, सनातनी, जातिवादी, चापलूसी और चाटुकारिता ही थी। यकीन ना हो तो नेशनल आर्काइव जाएं और देख लें। श्रीमंतो के आगे सिर झुकाती उस चारण पत्रकारिता की तुलना में तो आज की पत्रकारिता आपको कई गुणा बेहतर लगेगी। आजादी से पहले पत्रकारिता की एक क्रांतिकारी धारा थी, जो समय के हिसाब से सक्षम और प्रभावशाली थी, लेकिन वो उस समय की पत्रकारिता की मुख्यधारा नहीं थी। नेशनल आर्काइव या किसी भी पुराने अखबार के आजादी के बाद के रूमानी दिनों के अखबार ही पलट लें, आपकी ये धारणा मिट जाएगी कि उन दिनों भी कोई महान पत्रकारिता हुई थी।
और अगर बात टीवी न्यूज की हो रही है तो हमारे पिछले मॉडल क्या हैं। क्या आज आपको दूरदर्शनी पत्रकारिता चाहिए। राजीव गांधी और नरसिंह राव के लंबे भाषण लाइव देखकर क्या आप तालियां बजा पाएंगे। आज जब देश के हर हिस्से में असंतोष बढ़ रहा है, तो देश के सूचना और प्रसारण मंत्री देश के चैनल प्रमुखों को बुलाकर हिंसा की तस्वीरें कम दिखाने को कहते हैं। लेकिन टीआरपी के लिए दौड़ रहे चैनल के सामने उनकी बात सुनने का रास्ता ही नहीं है। इसलिए अगर पुलिस कहीं लाठी भांजती है, या गोली चलाती है, और उसके एक्साइटिंग विजुअल हैं तो कोई भी चैनल उसे नहीं दिखाने का जोखिम नहीं लेगा। लेकिन 20 साल पहले क्या ये संभव था। उस समय दूरदर्शन के अधिकारी एक तो सरकारी हिंसा के दृश्य दिखाते ही नहीं और अगर मंत्री के निर्देश के बावजूद कोई ऐसा करता तो उसकी नौकरी चली जाती।
दूरदर्शन के सेंसर के बावजूद अपने समय से आगे की पत्रकारिता अगर किसी ने की थी, तो उनमें मुझे सुरेंद्र प्रताप सिंह का नाम याद आता है। जिन्होंने गणेश के दूध पीने के अफवाह की धज्जियां उड़ाकर ये दिखा दिया था कि अफवाह का खंडन भी पॉप हो सकता है, दर्शक जुटा सकता है, लोगों की स्मृति में वर्षों बाद तक जिंदा रह सकता है। ये सबक उन लोगों के लिए भी है जो पॉप होने के लिए कई तरह के शॉर्ट कट अपना रहे हैं। पुराने एसपी ने नए जमाने के पत्रकार बहुत कुछ सीख सकते हैं। लेकिन एसपी जितने मॉडर्न थे, उस समय की पत्रकारिता उतनी मॉडर्न नहीं थी। इसलिए एसपी अकेले चले और समय के शिलालेख पर कुछ बेहद गहरे निशान छोड़ गए। वरना हमारे पेशे में कौन किसे याद करता है?
बहरहाल हमें एसपी को याद करते हुए नए जमाने की पत्रकारिता का जश्न मनाना चाहिए। और ये सोचना चाहिए कि पुराना इसलिए नहीं बचा क्योंकि वो बचे रहने के काबिल ही नहीं था। आखिर मीनाकुमारी और गीताबाली जैसी आदर्श भारतीय नारियों वाली फिल्में भी तो अब नहीं बनती। असंस्कारी कहे जाने दृश्यों से परहेज अब किसी हीरोइन को नहीं है। एश्वर्या रॉय, प्रियंका चोपड़ा से लेकर बिपाशा बासु, मल्लिका शेहरावत और राखी सावंत नए बिंदास जमाने को अगर सिंबॉलाइज कर रही हैं तो टीवी न्यूज चैनल घूंघट के पर्दे में रहने वाली मूर्तियां कहां से लाए। और फिर साड़ी की जगह जींस और मीनी स्कर्ट और शॉर्ट पेंट तो सिर्फ परदे पर नहीं, हमारे आपके जीवन में भी आ गया है। और इसमें आखिर रोने धोने की क्या बात हो गई। पुरुषों ने भी तो धोती और अंगवस्त्रम पहनना छोड़ दिया है। महिलाएं तो इस बात के लिए नहीं रोतीं।
बहरहाल आज की पत्रकारिता पर रोने वालों को ऐसा करने का पूरा हक है। लेकिन उन्हें कुछ बातें ऐसी भी हैं, जिनकी अनदेखी नहीं करनी चाहिए।
- मौजूदा समय में टीवी चैनल का कैमरा देश में मानवाधिकारों और लोकतांत्रिक अधिकारों का सबसे तगड़ा पहरेदार है। मानवाधिकार आयोग तो इसके सामने कुछ भी नहीं है। अंबिकापुर में थानेदार अगर भीड़ पर लाठियां बरसाता है और कैमरा वहां है, तो उसकी नौकरी जा सकती है। आगरा में कोर्ट कंपाउंड में दलित युवक की पिटाई के समय कैमरा मौजूद है तो दोषी लोगों के खिलाफ कार्रवाई होने के आसार अधिक हैं। अगर कैमरा सक्रिय है तो बच्चों के पांव में बेड़ी डालने वाले मास्टर की नौकरी जा सकती है। अगर नंदीग्राम में टीवी कैमरा नहीं होता तो सीपीएम को शायद इतनी शर्म ना आ रही होती। होंडा मोटर्स के मजदूरों की निर्मम पिटाई करने वाला एसपी क्या आज से पंद्रह साल पहले सस्पेंड हो सकता था।
- अभी की टीवी पत्रकारिता न्यूज स्पेस में सुसंस्कृत, कुलीन, भद्रलोक, इलीट, सनातन और ब्राह्मणवादी विचारों के अंत की शुरुआत है। नई पत्रकारिता में सहारनपुर का दलित छात्र राजेश भी नायक होगा क्योंकि वो ऐसे अंदाज में अंग्रेजी बोलता है, जैसे कि अमेरिकी बोलते हैं। नया नायक या खलनायक कौन होगा, ये कुछ लोगों के तय करने से तय नहीं होगा। इसे दर्शकों का लोकतंत्र तय करेगा। नई नायिका राखी सावंत हैं, नया हीरो हीमेश रेशमिया है, नायिका रोहतक की मल्लिका हैं, नायक रांची का महेंद्र सिंह धोनी और सूरत की मस्जिद में खेलते कूदते बड़ा हुआ पठान है या फिर कोलकाता पुलिस का कॉन्स्टेबल प्रशांत तमांग है और फिर हमारे मटुकनाथ हैं। और दर्शक जब जिसे चाहेगा उसकी छुट्टी कर देगा और सबसे प्रभावशाली लोग मुंह ताकते रह जाएंगे।
-ये पत्रकारिता का बहुलवाद है, ये पत्रकारिता का लोकतंत्र है। ये दर्शकों को च्वाइस दे रहा है, ये रिजेक्ट करने की आजादी दे रहा है। आपके पास गंदा देखने की स्वतंत्रता है, लेकिन अच्छा देखने की भी च्वाइस है। आप चुन लीजिए। आप रिजेक्ट कर दीजिए। ये द्वंद तो चिरंतन है। लेकिन पंद्रह साल पहले आप क्या करते। किसी मंत्री का लंबा और उबाऊ भाषण जब दूरदर्शन से आ रहा होता, तो आप आखिर क्या कर लेते। इसलिए खुश रहिए और रोना बंद कीजिए कि आप 2007 में जी रहे हैं और इस समय की पत्रकारिता कर रहे हैं।
-एक आखिरी बात। पुराने दौर में नियुक्तियों में जिस तरह का चेलावाद, जातिवाद और क्षेत्रवाद था, वो अब चल नहीं सकता। जो संपादक ऐसा करेगा, वो खुद भी बर्बाद होगा और अपने प्रोडक्ट को भी बर्बाद कर देगा। एक ब्राह्मण या कायस्थ संपादक अगर किसी ब्राह्मण या कायस्थ को नौकरी देना चाहे भी तो उसे काबिल ब्राह्मण या कायस्थ ढूंढना होगा। बाजार उसे एक हद से ज्यादा जातिवादी होने की इजाजत नहीं देगा। इसकी प्रक्रिया चल पड़ी है और न्यूजरूम में हमें आने वाले दिनों में भारतीय समाज की विविधता ज्यादा प्रभावशाली ढंग से नजर आएगी।

