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Monday, February 1, 2010

जब सवाल जाति का हो तो क्या सेकुलर(?) और क्या संघी

जब वर्धा में प्रोफेसर अनिल चमड़िया की नियुक्ति निरस्त करने का आदेश जारी किया जा रहा था, लगभग उन्हीं दिनों दूर दक्षिण में मैंगलोर यूनिवर्सिटी में भी ऐसा ही एक फैसला हो रहा था। एक यूनिवर्सिटी केंद्र सरकार की है और दूसरी यूनिवर्सिटी एक ऐसे राज्य में चल रही है, जहां बीजेपी का शासन है। एक यूनिवर्सिटी को तथाकथित प्रगतिशील का गौरवशाली नेतृत्व हासिल है तो दूसरे पर संघ की ध्वजा लहरा रही है। लेकिन जब लोकतांत्रिक आचरण की धज्जियां उड़ाने की बात हो तो दोनों विश्वविद्यालयों में अद्भुत समानताएं दिखती हैं। आप खुद ही पढ़ लीजिए। -दिलीप मंडल


बेंगलुरू: हिंदुत्व से जुड़े संगठनों के दबाव में मैंगलोर यूनिवर्सिटी ने पत्रकारिता के एक लेक्चरर से पढ़ाने-लिखाने का काम छीन लिया है। लेक्चरर एम. पी. उमेशचंद्र को पत्रकारिता के छात्रों को पढ़ाने की जगह विश्वविद्यालय के एससी/एसटी सेल में स्पेशल अफसर का काम सौंप दिया गया है। इससे पहले

विश्वविद्यालय सिंडेकेट ने उन्हें क्लास न लेने का आदेश दिया था।


मैंगलोर से बीजेपी के सांसद नलिन कुमार कतील ने मांग की है कि उमेशचंद्र के ब्राह्मण विरोधी बयानों की जांच कराई जाए। एबीवीपी ने आरोप लगाया है कि उमेशचंद्र संघपरिवार के संगठनों के खिलाफ बोलते हैं और दलित मुद्दों पर अतिवादी रुख रखते हैं।


मैंगलोर यूनिवर्सिटी के मास कम्युनिकेशन के पोस्ट ग्रेजुएशन के कुछ छात्र लेक्चरर उमेशचंद्र को विश्वविद्यालय से निकालने की मांग कर रहे थे। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद यानी एबीवीपी इस आंदोलन का समर्थन कर रही थी। आंदोलनकारी 10 दिनों से उमेशचंद्र की कक्षा का बहिष्कार कर रहे थे।


उमेशचंद्र को लेक्चरर के पद से हटाने का फैसला सिंडेकेट की बैठक में किया गया, जिसकी अध्यक्षता कार्यकारी वाइस चांसलर के के आचार ने की। बैठक के बाद रजिस्ट्रार के चिनप्पा गौड़ा ने बयान जारी करके कहा है कि सिंडिकेट उमेशचंद्र को निर्देश देती है कि अगले आदेश तक वो क्लास न लें। जब तक सिंडिकेट अगला फैसला नहीं करती है तब तक संबंधित विषयों की पढ़ाई के लिए कोई और व्यवस्था की जाएगी।


उमेशचंद्र ने कहा है कि छात्रों को राजनीतिक ताकतों ने बहकाया है और छात्रों से उन्हें कोई शिकायत नहीं है। इससे पहले हिंदुत्ववादी संगठनों ने इंग्लिश के लैक्चरर पट्टाबिरम सौमय्याजी के खिलाफ भी अभियान चलाया था क्योंकि उन्होंने इलाके में नैतिकता को लेकर जबर्दस्ती करने वालों को विरोध किया था। (द हिंदू, सकाल टाइम्स और मैंगलोरियन डॉट कॉम से मिली सूचनाओं के आधार पर।)


स्रोत:


http://www.sakaaltimes.com/SakaalTimesBeta/20100129/4983894914234162568.htm


http://beta.thehindu.com/news/cities/Mangalore/article96148.ece


http://mangalorean.com/news.php?newstype=local&newsid=166757

2 comments:

pankaj srivastava said...

जात जात में जात है, जस केलन कै पात
रैदास न मानुख बन सकै, जब तक जात न जात..

भाई, रविवार को पुस्तक मेले में मेरा मोबाइल फोन चोरी हो गया। मैं किसी से भी संवाद करने में अक्षम हूं। कई सालों से इकट्ठा किए गए नंबरों को एक साथ खो जाने से परेशान भी हूं...ये मेरे आलस्य का भी नमूना है कि नंबरों को किसी डायरी में नहीं उतारा।
मेरा वो नंबर कुछ दिन में फिर मिल जाएगा,फिलहाल मैं दफ्तरी नंबर 9910001549 पर हूं।
मैं इस अभियान में आप सबके साथ हूं।

अशोक कुमार पाण्डेय said...

मै पूरी तरह आपसे सहमत हूं
अपने अंतर्जातीय विवाह के बाद ही मैने बदली हुई नज़रें देखीं थीं बाद में यह सच समझ आया कि जाति की जकड़न कितनी मज़बूत है।

समर्थन पत्र पर साईन यूं ही नहीं किये हैं। मुझे अपने साथ समझिये।

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