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Tuesday, March 31, 2009

डायवर्सिटी, चुनाव और मायावती का सस्पेंस

चुनाव के पहले की ये मेरी पहली पोस्ट है। अब लगातार लिखने का इरादा है। आज एक लेख आप पढ़िए चुनाव में दलित-वंचित उम्मीदों और आकांक्षाओं के बारे में। इस लेख को लिखने का आइडिया बहुजन डायवर्सिटी मिशन के संस्थापक और चिंतक एच एल दुसाध की बातों से मिला। दुसाध साहब ने 60 से ज्यादा किताबें लिखी हैं। सभी हिंदी में हैं। लेकिन स्वाभाविक कारणों से हिंदी का साहित्य समाज उन्हें नहीं जानता। बहरहाल आप देखें वो लेख जो आज नवभारत टाइम्स के संपादकीय पेज पर छपा है। 

3 comments:

अजित वडनेरकर said...

ये अच्छी बात है कि लगातार लिखने का इरादा है।
कई बार इस स्टेशन से खाली लौटा हूं।
...भारतीय राजनीति में प्रतीकों के महत्व की बात एकदम सही है...पर जैसे ही यह ध्यान में आती है मन उदास होता चला जाता है...
हमारे देश में प्रतीकवाद का जो रूप है वह प्रगति या भविष्य की ओर नहीं देखने देता बल्कि ठहराव, तुष्टिवाद और अनिर्णय से बचने का फौरी मंत्र ज्यादा नजर आता है।

Hari Joshi said...

हम तो यही सोच कर आए थे कि प्‍लेटफार्म पर गाड़ी लग चुकी होगी।

Unknown said...

इंतजार रहेगा। मुद्दा वाकई में महत्वपूर्ण है। शुरू करें।

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