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Monday, January 11, 2010

फिर पूछें कि कौन दुश्मन है ..

शेष नारायण सिंह

अपनी स्थापना के समय से ही भारत और पाकिस्तान के बीच तल्खी कई स्तर पर महसूस की जाती रही है. पाकिस्तानी हुक्मरान शुरू से जानते रहे हैं कि 1947 के पहले के भारत में रहने वाले मुसलमानों को बेवक़ूफ़ बना कर पाकिस्तान की स्थापना की गयी थी. आखिर तक, मुहम्मद अली जिन्ना ने यह नहीं बताया था कि पाकिस्तान की सीमा कहाँ होगी. क्योंकि अगर वे सच्चाई बता देते तो अवध और पंजाब के ज़मींदार मुसलमान अपनी खेती बारी छोड़ने को तैयार न होते और पाकिस्तान की अवधारणा ही खटाई में पड़ जाती. लेकिन पाकिस्तान बन गया है और वह आज एक सच्चाई है ..एक सच्चाई यह भी है कि दोनों देशों के बीच कई स्तर पर नफरत और दुश्मनी का भाव है सभ्य समाज में लगभग सभी मानते हैं कि यह दुश्मनी ख़त्म की जानी चाहिए.

भारत और पाकिस्तान के बीच दोस्ती की एक नयी पहल की गयी है. भारत और पाकिस्तान के कुछ अखबारों की कोशिश है कि दोनों देशों की जनता पहल करे और दोस्ती की जो लहर चले, वह दोनों मुल्कों के सरकारी तौर पर जिंदा रखे जा रहे दुश्मनी के भूत को भागने के लिए मजबूर कर दे. कोशिश यह है कि भारत और पाकिस्तान के बीच बनायी गयी सरहद की दीवाल इतनी नीची कर दी जाए कि कोई भी मासूम बच्चा उसे पार कर ले. दर असल पाकिस्तान का बनना ही एक ऐसी राजनीतिक चाल थी जिसने आम आदमी को हक्का-बक्का छोड़ दिया था. इसके पहले कि उस वक़्त के भारत की जनता यह तय कर पाती कि उसके साथ क्या हुआ है, अंग्रेजों की शातिराना राजनीति और भारत के नेताओं की अदूरदर्शिता का नतीजा था कि अंग्रेजों की पसंद के हिसाब से मुल्क बँट गया.

बँटवारे के इतिहास और भूगोल पर चर्चा बार बार हो चुकी है . चर्चा करने से एक दूसरे के खिलाफ तल्खी बढ़ती है. इस लेख का उद्देश्य पहले से मौजूद तल्खी को और बढ़ाना नहीं है. हाँ यह याद करना ज़रूरी है कि पाकिस्तान की भौगोलिक स्थिति चाहे जो हो, 1947 के बाद सरहद के इस पार बहुत सारे घरों के आँगन में पाकिस्तान बन गया है और वह अभी तक तकलीफ देता है ..राजनीतिक नेताओं की महत्वाकांक्षा को पूरा करने के लिए हुए बँटवारे ने अवाम को बहुत तकलीफ पंहुचायी है. दुनिया मानती है कि 1947 में भारत का विभाजन एक गलत फैसला था . बाद में तो बँटवारे क एसबसे बड़े मसीहा, मुहम्मद अली जिन्ना भी मानने लगे थे..विख्याद इतिहासकार अलेक्स टुंजेलमान ने लिखा है कि अपने आखिरी वक्त में जिन्ना ने पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री लियाकत अली खान से कहा था कि पाकिस्तान मेरी जिंदगी की सबसे बड़ी बेवकूफी है। अगर मुझे मौका मिला तो मैं दिल्ली जाकर जवाहरलाल से कह दूंगा कि गलतियां भूल जाओ और हम फिर से दोस्तों की तरह रहें. बहरहाल पछताने से इतिहास के फैसले नहीं बदलते ..

बँटवारे के बाद ,पंजाब की तो आबादी का ही बँटवारा हो गया था. सरहद के दोनों तरफ के लोग रो पीट कर एक दूसरे के हिस्से में आये मुल्क में रिफ्यूजी बन कर आज 60 साल से रह रहे हैं लेकिन उत्तर प्रदेश के बहुत सारे जिलों से लोग कराची गए थे इस लालच में कि पाकिस्तान में मुसलमानों को अच्छी नौकरी मिलेगी.यहाँ उनका भरा पूरा परिवार था लेकिन वहां से कभी लौट नहीं पाए . उनके लोगों ने वर्षों के इंतज़ार के बाद अपनी ज़िंदगी को नए सिरे से जीने का फैसला किया और वह तकलीफ अब तक है..आज भी जब कोई बेटी, जो पाकिस्तान में बसे अपने परिवार के लोगों में ब्याह दी गयी है , जब भारत आती है तो उसकी माँ उसके घर आने की खुशी का इस डर के मारे नहीं इज़हार कर पाती कि बच्ची एक दिन चली जायेगी. और वह बीमार हो जाती है . उसी बीमार माँ की बात वास्तव में असली बात है . नेताओं को शौक़ है तो वे भारत और पाकिस्तान बनाए रखें, राज करें ,सार्वजनिक संपत्ति की लूट करें, जो चाहे करें लेकिन दोनों ही मुल्कों के आम आदमी को आपस में मिलने जुलने की आज़ादी तो दें. अगर ऐसा हो गया तो पाकिस्तान और हिन्दुतान सरहद पर तो होगा , संयुक्त राष्ट्र में होगा, कामनवेल्थ में होगा लेकिन हमारे मुल्क के बहुत सारे आंगनों में जो पाकिस्तान बन गया है , वह ध्वस्त हो जाएगा.फिर कोई माँ इसलिए नहीं बीमार होगी कि उसकी पाकिस्तान में ब्याही बेटी वापस चली जायेगी . वह माँ जब चाहेगी ,अपनी बेटी से मिल सकेगी. इसलिए दोनों देशों के बड़े अखबारों की और से शुरू किया गया यह अभियान निश्चित रूप से स्वागत योग्य है ..

अखबारों की तरफ से जो अभियान शुरू किया गया है उसमें दोनों देशों की सरकारों और नेताओं को बाईपास करके लोगों के बीच संवाद शुरू करने के लिए सकारात्मक पहल की घोषणा भी की गयी है .. दोनों देशों के बीच अविश्वास और नफरत के अस्तित्व को स्वीकार करते हुए भी आपसी बात चीत के रास्ते शुरू करने का आवाहन किया गया है .कोशिश यह है कि विवादों को सुलझाने की नेताओं की कोशिश की परवाह किये बिना,दोस्ती और संवाद की बात चल निकले. आखिर सब कुछ तो एक जैसा है दोनों देशों के बीच में . संगीत, रीति रिवाज़, बोली , भाषा सब कुछ साझा है . हमारे बुज़ुर्ग तक साझी हैं., ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती , हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया, अमीर खुसरो, बुल्ले शाह , बाबा फरीद,गुरु नानक, कबीर सब साझी हैं. हमारे आस्था के केंद्र अजमेर में भी हैं और पाक पाटन में भी. .हमने आज़ादी की लड़ाई एक साथ लड़ी है. हमारा संगीत वही है . हमारे महान शायर वही हैं . हमारे ग़ालिब और मीर वही हैं और हमारे इकबाल वही हैं .. किशोर कुमार , लता मंगेश्कार, मुहम्मद रफ़ी ,गुलाम अली,आबिदा परवीन और मेहंदी हसन दोनों ही देशों के अवाम के बीच एक ही तरह के जज्बे पैदा करते है . तो फिर हम लड़ते क्यों हैं? जवाब साफ़ है . हम नहीं लड़ते. हमारे नेता लड़ते हैं .क्योंकि उनके अस्तित्व के लिए वह ज़रूरी है .... ज़रुरत इस बात की है कि सरकारों और नेताओं की परवाह न करके दोनों देशों के लोग एक दूसरे से बात चीत करें. दोनों ही देशों के अखबारों ने इस दिशा में पहला क़दम उठा दिया है ..

भारत के बहुत सारे शहरों में 16 से 24 जनवरी के बीच संगीत के कार्यक्रम आयोजित किये जा रहे हैं जिनमें भारत और पाकिस्तान के नामी संगीतकार हिस्सा लेंगें ..कैलाश खेर, राहत फ़तेह अली खां , शुभा मुद्गल ,आबिदा परवीन,गुलाम अली, हरिहरन आदि संगीतकार इस पहल की पहली कड़ी हैं .. और कोशिश करेंगें कि हमारे दोनों मुल्कों में रहने वाले इंसान एक दूसरे के खिलाफ नहीं बल्कि एक साथ खड़े हों . इस कोशिश की सफलता की कामना की जानी चाहिए.. ...

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और सामाजिक विषयों के अध्येता हैं)

4 comments:

रंगनाथ सिंह said...
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रंगनाथ सिंह said...

विशफुल थिकिंग से इतिहास का अध्ययन करने का क्या लाभ ? यह तो वो कहते हैं जिन्हें राजनीति करनी हो और करना कुछ न हो। इस लिहाज से समूचा दक्षिण एशिया ही एक इकाई है। इण्डोलाजी के छात्र के रूप में हम दक्षिण एशिया को एक इकाई के रूप में ही बरतते हैं। लेकिन व्यावहारिक राजनीति में भू-राजनीतिक सीमाओं को स्वीकार करके ही चलना चाहिए। इतिहास का रथ पीछ नहीं धकेला जा सकता। जर्मनी जैसे अपवाद की उदाहरण लेकर चलना ठीक नहीं होगा।और वहां भी स्थिति भारतीय-उपमहाद्वीप जैसी जटिल नहीं थी।

रंगनाथ सिंह said...

कल पहली टिप्पणी की टाइपिंग की गलतियों को दूर करके दूसरी टिप्पणी दी थी। लगता है कि वो तकनीकी कारणों से नहीं आ पाई। शेष जी से इतिहास को खामाख्याली ढंग से देखते प्रतीत हो रहे हैं। इतिहास को नियंता कुछ व्यक्ति नहीं होते। जिस तरह से किसी फल को तोड़ते हाथ किसी एक या दो व्यक्ति के हो सकते हैं लेकिन उस पेड़ के रोपने से लेकर फलने-फूलने तक एक लम्बी प्रक्रिया और विभिन्न कारण होते हैं उसी तरह किसी ऐतिहासिक घटना के भी। वैचारिक तौर पर पाकिस्तान क्या समूचा दक्षिणा एशिया एक भौगिलिक और संास्कृतिक इकाई है। दुनियाभर के भारतविद इसे एक इकाई के रूप में ही बरतते हैं। और जहां तक शांतिपूर्ण सहअस्तित्व को बात है पूरी दुनिया के लिए यही बात कही जा सकती है। भू-राजनीतिक सीमाएं हवा में नहीं बनी होती। हिन्दी-उर्दू भाषा के संगीत की बहुदेशिक लोकप्रियता से कोई जमीनी रास्ता नहीं निकलता। ब्रेख्त की एक कविता है कि जब नेता शांति की बात करते हैं तो दूसरी सेना के लिए युद्ध के लिए कूच करने का आदेश दिया जा चुका होता है।

शेष नारायण सिंह said...

बिलकुल सही बात है रंग नाथ जी की . इतिहास के बारे में भी और दक्षिण एशिया के बारे में भी . हाँ, भारत और पाकिस्तान के बीच दोस्ती एक विशफुल थिंकिंग है . बंटवारा एक पछतावा है जिसकी अभिव्यक्ति जिन्ना ने भी की, जिनके लिए पाकिस्तान सबसे बड़ी उपलब्धि होनी चाहिए थी. और भी बहुत सारे लोगों ने भी बँटवारे पर पछतावा ज़ाहिर किया है और अब मैं भी करता हूँ. और सोचता हूँ कि इतिहास की बनायी भौगोलिक लकीर बेशक बनी रहे लेकिन क्या दोनों मुल्कों के बीच आवाजाही थोडा आसान नहीं हो सकती ..मुझे लगता है कि मैं और रंग नाथ, एक ही वेव लेंथ पर हैं .

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