Sunday, July 19, 2009
औरत- एक वजूद!
औरत
धीरे-धीरे उतरती है
मर्द की जिंदगी में
और शुमार हो जाती है
आदत की तरह.
कभी खौलती है
वजूद में/चाय की तरह
कभी बिखरती है/हर कश के साथ
धुयें की मानिंद.
बहती है कभी रंगों में
जिंदगी की सच्चाई बन
दहक-लाल-गर्म.
थरथराती है कभी/सांसों में
इच्छाओं की
ज्वार भाटा बन.
गोया
पत्नी वजूद नहीं
एक वस्तु हो/जिसे गढा हो
भले ही इश्वर ने
पर/इतना लचीलापन भी जरूरी है
कि मर्द ढाल सके
वक्त-बेवक्त/अपनी सुविधा
और कायदे के सांचे में.
Sunday, July 5, 2009
टाइम मशीन में लालगढ़ और एसपी सिंह
यहां हम एक ऐसे न्यूजरूम की कल्पना करते हैं जहां टाइम मशीन में डालकर लालगढ़ के संघर्ष और एसपी सिंह को एक साथ इकट्ठा कर दिया गया हो। इस घटना के पात्र वास्तविक हो सकते हैं, सिर्फ नाम बदल दिए हैं क्योंकि इससे पूरी बात पर कोई फर्क नहीं पड़ता है।
जून 2009 के आखिरी हफ्ते का कोई दिन
स्थान-एक न्यूज चैनल का दफ्तर
"लालगढ़ में पुलिस के खिलाफ सभा कर रहे 10,000 लोगों को कल आतंकवादी किसने लिखा था?" एसपी की संयत लेकिन थोड़ी तीखी आवाज के साथ ही न्यूजरूम में सन्नाटा छा गया। सुबह साढ़े 9 बजे का समय था। कनॉट प्लेस में टीवी चैनल के एक दफ्तर में रात की शिफ्ट वाले जा रहे थे और अगली शिफ्ट वाले आ रहे थे। हर ओर हलचल मची थी। एसपी सिंह 3 दिन शहर से बाहर रहकर लौटे थे। ज्यादातर लोगों को तो पहली बार में समझ में ही नहीं आया कि लालगढ़ में पुलिस से लड़ रहे लोगों को आतंकवादी नहीं तो और क्या लिखा जाएगा। पूरा मीडिया तो लालगढ़ में जो हो रहा है उसे माओवादी आतंकवादी बनाम सुरक्षा बलों के संघर्ष के तौर पर देख रहा है। ऐसे में एसपी आखिर कहना क्या चाहते हैं।
"भाई ऐसा है कि 10,000 लोग अगर आतंकवादी हो गए हैं और 140 गांवों की पूरी जनता आतंकवादी हो गई है तब तो उन्हें गिरफ्तार करना होगा या मारना होगा", एसपी बोले, " आप सब लोग पत्रकार हैं और इस नाते समझदार भी, क्या ये संभव है।"
न्यूजरूम का सन्नाटा और गहरा हो गया क्योंकि बुलेटिन में आतंकवादी शब्द कई बार आया था और ये खबर कई हाथों से गुजरी थी, जिसमें सीनियर लोग भी शामिल थे। न्यूजरूम की सबसे युवा सदस्य सुनयना ने पूछा, "सर, आतंकवादी नहीं तो क्या लिखें? बंदूक तो उनके पास होती है। हमारे पास जो फुटेज आ रहे हैं उनमें आदिवासियों के हाथों में कुल्हाड़ी, लाठी और दो-चार बंदूकें भी दिखती हैं। उन्होंने लैंडमाइन ब्लास्ट भी तो किए हैं।"
"देखिए अगर हथियार होने से कोई आतंकवादी होता है तो देश में सबसे ज्यादा हथियार तो पुलिस और सेना के पास हैं। उनके काम करने का तरीका भी हिंसक ही होता है। आपकी परिभाषा से तो देश में आतंकवादियों का सबसे बड़ा गिरोह सेना और पुलिस हो गई। मेरे ख्याल से लालगढ़ में जो हो रहा है वो एक पॉपुलर आंदोलन हैं, जिसमें कुछ माओवादी भी घुसे हुए हैं। आप हद से हद इन्हें माओवादी या उग्रवादी या अतिवादी कहें। हिंसक तौर तरीके अपनाने वाले भगत सिंह को ब्रिटेन का इतिहास आतंकवादी कहता है और हम क्रांतिकारी कहते हैं। यानी भाषा के ऐसे सवाल इस बात से तय होते हैं कि आप किस पक्ष में खड़े हैं। मेरी राय है कि पत्रकारों में इस लड़ाई में जनता के पक्ष में खड़ा होना चाहिए। देखिए आप जैसे ही अपना पक्ष तय करेंगे आपकी भाषा और आपके शब्दों का संस्कार तय हो जाएगा, " एसपी की बात अब कुछ लोगों को समझ में आने लगी थी।
लेकिन सुनयना के जेहन में अभी भी कई सवाल आ रहे थे। वो बोली, "सर, ये लोग सरकार को नहीं मानते, पुलिस को इलाके में घुसने नहीं देते, ऐसे लोगों को आतंकवादी और देशद्रोही क्यों नहीं माना जाए।
एसपी अब गहरी सोच में डूब गए। सुनयना को बाकी सीनियर्स समझाने में जूट गए। कई तरह के तर्क वितर्क होते रहे। अचानक एसपी बोले, सुनयना आपकी राय में लालगढ़ में हंगामा कब शुरू हुआ है। सुनयना के साथ ही कई और लोग बोले लगभग 15-20 दिनों से।
एसपी ने कहा, यही तो हमारे पेशे के लोगों की मुश्किल है। सब कुछ इंस्टेंट होता है आप लोगों के लिए। देखिए अगर पश्चिम बंगाल और देश की बड़ी खबरों पर आपकी नजर होगी तो आपको याद होगा कि पिछले साल नवंबर महीने में इसी इलाके में एक माइन ब्लास्ट हुआ था, जिसमें पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य और उस समय के केंद्रीय स्टील मंत्री रामविलास पासवान बाल बाल बचे थे। वो इलाके में एक स्टील प्लांट के निर्माण का उद्घाटन करने जा रहे थे। इस प्लान्ट के लिए बड़े पैमाने पर जमीन का अधिग्रहण होना है और पश्चिम बंगाल में नंदीग्राम और सिंगुर के अनुभव के बाद कोई भी किसान सरकार को निजी प्रोजेक्ट के लिए सरकारी कीमत पर जमीन बेचने के तैयार नहीं है। खैर आप सबने भी अपने ही चैनल पर खबर चलाई थी ब्लास्ट के बाद बड़े पैमाने पर लोगों की गिरफ्तारी हुई थी। इस घटना को जाने बगैर आप लालगढ़ के बारे में अगर लिखेंगे या बोलेंगे तो खबर के साथ और साथ ही उस इलाके की जनता के साथ अन्याय करेंगे। लालगढ़ माओवाद का नहीं जमीन अधिग्रहण और विरोध का मुद्दा है।
इस चर्चा के दौरान दिन की शिफ्ट के ज्यादातर लोग ऑफिस पहुंच चुके थे। कॉन्फ्रेंस रूम में न्यूजमीटिंग के लिए लोग जुटने लगे। चाय के साथ खबरें तय करने का सिलसिला शुरू हुआ...
...न्यूजरूम में लालगढ़ और एसपी सिंह
न्यूज मीटिंग में सभी ब्यूरो से आए आइडिया की लिस्ट और एएनआई और दूसरी समाचार एजेंसियों के दिन के एजेंडे की सूची बांट दी गई। चूंकि लालगढ़ से बेहद एक्साइटिंग विजुअल आ रहे थे। इसलिए ये सब समझ रहे थे कि ये खबर ही आज बिकेगी। लेकिन एसपी ने आतंकवाद और उग्रवाद के बीच फर्क को लेकर जिस तरह अपनी बातें रखीं थी, उससे साफ जाहिर था कि लालगढ़ अब वैसे कवर नहीं होगा, जिस तरह से उसे पिछले तीन-चार दिनों से कवर किया जा रहा था।
एसपी ने बांग्ला के एक अखबार में छपी एक फोटो लोगों को दिखाई। "देखिए ये चार फोटो हैं हमारी आज की सबसे बड़ी स्टोरी।" इसके साथ छपी खबर को पढ़ने के लिए उन्होंने अखबार छवि विश्वास की ओर बढ़ाया। छवि ने जो खबर पढ़ी उसके मुताबिक चूंकि सुरक्षा बलों के पास लैंडमाइन डिटेक्टर सिर्फ दो ही हैं, इसलिए वो आदिवासियों को लोहे की छड़े पकड़ा देते हैं और सुरक्षा बलों के आगे आगे चलने को मजबूर करते हैं। उन्हें कहा जाता है कि वो जमीन को बीच बीच में कोंचकर देखते रहें कि कोई बारूदी सुरंग तो नहीं है।
एसपी ने कहा मुझे कोलकाता से किसी ने बताया है कि वहां के लोकल चैनल के पास इसकी फुटेज है। चैनल के संपादक से मेरी बात हो गई है। कोलकाता की रिपोर्टर से कहिए कि वहां से फुटेज ले आए। इस फुटेज पर बांग्ला चैनल का एक्सक्लूसिव जरूर चलाएं। साथ ही एक रिपोर्टर को फुटेज के साथ मानवाधिकार आयोग भेजिए और वहां से रिएक्शन लाइए। बंगाल के मुख्यमंत्री या चीफ या होम सेक्रेटरी जहां भी मिले उन्हें पकड़िए और सवाल के जवाब में जो भी कहें या चुप रहें, उसे दिखाइए। कोई बात न करे तो रिपोर्टर को राइटर्स बिल्डिंग के बाहर खड़ा कीजिए और उसके रिएक्शन लेने के प्रयासों के बारे में पीटीसी करवाइए। मानवाधिकार आयोग और मुख्यमंत्री कार्यालय में अगले एक घंटे में फैक्स भेजकर रिएक्शन मांगिए।
पिछले तीन दिनों से होम मिनिस्ट्री से आ रहे बयानों और बाइट के आधार पर लालगढ़ की रिपोर्टिंग करने वाले रिपोर्टर प्रकाश चंद्रा को समझ में आ रहा था कि अब उसके आराम के दिन गए। एसपी ने प्रकाश की ओर मुड़कर कहा, "मंत्री और सेक्रेटरी तो बहुत बयान दे रहे हैं। इस बारे में उनसे सवाल पूछिए। जो भी वो कहते हैं उसे स्टोरी के हिस्से के तौर पर डालिए। सरकार असहज सवाल पूछने वालों को ही पूछती है। इसलिए जरा डटकर पूछिए। भरोसा रखिए आपका सोर्स खराब नहीं होगा"
एसपी ने एसाइनमेंट हेड नवीन कुमार से पूछा-लालगढ़ कौन कवर कर रहा है। जवाब मिला कोलकाता की रिपोर्टर श्रुति वहां गई है। वो सुरक्षा बलों के साथ लगातार लगी हुई है और हर पल की खबर चैनल को मिल रही है। इस मामले में हमारा चैनल किसी भी चैनल से पीछे नहीं है।
एसपी ने कहा- अगर सभी चैनलों के रिपोर्टर सुरक्षा बलों के साथ लगे हैं और सारी सूचनाएं सुरक्षा बलों से ही मिल रही है तो कोई भी चैनल पीछे कैसे हो सकता है। लेकिन मुश्किल ये है कि कोई भी चैनल आगे भी नहीं हो सकता। वहां हमारे कम से कम तीन रिपोर्टर और कैमरा टीम होनी चाहिए। एक श्रुति को सुरक्षा बलों से साथ रहने दीजिए। पटना से आशीष और दिल्ली से छवि विश्वास को लालगढ़ भेजिए। दोनों को बांग्ला आती है। ये दोनो रिपोर्टर गांववालों के साथ रहकर उनके नजरिए को सामने लाएंगे। इस तरह हम न सिर्फ बैलेंस रिपोर्टिंग कर रहे होंगे बल्कि बाकी चैनलों को जब तक ये बात समझ में आएगी तब तक हम लीड ले चुके होंगे। हमारे पास अलग तरह के फुटेज होंगे अलग तरह की साउंड बाइट होगी।
एसपी सिंह इस पूरी बातचीत के दौरान बांग्ला और कोलकाता से छपने वाले बाकी अखबारों को पढ़ते भी जा रहे थे। उन्होंने कहा- ये जो खबर इस बांग्ला अखबार में छपी है, इसे देखिए। गांव वाले सुरक्षा बलों को खाने पीने का सामान नहीं बेच रहे हैं। सुरक्षा बलों को उनके साथ जबर्दस्ती करनी पड़ रही है। ये स्टोरी बताती है कि लोगों को सुरक्षा बलों को लेकर कितनी नाराजगी है और दिल्ली के अखबारों में जो छप रहा है कि गांव वालों ने सुरक्षा बलों का स्वागत किया, उसकी हकीकत क्या है।
इसके बाद एसपी डेस्क के लोगों की ओर मुड़े और कहा- देखिए लालगढ़ को पूरे कॉन्टेस्ट में देखिए। ये सिर्फ कानून-व्यवस्था का मामला नहीं है। जमीन अधिग्रहण को लेकर देश भर में जो गुस्सा है, उसके हिस्से के तौर पर भी लालगढ़ को देखा जाना चाहिए। आप लोग कोलकाता के अखबारों को जरूर देखें। उससे आपको ज्यादा पक्षों को समझने में आसानी होगी। दिल्ली में बैठकर आपको ये कैसे अंदाजा लग पाएगा कि वहां के ज्यादातर स्कूलों में फौज भरी है। जीवन अस्तव्यस्त है। वहां लगभग युद्ध जैसे हालात हैं। अपने ही देश की सबसे गरीब जनता के विरुद्ध युद्ध। मैं निजी तौर पर हिंसा के खिलाफ हूं। लेकिन हर तरह की हिंसा का। सरकारी हिंसा का समर्थन मैं नहीं कर सकता। किसान की जमीन मनमानी कीमत पर लेकर उसे उद्योगपतियों को जबरन सौंप देना हिंसा है। दुनिया भर में उद्योगपति खुद जमीन खरीदते हैं। जबरन जमीन ले लेने का ये कानून अंग्रेजों के समय बना। लेकिन आजाद भारत की सरकारें इसका इस्तेमाल करती रहती हैं। ये कानून जनता और किसानों के खिलाफ हिंसा है। हिंसा का विरोध करना है तो इस सरकारी हिंसा का भी विरोध करना चाहिए। ये आश्चर्यजनक है कि सरकार की बंदूकें ऐसे मामलों में हमेशा किसानों के खिलाफ ही चलती हैं। यूरोप या अमेरिका जैसे विकसित लोकतंत्र में इसकी कल्पना आप नहीं कर सकते। ये हमारे जैसे अविकसित देशों में ही हो सकता है।
इस बातचीत को बहुत देर से खामोशी से सुन रहा अभिषेक थोड़ा बेचैन दिख रहा था। अभिषेक ने कहा, "लेकिन सर, माओवादियों को सरकार बैन कर चुकी है। बाजार की ताकतें उनके खिलाफ हैं ही। ऐसे में क्या आपको लगता है कि हमारे जैसा मीडिया इस मुद्दे पर जनता के पक्ष में स्टैंड ले सकता है।"
एसपी के माथे पर चिंता की लकीरें नजर आने लगीं। वो चुप रहे। ऐसा लगा कि वो इस सवाल का जवाब नहीं देना चाहते। वो धीरे से बोले, "अभिषेक दरअसल आप वो सवाल उठा रहे हैं जो मैं अपने आप से अक्सर पूछता हूं। देखिए आप यहां इतने महीनों से काम कर रहे हैं। चैनल के जनता के या कमजोरों के पक्ष में खड़े होने से आपको शायद ही कभी रोका गया होगा। लेकिन ये तो मानना ही पड़ेगा कि जिसने इस चैनल के चलाने के लिए पैसे खर्च किए हैं वो धर्मार्थ चैनल नहीं चला रहा है। उसे अपने निवेश पर मुनाफा चाहिए। हमें उसने काम पर इसलिए रखा है कि हम उसके लिए मुनाफा कमाएं। इसके लिए जरूरी है कि ढेर सारे लोग हमारा चैनल देखें। अगर आप जनपक्षीय होकर भी दर्शक जुटा पा रहे हैं तो शायद ही आपको कभी टोका जाएगा। बिजनेसमैन की पहली और आखिरी प्राथमिकता पैसे कमाना है। इस गणित को हमें समझना होगा। बिजनेस मैन के पैसे से चल रहे चैनल को हम माओवादियों का मुखपत्र या लघुपत्रिका बनाना चाहेंगे तो वो ऐसा नहीं करने देगा। वो इस चैनल को सरकार का भोंपू भी नहीं बनने देगा अगर ऐसा करने पर दर्शक हमें छोड़ जाएं। इस समय की असली चुनौती है कि कैसे जनपक्षीय होते हुए भी पॉपुलर बने रहा जाए। ये काम कठिन है। लेकिन मुमकिन है। गणेश जी को दूध पिलाने वाली घटना को अंधविश्वास के तौर पर दिखाकर भी दर्शक जुटाए जा सकते थे और अंधविश्वास का खंडन करके भी। हमने मोची के औजार को दूध पिलाकर अंधविश्वास का खंडन किया और पॉपुलर भी बने रहे। ये पत्रकारों के सामने मौजूद सबसे बड़ी चुनौती है।
अभिषेक बीच में ही बोल पड़ा, " लेकिन सर, अगर हमारी रिपोर्टिंग ज्यादा ही जनपक्षीय हो गई तो क्या सरकार और देश के सत्ता इसकी इजाजत देगी। एसपी अब और परेशान नजर आ रहे थे। उन्होंने कहा- "मैं जानता हूं कि इसकी इजाजत संस्थागत मीडिया में नहीं है। मैं संस्थानों के अंदर लोकतांत्रिक और जनपक्षीय स्पेस के लिए गुरिल्ला लड़ाई लड़ रहा हूं। लेकिन ये भी सच है कि महीने के आखिर में मिलने वाली तनख्वाह और संस्थान में होने से आने वाला रुतबा और दबदबा भी शायद मुझे प्रिय है। ये मेरे अंदर का अंतर्विरोध है। कभी कभी मन करता है कि सब छोड़कर चल दूं और अपने मन का काम करूं। लेकिन जो कुछ भी हासिल हो रहा है वो मुझे पीछे खींचता है। इसलिए कई बार मैं समझौते करता हूं। कई बार नहीं करता। कई बार जनता के लिए लड़ रहे संगठनों को पैसे देकर अपना अपराधबोध मिटाता हूं। लेकिन आखिरकार मैं इसी व्यवस्था के अंदर का एक पत्रकार हूं। अपना सच और अपनी सीमाएं मैं जानता हूं। अपनी सीमाएं मैं बढ़ाने की कोशिश में लगा रहता हूं। लेकिन एक लिमिट है, जिसे मैं पार नहीं करता। मुझे कृपया आप लोग इस कमजोरी या सीमा के साथ ही स्वीकार करें।
सुबह की चमक अब एसपी के चेहरे से पूरी तरह गायब हो गई थी। वो थके हुए दिख रहे थे। न्यूजरूम में अब अफरातफरी शुरू हो चुकी थी। इस भाषणबाजी के चक्कर में लगभग डेढ़ घंटे "खराब" हो चुके थे।
Friday, June 26, 2009
12 साल बाद क्यों याद करें एसपी को
जैसा कि एसपी यानी सुरेंद्र प्रताप सिंह ने अपने आखिरी बुलेटिन में कहा था कि ...”लेकिन जिंदगी तो चलती रहती है” और बकौल संवेदनशील कहे जाने वाले कवि अशोक वाजपेयी के, “मरने वाले के साथ कोई मर नहीं जाता,” इस निर्मम-निष्ठुर समय में कुछ लोग एसपी को याद करना चाहते हैं।
एक आदमी जो मठ बनाने में यकीन नहीं करता था और अक्सर हमारे जैसे युवा पत्रकारों से कहता था कि जो घर फूंके आपनो, चले हमारे साथ, वैसे एसपी की याद को लोग आखिर अब तक क्यों जिंदा रखने पर तुले हैं। एसपी कोई चेला मंडली नहीं छोड़ गए। कोई जाति या इलाकाई समूह एसपी के साथ जुड़ा नहीं रहा। उनकी रचनाओं का संकलन या संचयन प्रकाशित कराने वाला कोई नहीं है। ये सवाल तो पूछा ही जाएगा कि एसपी की रचनाओं का संग्रह क्यों नहीं छप पाया।
ये सवाल कई और सवालों की ऋंखला को जन्म देता है। ये असहज करने वाली बाते हैं। एसपी के लेख हिंदी और इंग्लिश में खूब छपे। नवभारत टाइम्स छोड़ने से लेकर टेलिग्राफ ज्वाइन करने के बीच उन्होंने मूल रूप से लिखकर जीवन यापन किया। वो इससे पहले और बाद भी लिखते रहे। इंडिया टुडे से लेकर बिजनेस स्टेंडर्ड में उनके कॉलम छपे। उनके सिंडिकेटेड लेख तो देश भर में छपे। सारा लेखन उपलब्ध है। कोई भी प्रकाशक ये सब छापना चाहेगा। लेकिन ये हो नहीं पाया है।
उनसे कमतर संपादकों की रचनाओं के संकलन देखते-देखते आ गए। बिके न बिके अलग बात है। लेकिन एसपी का लेखन अब भी संकलित रूप में सामने नहीं आ पाया है। ये अफसोस की बात है।
एसपी पिछले कुछ दशकों में हिंदी पत्रकारिता के सबसे बड़े हीरो हैं। लोकप्रियता में उनके आसपास कोई नहीं पहुंच पाया है। लेकिन उनकी स्मृति में डाक टिकट नहीं आया। कई और लोगों के डॉक टिकट आ गए। उनकी स्मृति में कोई महत्वपूर्ण पुरस्कार नहीं है। टेक्स्ट बुक्स में उनका यथोचित उल्लेख नहीं है। उनकी रचनों का संकलन नहीं है। पत्रकारिता की अगली पीढ़ी तक ये बात पहुंचाने का कोई जरिया नहीं है कि एक शख्स ने किस तरह हिंदी पत्रकारिता को आधुनिक बनाने के लिए पायोनियरिंग काम किया। हिंदी टीवी पत्रकारिता की तो एक तरह से विधिवत शुरुआत ही एसपी से होती है। लेकिन क्या ये सब स्मृतियों में ही रहेगा या इसका कोई डॉक्यूमेंटेशन भी होगा।
जो समाज अपने नायकों का सम्मान नहीं करता, वो आगे भी नायकों के लिए तरसते रहने को अभिशप्त होता है। क्या हिंदी का समाज अपनी इस नियति से उबर पाएगा। या टांग खिंचाई और मूर्तियों का खंडन ही इसकी नियति है?
इन बातों पर विचार हम करें या न करें, लेकिन एसपी को याद तो कर ही सकते हैं। इसलिए शनिवार को शाम तीन बजे एसपी को याद करने की योजना कुछ लोगों ने बनाई है। स्थान है प्रेस क्लब ऑफ इंडिया, रायसीना रोड, नई दिल्ली। आप सब आएं तो कुछ बात बने, कुछ बात बढ़े। वरना जिंदगी तो चलती ही रहती है...
Friday, June 12, 2009
दुश्मन और दोस्त
दोस्त मुझे उन दुश्मनों से बचाना चाहते हैं
दुश्मन रात-दिन ताक में हैं
मेरी हर बात पर, मेरी हर चाल पर उनकी निगाह है
मेरी छोटी-छोटी कमजोरियों को भी
दुश्मन ध्यान से देखते, नोट करते हैं
न जाने कब, कौन सी कमजोरी उनके काम आ जाए
मेरा काम तमाम करने में
दोस्त यह देख विचलित होते हैं
दुश्मन की बारीक नज़र और उनके खतरनाक इरादे
मेरे दोस्तों की नज़र से छुपे नही रहते
वे मुझे उन खतरों से बचाना चाहते हैं
दुश्मन हैं अनगिन
चप्पे-चप्पे पर तैनात हैं दुश्मनों के आदमी
घर में, दफ्तर में, आस-पड़ोस में
मैं घिरा हुआ हूँ दुश्मनों के आदमियों से, दुश्मनों से
दोस्त संख्या में बहुत कम हैं
उन्हें मेरी चिंता है
वे इस लडाई को 'जड़' से ख़त्म कर देना चाहते हैं
वे मुझे समझाते हैं, वे मुझे डराते हैं
वे मुझे वैसा ही बना देना चाहते हैं
जैसा दुश्मन मुझे देखना चाहते हैं
दुशमन कोई रियायत देने को तैयार नही
वे मुझे ज़मीन के हजारों फुट नीचे दफना देना चाहते हैं
ताकि मेरे प्रेत भी वापस न आ सकें उन्हें परेशान करने को
दोस्त मुझे बहुत चाहते हैं
वे मुझे मार कर
मेरी लाश को अपने साथ रखना चाहते हैं
एकदम सुरक्षित
हमेशा-हमेशा के लिए
Sunday, June 7, 2009
Slum in a world of millionaires!
(ऑस्कर की जीत ने 'स्लमडॉग' और 'जय हो' इन दोनों शब्दों को ग्लोबल विस्तार दे दिया। इस नयी लोकप्रियता की बदौलत अब ये दोनों शब्द एक नयी दौड़ में शामिल हो गए हैं। वह है अंगरेजी भाषा का दस लाखवां शब्द बनने की। इस दौड़ में ७३ और शब्द शामिल हैं। बहरहाल, इसी बहाने हम 'स्लमडॉग' की दुनिया की एक झलक ले लेते हैं वरिष्ठ पत्रकार अनिल जी की नज़र से जो नागपुर के लोकमत और मुंबई के जनसत्ता के बाद रायपुर और हैदराबाद की परिक्रमा करते हुए अब दिल्ली आ गए हैं. )
I would start with my some reflections on Slum dog Millionaire because I think that even in an age of small screen explosion; the big screen is still much more effective। I think Slum dog Millionaire is a film which carries a strong statement from the forces of globalization and liberalization. The naked capitalism has shed all its pretensions about humanity and has come out in the open in vulgarizing the dehumanized atmosphere a poor is living in. The film clearly spells out that there is no visible hope in the world poor has woven around them. The change comes from the show business of a globalizing economy but this change is also not without condition.
The film has good number statement about the nation state called India। It depicts a ruthless, cruel, dehumanized society which is communally divided with no regard for human rights। It is a monolithic world of gangsters and corrupt officials (here police)। This post-modernist construct does not trace the origin and development of such a society and tries depicting in matter of fact way, as if the victims themselves have created this society. The brother of the central character has been created to extend a simplistic metaphor where a victim becomes oppressor. The film maker is very much alert that the character does not take up a role of liberator. The like a ad film it takes help of human relationship to sale the idea of a ‘static, ‘inhuman’ and hopeless society of a nation state which has overthrown its colonial masters not many years ago.
We can compare the film with classics like ‘Boot Polish’, ‘Jagate Raho’ or ‘Chakra, a film from alternative cinema। The system has been exposed and horrifying experience of a dehumanized world around has also been depicted with all its details but the belief that life is great and humanity should triumph, has not been lost sight of। We come out by learning lesions to make this world more humane. The learning process by which Jamal comes to win the Kaun Banega Krorepati game show is a very cautiously worked out theme in which the entire third world society has been ridiculed and new Macaulay’s children of globalization has born. The alphabets he learns form the cruel world around is not of compassion or love but of a deep seated lust. The film maker is cautious in depicting the very common theme of sacrificing one’s life for the kin that it should not run into a field where the humanity makes a triumph over the villain design to defeat it. Salim dies for the reason that Jamal should not lose the opportunity of becoming a millionaire. His inspiration for sacrifice comes from the thrilling world of modern market where every one has got a chance to become a millionaire.
The ultimate denial of the nation state comes from an altogether different corner. The legend of Mahanayak has been punctured through a well articulated scene where Jamal baths the filth to meet the great star. The depiction finds its climax in which the host of KBK becomes a villain by trying to stop him from winning the game. Here the disbelief generated against the myth of a Mahanayak is not to create a space for brave and humane kind of heroism. It is a part of grand design of denying the struggle for a democratic and plural society in third world. The agenda is clear a new kind of American Hope should capture our mind. We must refer Noam Chomsky for his depiction of western media. The entire agenda is of manufacturing the Consent. The dog of this slum has not been attributed with the ferocity of the dog Faiz Ahmad Faiz has described,
'ये मजलूम मखलूक गर सर उठायें / तो इन्सान सब सरकशी भूल जाए / ये चाहें तो दुनिया को अपना बना लें/ ये आकाओं की हड्डियाँ तक चबा लें / कोई इनको अह्सासे जिल्लत दिला दे/ कोई इनकी सोयी हुई दुम हिला दे
Tuesday, May 26, 2009
पत्रकारिता हमारी ढाल है...
राजीव रंजन
(राजीव इलेक्ट्रोनिक और प्रिंट मीडिया से होते हुए ऑनलाइन मीडिया पहुंचे हैं और आजकल एक क्रिकेट वेबसाइट से जुड़े हैं। इसलिए अगर उनकी ये पंक्तियाँ हम सबके सच की गवाही दे रही हैं तो आश्चर्य नही।)
हमें गुमान है कि हम
लोकतंत्र के चौथे खंभे की
ईंट और गारे हैं
हमें यह भी गुमान है कि
हम लोगों की आवाज हैं
ये बात और है कि
हमारी ही आवाज
बेमौत मर जाती है
या यूं कहें, हम ही खुद
घोट देते हैं उसका गला
हम सिर्फ नौकरी करते हैं
हमारी एकमात्र चिंता है
नौकरी बची रहे
चाहे कुछ और बचे न बचे
जब हम पर कोई सवाल उठाता है
हम उछाल देते हैं
उस पर ही कई सवाल
हम पापी पेट की दुहाई देकर
न जाने कितने पाप
चुपचाप देखते रहते हैं
हम पापी पेट के नाम पर
हर रोज न जाने कितने
पाप करते रहते हैं
और इन सारे ‘पापबोधों’ से
मुक्त होने के लिए
कविता लिख देते हैं।
पत्रकारिता हमारी ढाल है
साहित्य हमारी आड़।
(28/12/2006 )
Monday, May 25, 2009
क्यो हमारा पीछा नही छोड़ रहा बाबरी मस्जिद का भूत?
डॉक्टर एस डी नैय्यर
(आर्मी से रिटायर हुए डॉक्टर नैय्यर से रिजेक्ट माल के पाठक परिचित हैं। इस बार डॉक्टर साहब बाबरी मस्जिद... अर्ररर... सॉरी राम जन्मभूमि पर अपने विचार लेकर हाजिर हैं। हम तो पहले ही घोषित कर चुके हैं कि किसी भी विचार को रिजेक्ट करना इस मंच की नीति के ख़िलाफ़ है। सो नैय्यर साहब के विचारों को भी यहाँ जगह मिलनी ही थी, पर इसके अलावा भी एक कारण है इसे यहाँ आप सबके सामने पेश करने का।
डॉ नैय्यर देश और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को समझने और उसे यथाशक्ति निभाने वाले कर्तव्यनिष्ठ नागरिक हैं। ८० वर्ष की उम्र में भी वह एक चैरिटेबल ट्रस्ट से जुड़ कर मुफ्त लोगो का इलाज करते हैं। श्रद्धालु हैं, लेकिन राजनीति से कोई लेना-देना नही है। ऐसे व्यक्ति के विचार हमें मौका देते हैं उस मानसिकता को समझने का जो इस देश के आम जन मानस के आसपास है। खासकर तब जब चुनाव में मिले अप्रत्याशित झटके से बौखलाई बीजेपी इस उलझन से निकल नही पा रही कि उसे मन्दिर के रास्ते चलना चाहिए या विकास के रास्ते, नैय्यर साहब की बातें यह समझने में भी मदद कर saktee है कि उन जैसे लाखो लोगों की सोच और बीजेपी की महत्वाकांक्षा में दूरी कहां और क्यों आ गयी है।)
मैं अयोध्या और वहाँ के विवादित स्थल पर अक्सर जाता रहा हूँ जिसके बारे में माना जाता है कि वह राम जन्म भूमि है। इस बात का कोई ठोस सबूत नही हो सकता, सिवाय इसके कि लोग ऐसा मानते हैं। वहाँ अखंड कीर्तन वर्षों से चल रहा है।
अयोध्या की अपनी यात्राओं के दौरान मैंने उस स्थान पर मस्जिद के कोई निशान नही पाये। वहाँ कभी कोई मुस्लिम मुझे नही दिखा। जिस गुम्बद का जिक्र किया जाता है वह दूसरे गुम्बदों जैसा ही था। किसी भी मस्जिद में कुछ चीजें तो होनी ही चाहिए, जैसे
- हाथ धोने की जगह जहाँ 'वजू' किया जाए। वहाँ ऐसी कोई जगह नही थी।
- मुस्लिम श्रद्धालुओं के लिए ख़ास तौर पर बनायी गयी एक जगह जहाँ नमाज पढी जाए। वहाँ यह जगह भी नही थी।
- स्थानीय निवासियों की याद में (कम से कम मौजूदा पीढी की याद में) वहां किसी ने नमाज़ नही पढी है।
फ़िर यह मस्जिद आयी कहाँ से? बाबर ने यहाँ कोई मस्जिद नही बनवाई, कोई पुरातात्विक प्रमाण भी ऐसा नही बताते।
पूर्व प्रधानमन्त्री वी पी सिंह ने भी एक बार स्वीकार किया था कि वहाँ कोई मस्जिद नही है। यह मुस्लिम वोटों के लिए चलने वाला राजनीतिक खेल ही है जिसकी वजह से बाबरी मस्जिद का भूत हमारा पीछा नही छोड़ रहा। अजीब बात यह है कि बीजेपी के लोगो ने भी सच का पता लगाने की कोशिश नही की।
Monday, May 18, 2009
आर्थिक मंदी : आख़िर रास्ता किधर है
कुलदीप नाथ शुक्ला
(जब भी मौजूदा हालात की गंभीरता का सवाल शिद्दत से उठता है तो पहला सवाल यह सामने आता है कि इसका हल क्या है। सवाल लाजिमी है, लेकिन अक्सर यह इस तत्परता से और इस अंदाज़ में किया जाता है कि हालात की गंभीरता का मुद्दा उठाने वाला ही ख़ुद को कटघरे में महसूस करने लगता है। इलाज नही मालूम था तो सवाल क्यों उठाया? बहरहाल, हालात की गंभीरता को महसूस करते हुए और यह समझते हुए कि इसका कोई एक सर्वमान्य हल या नुस्खा रातो-रात नही निकाला जा सकता, हम शुक्लाजी के लेख की अगली कड़ी यहाँ पेश कर रहे हैं जिसमे उनहोंने हल के संभावित विकल्पों पर विचार किया है। )
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करीब दो दशक पहले जब सोविएत संघ का पतन हुआ था तब सोविएत मोडल की विफलता का शोर पूरी दुनिया में मचाया गया था। गौर करने की बात है कि सोविएत संघ का विघटन न तो वहाँ की जनता के आतंरिक विद्रोह का नतीजा था और न ही बाहरी हमले का। यह उस मोडल की आतंरिक विसंगति की स्वाभाविक गति का परिणाम था। घोषित पूंजीवादियों ने उसे समाजवाद के पतन का नाम देते हुए समाजवाद को अप्रासंगिक करार दिया। शीत युद्ध की समाप्ति की घोषणा के साथ ही अमेरिका के नेतृत्व में एक ध्रुवीय विश्व की परिकल्पना पेश की गयी और पूंजीवादी व्यवस्था को एकमात्र प्रासंगिक और शाश्वत व्यवस्था के जामे में प्रस्तुत किया जाने लगा।
इस प्रकरण से सभी पाठक अच्छी तरह परिचित हैं। यहाँ इस सम्बन्ध में सिर्फ़ इतना ही बताना काफ़ी होगा कि सोविएत संघ का स्वघोषित पतन एवं विघटन समाजवाद का नही बल्कि राजकीय एकाधिकार पूँजीवाद का पतन एवं विघटन था। इस बारे में वैज्ञानिक समाजवाद की सामान्य जानकारी रखने वाले लोगों को भी कोई संदेह न था और न है।
तो सोविएत संघ के इस स्वघोषित पतन के साथ पूँजीवाद का एक महत्वपूर्ण मोडल - राजकीय एकाधिकारी पूँजीवाद का मोडल ध्वस्त हो गया। उसे यानी सोविएत संघ को राजकीय एकाधिकार पूंजीवाद से निजी एकाधिकार पूँजीवाद की तरफ़ संक्रमण करना पड़ा।
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आज आप सब देख रहे हैं कि पूंजीवाद का स्वर्ग कहे जाने वाले अमेरिका में उसका क्लासिकल मोडल - निजी एकाधिकारी पूंजीवाद का मोडल - अपनी आतंरिक विसंगतियों के चलते अमेरिका में तो ध्वस्त हो ही रहा है पूरी पूंजीवादी दुनिया को ही हिला कर रख दे रहा है। मंदी से उबरने के असफल प्रयास में दुनिया कीसभी सरकारें सरकारी खजाना खोले दे रही हैं। जिन बड़ी कंपनियों का दिवाला पिट चुका है उन्हें राजकीय मालिकाने में लिया जा रहा है। दीवालियेपन की कगार पर खड़ी कंपनियों को सरकारी आर्थिक पॅकेज के जरिये बचाने के साथ-साथ उनमे राजकीय हिस्सेदारी बढ़ाईजा रही है। संक्षेप में बात यह कि निजी एकाधिकार पूँजीवाद की इस ढहती दीवार को सरकारी सहयोग एवं संरक्षण की जरूरत पड़ गयी है। दूसरे शब्दों में निजी एकाधिकारी पूंजीवादी मोडल स्वतः राजकीय एकाधिकारी मोडल की तरफ़ संक्रमित होने को मजबूर हो रहा है।
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भारत जैसे मिश्रित पूंजीवादी अर्थव्यवस्था वाले मोडल की जड़ें भी बुरी तरह हिल चुकी हैं। यह कछुआ अपनी गर्दन अपनी खोल में समेटने को विवश हो रहा है। यहाँ इस बात पर ध्यान अवश्य दिया जाना चाहिए कि दूसरे विश्व युद्ध में विजयी तथा पराजित दोनों तरह की साम्राज्यवादी शक्तियां इस महामंदी से सर्वाधिक प्रभावित हुयी हैं। दूसरे विश्व युद्ध के बाद स्वाधीन हुए नवोदित साम्राज्यवादी देशों पर इस मंदी का असर अभी अपेक्षाकृत कम मालूम पड़ रहा है। इसका प्रमुख कारण इनके अर्थतंत्र की तथाकथित मजबूती में नही बल्कि इसका सारा बोझ इन देशों की आम मेहनतकश जनता के कन्धों पर डाल देने की सरकारी साजिश में निहित है। मगर इस लगातार बढ़ते बोझ से दबते मेहनतकश अवाम में भी अब इस संकट का सारा बोझ बर्दाश्त करने क्षमता नही रह गयी है। उसके अन्दर बेचैनी बढ़ती जा रही है जिसका विस्फोटक स्वरुप कभी भी सामने आ सकता है।
तथ्यों की गवाही से स्पष्ट है कि पूँजीवाद का प्रत्येक मोडल - राजकीय एकाधिकार वाला मोडल, निजी एकाधिकार वाला मोडल और मिश्रित एकाधिकार वाला मोडल - बुरी तरह असफल साबित हो चुका है। पूंजीवाद के अन्दर संकटों का निदान संकट का बोझ शोषित-पीड़ित-मेहनतकश जनता के कन्धों पर डालते जाने में ही निहित है। प्रतिद्वंदी साम्राज्यवादी शक्तियों द्वारा एक दूसरे को नष्ट कर के स्वयं को संकट से निकलने का जो प्रयास करती हैं और उसकी वजह से जो विनाशकारी युद्ध होते हैं उनका खामियाजा भी आम जनता को ही भुगतना पड़ता है।
बहरहाल, जब पूँजीवाद के सारे मोडल असफल साबित हो चुके हों तब अगर संकट का हल उसी दायरे में खोजने की बाध्यता कोई अपने ऊपर लादे रहे तो उसका कूछ नही किया जा सकता। अगर इस सीमित दायरे से बाहर निकल कर देखें और समाजवाद से जुड़े पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर खुले दिलो-दिमाग से विचार कर सकें तो ऐसे संकटों से सर्वथा मुक्त समाज का लक्ष्य देख पाना मुश्किल नही है। जहाँ तक उस लक्ष्य की ओर बढ़ने का सवाल है है तो यहाँ मै लेनिन के इन शब्दों को याद दिलाना काफ़ी समझता हूँ कि 'अवसरवाद के ख़िलाफ़ निर्मम संघर्ष के बिना साम्राज्यवाद के खिलाफ संघर्ष असंभव है।'
Wednesday, May 13, 2009
आर्थिक मंदी : आख़िर ये बला क्या है
(आर्थिक मंदी की मार और इससे मची चीख-पुकार तो अब हमारे लिए नयी बात नही है। हम सब इसके गवाह हैं। सवाल सिर्फ़ यह है कि आख़िर यह सब क्यों और कब तक? दोनों सवालों के जो जवाब हमें मिल रहे हैं वे संतोषजनक नही हैं। जो आर्थिक सुधार हमें अकेलेपन से निकाल कर और पूरी दुनिया के साथ जोड़ कर स्वर्ग की तरफ़ ले जाने वाले थे उन्ही सुधारो ने हमें आर्थिक संकट की गर्त में पहुँचा दिया । यह सब क्यों और कैसे हुआ कोई ढंग का जवाब नही मिल रहा। कब तक चलेगा इस बारे में भी कोई ठोस जवाब नही है। पहले कहा गया संकट ही नही है। फ़िर कहा गया कुछ हफ्तों में या अगली तिमाही तक चीजें ठीक हो जायेंगी। फ़िर कहा गया साल दो साल भी लग सकता है। ऐसे ही उलझन और संभ्रम की स्थिति में पेश है दो किश्तों का यह लेख जो मंदी की मौजूदा स्थिति का एक ख़ास दृष्टिकोण से विश्लेषण करता है। )
मौजूदा महामंदी की शुरुआत दुनिया के सर्वाधिक विकसित, संपन्न और शक्तिशाली पूंजीवादी देश अमेरिका से हुयी। असलियत पर परदा डालने के लिए पहले तो इसे सब प्राईम संकट तथा वित्तीय संकट कहा गया जो संकट का कारण नही बल्कि इसका लक्षण मात्र है। लेकिन वास्तविकता बड़ी निर्मम होती है। उसने व्यवस्था के संचालकों की आंखों में ऊँगली डाल कर दिखा दिया और उन्हें यह स्वीकारने को मजबूर कर दिया कि संकट इतना बड़ा है कि उनके हाथ पैर फूले हुए हैं। संकट पर जल्द ही काबू पा लेने की थोथी घोषणाएं तसल्लीबख्श बकवास साबित हुयी। निजी एकाधिकार पूंजीवाद का स्वर्ग अपने गुलामों के लिए ही नही, मालिकों के लिए भी नर्क बन गया है।
इस वैश्विक आर्थिक मंदी के चलते बीते वर्ष के दौरान वित्तीय परिसंपत्तियों में लगभग पाँच सौ खरब डालर का नुकसान हुआ है। एशिया विकास बैंक द्बारा जारी एक अध्ययन 'वैश्विक वित्तीय संकट एवं उभरती हुयी अर्थव्यवस्थाएं : परिसंपत्तियों में प्रमुख नुकसान' में कहा गया है कि वर्ष २००८ के दौरान एशिया के विकासशील देशों में ९६ अरब डॉलर की क्षति दर्ज की गयी। अध्ययन में स्पष्ट किया गया है कि १९३०-३१ की मंदी के बाद यह सर्वाधिक भीषण संकट है।
यह संकट सही मायनो में अति उत्पादन का संकट है। अति उत्पादन से मतलब यह नही कि दुनिया के सभी लोगो की जरूरतों से ज्यादा उत्पादन हो रहा है। उत्पादन की पूंजीवादी व्यवस्था में आवश्यकता का मतलब यह है कि आपको किसी चीज की जरूरत हो और आप उसकी कीमत चुकाने लायक माल अपनी जेब में रखते हों और उस चीज पर खर्च करने का आपका इरादा भी हो। जब ये तीनो संयोग जुड़ते हैं तभी उसे आपकी या किसी की भी जरूरत में शुमार किया जाता है।
यानी अगर आपके पास पैसे न हों तो रोटी आपकी जरूरत नही मानी जायेगी। इतना ही नही, मान लिया आपके पास रोटी खरीदने लायक पैसे हैं लेकिन उसे रोटी पर खर्च करने के बजाय आप अपने बच्चे की दवा पर खर्च करना ज्यादा जरूरी समझते हैं तब भी रोटी को आपकी आवश्यकता में नही गिना जाएगा।
इस प्रकार पूँजीवाद में अति उत्पादन का मतलब उस उत्पादन से है जिसके खरीदार नही मिल रहे हैं, भले ही आबादे के एक बड़े हिस्से को उस उत्पादन की अत्यधिक जरूरत हो। वर्त्तमान आर्थिक संकट के मूल में यही बात है। आज बाजार ऐसे उत्पादित मालों से भर गया है जिसकी जरूरत तो लोगों को है लेकिन इनका दाम दाम चुका कर इन्हे खरीदने की सामर्थ्य उनमे नही है। एक वाक्य में कहें तो समाज के ज्यादातर लोगों में क्रय शक्ति का अभाव।
कहना न होगा कि पूंजीवादी शोषण की चलती चक्की ने आबादी के बड़े हिस्से की संपत्ति का अपहरण कर उसे सम्पत्तिहीन बना है। सेवारत श्रमिकों को भारी संख्या में काम से हटा कर उनकी आमदनी का जरिया छीन लिया गया। इससे बेरोजगारों की फौज बढ़ी और इस स्थिति का भी फायदा इस रूप में उठाया गया कि लोगो को न्यूनतम से भी कम मजदूरी देकर दिहाडी एवं ठेका मजदूरों के रूप में काम लिया जाने लगा। इतना ही नही सरकारी टैक्सों में बढोतरी करके और एकाधिकारी दामो के जरिये कीमतें भी काफ़ी बढ़ा दी गयीं।
इस पूरी प्रक्रिया में स्वाभाविक रूप से आबादी के बड़े हिस्से की क्रय शक्ति लगातार कम होती गयी। और बाजार में इतना माल जमा हो गया कि जरूरत होते हुए भी क्रय शक्ति के अभाव में लोग उसे खरीद नही पा रहे हैं।
इसी संकट के महासमुद्र में यह व्यवस्था डूब - उतरा रही है। अपनी आतंरिक विसंगतियों का शिकार हुयी इस व्यवस्था के पास इससे बचने का कोई उपाय नही है। इसका स्वाभाविक परिणाम चालू उत्पादन में कमी, कल-कारखानों की बंदी और बेतहाशा छंटनी के रूप में सामने आ रहा है जिसके चलते यह संकट और भी व्यापक तथा गहरा होता जाएगा।
(अगली किश्त : आख़िर रास्ता किधर है?)
लेखक मासिक पत्रिका 'कम्युनिस्म' के सम्पादक हैं.
Saturday, May 9, 2009
पहाड़ की खुशी और गम को समझने का नया मंच
देखिए उनका ब्लॉग

