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Sunday, April 6, 2008

जियो जिंदगी

आर. अनुराधा

बचपन में एक कहानी सुनी थी। बाजार में एक बच्चा रो रहा था कि उसके पास सुंदर जूते नहीं हैं। उसके पिता ने उसे एक आदमी के बारे में बताया जिसके पैर ही नहीं थे। कहानी की सीख यह थी कि आदमी के पास जो है उसकी कीमत समझे और उसमे खुश होने के कारण ढूंढे। हम कई ऐसी बीती हुई या आने वाली या अपने काबू के बाहर की बातों का स्यापा करते जिंदगी के वर्तमान अच्छे पल भी खो देते हैं। ऐसी कई चीजें हैं जो हम दूसरों के पास देखते है और अपने पास होने का अफसोस लगातार करते रहते हैं। पड़ोसी की समृद्धि परेशान करती है? कितनों को घर ही नसीब नहीं। घर में बुजुर्गों की देखभाल सरदर्द का सबब है? उन्हें देखें जिनके मार्गदर्शन के लिए बड़ों की अंगुली ही नहीं। जिंदगी बोझ लगती है? लेकिन सोचें, है तो सही!

मौत को नजदीक से देखने के बाद ही जिंदा होने का अहसास होना शुरू होता है, जिंदगी के सही मायने और इसकी कीमत समझ में आने लगते हैं। मैंने भी एक बार जीवन के अंत को करीब से देखा था, ठीक 10 साल पहले। कैंसर के साथ अपनी पहली लड़ाई के दौरान एक बार मुझे लगा था कि शायद जिंदगी कमजोर पड़ रही है। उन हालात में, जिंदगी की डोर बस किसी तरह हाथ में कस कर पकड़े रहने की जद्दोजहद और जिद ने मुझे जीना सिखा दिया।

मेरे मामले में शुरुआत ही गलत हुई, जैसा कि हिंदुस्तान में कैंसर के मामलों में आम तौर पर होता है। जब बीमारी को लेकर पहली बार अस्पताल पहुंची तो ट्यूमर काफी विकसित अवस्था में था, स्टेजिंग के हिसाब से टी-4बी। लेकिन अच्छी बात यह थी कि बीमारी किसी महत्वपूर्ण अंग तक नहीं पहुंची थी।

इलाज तय हुआ- तीन सीइकिल कीमोथेरेपी ट्यूमर को छोटा करने और उसके आस-पास छितरी कैंसर कोशाओं को समेटने के लिए, उसके बाद सर्जरी और फिर तीन साइकिल कीमोथेरेपी शरीर में कहीं और छुपी बैठी कैंसर कोशिकाओं के पूरी तरह खात्मे के लिए। उसके बाद रेटियोथेरेपी भी- ट्यूमर की जगह पर किसी कैंसर कोशिका की संभावना को भी जला कर खत्म कर देने के लिए। यानी रत्ती भर भी कसर छोड़े बिना धुंआधार हमले हुए ट्यूमर पर। और आखिर उसे हार माननी पड़ी। लेकिन उस इलाज, खास तौर पर कीमोथेरेपी के मारक हमलों ने कमजोर बीमार कोशिकाओं के साथ-साथ नाजुक रक्त कणों को भी उसी तेजी से खत्म करना शुरू कर दिया।

यह समय था जब मुझे खांसी के साधारण संक्रमण से लड़ने के लिए भी सफेद रक्त कणों की पूरी फौज की जरूरत थी और उधर दवाइयों के असर से शरीर में सफेद रक्त कणों की संख्या 6,000 या 8000 के सामान्य स्तर से घटते-घटते चार सौ और उससे भी कम रह गई थी। और मुझे पता था कि कीमोथेरेपी के दौरान ऐसी स्थिति में साधारण खांसी का कीटाणु भी इंसान को आराम से पछाड़ सकता है।

उस समय खुद को किसी नए कीटाणु के हमले से बचाने के लिए खाना-पानी उबाल-पका कर लेने, खाने के पहले साबुन से हाथ धोने और बाद में ब्रश करने, बार-बार गरारे करने जैसे सरल उपायों से लेकर कड़ी एंटीबायोटिक दवाओं और सभी से दूर अकेले कमरे (आइसोलेशन) में 10 दिनों तक रहने और हवा में मौजूद कीटाणुओं को शरीर में जाने से रोकने के लिए नाक पर मास्क बांधे रहने जैसी हर कोशिश की। फिर भी रक्त कणों की संख्या गिरती ही गई। एक समय ऐसा आया जब लगा, मुट्ठी में रेत की तरह जिंदगी तेजी से फिसलती जा रही है और किसी भी समय खत्म हो जाएगी।

तब मुझे याद आए वो अच्छे दिन जो मैंने जिए थे, बिना उनकी अच्छाई का एहसास किए। वो सब लोग जिन्होंने मेरे लिए कुछ अच्छा किया था। यहां तक कि मैंने उन सबकी एक फेहरिस्त बना डाली और तय किया कि अगर जिंदगी बाकी रही तो उनका ऋण मैं किसी तरह उतारने की कोशिश जरूर करूंगी। हालांकि उस कठिन समय से उबरने में कुछ ही दिन लगे, लेकिन वह समय एक युग की तरह बीता। उन तीन-चीर दिनों में लगा कि सिर्फ जिंदा रहना भी एक नेमत है, जिंदगी चाहे जैसी भी हो। सिर्फ जीते रहना भी उतना सहज नहीं, जितना हम सोचते हैं।

उस दौरान मैं देख रही थी अपने स्वस्थ लगते शरीर को मौत के करीब पहुंचते, और नहीं जानती थी कि आगे क्या है। उस दौरान मैंने समझा कि जिंदा रहने का अर्थ सिर्फ जिए जाना नहीं है। हर दिन कीमती है और लौट के आने वाला नहीं है। और यह भी कि कोई दिन, कोई भी पल आखिरी हो सकता है और कल हमेशा नहीं आता।

अब बीते कल को पीछे छोड़ चुकी हूं, लेकिन उसके सबक आज भी मेरे सामने हैं। ठीक होने के बाद को औपचारिक संगठन बनाए बिना ही, कैंसर से लड़ कर जीत चुकी कुछ और महिलाओं के साथ या अकेले ही कैंस जां और जागरूकता शिविरों में शामिल होती हूं, अस्पतालों के कैंसर ओपीडी में अपने अनुभव और जानकारी वहां इलाज करा रहे मरीजों के साथ बांटती हूं, उनकी जिज्ञासाओं, आशंकाओं, उलझनों को दूर करने की कोशिश करती हूं तो लगता है जीवन सार्थक है। और अपने इन्हीं अनुभवों को ज्यादा-से ज्यादा लोगों से बांटने के मकस से उन्हें पुस्तक रूप भी दे डाला- ऱाधाकृष्ण प्रकाशन (राजकमल) नई दिल्ली से छपी- ' इंद्रधनुष के पीछे-पीछे : एक कैंसर विजेता की डायरी '

इलाज के उस 11 महीने लंबे दौर ने मुझे सिखाया कि खुद को पूरी तरह जानना, समझना और अपनी जिम्मेदारी खुद लेना जीने का पहला कदम है। अगर मैं अपने शरीर से परिचित होती, उसमें रहे बदलावों को पहले से देख-समझ पाती तो शायद बेहद शुरुआती दौर में ही बीमारी की पहचान हो सकती थी। और तब इलाज इतना लंबा, तकलीफदेह और खर्चीला नहीं होता।

अपने इस सबक को औरों तक पहुंचाने की कोशिश करती हूं। स्तनों को अपने हाथों से और आइने में देख कर खुद जांचने के सरल, मुफ्त लेकिन बेशकीमती तरीका महिलाओं को बताती हूं ताकि उन्हें भी वह सब झेलना पड़े जो मुझे झेलना पड़ा। अफसोस की बात है कि हिंदुस्तान के अस्पतालों तक पहुंचने वाले कैंसर के चार में से तीन मामलों में बीमारी काफी विकसित अवस्था में होती है जिसका इलाज कठिन और कई बार असफल होता है। किसी बढ़ी हुई अवस्था के कैंसर की जानकारी पाकर हर बार सदमा लगता है कि क्यों नहीं इसकी तरफ पहले ध्यान दिया गया।

अफसोस
इसलिए और बढ़ जाता है कि खास तौर पर महिलाएं अपनी तकलीफों को तब तक छुपाए रखती हैं, सहती रहती हैं, जब तक यह उनकी सहनशक्ति की सीमा के बाहर हो जाए। (और सबसे खतरनाक बात यह है कि आम तौर पर कैंसर में दर्द सबसे आखिरी स्टेज पर ही होता है। यह बिल्ली की तरह दबे पांव आने वाली बीमारी है, और शरीर के किसी वाइटल अंग में पहुंचने के बाद उसके कामकाज में रुकावट डालती है, तब ही इसके होने का एहसास हो पाता है।) शायद यह सोच कर कि अपनी तकलीफों से दूसरों को क्यों परेशान किया जाए। जबकि बात इसके एकदम उलट है। परिवार की धुरी कहलाने वाली महिला अगर बीमार हो तो पूरा परिवार अस्त-व्यस्त हो सकता है। इसलिए ज़ंग लगने के पहले से ही धुरी की सार-संभाल होती रहे तो जीवन आसान हो जाता है।

सभी जागरूक रहें अपने शरीर और सेहत के बारे में और बीमारयों के बारे में, ताकि जहां तक हो सके उन्हें दूर रखा जा सके या शुरुआत में ही पता लगाकर खत्म किया जा सके। जीने के और भी कुछ गुर हैं- शरीर और जिंदगी को थोड़ा और सक्रिय बनाने की कोशिश, कसरत और खान-पान की अच्छी आदतों के अलावा नफा-नुकसान का हिसाब किए बिना कभी-कभी किसी के लिए कुछ अच्छा करने की कोशिश। तभी हम भरपूर जी पाएंगे, सही मायनों में जिंदगी।

4 comments:

आनंद said...

आपका अनुभव हिला देने वाला है। आपने सच कहा, हमारा जीवन एक वरदान की तरह है। पर अफसोस इस बात का है कि हम इसकी सही कद्र नहीं करते। - आनंद

pooja said...

''..इसलिए ज़ंग लगने के पहले से ही धुरी की सार-संभाल होती रहे तो जीवन आसान हो जाता है..''
हाँ यह एक सच्चाई है जिसे परिवारों में हमेशा ही स्त्री से छुपा कर रखा जाता है.. वह मरते दम तक यह नही जान/स्वीकार पाती की अपना स्वास्थ्य अपनी चिंता अपना जीवन कितना mahtvpurn है! और अपने मानसिक शारीरिक स्वास्थ्य की देखभाल करना उसका स्वयं के prati कर्तव्य है.

अनुराधा जी आपकी ज़िंदगी के टुकड़े दरअसल हम सभी की ज़िंदगी के टुकड़े हैं. सिलसिला जारी रखें.

पूजा प्रसाद

mamta said...

आपका अनुभव बहुतों की आँखें खोल देगा।जिस हिम्मत से आपने इस का सामना किया वो काबिले तारीफ है। आपने अपने अनुभव यहां पर बांटे इसके लिए शुक्रिया।

जागरूकता बहुत जरुरी है।

आर. अनुराधा said...

मेरे अनुभवों के मर्म को समझा गया, इसकी मुझे खुशी है। अगर यह बात वैचारिक विमर्श से आगे बढ़ कर ऐक्शन में तब्दील होती दिखे तो मैं समझूंगी, मेरा भोगना और लिखना सार्थक रहा।

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