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Saturday, April 5, 2008

रवीश बाबू, बिहार तो दिल्ली में भी है!

रवीश ने ऐसी कोई बात नहीं कही है कि लोग नाराज हो जाएं। जाति ठेकेदारी में है, नौकरशाही में है, सेना और पुलिस में है, शिक्षा में है, वकालत-न्यायपालिका में है, पत्रकारिता और साहित्य में है। कुल मिलाकर भारतीय समाज की अस्थिमज्जा यानी बोनमैरो में है जाति। जाते-जाते जाएगी जाति। लेकिन जाति का रक्तबीज पिछले कई सदियों से जिस तरह रूप बदलकर, कभी आक्रामक होकर तो कभी सिर झुकाकर, कभी विजेताओं के सामने बिछकर सर्वाइव कर रहा है, उसमें रवीश का ये शक करना अकारण नहीं लगता है कि बाजार और जाति एक दूसरे को को-ऑप्ट कर रहे हैं या कर सकते हैं।

रवीश ने जो नहीं कहा है वो ये है कि बिहार अगर जाति नाम की बीमारी के सबसे उग्र लक्षण का नाम है तो प्रगतिशील कहे जाने वाले पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों और दिल्ली जैसे शहर में भी "बिहार" मौजूद है।

जहां तक डॉक्टरी पेशे की बात है तो आपको एक पुराना वाकया बताता हूं। देश में मेडिकल एजुकेशन का इतिहास जानने वालों के लिए ये पुरानी बात होगी, उनका समय खराब करने के लिए क्षमाप्रार्थी हूं। घटना 1836 की है। आदमी के जीवन के लिहाज से ये पुरानी बात है लेकिन समाज और राष्ट्र के जीवन में 150 साल खास लंबा समय नहीं होता।

1833 में देश का पहला मेडिकल कॉलेज कोलकाता में खुला। नाम था कोलकाता मेडिकल स्कूल। उससे पहले तक एलोपैथी के डॉक्टर विदेश से पढ़कर आते थे क्योंकि भारत में या तो आयुर्वेद की पढ़ाई होती थी या यूनानी चिकित्सा की।

- कोलकाता मेडिकल स्कूल में तीन साल तक एनॉटमी की पढाई बगैर शव की चीरफाड किए होती रही क्योंकि सवर्ण छात्र शव को छूने के लिए तैयार नहीं थे, क्योंकि शव को छूने का काम तो नीची जाति वाले ही कर सकते थे।

- 10 जनवरी 1836 को एनॉटमी के प्रोफेसर गॉडइव एक शव लेकर आए। पहले संस्कृत कॉलेज में आयुर्वेद के शिक्षक और तबादले के बाद मेडिकल कॉलेज पहुंचे मधुसूदन गुप्ता अपने बेटे राजकेष्टो समेत चार छात्रों को लेकर एनॉटमी की लैब में पहुंचे और शव की चीरफाड़कर एनॉटमी की पढ़ाई हुई। बाकी सात सवर्ण छात्रों ने इस पढ़ाई से खुद को दूर रखा। ये कोलकाता के भद्रलोक के लिए हिला कर रख देने वाली घटना थी और कॉलेज के गेट पर इसका विरोध करने के लिए भीड़ जुट गई थी।

इस घटना का जिक्र करता हुआ एक शिलालेख लगाया गया जो कोलकाता मेडिकल कॉलेज के एनॉटमी डिपार्टमेंट में मौजूद है। इस घटना का जिक्र प्रोफेसर केएनएम कुंजरू ने अपनी किताब वेस्टर्न मेडिकल एजुकेशन इन इंडिया में किया है। । उस पूरे बैच से सिर्फ चार छात्र ही मेडिकल की डिग्री लेने में कामयाब हो पाए थे।

समय बदल गया है। शव की चीरफाड़ से अब किसी को एतराज नहीं है। लेकिन यकीन मानिए और आप जानते हैं कि सब कुछ नहीं बदला है। लेकिन बदलने के लक्षण जरूर नजर आ रहे हैं। कई बार जाति नाम का मरीज इलाज कराने से डरता है। चिल्लाता है, छटपटाता है, अस्पताल से भाग जाता है। ये सब कुछ हमारे समय में कुछ ज्यादा ही रफ्तार से हो रहा है।

ये कैसा रोचक समय है जब देश के सबसे नामी मेडिकल कॉलेज-हॉस्पिटल में से एक सफदरजंग के मेडिकल सुपरिंटेंडेंट और प्रिंसिपल दलित हैं और सड़क पार एम्स में कोटा कटेगरी के कैंडिडेट कहते हैं कि रिटेन के आधार पर एसेसमेंट कीजिए। हम परीक्षा पास कर लेंगे। इंटरव्यू में फेल करने का खेल बंद कीजिए। लेकिन एम्स का मेरिटवादी प्रशासन तीन साल से हो रही इस मांग के बावजूद मेरिट का आदर करने से घबराता है। वहां रेजिडेंट के रिक्रूटमेंट में रिटेन और इंटर्नल एसेसमेंट को सौ-सौ नबंर दिए जाते हैं। इंटर्नल एसेसमेंट जातिवादी प्रोफेसरों के हाथ में ब्रह्रास्त्र की तरह है।

क्या ये महज संयोग है कि शिक्षा जगत में जातिवाद के सबसे मजबूत गढ़ एम्स में रेजिडेंट डॉक्टर एसोसिएशन और फैकल्टी एसोसिएशन दोनों के अध्यक्ष एक ही प्रांत के हैं और दोनों ही वहां के सवर्ण आंदोलन के अगुआ रहें हैं।

सुन रहे हैं रवीश बाबू, बिहार तो दिल्ली में भी है।

7 comments:

mandalvichar said...

रवीश जो कहते हैं खरा कहते हैं इसलिए सब उन पर टूट पड़ते हैं...थोड़ा 'वे लोग' सोचने को तैयार हों तो शायद असलियत समझ में आए.

आर. अनुराधा said...

जाति का मामला समझना हो तो पढ़ने में एकदम सरल लगता है। लेकिन समाज में इसके असर और नतीजों का खुलासा जब होता है तो इस व्यवस्था से फायदा उठा रहा वर्ग तिलमिला जाता है। बिना जटिल बनाए, ऐसे सरल उदाहरणों से समाज में जाति की बदबूदार व्यवस्था को उघाड़ने के काम में जो लगे हैं, उन्हें बधाई। लगे रहिए।

Anonymous said...

बात मे दम है ! मेरे नाना जी "जज" बने - डाक्टर नही ! क्योंकि उस ज़माने मे - चीड़ - फाड़ का काम "हजाम" किया करते थे ! रवीश ने बिल्कुल सही बात कही है - दुःख होता है जब जातिगत मामलों मे वो एक ख़ास जाती पर "हमला" करते हैं ! यह बिल्कुल सही है की दवा की प्रथम दस कम्पनी मे २ या ३ एक खास जाती के बिहारी लोगों की है ! और बिहार मे सिर्फ़ उनके जाती के लोग ही नही बाकी जाती के डाक्टर लोग भी लिखते हैं ! दूसरी बात - क्या कोई कम्पनी सिर्फ़ और सिर्फ़ अपनी अल्पसंख्यक जाती और बिहार के यहूदी कहे जाने वाले जाती की बदौलत पूरे भारत मे कैसे टीक सकती है !
रवीश की बौखलाहट का क्या कारन हो सकता है - यह पता करना चाहिए !

दिलीप मंडल said...

सिप्ला, रैनबैक्सी, ग्लैक्सोस्मिथक्लाइन, जायडस कैडिला, सन फार्मा, निकोलस पीरामल, लुपिन, वोकहार्ट, अल्केम, नोवार्टिस, एवेंटिस ये है बिक्री के लिहाज से देश की सबसे बड़ी फार्मा कंपनियां। इनमें लगभग आधी तो एमनसी हैं और बाकी भी ज्यादातर लिस्टेड कंपनियां हैं। एक अल्केम लैब के मालिक संप्रदा सिंह जरूर बिहारी हैं, लेकिन बिहार में न वा माल बनाते हैं न वहां से अपना ऑफिस चलाते हैं। ज्यादा स्टेक के हिसाब से भी किसी और कंपनी में किसी बिहारी का प्रभुत्व तो मुझे दिखता नहीं है।

हम सबका ज्ञान बढ़ाएं कि दवा क्षेत्र में कौन सी दो-तीन कंपनियों के मालिक बिहारी और वो भी किसी खास जाति के हैं। कृपया सपनों की दुनिया से निकलिए। बिहार के लोग तरक्की कर रहे हैं और उन्हें अभी लंबा सफर तय करना है। सुस्ताने का समय नहीं आया है। न ही गर्व करने की कोई बात अभी हुई है।

pranava priyadarshee said...

रवीश कुमार के आलेख ने जाति के सवाल के एक नये जटिल पहलू की तरफ इशारा किया किया. वहां(बिहार मे) बाजार की शक्तियाँ (दवा कंपनियाँ) जाति प्रथा का फायदा उठाने के लिए जाति की जकडन को मज़बूत कर रही हैं.
कोई जरूरी नही कि वह कम्पनी पूरे देश मे जाति के ही आधार पर फैलने की कोशिश करे. वह जरूरत के मुताबिक भाषा, लिंग, क्षेत्र, धर्म आदि से जुडी भावनाओं का या फिर समाजवाद, साम्यवाद, राष्ट्रवाद आदि किसी वाद से जुडी भ्रांतियों का भी फायदा उठा सकती है. यह उस एक कम्पनी की ही नही सभी कंपनियों का सच है. बाजार का तर्क ही अधिकतम लाभ का है. अगर जाति प्रथा के टूटने से लाभ होता है तो वह उसे तोड़ने मे मददगार होगा और उसके मजबूत होने से लाभ होता होगा तो जाति की जकडन को मजबूत बनाने की हर संभव कोशिश करेगा.
मैं यह नही कहता कि जाति को कमजोर करने मे अगर बाजार से मदद मिलती हो तो वह न ली जाय. मेरा निवेदन सिर्फ इतना है कि हम बाजार को जाति विरोधी न मानने लग जाएं. आने वाले समय मे अब इसकी (बाजार की) प्रगतिशील भूमिका (जाति ही नही, किसी भी मायने मे) दिखने की संभावना कम ही होती जानी है.

Sarvesh said...

Baat adhunikta ka karte hain humlog aur example 1836 ka dete hain, aur prove karne lagte hain kee Ravish jee kyon sahi hain. Both Ravishjee and his friends (on his behalf) will keep justifying it his writings. Thanks for justifying which he couldn't. Aap sahi bol rahe hain. hum bhi aisa hee sune the kee 1857 ke mutiny ka ek reason thaa kartus me gay/suar kee charbi hone ka rumour. Eesko kya bola jaye? Eetihas me bahut kuchh dafan hai. oosame se apane kaam kee cheeze hee mat dhundhiye. So called dava(assume a pseudo name AKLM) kee dava ko Patna ke other doctors prescribe nahin karte kyonkee wo ek vishesh jaati ka company hai, eesako nahin oozagar kar ke Ravish ne ye oozagar kiya kee kuchh doctors AKLM kee dava prescribe karte hain (even though its life saver) because its owner belong to their own caste. Kal Bangalore me ek doctor ne ees company ki dava ko mujhe prescribe kar diya. Maine puchha sir aapka caste? He scolded me. Maine bola please doctor bataiye. Onhone kaha Gowda. Unhone puchha kee kyon puchha aisa? Maine bataya kee ek lekh ke anusar ees company ki dava ko patna ke doctors eesliye nahin likhte kyonkee eesake owner oonaki jaati ke nahin hai. He started laughing.... He told I don't know the owners caste I read the ingradients of the medicine. Please educate those doctors in Patna to behave like doctor and not like rajneta.

subhash said...

sahi hai.jati ki lambandi to peshe me hai hi.timilana to tha hi.roji roti se badhkar ki hi bat nahi hai,sawal use apne tak bandhak rakhne ka hai.....unfortunatily yeh sab Bihar me hi hota hai.....

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