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Thursday, March 27, 2008

नॉरसिसस बनने से बचाते हैं बेनामी

बेनामी बंधुओं का मुझसे खास प्रेम रहा है। खासकर जाति व्यवस्था जैसे नाजुक विषय पर बात शुरू करते ही जाने किस किस जगह से बाहर आ जाते हैं। कभी भाषा से कभी कथ्य से तो कभी तकनीकी औजारों से अक्सर पहचान लिए जाते हैं और यही है सारी समस्या की जड़। समस्या
की जड़ ये है कि हममें से ज्यादातर ब्लॉगर एक दूसरे को जानते-पहचानते हैं। अभी भी हिंदी ब्लॉगिंग एक छोटे से क्लब की तरह है। इसलिए झगड़े भी बिल्कुल क्लब या हाउसिंग सोसायटी के अंदाज में होते हैं।

ब्लॉग के झगड़ों को देखिए। जो लोग झगड़ते दिख रहे हैं वो सब एक दूसरे के परिचित है। दो अनजान ब्लॉगरों का झगड़ा दुर्लभ बात है। झगड़ रहे ब्लॉगर बात पर बात करते दिखते जरूर हैं, लेकिन ये लड़ाई व्यक्तियों के बीच होती है। ऐसी लड़ाई की तीक्ष्णता व्यक्तियों के अंतर्संबंधों के डायनामिक्स से तय होती है।

जो ब्लॉगिंग में ज्यादा लगे हैं, उन्हें यहां के मान-असम्मान की परवाह कुछ ज्यादा होती है। ब्लॉगिंग में जिस तरह की "इज्जत" के उछलने से लोग परेशान हैं, वो थोड़ी पुरानी सी सोच लगती है। उसे सामंतवाद कह लीजिए, या किसान या ग्रामीण या पिछड़ी मानसिकता या कोई और नाम दे दीजिए। बात बात पर इज्जत खराब होना कोई अच्छी बात नहीं है।

मेरी निजी राय है कि ब्लॉगिंग में बेनामी तो रहेंगे। कुछ कमेंटकर्ताओं ने सिर्फ कमेंट करने के लिए ब्लॉग बना लिए हैं। वे बेनामी ब्लॉगर हैं। अगर बेनामियों से किसी को एतराज है तो वो अपने मंच पर इसकी इजाजत न दे। लेकिन बेनामियों को अपनी आत्मा का अहेरी मानिए, तो फिर उनसे कोई समस्या नहीं होगी।

ये वो प्रजाति है जो आपकी आलोचना करती है, आपको वलनरेबल होने का एहसास दिलाती है। हमें आत्मतुष्टि के कीचड़ में धंसने से बचाती है। हमें नॉरसिसस बनने से रोकते हैं बेनामी आलोचक। हमें तथ्यों को लेकर परफेक्ट होने के लिए धकेलते हैं बेनामी। हमें नया पढ़ने और जानने के लिए उकसाते हैं और हमारा ही भला करते हैं ये लोग। निंदक नियरे राखिए की बात इन पर फिट बैठती है।


रिजेक्टमाल पर हम बेनामी कमेंट की छूट देते हैं, उनके कमेंट पढ़ते हैं, पब्लिश या रिजेक्ट करने के लिए हम अपने विवेक का इस्तेमाल करते हैं। जो मंच ज्यादा लोकतांत्रिक और साहसी हो पाते हैं वहां बेनामी कमेंट की भी छूट है और कमेंट मॉडरेशन भी नहीं है।

हमारे बारे में कोई निजी या चुभती हुई बात तो हमें जानने वाला ही करता है। हमें चोट पहुंचाने में किसी अनजाने को क्या फायदा? इसलिए बेनामियों को अपना जानिए। वो आपके करीब के लोग हैं। अगर कोई आपका क्षद्म रचकर कोई बात कहता है तो ये चिंता की बात है। लेकिन कोई बात अगर किसी के समग्र व्यक्तित्व से अलग रूप में कही जाएगी तो उसकी विश्वसनीयता नहीं होती। मेरा रूप धरकर कोई अगर ब्राह्मणवाद की तारीफ करेंगा तो आप क्या यकीन करेंगे? किसी दारूबाज मित्र के बारे में ही तो ये अफवाह चल सकती है कि पीकर नाली में पड़ा था। हर अफवाह को पंख नहीं लगते। अफवाह का भी एक आधार होना चाहिए, तभी वो आगे बढ़ती है। ऐसी अफवाह नहीं चल सकती कि मुकेश अंबानी ने अपनी सारी संपत्ति दान कर दी है या कि अमिताभ बच्चन बुढ़ापा बिताने के लिए बाराबंकी चले आए हैं। इसलिए अपनी विश्वसनीयता पर यकीन कीजिए।

बहरहाल, इटरनेट के मुक्त माध्यम में बेनामियों की अपनी सत्ता है और उस सत्ता की जरूरत भी है और उसका अपना महत्व है। हिंदी ब्लॉगिंग को इस सच का साक्षात्कार करने के लिए वयस्क होना पड़ेगा।

7 comments:

Vikas said...

निंदक नीयरे रखिए कि बात सही है. हमला अगर विचारों के मतभेद के चलते हो तो इसमे ब्लॉग जगत का भला ही होगा. हाँ हमले व्यक्तिगत नही होनें
चाहिए.

अनामदास said...

दिलीप जी
सही कहा आपने. बेनामी का अपना महत्व है, पहला वाक्य पढ़ते ही समझ में आ जाता है कि बात में कोई सार है या नहीं, उसके बाद बेनामी हो या नामवर, क्या फर्क़ पड़ता है, जाति प्रथा वाले कमेंट ज्यादातर स्लांडर थे जिनमें कोई सार नहीं था लेकिन बेनामी चिट्ठियां कई बार मुद्दे की बात कहती हैं. मेरा तो ब्लॉग ही बेनामी है...

Anonymous said...

हुजूर-ए-आला से सहमति है . अनाम न होंगे तो ओढे हुए आभिजात्य/पांडित्य का मुखौटा कौन खींचेगा ? प्रतिमा का सिंदूर कौन खरोंचेगा ?

इस हाथ दे,उस हाथ ले;अहो रूपम अहो ध्वनिम और 'आजा मेरे सप्पमपाट,मैं तने चाटूं तू मने चाट' के आदान-प्रदानवादी सम्पर्कयुग में,अगर अपनी भूमिका ठीक से समझें और थोड़ी-सी वस्तुनिष्ठता बनाए रखें, तो कई बार बनती दिखती अश्लील सर्वानुमति या सर्वसहमति के माहौल में असली 'वाचडॉग'या 'पहरुए' तो अनाम ही साबित होंगे .

आनामी-बेनामी टिप्पणीमारक, अगर उनका उद्देश्य सिर्फ़ सुधारक है, तो वे आत्ममुग्धता नाम की महामारी के खिलाफ़ एक किस्म का 'वैक्सीनेशन' या टीकाकरण हैं . अब टीका लगेगा तो थोड़ा दर्द तो होगा ही . किसी-किसी को हल्का बुखार भी आ सकता है .

-- चौपटस्वामी

Anonymous said...

Ab to hum apna suicide note bhi anonymous hi likhenge sir jee.

Debate mudde par ho isliye anonymous likhate hain...aapse ya kisi se koi personal locha thode hi hai.

kai baar baat aapse sahmat hote hue hi rakhta hun lekin shayad kahne ka tareeka thoda teekha ya ajeeb lagta ho aapko.

waise main to in ya kisi bhi bahas mein ab vishwas khone laga hun. sachmuch.

अनूप शुक्ल said...

बात काफ़ी हद तक सही है। बेनामी लोग थे, हैं और रहेंगे। बात -बात पर इज्जत उतरने की बात भी छुई -मुई वाली बात है। लेकिन समस्या तब आती है जब लोग बेनामी की आड़ में अभद्र टिप्पणियां करते हैं। गाली-गलौज करते हैं।

Ek ziddi dhun said...

देखिये जहाँ तक जाति वाला मसला है, उस पर कोमेंट करने वाले पहचान ही लिए जाते हैं और छुप रहने वाले भी. संघ को भी इस मसले पर नंगा होने के बावजूद यूथ फॉर एक्वालिटी जैसे नामों की जरुरत पड़ जाती है. हमारे बुद्धिजीवी भी इस मसले पर आकर ज्यादातर अजीब बातें करने लगते हैं. फिर जो बात व्यक्तियों को लेकर टिप्पणी की है, वह महत्वपूर्ण है. मुद्दे के बजाय लोग उसे लिखने वाले को लेकर ज्यादा परेशां होते हैं.

इष्ट देव सांकृत्यायन said...

नर्सीसस वाली बात टू ठीक है. लेकिन भाई जो बात हम बेनाम होकर कह सकते हैं उसे नाम से कहने में कैसा हर्ज? और जो ख़ुद को छिपेगा वह किसी और को कुछ भी होने से बचाएगा. ख़ुद टू वो फौज के सिपाही हो जाते हैं जिसे बकौल गब्बर संघ ठाकुर ने खडी कर रखी थी. और वो वास्तव में वही होते भी हैं.

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