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Saturday, March 1, 2008

राज ठाकरे ने तो वक्त को पहचान लिया, हम कब पहचानेंगे?

प्रणव प्रियदर्शी

राज ठाकरे और राज ठाकरे जैसों का इस्तेमाल करने वाले जिस सच को समझ कर अपनी रणनीति मे जरूरी बदलाव कर रहे हैं, उस सच को हम क्यों नही पहचान पा रहे? बाल ठाकरे के समय ट्रेड यूनियनों के पास ताकत हुआ करती थी, इसीलिए उस ताकत को छिन्न-भिन्न करने की जरूरत थी. अब परिस्थिति बदल गयी है. युनियने बेकार सी हो गयी हैं. मजदूरों के लिए नयी रियायतें हासिल करना तो दूर, कठिन संघर्ष के बाद हासिल पुरानी सुविधाएं भी एक-एक कर छिनती जा रही हैं और युनियने कुछ बोलने तक की स्थिति मे नही रह गयी हैं. ऐसे मे यूनियनों की शक्तिहीनता, उनकी बेचारगी जगजाहिर है. फिर भला मरे हुए को मारने की किसी को भी क्या पडी है.

राज ठाकरे भी जानते हैं कि उस काम के लिए उन्हें कोई शाबाशी नही देगा जिसकी जरूरत ही नही है. इसीलिए उन्होने अपने लिए नया काम सोचा. उन्हें मालूम था कि सरकार और कंपनियों के पास अब नौकरियां नाम मात्र को ही हैं. लेकिन बेरोजगार युवक यह बात मानने को तैयार नही. उन्हें तो हर हाल मे नौकरी चाहिए. स्वाभाविक रूप से सरकार और कंपनियों के खिलाफ बेरोजगार लोगों का गुस्सा बढ़ता जा रहा है. सो राज ठाकरे ने इस गुस्से को दूसरी तरफ मोड़ने का काम अपने हाथ मे लिया. उन्होने सरकार और कंपनियों को नौकरिया क्रियेट करने की जिम्मेदारी से मुक्त करते हुए यह कहा कि उनकी पार्टी मराठी युवकों को खुद रोजगार देगी. फिर उत्तर भारतीयों को विभिन्न रोजगारों से बेदखल कर उनके रोजगार अपने हाथ मे ले लेने का आह्वान मराठी युवकों से किया. (देखिए पिछला पोस्ट : बाल ठाकरे से आगे बढ़ गए है राज ठाकरे)

नतीजा सामने है. सरकार और कंपनिया एक तरफ है. नौकरियों के लिए जनता आपस मे ही एक दूसरे को मार काट रही है. वही जनता जो अगर सबको नौकरी की मांग पर संयुक्त आन्दोलन छेड़ देती तो सरकार और उद्योग के कर्ता-धर्ताओं के हाथ-पाँव फूल गए होते. लेकिन भगवान् भला करे राज ठाकरे और उनकी राजनीति का, अब ये लोग चैन की सांस लेते हुए और दो-चार जगह 'सेज' के प्रस्ताव लाकर जमीन अधिग्रहण करवा सकते हैं. जनता उनके खिलाफ नही उठने वाली. वह पर प्रान्तीयों को खदेड़ने मे लगी है.

बहरहाल, बात यह हो रही थी कि यह तथ्य हम कब समझेंगे? हम जो जनता की समस्याओं को उठाने का दावा करते है, समस्याओं का विश्लेषण करते हैं. हम यह क्यों नही समझते कि मूल प्रश्न सबको बुनियादी जरूरते बिना शर्त पूरी करने की गारंटी देने का है. हर तरह के भेदभाव मिटाने का है. और यह काम 'प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व' से नही होगा. नौकरियों मे हर जाति, धर्म, लिंग, क्षेत्र, भाषा की सांकेतिक उपस्थिति या आनुपातिक उपस्थिति सुनिश्चित करने से नही होगा.

इसके लिए हर जाति, धर्म, लिंग, क्षेत्र, भाषा के वंचितों, पीडितों को एक साथ साझा लड़ाई लड़नी और जीतनी होगी.

सच है कि यह एक बेहद लम्बी लड़ाई है जो अभी ढंग से शुरू भी नही हुयी है. अभी एक तरफा हमलों का दौर है. इन हमलों से ही दूसरा पक्ष उठने, संगठित होने और लड़ने की प्रेरणा लेगा.

सवाल है कि तब तक क्या किया जाये? जवाब भी सीधा, सहज है. दूसरे पक्ष को उस लम्बी निर्णायक लड़ाई के लिए तैयार किया जाये. यह बताया जाये कि जरूरत आपसी भेदभाव भूल कर हाथ से हाथ जोड़ कर श्रृंखला बनाने मे है. यह तर्क फूहड़ है कि जब तक दुश्मन हमला नही कर देता और फौज उस लड़ाई मे नही उलझ जाती तब तक सैनिको को आपस मे ही थोडी मार-काट कर लेने दी जाये.

(अगली किस्त : कितना जरूरी है जाति का सवाल?)

1 comment:

raju said...

raj thakray ne apni upasthiti darj karane ki kosis matra ki hai.ab dondo ore se rajnitik rotiya seki jayengi.lekin ye public hai ye sa janti raj bhi bhi kuch dino ka mehman hai.

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