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Thursday, March 20, 2008

थैक यू, मिस तस्लीमा, नाउ स्माइल प्लीज!

- दिलीप मंडल

अच्छा किया, तुम भारत से दफा हो गई। हम वसुधैव कुटुंबकम वाले हैं। क्या अपना-क्या पराया। भारत में रहो या स्वीडेन में। एक ही तो बात है। चलो अच्छा हुआ एक मुसीबत टली। वाममोर्चा की ओर से तुम्हें खास तौर पर धन्यवाद। तुम्हारा कोलकाता में होना हमें शर्मिंदा कर रहा था। तुम्हारा भारत में होना हमारे लिए मुसीबत बन गया था।

तस्लीमा तुम जानती ही हो। इस बूढ़े रजिंदर सच्चर ने ऐसी रिपोर्ट दे दी है कि हमारी मुसीबत हो गई है। हमारी सरकार ने सच्चर को सूचना दी कि पश्चिम बंगाल में 25 फीसदी मुसलमान हैं और राज्य सरकार की नौकरियों में उनकी संख्या 2.1 फीसदी है। सच्चर ने ये रिपोर्ट छाप दी तो हमारे राज्य में मुसलमान नौकरी मांगने लगे। नंदीग्राम में भी तो ज्यादातर मुसलमान बर्गादार हैं। वो जमीन का ऊंचा मुआवजा मांगने लगे। ये भी कोई बात है। हम उन्हें सुरक्षा दे रहे हैं। उन्हें दंगों से होने वाली मौत से आजादी दिला दी। अब वो भूख से होने वाली मौत से आजादी चाहते हैं। ये भी कोई बात है।

तस्लीमा तुम तो जानती ही हो कि हम मुसलमानों को नौकरियां नहीं दे सकते। लेकिन उन्हें कुछ तो देना ही था। पंचायत चुनाव सिर पर हैं। मुसलमानों को ट्रॉफी के तौर पर हमने तुम्हारा राज्य निकाला और फिर देश निकाला दे दिया। वो भी खुश, हम भी खुश। उनका मजहब बच गया, हमारी राजनीति बच गई।

तस्लीमा तुम भी हंसो ना। स्माइल प्लीज।

4 comments:

हिन्दु चेतना said...

मुस्लिम तुष्टीकरण के बीज से पैदा नेता और दलाली के पैसा से जन्में मानवाधिकार संघठन इस देश का भला कभी नही कर सकते।

दिलीप मंडल said...

हिंदू चेतना जी, तस्लीमा और एम एफ हुसैन को आप भी कहां झेल पाते हैं। तुष्टीकरण कितना हुआ है, ये तो सच्चर साहब बता ही रहे है। देश के संसाधनों में सबसे कम हिस्सेदारी पाने वाले समुदाय का तुष्टीकरण कौन कर रहा है? भारत माता की एक संतान कुछ ज्यादा दुबली क्यों दिखे। मां तो कमजोर बच्चे का ज्यादा ध्यान रखती है। आपके घर की छत में कुछ ज्यादा ही सुराख नजर आ रहे हैं मुझे।

गुस्ताख़ said...

दिलीप जी, क्या तसलीमा धर्मनिरपेक्षता की अलंबरदार या प्रतीक महिला हैं?

AP said...

भाई, बड़ी बढ़िया बात कही है आपने. इस देश मैं तसलीमा जैसों के लिए आब जगह नहीं बची. लेफ्ट - राइट जैसे कोई भी विचार धारा आब बची नहीं है. शुकर है के कैफी साहब जैसे लोग नहीं रहे नहीं टू क्या पता कैफी साहब को भी कहाँ कहाँ भटकना पड़ता. अब साहित्यकारों का भी मज़हब होना शुर हो गया है.......अल्ल्लाह ( अगर कहीं है) ही मालिक है.....और हद तो यह है की किसी को कोई दर्द नहीं है... प्रिन्स गड्ढे मैं गिर गया तो सारे हिंदुस्तान मी तहेल्का मच गया, शेरों को बचाने के लिए टी.व. चैनल मुहीम चला रहे हैं....इंसान के कोई क़द्र नहीं है..तसलीमा कैसे गयीं.....कहाँ गयीं...किसी ने उफ़ नहीं की.
आओ मिल कर हिन्दुस्तानिओं की मरी हुए संवेदनहीनता के लिए फातिहा पढ़ें......

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