डॉक्टर एस डी नैय्यर
([डॉक्टर नैय्यर आर्मी के रिटायर्ड कर्नल हैं। वह अस्थमा एसोसियेशन के प्रेजिडेंट भी रह चुके हैं। दिल्ली के मॉडर्न स्कूल में पिछले दिनों हुयी एक छात्रा आकृति भाटिया की मौत पर वे बहुत बेचैन हैं। उनका कहना है की एक तो सही जानकारी की कमी एक मासूम जिंदगी को लील गयी दूसरे इस मामले पर जो हंगामा मचा है उससे सही जानकारी फैलाने में कोई मदद नही मिल रही उल्टे लोग और गुमराह हो रहे हैं। पेश है डॉक्टर नैय्यर की बेचैनी से उपजी यह पोस्ट।)
दिल्ली के एक स्कूल में पिछले दिनों हुयी एक छात्रा आकृति की मौत पर काफी हंगामा हुआ है। मैं इस मामले में छपी khabaren dekhataa rahaa hoon । कहने की जरूरत नही कि १७ साल की इस बच्ची की मौत सचमुच दुखद है। पैरेंट्स की तकलीफ समझ में आती है। जो बात समझ में नही आती वह है स्कूल और प्रिंसिपल के ख़िलाफ़ मचाया जा रहा हंगामा। ख़ास तौर पर इसलिए कि कम से कम इस मामले में स्कूल - प्रिंसिपल और टीचर्स - की कोई गलती नही है।
आकृति दमे की मरीज थी। वर्षों से उसे यह बीमारी थी और मौत के कुछ ही दिन पहले अस्पताल में भर्ती भी की गयी थी। साफ़ है कि पैरेंट्स इस बीमारी से जुड़े मानसिक - भावनात्मक पहलुओं की अहमियत पूरी तरह नही समझ पाये। वरना शायद use उस हालत में स्कूल नही भेजते। दिल्ली में बच्चो के बीच कम्पीटीशन का भाव बहुत तगडा होता है। पैरेंट्स को चाहिए था कि वे टीचर्स को आकृति की स्थिति के बारे में पहले से बताते और एहतियाती kउठाते बजाय इसके बाद में स्कूल पर दोष मढें।
दमे के मरीजो को इन्हेलर लेने की सलाह देना आम है। इसका इस्तेमाल भी आम है। मेरा अपना जो अनुभव है इतने वर्षों का, उसमे मैंने देखा है की इनहेलर ke jyada उपयोग के साईड इफेक्ट के बारे में शायद ही किसी mareej को बताया jata है। amooman वे इस बारे me अंधेरे me ही रहते हैं।
जैसा कि आकृति के मामले में हुआ जब किसी मरीज को दमे का दौरा आता है तब मरीज अटैक को रोकने के लिए लगातार इन्हेलर का इस्तेमाल करता है। साँस लेने में परेशानी, चिंता घबराहट और दूसरे लक्षण बढ़ जाते हैं।
साँस ले रहे फेफडे की सतह पर एक परत जम जाती है और गैसों का आदान-प्रदान रुक जाता है। कार्बन डाईऔक्साइड जमा हो जाता है मरीज का दम घुट जाता है, आकृति की पोस्ट मार्टम रिपोर्ट से भी इसकी पुष्टि होती है। मुझे पता नही इस बच्ची को इन्हेलर के लगातार इस्तेमाल के साइड इफेक्ट के बारे में आगाह किया गया था या नही।
ऐसे मामले से निपटना डॉक्टरों के लिए भी मुश्किल होता है। फ़िर तीचेर्स और प्रिंसिपल से क्या अपेक्षा रखी जाए? जरूरत है इन्हेलर इस्तेमाल करने वालों के बीच जागरूकता लाई जाए। खासकर बच्चों के मामले में उनके पैरेंट्स को समय रहते इसके ज्यादा इस्तेमाल के खतरे बताये जाएँ। स्कूल और प्रिंसिपल पर दोष मढ़ना - कम से कम इस मामले में उचित नही।
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Wednesday, May 6, 2009
Saturday, April 25, 2009
गर पैसा सचमुच भगवान बन जाए!
दिवाकर मोहनी
(उम्र के आठवें दशक में भी दिवाकर मोहनी इतने सक्रिय हैं कि युवा शरमा जाएँ। नागपुर से प्रकाशित सम्मानित पत्रिका 'सुधारक' के सम्पादक मोहनी जनपक्षधरता एवं प्रामाणिकता के साथ ही मार्क्सवाद से अपनी असहमतियों के लिए भी जाने जाते हैं। हालांकि समतावादी मूल्यों में अपनी दृढ़ आस्था का उद्घोष करने में वह कभी पीछे नही रहे। बहरहाल, उनका यह लेख मासिक पत्रिका 'कम्यूनिज्म' के ताजा अंक से लिया गया है।)
हम अक्सर सुनते आए हैं, 'पैसा भगवान् है।' हालांकि भगवान् दीखता नही और कभी किसी काम से हमें रोकने या हमसे कोई काम करवाने सामने भी नही आता। जैसा कि वैज्ञानिक सोच बताती है और बहुत सारे लोग इस तथ्य को जानते, स्वीकारते और कहते भी हैं कि ईश्वर या भगवान् कुछ नही होता। वह सिर्फ़ कुछ लोगों की कल्पना है। अगर किसी दिन दुनिया के सारे आस्तिक मान लें कि ईश्वर नही है तो उस दिन क्या होगा?
कुछ नही होगा, सिवाय इसके कि मंदिरों में घंटियाँ नही बजेंगी, मस्जिदों से अजान सुनाई नही देगी और गिरजाघरों में मोमबत्तियां नही जलेंगी। सूरज उस दिन भी पूरब में ही उगेगा और शाम को वह डूब भी जायेगा पश्चिम में। क्योंकि ईश्वर तो आता नही कभी कुछ करने। सब कुछ करते तो इंसान और अन्य जीव जंतु ही हैं। सिर्फ़ श्रेय सारा भगवान् को देने की हमने आदत बना ली है।
अब इसी कल्पना को पैसे पर लागू करें। यानी एक दिन पैसा सचमुच ईश्वर बन जाए और परिदृश्य से गायब हो जाए तो? उस दिन क्या होगा? हम घर से अनाज खरीदने निकलें, दूकान पहुँचने पर पता चले पैसे की जरूरत ही नही, अनाज यूँ ही मिल रहा है बिना पैसो के। हम क्या करेंगे?
हमें जरूरत १० किलो चावल की है तो क्या हम ५० किलो चावल खरीद लेंगे? वैसे खरीदना कैसा, जब पैसों का लेंन - देन ही न हो? तो क्या हम १० किलो के बदले ५० किलो चावल घर ले आयेंगे? जरूर ले आना चाहेंगे अगर हमें यह बताया गया हो कि सिर्फ़ आज भर या या दो दिन या एक हफ्ते के लिए ही बिन पैसों के चावल मिल रहा है। अगर हमें यह अच्छी तरह पता हो कि नयी व्यवस्था हमेश के लिए है और जिसे जब जी चाहे जितना भी चावल ले जा सकता है बिना पैसा दिए तो हम उतना ही चावल लायेंगे, जितना हमारे घर में खप जायेगा।
ज्यादा लाकर हम करेंगे क्या? किसी को बेच तो सकते नही। और कोई मुफ्त में भी हमसे लेकर क्यो हमारा एहसानमंद होना चाहेगा? वह सीधे स्टोर से ही लेगा।
दूकानदार की अपनी ज़रूरतें हैं। वह स्कूल जायेगा अपने बच्चे के दाखिले के लिए। पता चला किसी तरह का फॉर्म नही, कोई अड्मिशन फी नही। कोई डोनेशन नही। बस नाम-पता लिखवाइए और बच्चे को स्कूल भेजना शुरू कर दीजिये।
स्कूल टीचर को भी तो पैसों की जरूरत पड़ती है। पता चला उसकी माँ बीमार है। शिक्षक महोदय अस्पताल पहुंचे तो मालूम पड़ा माँ की किडनी में पत्थर है। लेकिन चिंता की कोई बात नही। अस्पताल में कमरा नंबर बिस्तर नंबर निर्धारित कर माँ को भर्ती कर लिया जाता है। न भर्ती का पैसा, न डोक्टर की फीस, न दवाओं की कीमत।
अब तक मैं और आप कल्पना के घोडे पर सवार थे। लेकिन कहीं कोई अड़चन नही आयी। काम तो हम सब ही करते हैं एक दूसरे का, सिर्फ़ भरोसा एक दूसरे पर न करके कागज़ के टुकड़े पर करते हैं।
मैं यह बात जोर देकर कहना चाहता हूँ की यह निरी कल्पना नही है। पैसा रहित व्यवस्था आज भी शुरू हो सकती है, इसी क्षण हो सकती है।
आज जो चावल - दाल की दुकाने हैं वे एक झटके में वितरण केन्द्र बन जायेंगी, जो पढाई की दुकाने हैं यानी स्कूल - कॉलेज, वे सचमुच के विद्या केन्द्र बन जायेंगे और जो लोगों की ज़िन्दगी का सौदा करने वाली दुकाने यानि अस्पताल हैं, स्वास्थ्य केन्द्र बन जायेंगे।
इस कल्पना को अमल में लाने के लिए सरकार को सिर्फ़ एक निर्णायक कदम उठाना होगा। उसे देश के १०० करोड़ लोगो (यानी समूची आबादी) के नाम एक-एक क्रेडिट कार्ड जारी करना होगा। वह कार्ड इस बात की गारंटी होगा की हर व्यक्ति की छः प्राथमिक जरूरतें (भोजन, वस्त्र, आवास, शिक्षा, स्वास्थय और यातायात) बिना शर्त पूरी होंगी।
यकीन मानिए इससे सरकार पर कोई अतिरिक्त बोझ नही पड़ेगा। ये सारी जरूरतें हम आज भी पूरी करते ही हैं चाहे पैसों के बदले ही सही। उस समय भी हम सब मिल कर एक दूसरे की ये प्राथमिक जरूरतें पूरी e कर लिया करेंगे । फर्क सिर्फ़ यह होगा की उस समय सबकी जरूरतें पूरी होने की गारंटी भी रहा करेगी।
और सोचिये कैसी-कैसी भीषण बीमारियां मानव समाज को छोड़ कर चली जायेंगी। जातिवादी भेदभाव तत्काल ख़त्म हो जायेंगे क्योंकि एक पक्ष की अन्यायपूर्ण बातें सहन करते रहने की कोई मजबूरी दूसरे पक्ष की नही रह जायेगी। युवाओं के सामने रोजी - रोटी जुटाने की कोई समस्या नही रह जायेगी। वे अपनी योग्यता और रूचि के मुताबिक कोई भी काम चुनने को स्वतंत्र रहेंगे। काम तो रहेगा, लेकिन नौकरी नही रह जायेगी।
सबसे बड़ा सवाल इस स्थिति के मद्देनज़र यह उठाया जाता है की ऐसी काल्पनिक स्थिति अगर वास्तव में उत्पन्न हुयी तो लोग काम करना ही छोड़ देंगे। अगर 'अनुपस्थिति' दर्ज होने और वेतन कटने का डर न हो
तो लोग समय से दफ्तर पहुंचेंगे ही क्यों? फ़िर अगर सबको क्रेडिट कार्ड मिल ही जाएगा तो उन्हें दफ्तर में काम करने की जरूरत ही क्या रह जायेगी? और अगर जरूरत न रही तो वे दस फीसदी काम भी वरिष्ठों पर एहसान के ही रूप में करेंगे। ऐसे में दफ्तरों में anushaasan कैसे रह पायेगा?
जवाब देने से पहले यह साफ़ करना बेहतर रहेगा की ये सवाल मौजूदा व्यवस्था द्वारा निर्मित मानसिकता से उपजे हैं। नयी व्यवस्था नयी मानसिकता को भी जन्म देगी और उस मानसिकता में न ऐसे सवालों की गुंजाइश रहेगी न उनका जवाब देने की मजबूरी। मगर, वह नयी मानसिकता जब बनेगी तब बनेगी। आज तो अज की ही मानसिकता है। इसीलिये आज हमें इन सवालों के जवाब देने ही होंगे।
आज की मानसिकता हमें बताती है की मनुष्य या तो लालच से निर्देशित होता है या फ़िर डर से। मौजूदा व्यवस्था के पास यही दो डंडे हैं जिनसे पूरे मानव समाज को हांका जा रहा है। आप ज्यादा और अच्छा काम करेंगे तो वेतन वृद्धि, प्रमोशन, ऐशो - अच्छा काम नही किया तो ट्रान्सफर, डिमोशन, बर्खास्तगी आदि। बस लालच और डर। मगर इस मानसिकता से निकल कर देखें तो लालच और डर में मनुष्य का सर्वोत्तम निकालने की क्षमता नही है। मनुष्य से उसका सर्वोत्तम निकालने की ताकत है प्रेरणा में। सच है की सरकार का क्रेडिट कार्ड मिल जाने के बाद व्यक्ति मजबूरीवश काम नही करेगा। तब वह अपनी प्रेरणा से अपने मन के अनुरूप काम करेगा।
आज एक कवि ह्रदय व्यक्ति हो सकता है पुलिस कांस्टेबल के रूप में ड्यूटी बजाने को मजबूर हो। इसी प्रकार एक संगीतकार बतौर क्लर्क अकाउन्ट्स के काम में सर खपाने को मजबूर हो सकता है।
मगर तब एक कवि अपना पूरा समय बेहतरीन कविता लिखने में दे सकेगा। एक संगीतकार बिना किसी डर, असुरक्षा और परेशानी के सर्वोत्कृष्ट धुनें तैयार करने में लग सकेगा। जज, डॉक्टर और मजदूर सबको एक जैसा ही क्रेडिट कार्ड मिलेगा। इसलिए लोग 'ज्यादा पैसा' के लोभ में पेशा नही चुनेंगे। जिसकी जैसी रूचि और क्षमता होगी वैसा ही कम वे अपने लिए चुनेंगे।
केन्द्र सरकार को चाहिए की वह हर भारतीय के नाम एक क्रेडिट कार्ड अविलम्ब जारी करे। यह कार्ड इस बात की गारंटी हो की sambaddh व्यक्ति की सभी प्राथमिक जरूरतें सहजता से पूरी होंगी। कार्ड में इस बात का उल्लेख उसी प्रकार हो सकता है जैसे रुपये में होता है, यानी 'मैं धारक को भोजन, वस्त्र, आवास, शिक्षा, स्वस्थ्य और यातायात संबन्धी उसकी सभी आवश्यकताएं निःशुल्क और बिना किसी शर्त पूरी करने का वचन देता हूँ।'
ऐसा क्रेडिट कार्ड जारी किया जाए और तत्काल जारी किया जाए। यह प्रस्ताव मैं पूरी गंभीरता से समाज के सामने रखता हूँ और चाहता हूँ की समाज इसे एक मांग के रूप में सरकार के सामने रखे। इस मांग को जितना अधिक समर्थन मिलेगा सरकार के लिए इसे गंभीरता से लेने की जरूरत भी उतनी ही तेजी से स्पष्ट होगी।
(उम्र के आठवें दशक में भी दिवाकर मोहनी इतने सक्रिय हैं कि युवा शरमा जाएँ। नागपुर से प्रकाशित सम्मानित पत्रिका 'सुधारक' के सम्पादक मोहनी जनपक्षधरता एवं प्रामाणिकता के साथ ही मार्क्सवाद से अपनी असहमतियों के लिए भी जाने जाते हैं। हालांकि समतावादी मूल्यों में अपनी दृढ़ आस्था का उद्घोष करने में वह कभी पीछे नही रहे। बहरहाल, उनका यह लेख मासिक पत्रिका 'कम्यूनिज्म' के ताजा अंक से लिया गया है।)
हम अक्सर सुनते आए हैं, 'पैसा भगवान् है।' हालांकि भगवान् दीखता नही और कभी किसी काम से हमें रोकने या हमसे कोई काम करवाने सामने भी नही आता। जैसा कि वैज्ञानिक सोच बताती है और बहुत सारे लोग इस तथ्य को जानते, स्वीकारते और कहते भी हैं कि ईश्वर या भगवान् कुछ नही होता। वह सिर्फ़ कुछ लोगों की कल्पना है। अगर किसी दिन दुनिया के सारे आस्तिक मान लें कि ईश्वर नही है तो उस दिन क्या होगा?
कुछ नही होगा, सिवाय इसके कि मंदिरों में घंटियाँ नही बजेंगी, मस्जिदों से अजान सुनाई नही देगी और गिरजाघरों में मोमबत्तियां नही जलेंगी। सूरज उस दिन भी पूरब में ही उगेगा और शाम को वह डूब भी जायेगा पश्चिम में। क्योंकि ईश्वर तो आता नही कभी कुछ करने। सब कुछ करते तो इंसान और अन्य जीव जंतु ही हैं। सिर्फ़ श्रेय सारा भगवान् को देने की हमने आदत बना ली है।
अब इसी कल्पना को पैसे पर लागू करें। यानी एक दिन पैसा सचमुच ईश्वर बन जाए और परिदृश्य से गायब हो जाए तो? उस दिन क्या होगा? हम घर से अनाज खरीदने निकलें, दूकान पहुँचने पर पता चले पैसे की जरूरत ही नही, अनाज यूँ ही मिल रहा है बिना पैसो के। हम क्या करेंगे?
हमें जरूरत १० किलो चावल की है तो क्या हम ५० किलो चावल खरीद लेंगे? वैसे खरीदना कैसा, जब पैसों का लेंन - देन ही न हो? तो क्या हम १० किलो के बदले ५० किलो चावल घर ले आयेंगे? जरूर ले आना चाहेंगे अगर हमें यह बताया गया हो कि सिर्फ़ आज भर या या दो दिन या एक हफ्ते के लिए ही बिन पैसों के चावल मिल रहा है। अगर हमें यह अच्छी तरह पता हो कि नयी व्यवस्था हमेश के लिए है और जिसे जब जी चाहे जितना भी चावल ले जा सकता है बिना पैसा दिए तो हम उतना ही चावल लायेंगे, जितना हमारे घर में खप जायेगा।
ज्यादा लाकर हम करेंगे क्या? किसी को बेच तो सकते नही। और कोई मुफ्त में भी हमसे लेकर क्यो हमारा एहसानमंद होना चाहेगा? वह सीधे स्टोर से ही लेगा।
दूकानदार की अपनी ज़रूरतें हैं। वह स्कूल जायेगा अपने बच्चे के दाखिले के लिए। पता चला किसी तरह का फॉर्म नही, कोई अड्मिशन फी नही। कोई डोनेशन नही। बस नाम-पता लिखवाइए और बच्चे को स्कूल भेजना शुरू कर दीजिये।
स्कूल टीचर को भी तो पैसों की जरूरत पड़ती है। पता चला उसकी माँ बीमार है। शिक्षक महोदय अस्पताल पहुंचे तो मालूम पड़ा माँ की किडनी में पत्थर है। लेकिन चिंता की कोई बात नही। अस्पताल में कमरा नंबर बिस्तर नंबर निर्धारित कर माँ को भर्ती कर लिया जाता है। न भर्ती का पैसा, न डोक्टर की फीस, न दवाओं की कीमत।
अब तक मैं और आप कल्पना के घोडे पर सवार थे। लेकिन कहीं कोई अड़चन नही आयी। काम तो हम सब ही करते हैं एक दूसरे का, सिर्फ़ भरोसा एक दूसरे पर न करके कागज़ के टुकड़े पर करते हैं।
मैं यह बात जोर देकर कहना चाहता हूँ की यह निरी कल्पना नही है। पैसा रहित व्यवस्था आज भी शुरू हो सकती है, इसी क्षण हो सकती है।
आज जो चावल - दाल की दुकाने हैं वे एक झटके में वितरण केन्द्र बन जायेंगी, जो पढाई की दुकाने हैं यानी स्कूल - कॉलेज, वे सचमुच के विद्या केन्द्र बन जायेंगे और जो लोगों की ज़िन्दगी का सौदा करने वाली दुकाने यानि अस्पताल हैं, स्वास्थ्य केन्द्र बन जायेंगे।
इस कल्पना को अमल में लाने के लिए सरकार को सिर्फ़ एक निर्णायक कदम उठाना होगा। उसे देश के १०० करोड़ लोगो (यानी समूची आबादी) के नाम एक-एक क्रेडिट कार्ड जारी करना होगा। वह कार्ड इस बात की गारंटी होगा की हर व्यक्ति की छः प्राथमिक जरूरतें (भोजन, वस्त्र, आवास, शिक्षा, स्वास्थय और यातायात) बिना शर्त पूरी होंगी।
यकीन मानिए इससे सरकार पर कोई अतिरिक्त बोझ नही पड़ेगा। ये सारी जरूरतें हम आज भी पूरी करते ही हैं चाहे पैसों के बदले ही सही। उस समय भी हम सब मिल कर एक दूसरे की ये प्राथमिक जरूरतें पूरी e कर लिया करेंगे । फर्क सिर्फ़ यह होगा की उस समय सबकी जरूरतें पूरी होने की गारंटी भी रहा करेगी।
और सोचिये कैसी-कैसी भीषण बीमारियां मानव समाज को छोड़ कर चली जायेंगी। जातिवादी भेदभाव तत्काल ख़त्म हो जायेंगे क्योंकि एक पक्ष की अन्यायपूर्ण बातें सहन करते रहने की कोई मजबूरी दूसरे पक्ष की नही रह जायेगी। युवाओं के सामने रोजी - रोटी जुटाने की कोई समस्या नही रह जायेगी। वे अपनी योग्यता और रूचि के मुताबिक कोई भी काम चुनने को स्वतंत्र रहेंगे। काम तो रहेगा, लेकिन नौकरी नही रह जायेगी।
सबसे बड़ा सवाल इस स्थिति के मद्देनज़र यह उठाया जाता है की ऐसी काल्पनिक स्थिति अगर वास्तव में उत्पन्न हुयी तो लोग काम करना ही छोड़ देंगे। अगर 'अनुपस्थिति' दर्ज होने और वेतन कटने का डर न हो
तो लोग समय से दफ्तर पहुंचेंगे ही क्यों? फ़िर अगर सबको क्रेडिट कार्ड मिल ही जाएगा तो उन्हें दफ्तर में काम करने की जरूरत ही क्या रह जायेगी? और अगर जरूरत न रही तो वे दस फीसदी काम भी वरिष्ठों पर एहसान के ही रूप में करेंगे। ऐसे में दफ्तरों में anushaasan कैसे रह पायेगा?
जवाब देने से पहले यह साफ़ करना बेहतर रहेगा की ये सवाल मौजूदा व्यवस्था द्वारा निर्मित मानसिकता से उपजे हैं। नयी व्यवस्था नयी मानसिकता को भी जन्म देगी और उस मानसिकता में न ऐसे सवालों की गुंजाइश रहेगी न उनका जवाब देने की मजबूरी। मगर, वह नयी मानसिकता जब बनेगी तब बनेगी। आज तो अज की ही मानसिकता है। इसीलिये आज हमें इन सवालों के जवाब देने ही होंगे।
आज की मानसिकता हमें बताती है की मनुष्य या तो लालच से निर्देशित होता है या फ़िर डर से। मौजूदा व्यवस्था के पास यही दो डंडे हैं जिनसे पूरे मानव समाज को हांका जा रहा है। आप ज्यादा और अच्छा काम करेंगे तो वेतन वृद्धि, प्रमोशन, ऐशो - अच्छा काम नही किया तो ट्रान्सफर, डिमोशन, बर्खास्तगी आदि। बस लालच और डर। मगर इस मानसिकता से निकल कर देखें तो लालच और डर में मनुष्य का सर्वोत्तम निकालने की क्षमता नही है। मनुष्य से उसका सर्वोत्तम निकालने की ताकत है प्रेरणा में। सच है की सरकार का क्रेडिट कार्ड मिल जाने के बाद व्यक्ति मजबूरीवश काम नही करेगा। तब वह अपनी प्रेरणा से अपने मन के अनुरूप काम करेगा।
आज एक कवि ह्रदय व्यक्ति हो सकता है पुलिस कांस्टेबल के रूप में ड्यूटी बजाने को मजबूर हो। इसी प्रकार एक संगीतकार बतौर क्लर्क अकाउन्ट्स के काम में सर खपाने को मजबूर हो सकता है।
मगर तब एक कवि अपना पूरा समय बेहतरीन कविता लिखने में दे सकेगा। एक संगीतकार बिना किसी डर, असुरक्षा और परेशानी के सर्वोत्कृष्ट धुनें तैयार करने में लग सकेगा। जज, डॉक्टर और मजदूर सबको एक जैसा ही क्रेडिट कार्ड मिलेगा। इसलिए लोग 'ज्यादा पैसा' के लोभ में पेशा नही चुनेंगे। जिसकी जैसी रूचि और क्षमता होगी वैसा ही कम वे अपने लिए चुनेंगे।
केन्द्र सरकार को चाहिए की वह हर भारतीय के नाम एक क्रेडिट कार्ड अविलम्ब जारी करे। यह कार्ड इस बात की गारंटी हो की sambaddh व्यक्ति की सभी प्राथमिक जरूरतें सहजता से पूरी होंगी। कार्ड में इस बात का उल्लेख उसी प्रकार हो सकता है जैसे रुपये में होता है, यानी 'मैं धारक को भोजन, वस्त्र, आवास, शिक्षा, स्वस्थ्य और यातायात संबन्धी उसकी सभी आवश्यकताएं निःशुल्क और बिना किसी शर्त पूरी करने का वचन देता हूँ।'
ऐसा क्रेडिट कार्ड जारी किया जाए और तत्काल जारी किया जाए। यह प्रस्ताव मैं पूरी गंभीरता से समाज के सामने रखता हूँ और चाहता हूँ की समाज इसे एक मांग के रूप में सरकार के सामने रखे। इस मांग को जितना अधिक समर्थन मिलेगा सरकार के लिए इसे गंभीरता से लेने की जरूरत भी उतनी ही तेजी से स्पष्ट होगी।
Friday, April 24, 2009
सूरज को सज़ा दोगे?
विवेक आसरी
(युवा संवेदनशील कवि और पत्रकार विवेक नवभारत टाइम्स डॉट कॉम से जुड़े हैं। अपने ब्लॉग सुना आपने पर भी विवेक खासे सक्रिय रहते हैं। रिजेक्ट माल पर यह उनकी पहली प्रस्तुति है। )
अंधेरा रात के बलात्कार में बिजी है
और सुबह की उम्मीद
बेड के पास पड़ी
सिसक रही है
ख्वाबों के पांव तले की ज़मीन
धीरे-धीरे खिसक रही है
रूह खौल रही है
गुजरते वक्त की तेज होती आंच पर।
किसका बस है !!!
कभी-कभी लगता है
उम्मीद एक फालतू शब्द है
हर रात के बाद दिन होगा
इस तसल्ली से मुझे चिढ़ होती है
मुझसे किसने पूछा था
सुबह और शाम बनाते वक़्त।
न मेरी सहमति ली गयी
रात को अंधेरे में छिपाते वक़्त।
तो रोशनी के लिए
मैं क्यों सहर तलक इंतज़ार करूँ ?
गर रोशनी से पहले
मौत आ गई… उम्मीद को
तो क्या सूरज को सज़ा दोगे?
(युवा संवेदनशील कवि और पत्रकार विवेक नवभारत टाइम्स डॉट कॉम से जुड़े हैं। अपने ब्लॉग सुना आपने पर भी विवेक खासे सक्रिय रहते हैं। रिजेक्ट माल पर यह उनकी पहली प्रस्तुति है। )
अंधेरा रात के बलात्कार में बिजी है
और सुबह की उम्मीद
बेड के पास पड़ी
सिसक रही है
ख्वाबों के पांव तले की ज़मीन
धीरे-धीरे खिसक रही है
रूह खौल रही है
गुजरते वक्त की तेज होती आंच पर।
किसका बस है !!!
कभी-कभी लगता है
उम्मीद एक फालतू शब्द है
हर रात के बाद दिन होगा
इस तसल्ली से मुझे चिढ़ होती है
मुझसे किसने पूछा था
सुबह और शाम बनाते वक़्त।
न मेरी सहमति ली गयी
रात को अंधेरे में छिपाते वक़्त।
तो रोशनी के लिए
मैं क्यों सहर तलक इंतज़ार करूँ ?
गर रोशनी से पहले
मौत आ गई… उम्मीद को
तो क्या सूरज को सज़ा दोगे?
Sunday, April 19, 2009
लोकसभा चुनाव के प्रत्याशियों से ग्यारह सवाल
साथियो, देश में लोकसभा चुनाव की प्रक्रिया चल रही है। तमाम दलीय और निर्दलीय प्रत्याशी हमारे सामने यानी इस देश की जनता के सामने अपने मुद्दों को जनता का मुद्दा बताते हुए रख रहे हैं। ऐसे में 'देश की मेहनतकश आबादी के जन राजनीतिक संगठन' ऑल इंडिया वर्कर्स कौंसिल की पहल पर गठित भारतीय जन्संसाद ने जनता के कुछ आधारभूत मुद्दों को प्रत्याशियों के सामने रखने का सराहनीय प्रयास किया है। यह प्रयास भारतीय जन संसद के इस पत्रक में दीखता है जिसे हम यहाँ आप सबके साथ साझा कर रहे हैं।
महोदय,
देश की सर्वोच्च पंचायत - संसद - में हमारा प्रतिनिधित्व करने का जनादेश प्राप्त करने के लिए आप हमारे क्षेत्र में पधारे, इसके लिए हम आपके शुक्रगुजार हैं। जनसेवा के सम्बन्ध में हमें आप/ आपके दल की नीयत पर कोई संदेह नही है। फ़िर भी, विगत साठ वर्षों का अनुभव यही दर्शाता है किदेश के जनसेवक विभिन्न प्रश्नों पर हमारे हितों की पैरवी करने के बजाय शोषक - शासक वर्ग की सेवा में ही लीन रहे हैं।
इस सन्दर्भ में केवल एक ही तथ्य की तरफ़ संकेत कर देना काफ़ी होगा कि जन समस्याओं के समाधान के तमाम वादों और दावों के बावजूद आजादी के वक्त देश कि जो कुल आबादी थी लगभग उतने लोग आज गरीबी की रेखा के नीचे कीडो-मकोडों जैसा जीवन व्यतीत कर रहे हैं। देश के विकास के नाम पर एक तरफ़ अरबपतियों-खरबपतियों की संख्या में तीव्र बढोतरी हो रही है तो दूसरी तरफ़ लगभग ८० प्रतिशत जनता औसतन मात्र २० रुपये रोजाना की कमाई पर अमानुषिक जीवन जीने को विवश हैं।
ऐसे में इस चुनाव के मौके पर देश का जन साधारण अपनी आम समस्याओं के समाधान हेतु कोछ ठोस सवाल उठा कर जानना चाहता है कि इस सम्बन्ध में आप/आपके दल की योजना क्या है? इस बाबत हम अपने अब तक के अनुभवों के मद्देनज़र आपके किन्हीं वादों और घोषनाओं पर भरोसा करने के बजाय आपकी व्यवस्थित योजना के ठोसपन और उसकी सार्थकता पर विचार-विमर्श करके तदनुसार मतदान करने का निर्णय लेंगे।
सवाल
१, देश में लोकतंत्र की उम्र बढ़ने के साठ-साठ आम आदमी पर महंगाई, बेरोज़गारी तथा बहुआयामी भ्रष्टाचार का शिकंजा लगातार कसता गया है। समय-समय पर सत्ता पक्ष और विपक्ष के नेताओं ने बार-बार इसका रोना रोया है, लेकिन इसे समाप्त करने की दिशा में निर्णायक कदम कभी नही उठाया गया। इसे समाप्त करने के लिए एपी/आपके दल की क्या योजना है?
२, देश की बहुसंख्या आबादी आजीविका के परम्परागत निजी साधनों से वंचित होकर मजदूर बन चुकी है। और उसकी श्रम शक्ति की बिक्री न हो पाने तथा परिवार के समुचित भरण-पोषण लायक मजदूरी न मिल पाने के कारण उसकी जीवन दशाएं लगातार बाद से बदतर होती जा रही हैं। इस देशव्यापी आम सस्मस्य के निराकरण के लिए आप/आपके दल की क्या योजना है?
३, अर्थतंत्र के असंगठित क्षेत्र में अस्थायी, दिहाडी तथा ठेका मजदूरों की भरतो है ही, न्हारत sarkaar की नयी आर्थिक नीति के तहत अब संगठित क्षेत्र में भी विभिन्न तरीकों से स्थायी मजदूरों को हटा कर उनकी जगह अस्थायी, दिहाडी तथा ठेका मजदूरों से काम लिया जाने लगा है जिनकी तादाद विभिन्न उद्यमों में कार्यरत स्थायी मजदूरों के लगभग बराबर हो गयी है। विदित है इन तमाम अस्थायी, दिहाडी तथा ठेका मजदूरों को श्रम कानूनों द्वारा प्रदत्त सामान्य सुविधाएं तो उपलब्ध हैं ही नही, अब समान काम के लिए असमान वेतन की एक नयी विसंगति भी पैदा कर दी गयी है। इस सम्बन्ध में एपी/आपके दल की योजना क्या है?
४, देश के ग्रामीण क्षेत्र में आधे से भी ज्यादा परिवार भूमिहीन हो चुके हैं या अत्यल्प या अलाभकारी जोत पर निर्भरशील हैं। कंगाली की जिंदगी जी रहे इन लोगों को वर्ष में औसतन १३० दिन भी काम नही मिल पाटा। इनके जीवन दशाओं में अपेक्षित सुधार के लिए आप/आपके दल की योजना क्या है?
५, देश के किसानो की भारी संख्या कर्ज तथा सूखोरी के चंगुल में फंस चुकी है। विगत कुछ वर्षों के दौरान इसमें से लाखो किसान आत्महत्या कर चुके हैं और यह सिलसिला अब भी जारी है। इन किसानो की मुक्ति के लिए आप /आपके दल की योजना क्या है?
६, खुदरा व्यापार के क्षेत्र में बड़ी-बड़ी कंपनियों के प्रवेश के चलते देश के करोडो छोटे दुकानदारों की रोजी-रोटी पर खतरे के बादल मंडरा रहे हैं। इन्हें संकट से बचाने के लिए आप/आपके दल की योजना क्या है?
७, विभिन्न कारणों से बड़े पैमाने पर लोगों को विस्थापित किया जा रहा है। शहरी क्षेत्रों में झुग्गी-झोपडी में बसे लोगों को उजाड़ कर उन्हें बेघर किया जा रहा है। इनके समुचित पुनर्वास के लिए आप/ आपके दल की योजना क्या है?
८, देश की लगभग ८० प्रतिशत महिलायें घर में और घर के बाहर हर मोर्चे पर पर तरह-तरह के उत्पीडन की शिकार हैं। रोजमर्रा के तुच्छ एवं टुच्चे घरेलू कामो के बोझ से छुटकारा पाये बिना और सामाजिक उत्पादन के क्षेत्र में नियोजित हुए बिना इनकी मुक्ति सम्भव नही है। इस सन्दर्भ में आप/आपके दल की योजना क्या है?
९, शिक्षा एवं चिकित्सा के व्यापक व्यवसायीकरण के चलते आम आदमी के लिए अच्छी शिक्षा एवं समुचित चिकित्सा सेवा दुर्लभ होती जा रही है। देश के प्रत्येक व्यक्ति को समान एवं अच्छी शिक्षा तथा समुचित चिकित्सा सेवा उपलब्ध कराने के लिए आप/आपके दल की योजना क्या है?
१०, कहते हैं कि बच्चे देश का भविष्य और राष्ट्र की संपत्ति हैं। लेकिन, देश के लगभग दो तिहाई बच्चे भयंकर कुपोषण और अशिक्षा-कुशिक्षा के शिकार हैं। इसी तरह अपनी ज़िंदगी देश के लिए लगा देने वाले तमाम बुजुर्ग लोग आज अपनी परवरिश तथा समुचित देखभाल के अभामे परिवार के अन्दर तिरस्कृत एवं अपमानित जीवन जी रहे हैं। इन बच्चों एवं बुजुर्गों के लिए आप/ आपके दल की योजना क्या है?
११, विभिन्न कारणों से देश के अन्दर हताश, निराश एवं कुंठित लोगों की संख्या तेजी से बढ़ रही जो विविध मादक द्रव्यों का सेवन करके अपना स्वास्थय एवं चरित्र तो ख़राब कर ही रहे हैं, पूरे समाज को इसके दुष्प्रभाव से प्रदूषित कर रहे हैं। इस समस्या से निपटने के लिए आप/आपके की योजना क्या है?
विनीत
अध्यक्षमंडल
भारतीय जन-संसद
नोट :- देश का प्रत्येक व्यक्ति इस पत्रक को किसी भी भाषा में छपवा कर वितरित करने-कराने के लिए अधिकृत है।
महोदय,
देश की सर्वोच्च पंचायत - संसद - में हमारा प्रतिनिधित्व करने का जनादेश प्राप्त करने के लिए आप हमारे क्षेत्र में पधारे, इसके लिए हम आपके शुक्रगुजार हैं। जनसेवा के सम्बन्ध में हमें आप/ आपके दल की नीयत पर कोई संदेह नही है। फ़िर भी, विगत साठ वर्षों का अनुभव यही दर्शाता है किदेश के जनसेवक विभिन्न प्रश्नों पर हमारे हितों की पैरवी करने के बजाय शोषक - शासक वर्ग की सेवा में ही लीन रहे हैं।
इस सन्दर्भ में केवल एक ही तथ्य की तरफ़ संकेत कर देना काफ़ी होगा कि जन समस्याओं के समाधान के तमाम वादों और दावों के बावजूद आजादी के वक्त देश कि जो कुल आबादी थी लगभग उतने लोग आज गरीबी की रेखा के नीचे कीडो-मकोडों जैसा जीवन व्यतीत कर रहे हैं। देश के विकास के नाम पर एक तरफ़ अरबपतियों-खरबपतियों की संख्या में तीव्र बढोतरी हो रही है तो दूसरी तरफ़ लगभग ८० प्रतिशत जनता औसतन मात्र २० रुपये रोजाना की कमाई पर अमानुषिक जीवन जीने को विवश हैं।
ऐसे में इस चुनाव के मौके पर देश का जन साधारण अपनी आम समस्याओं के समाधान हेतु कोछ ठोस सवाल उठा कर जानना चाहता है कि इस सम्बन्ध में आप/आपके दल की योजना क्या है? इस बाबत हम अपने अब तक के अनुभवों के मद्देनज़र आपके किन्हीं वादों और घोषनाओं पर भरोसा करने के बजाय आपकी व्यवस्थित योजना के ठोसपन और उसकी सार्थकता पर विचार-विमर्श करके तदनुसार मतदान करने का निर्णय लेंगे।
सवाल
१, देश में लोकतंत्र की उम्र बढ़ने के साठ-साठ आम आदमी पर महंगाई, बेरोज़गारी तथा बहुआयामी भ्रष्टाचार का शिकंजा लगातार कसता गया है। समय-समय पर सत्ता पक्ष और विपक्ष के नेताओं ने बार-बार इसका रोना रोया है, लेकिन इसे समाप्त करने की दिशा में निर्णायक कदम कभी नही उठाया गया। इसे समाप्त करने के लिए एपी/आपके दल की क्या योजना है?
२, देश की बहुसंख्या आबादी आजीविका के परम्परागत निजी साधनों से वंचित होकर मजदूर बन चुकी है। और उसकी श्रम शक्ति की बिक्री न हो पाने तथा परिवार के समुचित भरण-पोषण लायक मजदूरी न मिल पाने के कारण उसकी जीवन दशाएं लगातार बाद से बदतर होती जा रही हैं। इस देशव्यापी आम सस्मस्य के निराकरण के लिए आप/आपके दल की क्या योजना है?
३, अर्थतंत्र के असंगठित क्षेत्र में अस्थायी, दिहाडी तथा ठेका मजदूरों की भरतो है ही, न्हारत sarkaar की नयी आर्थिक नीति के तहत अब संगठित क्षेत्र में भी विभिन्न तरीकों से स्थायी मजदूरों को हटा कर उनकी जगह अस्थायी, दिहाडी तथा ठेका मजदूरों से काम लिया जाने लगा है जिनकी तादाद विभिन्न उद्यमों में कार्यरत स्थायी मजदूरों के लगभग बराबर हो गयी है। विदित है इन तमाम अस्थायी, दिहाडी तथा ठेका मजदूरों को श्रम कानूनों द्वारा प्रदत्त सामान्य सुविधाएं तो उपलब्ध हैं ही नही, अब समान काम के लिए असमान वेतन की एक नयी विसंगति भी पैदा कर दी गयी है। इस सम्बन्ध में एपी/आपके दल की योजना क्या है?
४, देश के ग्रामीण क्षेत्र में आधे से भी ज्यादा परिवार भूमिहीन हो चुके हैं या अत्यल्प या अलाभकारी जोत पर निर्भरशील हैं। कंगाली की जिंदगी जी रहे इन लोगों को वर्ष में औसतन १३० दिन भी काम नही मिल पाटा। इनके जीवन दशाओं में अपेक्षित सुधार के लिए आप/आपके दल की योजना क्या है?
५, देश के किसानो की भारी संख्या कर्ज तथा सूखोरी के चंगुल में फंस चुकी है। विगत कुछ वर्षों के दौरान इसमें से लाखो किसान आत्महत्या कर चुके हैं और यह सिलसिला अब भी जारी है। इन किसानो की मुक्ति के लिए आप /आपके दल की योजना क्या है?
६, खुदरा व्यापार के क्षेत्र में बड़ी-बड़ी कंपनियों के प्रवेश के चलते देश के करोडो छोटे दुकानदारों की रोजी-रोटी पर खतरे के बादल मंडरा रहे हैं। इन्हें संकट से बचाने के लिए आप/आपके दल की योजना क्या है?
७, विभिन्न कारणों से बड़े पैमाने पर लोगों को विस्थापित किया जा रहा है। शहरी क्षेत्रों में झुग्गी-झोपडी में बसे लोगों को उजाड़ कर उन्हें बेघर किया जा रहा है। इनके समुचित पुनर्वास के लिए आप/ आपके दल की योजना क्या है?
८, देश की लगभग ८० प्रतिशत महिलायें घर में और घर के बाहर हर मोर्चे पर पर तरह-तरह के उत्पीडन की शिकार हैं। रोजमर्रा के तुच्छ एवं टुच्चे घरेलू कामो के बोझ से छुटकारा पाये बिना और सामाजिक उत्पादन के क्षेत्र में नियोजित हुए बिना इनकी मुक्ति सम्भव नही है। इस सन्दर्भ में आप/आपके दल की योजना क्या है?
९, शिक्षा एवं चिकित्सा के व्यापक व्यवसायीकरण के चलते आम आदमी के लिए अच्छी शिक्षा एवं समुचित चिकित्सा सेवा दुर्लभ होती जा रही है। देश के प्रत्येक व्यक्ति को समान एवं अच्छी शिक्षा तथा समुचित चिकित्सा सेवा उपलब्ध कराने के लिए आप/आपके दल की योजना क्या है?
१०, कहते हैं कि बच्चे देश का भविष्य और राष्ट्र की संपत्ति हैं। लेकिन, देश के लगभग दो तिहाई बच्चे भयंकर कुपोषण और अशिक्षा-कुशिक्षा के शिकार हैं। इसी तरह अपनी ज़िंदगी देश के लिए लगा देने वाले तमाम बुजुर्ग लोग आज अपनी परवरिश तथा समुचित देखभाल के अभामे परिवार के अन्दर तिरस्कृत एवं अपमानित जीवन जी रहे हैं। इन बच्चों एवं बुजुर्गों के लिए आप/ आपके दल की योजना क्या है?
११, विभिन्न कारणों से देश के अन्दर हताश, निराश एवं कुंठित लोगों की संख्या तेजी से बढ़ रही जो विविध मादक द्रव्यों का सेवन करके अपना स्वास्थय एवं चरित्र तो ख़राब कर ही रहे हैं, पूरे समाज को इसके दुष्प्रभाव से प्रदूषित कर रहे हैं। इस समस्या से निपटने के लिए आप/आपके की योजना क्या है?
विनीत
अध्यक्षमंडल
भारतीय जन-संसद
नोट :- देश का प्रत्येक व्यक्ति इस पत्रक को किसी भी भाषा में छपवा कर वितरित करने-कराने के लिए अधिकृत है।
Tuesday, March 31, 2009
डायवर्सिटी, चुनाव और मायावती का सस्पेंस
चुनाव के पहले की ये मेरी पहली पोस्ट है। अब लगातार लिखने का इरादा है। आज एक लेख आप पढ़िए चुनाव में दलित-वंचित उम्मीदों और आकांक्षाओं के बारे में। इस लेख को लिखने का आइडिया बहुजन डायवर्सिटी मिशन के संस्थापक और चिंतक एच एल दुसाध की बातों से मिला। दुसाध साहब ने 60 से ज्यादा किताबें लिखी हैं। सभी हिंदी में हैं। लेकिन स्वाभाविक कारणों से हिंदी का साहित्य समाज उन्हें नहीं जानता। बहरहाल आप देखें वो लेख जो आज नवभारत टाइम्स के संपादकीय पेज पर छपा है।
Sunday, March 29, 2009
72 साल के बच्चे से रोमांचक मुलाकात, आप भी मिलिए

डब्बूजी का कार्टून कोना याद है। ये अभी भी आता है। लेकिन बहुत लोगों के लिए ये धर्मयुग की यादों से जुड़ी हुई चीज है। बात आबिद सुरती की हो रही है। आज उनसे मिलने का मौका मिला। अनुराधा, मैं और बेटे अरिंदम के लिए ये एक शानदार मौका था और इसके लिए हम अपनी दोस्त फोटोजर्नलिस्ट सर्वेश के शुक्रगुजार हैं।
दोपहर बाद उस समय बूंदाबांदी सी हो रही थी। सर्वेश का निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन के पास अपना फ्लैट है। आबिद से मिलने का न्योता सर्वेश की ओर से ही आया था। हम रेलवे स्टेशन के पास सर्वेश के घर में जैसे ही घुसे सामने दीवान पर बैठा एक दढ़ियल जवान सा बुजुर्ग दिखा। टी शर्ट, नए जमाने की पैंट पहने वो बुजुर्ग थे हमारे बचपन के दिनों के साथी आबिद सुरती। हालांकि अपने इस दोस्त से ये पहली मुलाकात थी, लेकिन ऐसा लगा मानों हम तो हमेशा मिलते रहे हैं।
बहरहाल हमने जमकर उनके साथ गप्पे लड़ाईं। साथ मे चाय पी गई। पता चला कि चंद दिनों में 75 के होने जा रहे हैं आबिद सुरती। इस उम्र में उनकी सक्रियता और क्रिएटिविटी और सबसे बढ़कर नया और मॉडर्न सीखने की उनकी ललक ने हमें लगभग शर्मिंदा कर दिया। क्या आपको ये जानकर आश्चर्य होगा कि ये शख्स इस उम्र में दुनिया में हो रही हर बड़ी हलचल से वाकिफ है और उन पर अपनी राय रखता है और उसे क्रिएटिव तरीके से जाहिर भी करता है। इस उम्र में आबिद नए सॉफ्टवेयर की ट्रेनिंग ले रहे हैं। हाल ही में उन्होंने गुजराती लोककथाओं (लेखक गिजूभाई बधेका) की सिरीज का अनुवाद किया। उनकी ही प्रस्तुति और रेखांकन के साथ 10 किताबों का ये सेट नेशनल बुक ट्रस्ट से आया है।
उनका एक उपन्य़ास काला गुलाब अब फिल्मकारों की नजर में है और हो सकता है इस पर कोई फिल्म आ जाए। ये किताब दरअसल फिल्म की स्क्रिप्ट भी है।
बहरहाल छोटी सी मुलाकात में कुछ और बातें भी हुईं जो फिर कभी। ये तस्वीर जो आप देख रहे हैं वह अनुराधा ने सर्वेश के घर से मुंबई के लिए आबिद की रवानगी के समय उतारी है।
Monday, February 23, 2009
अविनाश और नीति-नैतिकता पर कुछ फुटकर विचार
भोपाल में काम कर रहे पत्रकार, ब्लॉगर और मित्र अविनाश के हाल के प्रकरण से जुड़ी घटनाओं और चर्चाओं से मैं लगभग अछूता रहा। ब्लॉग ही शायद वो जगह थी, जहां इसकी सबसे ज्यादा चर्चा हुई और निजी कारणों से पिछले लगभग छह महीने से इस नए उभरते और प्रिय शिशु माध्यम से अपना जुड़ाव नहीं था।
बहरहाल, जो सूचनाएं ब्लॉगेतर माध्यमों से आई, उससे मेरे लिए इस घटना के सच-झूठ के बारे में कोई राय बना पाना संभव नहीं है। कोई भी आदमी कोई भी हरकत कर सकता है, और किसी बुरी हरकत के लिए किसी आदमी का घोषित या ज्ञात रूप से बुरा होना जरूरी नहीं है, ऐसा मेरा अनुभव है। इस बात को मैं तथ्य से साबित नहीं करना चाहूंगा। हर आदमी का जीवन अनुभव उसे सिखाता है और राय बनाने में मदद करता है।
अविनाश प्रसंग में अगर किसी महिला या लड़की ने जबर्दस्ती का आरोप लगाया है, तो आरोप गलत साबित होने तक अविनाश दोषी हैं। कानून की नजर में भी और समाज की नजर में भी। लेकिन अगर ऐसा नहीं है तो भी अविनाश के बारे में किसी को अपनी राय बनाने का अधिकार है। अविनाश अगर मेरे मित्र न होते तो भी इस मामले में कदाचित मेरी राय यही होती।
यौन शुचिता और नैतिकता के नियम समय के साथ बदलते रहते हैं। नैतिकता की परिभाषा, अलग अलग समाजों, वर्गों और यहां तक की शहरों और गांवों और कस्बों तक में बदल जाती हैं। भोपाल और मेरठ की नैतिकता गुड़गांव, पार्कस्ट्रीट और कफ परेड की नैतिकता से अलग है। एक ही शहर में पॉश मोहल्ले और स्लम की नैतिकता अलग होती है। उसी तरह एक ही परिवार में गरीब और अमीर भाई के माइक्रो परिवार की नैतिकता अलग होती है। अखिल भारतीयता की तलाश इस मामले में आपको कहीं नहीं पहुंचाएगी।
इस मामले में हर व्यक्ति की दृष्टि अलग हो सकती है। मेरे लिए वो शारीरिक संबंध वैध हैं, जो वयस्क लोगों के बीच आपसी सहमति से कायम किए जाते हैं। जबर्दस्ती हुई तो ये कानूनी अपराध है। लालच (जॉब, प्रमोशन, पैसा, इंक्रिमेंट से लेकर चुनाव टिकट समेत इसके हजारों चेहरे हो सकते हैं) का पहलू अगर संबंधों के बीच आया तो ये अनैतिक ( या कम से कम अनुचित) माना जाएगा। रिश्तेदारियों की कुछ सीमाएं इसमें हैं और इसका वैज्ञानिक आधार भी हैं। जबर्दस्ती हुई तो पीड़ित पक्ष को सामने आना चाहिए। हालांकि ये कई बार संभव नहीं हो पाता। लालच संबंधों का आधार नहीं होना चाहिए। लेकिन है तो कोई इसमें बाधा कैसे खड़ा कर सकता है? ये चुनाव तो उसी को करना है, जिसका इससे वास्ता है।
लेकिन सिर्फ चर्चाओं के आधार पर किसी को दोषी करार देने की किसी की इच्छा का आदर करने के लिए मैं तैयार नहीं हूं। किसी व्यक्ति को सिर्फ इस आधार पर मैं खारिज करने को भी तैयार नहीं हूं, कि कुछ लोग ऐसा कह रहे हैं। आप ये नहीं भूल सकते कि देश में बाढ़ की रिपोर्टिंग की चर्चा हो तो जिस एक शख्स का नाम आप नहीं भूला सकते, वो नाम अविनाश का है। अविनाश पर आरोप लगे तो, साबित न होने तक उन्हें दोषी करार दीजिए। लेकिन उससे पहले उन्हें खारिज मत कीजिए। कोई दमदार व्यक्ति इतने भर से खारिज होता भी नहीं है। आपका जीवन अनुभव क्या कहता है इस बारे में? -दिलीप मंडल
Sunday, February 22, 2009
जेड गुडी के बहाने
आज के दिन हर जगह जेड गुडी की चर्चा है। आज का दिन उसके लिए खास है- उसने आज शादी कर ली है। उसकी शादी के पहले इंग्लैंड और वेल्स के रोमन कैथोलिक चर्च ने जेड को शुभकामनाएं दीं और उनके लिए प्रार्थना की। पर दुनिया के लिए 27 वर्षीय जेड गुडी की शादी इतनी खास क्यों है? इसका जवाब पाने के लिए उसकी पूरी कहानी जाननी पड़ेगी।
जेड के जिक्र/ परिचय का सिरा जोड़ने के लिए याद दिला दूं कि हिंदुस्तानी मीडिया में जेड की चर्चा पहली बार जनवरी 2007 में हुई जब इंगलैंड के रियलिटी टीवी शो 'सेलेब्रिटी बिग ब्रदर' में शिल्पा शेट्टी पर रेसिस्ट टिप्पणियां करने का इल्जाम उस पर लगा। इसके बाद वे शो से बाहर हो गईं और आखिरकार शिल्पा जीत गईं। हालांकि इसके लिए बाद में जेड ने कई बार माफी मांगी और सफाई दी कि उनका ऐसा कोई इरादा नहीं था।
दिलचस्प बात यह है कि फिर अगस्त 2008 में भारत में 'बिग ब्रदर' की ही तर्ज पर शिल्पा के कार्यक्रम 'बिग बॉस' में जेड शामिल हुईं। बिग बॉस के घर में अपने दूसरे ही दिन जेड को फोन पर पता चला कि उन्हें बच्चेदानी के मुंह का कैंसर है जो काफी विकसित अवस्था में है जिसका फौरन इलाज जरूरी है। जाहिर है, जेड कार्यक्रम छोड़ कर चली गईं और तब से लगातार कैंसर से लड़ रही हैं। ताजा समाचार यह है कि डॉक्टरों का कहना है कि “उसके पास इस दुनिया में ज्यादा समय नहीं है”।
कोई भी किसी के इस दुनिया में रहने या न रहने के समय को कैसे तय कर सकता है, जब तक कि व्यक्ति के दिल-दिमाग ने काम करना बंद न कर दिया हो? खास तौर पर कैंसर के मरीजों के बारे में ऐसी ‘भविष्यवाणियां’ मैंने भी कई बार सुनी हैं। और, यकीन मानिए, डॉक्टरों की ऐसी भविष्यवाणियों को भी अनेक मरीजों ने मेरे सामने ही झूठा साबित कर दिया है। सबका जिक्र जरूरी नहीं है, लेकिन दो-चार या आठ-दस महीनों को चार-पांच साल में बदलते मैंने कई बार देखा है। इसलिए जब सुन रही हूं कि जेड के पास कुछेक हफ्तों या महीनों का ही समय है तो चुपचाप यकीन नहीं करना चाहती। और अगर यह सच हो भी जाए तो बड़ी बात यह होगी कि जेड ने अपने 27 साल के जीवन को कितना जिया। महत्वपूर्ण सवाल यह होगा कि अपने छोटे से समय में उसने क्या किया।
उसने बहुत कुछ किया, खूब किया। पांच जून 1981 को जन्मी एक टूटे परिवार की लड़की जेड सेरिसा लॉराइन गुडी को पहली बार दुनिया ने जाना जब वह 2002 में ब्रिटेन के चैनल 4 के रियलिटी शो 'बिग ब्रदर' के परिवार में शामिल हुईं। इस ‘परिवार’ से निकाले जाने के बाद उसने अपने टीवी कार्यक्रम बनाना शुरू किया। साथ ही अपने सौंदर्य प्रसाधन भी बाजार में उतारे।
सोलह साल की उम्र में पहली बार उसे पता लगा कि उसके शरीर में कई ऐसी कोशिकाएं हैं जो कैंसर बना सकती हैं। इन बीमार कोशिकाओं का इलाज कर दिया गया। फिर सन 2004 उसे अंडाशय (ओवरी) का कैंसर और फिर 2006 में मलाशय का कैंसर बताया गया। दोनो बार इलाज के बाद उसे डॉक्टरों ने ‘ठीक हो गई’ माना। मगर ऐसा था नहीं। अगस्त 2008 के शुरू में फिर कैंसर की आशंका में उसने कुछ जांचें करवाईं जिनकी रिपोर्ट उन्हें हिंदुस्तान में बिग बॉस के घर पर मिली। इस दौरान दो मई 2006 को जेड ने अपनी पहली आत्मकथा- 'जेड: माई ऑटोबायोग्राफी' छपवाई और उसी साल जून में अपना इत्र- 'श्..जेड गुडी' जारी किया जो खासा लोकप्रिय हुआ।
नवंबर 2006 तक उसने नाउ पत्रिका के लिए साप्ताहिक कॉलम भी लिखा। फिर अगस्त 2008 में तीसरी बार कैंसर होने का पता लगने के बाद अक्टूबर 2008 में एक और आत्मकता लिखी- 'जेड: कैच अ फॉलिंग स्टार' जिसमें 2007 में बिग ब्रदर कार्यक्रम के दौरान के अनुभवों को समेटा है। उस पर एक टीवी डॉक्युमेंटरी ‘लिविंग विथ जेड गुडी’ का प्रसारण सितंबर में हुआ तो दिसंबर में एक और फिल्म ‘जेड’स कैंसर बैटल’ दिखाई गई। अक्टूबर में उसने अपना दूसरा ब्यूटी सैलोन खोला। फिर क्रिसमस के दौरान थिएटर रॉयल में 'स्नो व्हाइट' नाटक में बिगड़ैल रानी का किरदार निभाया। इस हालत में भी अपनी जीजीविषा को जिलाए रखने और अपनी इच्छाशक्ति के बल पर इतना सब कर पाने के लिए उसकी खूब तारीफ हुई। पर जनवरी में उसे इस शो से हटना पड़ा, शरीर साथ नहीं दे पाया।
शुक्रवार, 6 फरवरी को उनके मलाशय से गेंद के बराबर ट्यूमर ऑपरेशन के जरिए निकाला गया। आज उसने अपनी बीमारी की हालत में, मौत के करीब खड़े होकर भी शादी की है जिसे फिल्माने का ठेका भी उन्होंने महंगे में बेचा। इस ईवेंट के एक्सक्लूसिव कवरेज के लिए एक पत्रिका के साथ भी उनका सौदा हुआ, एक मोटी रकम के बदले। और कीमोथेरेपी से गंजी हुई अपनी खोपड़ी को दिखाने के लिए शादी में घूंघट न पहनने का फैसला भी चौंकाने वाला, पर बिकाऊ रहा।
अपनी जिंदगी के आखिरी चंद दिन कैमरे में कैद करवाने वाली यह बीमार सेलेब्रिटी अब अपनी मौत को भी भुनाना चाहती है? लोग यही कह रहे हैं और वह खुद भी कहती है कि वह मरने के पहले ज्यादा से ज्यादा धन इकट्ठा कर लेना चाहती है, अपने पांच और चार साल के दो बच्चों के लिए। इस बारे में कुछ लोगों का कहना है कि यह जेड का शोषण है। किसी की मौत को टीवी पर लाइव देखना- दिखाना क्रूर और अमानवीय है। पर जेड का कहना है कि उनकी जिंदगी कैमरे के सामने बीती है, इसलिए मौत भी कैमरे के सामने ही हो। उधर डॉक्टर मान रहे हैं कि टीवी पर यह सब देख रहे हजारों दर्शक इसी बहाने कैंसर के बारे में जानेंगे और जागरूक बनेंगे।
जेड के जिक्र/ परिचय का सिरा जोड़ने के लिए याद दिला दूं कि हिंदुस्तानी मीडिया में जेड की चर्चा पहली बार जनवरी 2007 में हुई जब इंगलैंड के रियलिटी टीवी शो 'सेलेब्रिटी बिग ब्रदर' में शिल्पा शेट्टी पर रेसिस्ट टिप्पणियां करने का इल्जाम उस पर लगा। इसके बाद वे शो से बाहर हो गईं और आखिरकार शिल्पा जीत गईं। हालांकि इसके लिए बाद में जेड ने कई बार माफी मांगी और सफाई दी कि उनका ऐसा कोई इरादा नहीं था।
दिलचस्प बात यह है कि फिर अगस्त 2008 में भारत में 'बिग ब्रदर' की ही तर्ज पर शिल्पा के कार्यक्रम 'बिग बॉस' में जेड शामिल हुईं। बिग बॉस के घर में अपने दूसरे ही दिन जेड को फोन पर पता चला कि उन्हें बच्चेदानी के मुंह का कैंसर है जो काफी विकसित अवस्था में है जिसका फौरन इलाज जरूरी है। जाहिर है, जेड कार्यक्रम छोड़ कर चली गईं और तब से लगातार कैंसर से लड़ रही हैं। ताजा समाचार यह है कि डॉक्टरों का कहना है कि “उसके पास इस दुनिया में ज्यादा समय नहीं है”।
कोई भी किसी के इस दुनिया में रहने या न रहने के समय को कैसे तय कर सकता है, जब तक कि व्यक्ति के दिल-दिमाग ने काम करना बंद न कर दिया हो? खास तौर पर कैंसर के मरीजों के बारे में ऐसी ‘भविष्यवाणियां’ मैंने भी कई बार सुनी हैं। और, यकीन मानिए, डॉक्टरों की ऐसी भविष्यवाणियों को भी अनेक मरीजों ने मेरे सामने ही झूठा साबित कर दिया है। सबका जिक्र जरूरी नहीं है, लेकिन दो-चार या आठ-दस महीनों को चार-पांच साल में बदलते मैंने कई बार देखा है। इसलिए जब सुन रही हूं कि जेड के पास कुछेक हफ्तों या महीनों का ही समय है तो चुपचाप यकीन नहीं करना चाहती। और अगर यह सच हो भी जाए तो बड़ी बात यह होगी कि जेड ने अपने 27 साल के जीवन को कितना जिया। महत्वपूर्ण सवाल यह होगा कि अपने छोटे से समय में उसने क्या किया।
उसने बहुत कुछ किया, खूब किया। पांच जून 1981 को जन्मी एक टूटे परिवार की लड़की जेड सेरिसा लॉराइन गुडी को पहली बार दुनिया ने जाना जब वह 2002 में ब्रिटेन के चैनल 4 के रियलिटी शो 'बिग ब्रदर' के परिवार में शामिल हुईं। इस ‘परिवार’ से निकाले जाने के बाद उसने अपने टीवी कार्यक्रम बनाना शुरू किया। साथ ही अपने सौंदर्य प्रसाधन भी बाजार में उतारे।
सोलह साल की उम्र में पहली बार उसे पता लगा कि उसके शरीर में कई ऐसी कोशिकाएं हैं जो कैंसर बना सकती हैं। इन बीमार कोशिकाओं का इलाज कर दिया गया। फिर सन 2004 उसे अंडाशय (ओवरी) का कैंसर और फिर 2006 में मलाशय का कैंसर बताया गया। दोनो बार इलाज के बाद उसे डॉक्टरों ने ‘ठीक हो गई’ माना। मगर ऐसा था नहीं। अगस्त 2008 के शुरू में फिर कैंसर की आशंका में उसने कुछ जांचें करवाईं जिनकी रिपोर्ट उन्हें हिंदुस्तान में बिग बॉस के घर पर मिली। इस दौरान दो मई 2006 को जेड ने अपनी पहली आत्मकथा- 'जेड: माई ऑटोबायोग्राफी' छपवाई और उसी साल जून में अपना इत्र- 'श्..जेड गुडी' जारी किया जो खासा लोकप्रिय हुआ।
नवंबर 2006 तक उसने नाउ पत्रिका के लिए साप्ताहिक कॉलम भी लिखा। फिर अगस्त 2008 में तीसरी बार कैंसर होने का पता लगने के बाद अक्टूबर 2008 में एक और आत्मकता लिखी- 'जेड: कैच अ फॉलिंग स्टार' जिसमें 2007 में बिग ब्रदर कार्यक्रम के दौरान के अनुभवों को समेटा है। उस पर एक टीवी डॉक्युमेंटरी ‘लिविंग विथ जेड गुडी’ का प्रसारण सितंबर में हुआ तो दिसंबर में एक और फिल्म ‘जेड’स कैंसर बैटल’ दिखाई गई। अक्टूबर में उसने अपना दूसरा ब्यूटी सैलोन खोला। फिर क्रिसमस के दौरान थिएटर रॉयल में 'स्नो व्हाइट' नाटक में बिगड़ैल रानी का किरदार निभाया। इस हालत में भी अपनी जीजीविषा को जिलाए रखने और अपनी इच्छाशक्ति के बल पर इतना सब कर पाने के लिए उसकी खूब तारीफ हुई। पर जनवरी में उसे इस शो से हटना पड़ा, शरीर साथ नहीं दे पाया।
शुक्रवार, 6 फरवरी को उनके मलाशय से गेंद के बराबर ट्यूमर ऑपरेशन के जरिए निकाला गया। आज उसने अपनी बीमारी की हालत में, मौत के करीब खड़े होकर भी शादी की है जिसे फिल्माने का ठेका भी उन्होंने महंगे में बेचा। इस ईवेंट के एक्सक्लूसिव कवरेज के लिए एक पत्रिका के साथ भी उनका सौदा हुआ, एक मोटी रकम के बदले। और कीमोथेरेपी से गंजी हुई अपनी खोपड़ी को दिखाने के लिए शादी में घूंघट न पहनने का फैसला भी चौंकाने वाला, पर बिकाऊ रहा।
अपनी जिंदगी के आखिरी चंद दिन कैमरे में कैद करवाने वाली यह बीमार सेलेब्रिटी अब अपनी मौत को भी भुनाना चाहती है? लोग यही कह रहे हैं और वह खुद भी कहती है कि वह मरने के पहले ज्यादा से ज्यादा धन इकट्ठा कर लेना चाहती है, अपने पांच और चार साल के दो बच्चों के लिए। इस बारे में कुछ लोगों का कहना है कि यह जेड का शोषण है। किसी की मौत को टीवी पर लाइव देखना- दिखाना क्रूर और अमानवीय है। पर जेड का कहना है कि उनकी जिंदगी कैमरे के सामने बीती है, इसलिए मौत भी कैमरे के सामने ही हो। उधर डॉक्टर मान रहे हैं कि टीवी पर यह सब देख रहे हजारों दर्शक इसी बहाने कैंसर के बारे में जानेंगे और जागरूक बनेंगे।
Wednesday, December 17, 2008
इतिहास के पन्नों के लिए
कमलेश पांडे 'पुष्प'
(कमलेश दिल्ली से प्रकाशित समाचार पत्रिका 'सीनियर इंडिया' से जुड़े हैं। पिछले दिनों मुंबई में हुए भीषण आतंकी हमले ने आम जनों की तरह संवेदनशील पत्रकारों को भी विचलित किया। कमलेश भी उन पत्रकारों में हैं। उनकी ये पंक्तियाँ इस बात की गवाह हैं। आप भी देखें इन्हें)
मुझे याद है
ब्लैक बोर्ड पर लिखे
कैलाश मास्टर के
क ख ग घ
जिसे मैं
गाँव की प्राइमरी पाठशाला की
सीलन भरी जमीन पर बैठ
लकड़ी की pattiyon पर
मुश्किलों से लिखना
सीख पाया था।
तब मुझे नही मालूम था
वही क ख ग घ
मेरी जिंदगी में
आगे चल कर
कत्ल, खुखरी, गोली और घाव
शब्द उकेरेंगे
और मैं इन शब्दों को / अपने ही लोगों की लाशों के बीच बैठ कर
खडिया और स्याही के बजाय
अपने गाढे रक्त से लिखूंगा
इतिहास के पन्नों के लिए
(कमलेश दिल्ली से प्रकाशित समाचार पत्रिका 'सीनियर इंडिया' से जुड़े हैं। पिछले दिनों मुंबई में हुए भीषण आतंकी हमले ने आम जनों की तरह संवेदनशील पत्रकारों को भी विचलित किया। कमलेश भी उन पत्रकारों में हैं। उनकी ये पंक्तियाँ इस बात की गवाह हैं। आप भी देखें इन्हें)
मुझे याद है
ब्लैक बोर्ड पर लिखे
कैलाश मास्टर के
क ख ग घ
जिसे मैं
गाँव की प्राइमरी पाठशाला की
सीलन भरी जमीन पर बैठ
लकड़ी की pattiyon पर
मुश्किलों से लिखना
सीख पाया था।
तब मुझे नही मालूम था
वही क ख ग घ
मेरी जिंदगी में
आगे चल कर
कत्ल, खुखरी, गोली और घाव
शब्द उकेरेंगे
और मैं इन शब्दों को / अपने ही लोगों की लाशों के बीच बैठ कर
खडिया और स्याही के बजाय
अपने गाढे रक्त से लिखूंगा
इतिहास के पन्नों के लिए
Saturday, December 6, 2008
टोलफ्री टेरर हेल्पलाइन नंबर है 1090
अगर कहीं कोई संदिग्ध वस्तु दिखे तो हम आम तौर पर पुलिस को 100 नंबर पर फोन करते हैं। लेकिन इससे भी प्रभावी जगह अपनी आशंका को पहुंचाना हो, ताकि आतंकवाद की किसी संभावित घटना के खिलाफ सटीक कार्रवाई हो सके तो ऑल इंडिया टेरर हेल्पलाइन नंबर पर फोन करना ज्यादा कारगर होगा।
ऑल इंडिया टोल फ्री टेरर हेल्पलाइन नंबर है- 1090। खास बात यह है कि देश में हर जगह यह नंबर कारगर है। इस पर मोबाइल से भी फोन किया जा सकता है। खास बात यह है कि इसमें फोन करने वाले की पहचान छुपाने की भी व्यवस्था है।
अगर कहीं भी, कभी भी आपको आतंकी गतिविधि का अंदेशा हो तो इस नंबर '1090' पर तत्काल फोन करें। स्थानीय पुलिस या टेरर स्क्वाड तक खबर पहुंच जाएगी। क्या पता एक फोन भर से कोई संभावित बुरी घटना टल जाए!
ऑल इंडिया टोल फ्री टेरर हेल्पलाइन नंबर है- 1090। खास बात यह है कि देश में हर जगह यह नंबर कारगर है। इस पर मोबाइल से भी फोन किया जा सकता है। खास बात यह है कि इसमें फोन करने वाले की पहचान छुपाने की भी व्यवस्था है।
अगर कहीं भी, कभी भी आपको आतंकी गतिविधि का अंदेशा हो तो इस नंबर '1090' पर तत्काल फोन करें। स्थानीय पुलिस या टेरर स्क्वाड तक खबर पहुंच जाएगी। क्या पता एक फोन भर से कोई संभावित बुरी घटना टल जाए!
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