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Saturday, February 6, 2010

आखिर कहां गायब हो जाते हैं दलित-आदिवासी अफसर

दिलीप मंडल


कुल 88 में एक भी नहीं। ये आंकड़ा है देश की शीर्ष नौकरशाही में दलित अफसरों की मौजूदगी का। देश को चलाने वाली शीर्ष नौकरशाही यानी केंद्र सरकार में सेक्रेटरी पद पर नियुक्त अफसरों की संख्या के बारे में ये आंकड़ा केंद्रीय कार्मिक और प्रशिक्षण राज्य मंत्री पृथ्वीराज चह्वाण ने पिछले दिनों लोकसभा में पेश किया। उन्होंने लोकसभा को ये भी बताया कि केंद्र सरकार में एडिशनल सेक्रेटरी के 66 पदों में से सिर्फ एक पर दलित है जबकि ज्वांयट सेक्रेटरी के 249 पदों में से 13 पद दलित अफसरों के पास हैं। आदिवासी अफसरों की बात करें तो केंद्र सरकार में चार सेक्रेटरी, एक एडिशनल सेक्रेटरी और नौ ज्वायंट सेक्रेटरी आदिवासी हैं। यानी इस देश की शीर्ष नौकरशाही के 403 पदों में से सिर्फ 28 पद दलितों और आदिवासियों के पास हैं। दलितों और आदिवासियों को मिलाकर इस देश की लगभग चौथाई आबादी बनती है। सरकार के आंकड़े बताते हैं कि शीर्ष नौकरशाही में इस आबादी की हिस्सेदारी सात फीसदी से भी कम है। सबसे ऊपर सेक्रेटरी पद पर तो दलितों की पूरी तरह गैरमौजूदगी बेहद चौंकाने वाली है।


भारतीय नौकरशाही में कुछ खास जातियों और समूहों का वर्चस्व हमेशा रहा है। साथ ही नौकरशाही में कुछ जाति और जाति समूहों की कम और लगभग गैरमौजूदगी भी सार्वजनिक तथ्य है। चौंकाने वाली बात सिर्फ ये है कि शीर्ष नौकरशाही में दलितों और आदिवासियों की लगभग गैरमौजूदगी आजादी से पहले से चले आ रहे आरक्षण के प्रावधान के बावजूद है। इन पदों पर ओबीसी और मुस्लिमों की कम मौजूदगी की बात अलग है और इसके कारण समझे जा सकते हैं। मुस्लिमों के लिए धर्म के आधार पर कभी भी आरक्षण नहीं रहा और ओबीसी आरक्षण लागू हुए अभी सिर्फ 16 साल हुए हैं और उसके बाद से आए ओबीसी अफसर अभी शीर्ष तक पहुंचने की वरीयता हासिल नहीं कर पाए हैं। लेकिन दलितों और आदिवासियों के साथ ऐसा क्यों है, जिन्हें आजादी के बाद से ही केंद्रीय नौकरियों में आरक्षण हासिल हुआ। आजादी के फौरन बाद 21 सितंबर 1947 को खुली प्रतियोगिता के आधार पर केंद्र सरकार की नियुक्तियों में अनुसूचित जातियों के लिए 12.5 फीसदी आरक्षण का आदेश जारी किया गया। खुली प्रतियोगिता के अलावा दूसरी नियुक्तियों में आरक्षण का प्रतिशत 16.66 तय किया गया। संविधान लागू होने के बाद सितंबर 1950 में सरकारी नौकरियों में अनुसूचित जनजातियों के लिए 5 फीसदी आरक्षण का प्रावधान किया गया। 1961 की जनगणना के आधार पर 1970 में आरक्षण का नया आधार तय हुआ और तब से ही केंद्र सरकार की नौकरियों में अनुसूचित जातियों के लिए 15 फीसदी और अनुसूचित जनजातियों के लिए 7.5 फीसदी आरक्षण है। हालांकि तब से कुल आबादी में दलितों और आदिवासियों का अनुपात बढ़ा है जो जनगणना में लगातार दर्ज हो रहा है। इसके हिसाब से आरक्षण का अनुपात ठीक करने की मांग लगातार हो रही है, जिसे लेकर सरकार अब तक खामोश है।


बहरहाल माना जाना चाहिए कि इस देश में दलितों और आदिवासियों के साथ कोई भेदभाव नहीं होता और संवैधानिक संस्था यूपीएससी संवैधानिक प्रावधानों के तहत ही हर साल केंद्रीय सिविल सेवाओं के लिए प्रत्याशियों का चयन करती है। इसके तहत सिविल सर्विस के लिए चुने जाने वालों में कम से कम 22.5 फीसदी प्रत्याशी दलित और आदिवासी होंगे। कम से कम इसलिए क्योंकि इन समुदायों के जो लोग सामान्य मेरिट से चुनकर आते होंगे, उन्हें आरक्षण के दायरे से बाहर जनरल कटेगरी का माना जाना चाहिए। हालांकि इस नियम और इस बारे में सुप्रीम कोर्ट के आदेशों को बरसों से तोड़ा जाता रहा है। इसके बावजूद नौकरशाही में प्रवेश के स्तर पर कम से कम 22.5 फीसदी दलित और आदिवासी होंगे। सिविल सर्विस के ही अफसर नौकरशाही के शिखर तक पहुंचते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि यूपीएससी से चुने जाने और नौकरशाही के शिखर तक पहुंचने के रास्ते में दलित और आदिवासी अफसर बीच में कहां खो जाते हैं?


सबसे पहले देखते हैं कि इसकी सरकारी व्याख्या क्या है? सरकार का कहना है कि इन पदों पर नियुक्ति विभिन्न काडर से डेपुटेशन यानी प्रतिनियुक्ति के आधार पर होती है। इसलिए इन काडर में दलित और आदिवासी अफसरों का जो प्रतिशत है, वो जरूरी नहीं है कि इन पदों पर भी नजर आए। कार्मिक और प्रशिक्षण मंत्री का ये भी कहना है कि केंद्र सरकार में सेक्रेटरी, एडिशनल सेक्रेटरी और ज्वायंट सेक्रेटरी के पद प्रमोशन के जरिए नहीं भरे जाते हैं। सिर्फ विदेश मंत्रालय के सेक्रेटरी का पद ही ऐसा है जिसे उसी काडर के अफसर से भरा जाता है। सरकार का स्पष्टीकरण ये है कि केंद्र सरकार के मंत्रालयों और विभागों में सेक्रेटरी, एडिशनल सेक्रेटरी और ज्वायंट सेक्रेटरी के पदों को भरने के लिए राज्य काडर समेत तमाम काडर के अफसरों का एक पैनल बनाया जाता है और उसी पैनल में आए अफसरों से इन पदों को भरा जाता है। सरकार ने साफ कर दिया है कि इन पदों पर रिजर्वेशन का कोई प्रावधान नहीं है लेकिन पैनल बनाते समय दलित और आदिवासी अफसरों को भी शामिल करने की कोशिश की जाती है और इसके लिए उन्हें जनरल अफसरों की तुलना में कम कड़े मानदंडों पर तौला जाता है।


सरकार के कहने का कुल मतलब ये है कि शीर्ष नौकरशाही में कौन आएगा और कौन नहीं इसके लिए एक व्यवस्था बनी हुई है और अगर इस व्यवस्था के तहत दलित और आदिवासी अफसर (जो कुल नौकरशाही का 22.5 फीसदी हैं) इन पदों के लिए पैनल में नहीं आ सकते हैं तो सरकार क्या कर सकती है। वो तो मानदंडों तक में ढील देती है लेकिन इससे ज्यादा वो क्या कर सकती है? ठीक ऐसा ही तर्क न्यायपालिका और रक्षा सेवाओं में वंचित समूहों की लगभग गैरमौजूदगी के लिए भी दिया जाता है। इस बारे में पूछे गए दर्जनों सवालों के जवाब में लोकसभा और राज्यसभा में यही कहा गया कि एक तो सरकार इन पदों पर जाति प्रतिनिधित्व का हिसाब नहीं रखती और दूसरी बात ये कि इन पदों पर नियुक्ति की एक प्रक्रिया का पालन होता है और उस प्रक्रिया के तहत ही कोई इन पदों पर चुनकर आ सकता है। यानी विशेष अवसर का सिद्धांत इन जगहों पर लागू नहीं होता।


हालांकि रक्षा सेवाओं में आरक्षण या विशेष अवसर की कभी मांग भी नहीं उठी है, इसलिए उन सेवाओं को फिलहाल इस विवाद से अलग रखा जा सकता है। उच्च न्यायपालिका में भी आरक्षण की मांग तो होती रही है, लेकिन संविधान और कायदे-कानून इस बारे में खामोश हैं और अब तक की सरकारों ने इस विषय पर चुप्पी साध रखी है। न्यायपालिका में दलितों, आदिवासियों और महिलाओं की उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए केंद्रीय न्यायिक सेवा आयोग बनाने की मांग उठती रही है, लेकिन फिलहाल ये मामला ठंडे बस्ते में ही है। लेकिन नौकरशाही का मामला इनसे अलग है।


सरकार उच्च नौकरशाही में दलितों और आदिवासियों की बेहद कम मौजूदगी के लिए जो तर्क दे रही है उसकी समीक्षा की जानी चाहिए। हालांकि ये उम्मीद नहीं की जा सकती कि सरकार ये स्वीकार करेगी कि इसकी वजह जातिगत भेदभाव है। लेकिन इसके अलावा इस आश्चर्यजनक घटना की और कोई सुसंगत व्याख्या नहीं हो सकती। एक और व्याख्या जो ऐसे मामलों में हमेशा सुनी जाती है वो मूलत: नस्लवादी है। ये व्य़ाख्या इस तरह की है कि दलित और आदिवासी अफसर आरक्षण की वजह से केंद्रीय सेवाओं में आ तो जाते हैं लेकिन मेरिट न होने या मेरिट कम होने की वजह से वो शिखर पर नहीं पहुंच पाते। जाहिर है इस तर्क के नस्लवादी स्वरूप की वजह से केंद्रीय मंत्री ने खुलकर ये बात लोकसभा में नहीं कही। लेकिन राजकाज और देश के संचालन में ऊंचे पदों पर वंचित समुदायों की कम उपस्थिति के पीछे अक्सर दबी जुबान में और कई बार खुलकर ये तर्क ये दिया जाता है कि मेरिट नहीं होने पर किसी को किसी खास पद पर कैसे बिठाया जा सकता है।


वैसे ये तर्क बेहद पुराना है। अंग्रेजी राज में ये तर्क तमाम भारतीयों के खिलाफ इस्तेमाल होता था। व्हाइटमैंस बर्डन की पूरी अवधारणा ही श्वेत लोगों की सर्वोच्चता और बाकी लोगों के प्रतिभाहीन-संस्कृतिहीन होने के आधार पर टिकी थी। लेकिन आजादी के बाद देश के ही कुछ खास समुदायों के खिलाफ इस तर्क का इस्तेमाल किया जाने लगा जो अब तक जारी है। ये एक खतरनाक सोच है और ये ध्यान रखा जाना चाहिए कि इस वजह से आबादी के एक हिस्से का भारतीय लोकतंत्र से मोहभंग भी हो सकता है। इसी आशंका को ध्यान में रखते हुए संविधान निर्माताओं ने संविधान में ही इस बात की व्यवस्था की है कि वंचित और पिछड़े समूहों को विशेष अवसर दिए जाएंगे। और ये बात ध्यान देने योग्य है कि विशेष अवसर के सिद्धांत को स्वीकार करते हुए संविधान में कहीं भी इसका आधार ये नहीं है कुछ समुदायों में मेरिट की कमी है। विशेष अवसर का आधार शैक्षणिक और सामाजिक पिछड़ापन है और इसके कारण ऐतिहासिक हैं। खासकर दलितों के लिए आरक्षण तो सवर्णों और दलितों के बीच हुई एक संधि का नतीजा है जिसे देश पूना पैक्ट के नाम से जानता है।


वैज्ञानिक तौर पर भी इस बात को साबित नहीं किया जा सका है कि किसी भी मानव समूह में नस्ल या जाति केआधार पर कम या ज्यादा प्रतिभा होती है। 15वीं सदी तक जिन यूरोपीय लोगों को बाकी दुनिया बर्बर जानती थी, वोआज दुनिया के सबसे सभ्य और समृद्ध लोगों में हैं। दक्षिण अफ्रीका का उदाहरण भी इस मामले में बेहद महत्वपूर्णहै जहां नस्लभेदी शासन खत्म होने के बाद अश्वेत प्रतिभा का जबर्दस्त विस्फोट दुनिया ने देखा। अमेरिका में भीअब शासन और जीवन के ज्यादातर अंगों में अश्वेत, हिस्पैनिक्स और एशियाई लोगों की हिस्सेदारी बढ़ रही है।मेरिट का सीधा संबंध अवसर मिलने या न मिलने से है। जब ये कहा जाता है कि किसी समुदाय में मेरिट वाले बच्चे ज्यादा हैं, तो इसका एक ही मतलब है कि उस समुदाय के बच्चों को शिक्षा और प्रगति करने के अवसर ज्यादा मिले। शहरों में जाकर बेहतर स्कूलों में दाखिला मिलते है एक बच्चा अचानक मेरिट वाला बन जाता है और गांवों के स्कूलों से आईआईटी, आईआईएम के लिए मेरिट का सृजन नहीं हो पाता है। ये सीधी सी बात जानते सभी हैं, लेकिन इसे मानने और लागू करने में भारतीय समाज की सदियों पुरानी मान्यताएं बाधा उत्पन्न करती हैं। यही बाधा दलित अफसरों को और दूसरे वंचित समुदायों के अफसरों को नौकरशाही के शिखर तक नहीं पहुंचने देती।


21वीं सदी के दूसरे दशक में जब भारतीय गणराज्य अपनी 60वीं सालगिरह मना रहा है, तब देश आकांक्षाओं के विस्फोट के दौर से भी गुजर रहा है। तमाम तरह की खामोश अस्मिताएं अब मुखर हो रही हैं। ऐसे समय में देश के सबसे बड़े कुछ समुदाय अगर ये महसूस करने लगें कि गणराज्य ने उन्हें छला है, उनके अवसर छीन लिए गए हैं तो ये अच्छी बात नहीं है। भारत सरकार के लिए ये सही नहीं है किनौकरशाही के शिखर पर वंचित समुदायों की बेहद कम मौजूदगी के लिए प्रक्रिया की आड़ ले। इस सवाल पर अबदेश में बहस होनी चाहिए कि ऐसा क्य़ों है और इसे कैसे सुधारा जा सकता है। ये समाज के भी हित में है और देश के हित में भी, कि कोई समुदाय ये न समझे कि वो छल का शिकार है।

Monday, February 1, 2010

जब सवाल जाति का हो तो क्या सेकुलर(?) और क्या संघी

जब वर्धा में प्रोफेसर अनिल चमड़िया की नियुक्ति निरस्त करने का आदेश जारी किया जा रहा था, लगभग उन्हीं दिनों दूर दक्षिण में मैंगलोर यूनिवर्सिटी में भी ऐसा ही एक फैसला हो रहा था। एक यूनिवर्सिटी केंद्र सरकार की है और दूसरी यूनिवर्सिटी एक ऐसे राज्य में चल रही है, जहां बीजेपी का शासन है। एक यूनिवर्सिटी को तथाकथित प्रगतिशील का गौरवशाली नेतृत्व हासिल है तो दूसरे पर संघ की ध्वजा लहरा रही है। लेकिन जब लोकतांत्रिक आचरण की धज्जियां उड़ाने की बात हो तो दोनों विश्वविद्यालयों में अद्भुत समानताएं दिखती हैं। आप खुद ही पढ़ लीजिए। -दिलीप मंडल


बेंगलुरू: हिंदुत्व से जुड़े संगठनों के दबाव में मैंगलोर यूनिवर्सिटी ने पत्रकारिता के एक लेक्चरर से पढ़ाने-लिखाने का काम छीन लिया है। लेक्चरर एम. पी. उमेशचंद्र को पत्रकारिता के छात्रों को पढ़ाने की जगह विश्वविद्यालय के एससी/एसटी सेल में स्पेशल अफसर का काम सौंप दिया गया है। इससे पहले

विश्वविद्यालय सिंडेकेट ने उन्हें क्लास न लेने का आदेश दिया था।


मैंगलोर से बीजेपी के सांसद नलिन कुमार कतील ने मांग की है कि उमेशचंद्र के ब्राह्मण विरोधी बयानों की जांच कराई जाए। एबीवीपी ने आरोप लगाया है कि उमेशचंद्र संघपरिवार के संगठनों के खिलाफ बोलते हैं और दलित मुद्दों पर अतिवादी रुख रखते हैं।


मैंगलोर यूनिवर्सिटी के मास कम्युनिकेशन के पोस्ट ग्रेजुएशन के कुछ छात्र लेक्चरर उमेशचंद्र को विश्वविद्यालय से निकालने की मांग कर रहे थे। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद यानी एबीवीपी इस आंदोलन का समर्थन कर रही थी। आंदोलनकारी 10 दिनों से उमेशचंद्र की कक्षा का बहिष्कार कर रहे थे।


उमेशचंद्र को लेक्चरर के पद से हटाने का फैसला सिंडेकेट की बैठक में किया गया, जिसकी अध्यक्षता कार्यकारी वाइस चांसलर के के आचार ने की। बैठक के बाद रजिस्ट्रार के चिनप्पा गौड़ा ने बयान जारी करके कहा है कि सिंडिकेट उमेशचंद्र को निर्देश देती है कि अगले आदेश तक वो क्लास न लें। जब तक सिंडिकेट अगला फैसला नहीं करती है तब तक संबंधित विषयों की पढ़ाई के लिए कोई और व्यवस्था की जाएगी।


उमेशचंद्र ने कहा है कि छात्रों को राजनीतिक ताकतों ने बहकाया है और छात्रों से उन्हें कोई शिकायत नहीं है। इससे पहले हिंदुत्ववादी संगठनों ने इंग्लिश के लैक्चरर पट्टाबिरम सौमय्याजी के खिलाफ भी अभियान चलाया था क्योंकि उन्होंने इलाके में नैतिकता को लेकर जबर्दस्ती करने वालों को विरोध किया था। (द हिंदू, सकाल टाइम्स और मैंगलोरियन डॉट कॉम से मिली सूचनाओं के आधार पर।)


स्रोत:


http://www.sakaaltimes.com/SakaalTimesBeta/20100129/4983894914234162568.htm


http://beta.thehindu.com/news/cities/Mangalore/article96148.ece


http://mangalorean.com/news.php?newstype=local&newsid=166757

Wednesday, January 27, 2010

दीपक आस का

(दोस्तो, डा कुमार विनोद की ग़ज़लें आप इस ब्लाग पर पहले भी पढ़ चुके हैं. कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय मे बतौर असोसिएट प्रोफ़ेसर छात्रो को गणित की गुत्थियाँ सुलझाना सिखाते हुए विनोद जी कविता के लिए भी समय निकालते रहे. उनका ग़ज़ल संग्रह 'बेरंग हैं सब तितलियाँ' हाल ही आधार प्रकाशन से छप कर आया है. पेश है उसी संग्रह की चुनिंदा ग़ज़लें)

1

बर्फ हो जाना किसी तपते हुए एहसास का
क्या करूँ मै खुद से ही उठते हुए विश्वास का

आँधियों से लड़ कर गिरते पेड़ को मेरा सलाम
मै कहाँ कायल हुआ हूँ सर झुकाती घास का

घर मेरे अक्सर लगा रहता है चिड़ियों का हुजूम
है मेरा उनसे कोई रिश्ता बहुत ही पास का

नाउमीदी है बड़ी शातिर कि आ ही जाएगी
एक हम रोशन किए बैठे हैं दीपक आस का

देख कर ये आसमाँ को भी बड़ी हैरत हुई
पढ़ कहाँ पाया समंदर जर्द चेहरा प्यास का


2
उनकी फ़ितरत मे शरारत है ज़रा - सी
दोस्ती मे भी अदावत है ज़रा - सी

कल इसी के दम पे बदलेगी हुकूमत
आप कहते हैं - बग़ावत है ज़रा - सी

सब कहें कायर मुझे तो क्या ग़लत है
बच रही मुझमे शराफ़त है ज़रा - सी

यूँ तो कोई ऐब राजा मे नही है
खून मे शामिल सियासत है ज़रा - सी

ज़ुल्म की आँखों मे आँखें डालना भी
कौन कहता है इबादत है ज़रा - सी


3

है हवा खामोश इसका ये मगर मतलब नही
आँधियों ने डर के मारे सी लिए हैं लब, नही

सबकी हां मे हां मिला, गर्दन झुकाकर बैठ जा
करके कोशिश देखना, आसान ये करतब नही

रात के हाथो उजाले आज फिर बेचे गये
है अजूबा इसमे क्या, ऐसा हुआ है कब नही

जब कभी दैरोहरम मे चल पड़े बादेसबा
सबको देती ताज़गी है, पूछ्ती मज़हब नही

दिल मे था जो कह दिया, जो कह दिया सो कर दिया
साफ़गोई से इतर आता हमे कुछ ढब नही

4
दोस्तो, पत्थर यहाँ भगवान है
यांत्रिकता शहर की पहचान है

खून से लथपथ हर इक मंज़र यहाँ
और मस्जिद मे खुदा हैरान है

सत्य का पथ है यही तो दोस्तो
घुप अंधेरा, दूर तक सुनसान है

मुस्कुराने से नही फुर्सत इसे
है अभी बच्चा, ज़रा नादान है

और कितनी दूर तक पीछा करें
ख्वाहिशों की क्या कोई पहचान है?

(डा. कुमार विनोद से 09416137196 पर संपर्क किया जा सकता है)

Tuesday, January 12, 2010

सबसे खतरनाक है कामयाब लोगों का अलगाववाद


दिलीप मंडल
उन्हें इस देश की सड़कें नापसंद हैं। वो ज्यादातर सफर हवाई जहाज से करते हैं और हो सके तो हवाई जहाज से सिटी सेंटर तक आने के लिए हेलिकॉप्टर का इस्तमाल करते हैं। भारत में दुनिया के लगभग सारे लक्जरी ब्रांड मिलने लगे हैं लेकिन वो शॉपिंग के लिए लंदन, पेरिस और न्यूयॉर्क से लेकर सिंगापुर, दुबई तक का सफर करते हैं। दुनिया के काफी लोग सैरसपाटे के लिए भारत आते हैं पर वो अपनी हर छुट्टी ससेल्स, दक्षिण अफ्रीका, बहामास, मोनैको, बाली या अलास्का में बिताना चाहते हैं। भारत बेशक यूरोप और अमेरिका के गरीब और मध्यवर्गीय लोगों के लिए इलाज कराने का बड़ा ठिकाना बन गया है लेकिन वो इलाज के लिए यूरोप या अमेरिका ही जाते हैं। उनके बच्चे या तो विदेश में पढ़ते हैं या भारत में रहकर ही स्कूली सर्टिफिकेट किसी विदेशी स्कूल बोर्ड का ही लेते हैं ताकि हायर एजुकेशन के लिए विदेश जाने में दिक्कत न हो। उनकी सुविधा के लिए अब देश में ही कई इंटरनेशनल स्कूल खुल गए हैं जो विदेशी स्कूल बोर्ड का एक्जाम लेकर वहीं का सर्टिफिकेट देते हैँ। वो सिर्फ अपने नौकर चाकर से भारतीय भाषाओं में बात करते हैं। उनके घर विदेशों में भी हैं, जहां वो अक्सर छुट्टियां बिताने के दौरान जाते हैं। वो विदेशी पहनते हैं, विदेशी शराब पीते हैं, विदेशी ख्वाब जीते हैं।
जी हां, मिलिए भारतीय कामयाबी के नए सितारों से। ये ग्लोबल इंडियन हैं। ये भारतीय हैं क्योंकि इनकी रगों में भारतीय खून है, वरना इनकी जिंदगी में अब भारत नाम मात्र का ही बचा है। खून में भारत है इसलिए भारत इनकी मजबूरी है। कभी कभार ये देशभक्त भी बन जाते हैं, खासकर विदेशों में होने वाले क्रिकेट मैच के दौरान, जहां आप इन्हें भारतीय झंडा लहराते देख सकते हैं। ऐसे और ऐसे ही कुछ चुने हुए मौकों पर वो अपनी देशभक्ति दिखा सकते हैं। भारत से उन्हें प्यार नहीं है। देश का उनके लिए खास मतलब ही नहीं है। उनमें से कई ने खुद विदेशी नागरिकता ले ली है। कई के बाल-बच्चों ने भी ऐसा ही किया है। भारत के लिए वो दुलारे हैं इसलिए उन्हें भारत की भी नागरिकता मिली है।
देशप्रेम हो या न हो लेकिन भारत से उन्हें मतलब जरूर है। भारत के संसाधनों से उन्हें प्यार है। भारत से वो अपना धन अर्जित करते हैं। भारत के कायदे कानून उनके लिए झुकने से परहेज नहीं करते हैं। भारत की राजनीति से लेकर नौकरशाही उनके कदमों में बिछी होती है। देश के संसाधनों का ये सबसे ज्यादा इस्तेमाल करते हैं लेकिन देश का इनके लिए कोई मतलब नहीं है। किसी विदेशी एयरपोर्ट पर भारतीय या एशियाई होने के कारण अपमानित होने पर इनका देशप्रेम जगता है। इसके बाद वो नस्लभेद की शिकायत करते हैँ। देश के करोड़ों लोगों के हित का इनके लिए कोई मतलब नहीं है। पुराना इलीट भी पैसे कमाता था लेकिन साथ ही धर्मशालाएं बनवाता था, मंदिर बनवाता था, प्याऊ बनवाता था, स्कूल चलाता था। नया इलीट भूलकर भी ये सब नहीं करता। देश को लेकर भावुक होना उसकी फितरत नहीं है।
ये लोग भारत से आजाद हैं। ये कामयाब लोगों की आजादी है। राजनीतिशास्त्र के विद्वान प्रोफेसर रणधीर सिंह ने ऐसे लोगों के लिए “कामयाब लोगों के अलगाववाद” जुमले का इस्तेमाल किया है। उनके मुताबिक जब कोई व्यक्ति असाधारण रूप से कामयाब यानी अमीर हो जाता है तो वो बाकी देश से अलग हो जाता है। वो देश के बाकी लोगों की तरह नहीं जीता। जीवन के साधन से लेकर तमाम तरीकों में वो अलग ही दुनिया बसा लेता है और उसी दुनिया में वो जीता है। कामयाब लोगों के अलगाववाद के एक मॉडल के बारे में आप पढ़ चुके हैं। लेकिन कामयाबी का ये टॉप फ्लोर है। ये बाकी देश से ऊपर है और काफी अलग है। अगर 10 लाख डॉलर से ज्यादा की निवेश योग्य आय (डॉलर मिलिनेयर) को अमीरों के सुपर क्लब में शामिल होने की शर्त मानें तो 2007 में देश में ऐसे एक लाख 23 हजार लोग थे। ये संख्या एक साल में 22.7 फीसदी बढ़ी है। दुनिया के किसी और देश में डॉलर मिलिनेयर की संख्या इतनी तेजी से नहीं बढ़ी है। यही वजह से दुनिया की तमाम वेल्थ मैनेजमेंट कंपनियां जैसे मॉर्गन स्टेनले, सोसायटी जैनराल, क्रेडिट सुइस और बार्कलेज ने भारतीय महानगरों में अपने ऑफिस खोले हैं जो इन सुपर रिच क्लब के सदस्यों को पैसे संभालना और पैसे से और पैसे बनाने की कला बेचते हैं। भारत बेशक दुनिया के सबसे गरीब देशों में है और ह्यूमन डेवलपमेंट इंडेक्स में देश का नंबर बेशक 130 से भी नीचे हैं लेकिन हमारे देश का सुपर अमीर क्लब का नंबर दुनिया में 10वां है और भारत में इस इस क्लब में शामिल होने वालों की रफ्तार सबसे तेज है।
भारतीय इलीट का एक छोटा सा हिस्सा ही इस सुपर अमीर क्लब का सदस्य है। इसके अलावा भी अमीरों और धनाढ्य लोगों की एक जमात है जिसका देश से रिश्ता लगातार कमजोर हो रहा है। इस तबके के जीवन का एकमात्र लक्ष्य सुपर अमीरों के क्लब में शामिल होना है। ये उस क्लब के संभावित सदस्य हैं। सुपर अमीर क्लब के सदस्य और वेटिंग लिस्ट में शामिल लोगों से मिलकर ही भारत के कामयाब लोगों की जमात बनती है। आप दक्षिण दिल्ली के सैनिक फॉर्म को इस जमात की मॉडल कॉलोनी मान सकते हैं। दिल्ली के तेजी से अमीर हुए लोगों ने इस कॉलोनी को बसाया है। यहां रहने वालों को इस कॉलोनी के कानूनी न होने की परवाह नहीं है। कानूनी नहीं है तो यहां सरकारी तौर पर बिजली नहीं आ सकती। ऐसे में यहां के लोगों ने अपने लिए जनरेटर सेट से बिजली का इंतजाम कर लिया। नगर निगम को यहां की घरों की डिजाइन के बारे में कुछ नहीं मालूम क्योंकि इन कोठियों के ऊंचे गेट के पीछे क्या है, ये जानने की अगर उनमें इच्छा भी है तो ऐसा करने की उनमें हिम्मत नहीं है। इस कॉलोनी में लोगों के सुरक्षा के भी अपने बंदोबस्त हैं। हर घर में अपना सुरक्षा गार्ड है। सुरक्षा इक्विपमेंट हैं। ऊंची दीवार है, जिसके ऊपर कांच के टुकड़े या कंटीले तार लगे हैं। ज्यादातर घरों की रखवाली खतरनाक कुत्ते करते हैं। इस कॉलोनी का कोई कुछ नहीं बिगाड़ सका है। देश की राजधानी में ये खुला खेल सबकी नजरों के सामने हो रहा है।
और जो इलीट कॉलोनियां गैरकानूनी नहीं हैं वहां भी सुरक्षा के बंदोबस्त तो लोगों ने खुद ही कर लिए हैं। ज्यादातर कॉलोनियों में एंट्री और एक्जिट गेट के जरिए होती है, जहां प्राइवेट गार्ड तैनात होते हैं। घरों के गेट पर भी गार्ड होते हैं। क्लोज सर्किट टीवी कैमरा, और वीडिया कॉले बेल और तरह-तरह के अलार्म अब आम हैं। सुरक्षा उपकरणों का तेजी से बढ़ता बाजार बता रहा है कि अपनी सुरक्षा को अब समर्थ लोग सरकार की जिम्मेदारी मानकर निश्चिंत नहीं होते।
इस समुदाय का बहुत कुछ बाकी देश से अलग है। इनके मनोरंजन का अंदाज अलग है। इनकी पार्टियों का ढंग अलग है। जीवन का तनाव कम करने के लिए ये रेव पार्टी करते हैं। उसके किस्से ऊंची चारदीवारों के बाहर कभी छनकर आते भी हैं तो आम लोग – बड़े लोग-बड़ी बातें-कहकर नजरें फेर लेते हैं।
कामयाब लोगों के इस अलगाववाद से देश को कौन बचाएगा?

Monday, January 11, 2010

फिर पूछें कि कौन दुश्मन है ..

शेष नारायण सिंह

अपनी स्थापना के समय से ही भारत और पाकिस्तान के बीच तल्खी कई स्तर पर महसूस की जाती रही है. पाकिस्तानी हुक्मरान शुरू से जानते रहे हैं कि 1947 के पहले के भारत में रहने वाले मुसलमानों को बेवक़ूफ़ बना कर पाकिस्तान की स्थापना की गयी थी. आखिर तक, मुहम्मद अली जिन्ना ने यह नहीं बताया था कि पाकिस्तान की सीमा कहाँ होगी. क्योंकि अगर वे सच्चाई बता देते तो अवध और पंजाब के ज़मींदार मुसलमान अपनी खेती बारी छोड़ने को तैयार न होते और पाकिस्तान की अवधारणा ही खटाई में पड़ जाती. लेकिन पाकिस्तान बन गया है और वह आज एक सच्चाई है ..एक सच्चाई यह भी है कि दोनों देशों के बीच कई स्तर पर नफरत और दुश्मनी का भाव है सभ्य समाज में लगभग सभी मानते हैं कि यह दुश्मनी ख़त्म की जानी चाहिए.

भारत और पाकिस्तान के बीच दोस्ती की एक नयी पहल की गयी है. भारत और पाकिस्तान के कुछ अखबारों की कोशिश है कि दोनों देशों की जनता पहल करे और दोस्ती की जो लहर चले, वह दोनों मुल्कों के सरकारी तौर पर जिंदा रखे जा रहे दुश्मनी के भूत को भागने के लिए मजबूर कर दे. कोशिश यह है कि भारत और पाकिस्तान के बीच बनायी गयी सरहद की दीवाल इतनी नीची कर दी जाए कि कोई भी मासूम बच्चा उसे पार कर ले. दर असल पाकिस्तान का बनना ही एक ऐसी राजनीतिक चाल थी जिसने आम आदमी को हक्का-बक्का छोड़ दिया था. इसके पहले कि उस वक़्त के भारत की जनता यह तय कर पाती कि उसके साथ क्या हुआ है, अंग्रेजों की शातिराना राजनीति और भारत के नेताओं की अदूरदर्शिता का नतीजा था कि अंग्रेजों की पसंद के हिसाब से मुल्क बँट गया.

बँटवारे के इतिहास और भूगोल पर चर्चा बार बार हो चुकी है . चर्चा करने से एक दूसरे के खिलाफ तल्खी बढ़ती है. इस लेख का उद्देश्य पहले से मौजूद तल्खी को और बढ़ाना नहीं है. हाँ यह याद करना ज़रूरी है कि पाकिस्तान की भौगोलिक स्थिति चाहे जो हो, 1947 के बाद सरहद के इस पार बहुत सारे घरों के आँगन में पाकिस्तान बन गया है और वह अभी तक तकलीफ देता है ..राजनीतिक नेताओं की महत्वाकांक्षा को पूरा करने के लिए हुए बँटवारे ने अवाम को बहुत तकलीफ पंहुचायी है. दुनिया मानती है कि 1947 में भारत का विभाजन एक गलत फैसला था . बाद में तो बँटवारे क एसबसे बड़े मसीहा, मुहम्मद अली जिन्ना भी मानने लगे थे..विख्याद इतिहासकार अलेक्स टुंजेलमान ने लिखा है कि अपने आखिरी वक्त में जिन्ना ने पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री लियाकत अली खान से कहा था कि पाकिस्तान मेरी जिंदगी की सबसे बड़ी बेवकूफी है। अगर मुझे मौका मिला तो मैं दिल्ली जाकर जवाहरलाल से कह दूंगा कि गलतियां भूल जाओ और हम फिर से दोस्तों की तरह रहें. बहरहाल पछताने से इतिहास के फैसले नहीं बदलते ..

बँटवारे के बाद ,पंजाब की तो आबादी का ही बँटवारा हो गया था. सरहद के दोनों तरफ के लोग रो पीट कर एक दूसरे के हिस्से में आये मुल्क में रिफ्यूजी बन कर आज 60 साल से रह रहे हैं लेकिन उत्तर प्रदेश के बहुत सारे जिलों से लोग कराची गए थे इस लालच में कि पाकिस्तान में मुसलमानों को अच्छी नौकरी मिलेगी.यहाँ उनका भरा पूरा परिवार था लेकिन वहां से कभी लौट नहीं पाए . उनके लोगों ने वर्षों के इंतज़ार के बाद अपनी ज़िंदगी को नए सिरे से जीने का फैसला किया और वह तकलीफ अब तक है..आज भी जब कोई बेटी, जो पाकिस्तान में बसे अपने परिवार के लोगों में ब्याह दी गयी है , जब भारत आती है तो उसकी माँ उसके घर आने की खुशी का इस डर के मारे नहीं इज़हार कर पाती कि बच्ची एक दिन चली जायेगी. और वह बीमार हो जाती है . उसी बीमार माँ की बात वास्तव में असली बात है . नेताओं को शौक़ है तो वे भारत और पाकिस्तान बनाए रखें, राज करें ,सार्वजनिक संपत्ति की लूट करें, जो चाहे करें लेकिन दोनों ही मुल्कों के आम आदमी को आपस में मिलने जुलने की आज़ादी तो दें. अगर ऐसा हो गया तो पाकिस्तान और हिन्दुतान सरहद पर तो होगा , संयुक्त राष्ट्र में होगा, कामनवेल्थ में होगा लेकिन हमारे मुल्क के बहुत सारे आंगनों में जो पाकिस्तान बन गया है , वह ध्वस्त हो जाएगा.फिर कोई माँ इसलिए नहीं बीमार होगी कि उसकी पाकिस्तान में ब्याही बेटी वापस चली जायेगी . वह माँ जब चाहेगी ,अपनी बेटी से मिल सकेगी. इसलिए दोनों देशों के बड़े अखबारों की और से शुरू किया गया यह अभियान निश्चित रूप से स्वागत योग्य है ..

अखबारों की तरफ से जो अभियान शुरू किया गया है उसमें दोनों देशों की सरकारों और नेताओं को बाईपास करके लोगों के बीच संवाद शुरू करने के लिए सकारात्मक पहल की घोषणा भी की गयी है .. दोनों देशों के बीच अविश्वास और नफरत के अस्तित्व को स्वीकार करते हुए भी आपसी बात चीत के रास्ते शुरू करने का आवाहन किया गया है .कोशिश यह है कि विवादों को सुलझाने की नेताओं की कोशिश की परवाह किये बिना,दोस्ती और संवाद की बात चल निकले. आखिर सब कुछ तो एक जैसा है दोनों देशों के बीच में . संगीत, रीति रिवाज़, बोली , भाषा सब कुछ साझा है . हमारे बुज़ुर्ग तक साझी हैं., ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती , हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया, अमीर खुसरो, बुल्ले शाह , बाबा फरीद,गुरु नानक, कबीर सब साझी हैं. हमारे आस्था के केंद्र अजमेर में भी हैं और पाक पाटन में भी. .हमने आज़ादी की लड़ाई एक साथ लड़ी है. हमारा संगीत वही है . हमारे महान शायर वही हैं . हमारे ग़ालिब और मीर वही हैं और हमारे इकबाल वही हैं .. किशोर कुमार , लता मंगेश्कार, मुहम्मद रफ़ी ,गुलाम अली,आबिदा परवीन और मेहंदी हसन दोनों ही देशों के अवाम के बीच एक ही तरह के जज्बे पैदा करते है . तो फिर हम लड़ते क्यों हैं? जवाब साफ़ है . हम नहीं लड़ते. हमारे नेता लड़ते हैं .क्योंकि उनके अस्तित्व के लिए वह ज़रूरी है .... ज़रुरत इस बात की है कि सरकारों और नेताओं की परवाह न करके दोनों देशों के लोग एक दूसरे से बात चीत करें. दोनों ही देशों के अखबारों ने इस दिशा में पहला क़दम उठा दिया है ..

भारत के बहुत सारे शहरों में 16 से 24 जनवरी के बीच संगीत के कार्यक्रम आयोजित किये जा रहे हैं जिनमें भारत और पाकिस्तान के नामी संगीतकार हिस्सा लेंगें ..कैलाश खेर, राहत फ़तेह अली खां , शुभा मुद्गल ,आबिदा परवीन,गुलाम अली, हरिहरन आदि संगीतकार इस पहल की पहली कड़ी हैं .. और कोशिश करेंगें कि हमारे दोनों मुल्कों में रहने वाले इंसान एक दूसरे के खिलाफ नहीं बल्कि एक साथ खड़े हों . इस कोशिश की सफलता की कामना की जानी चाहिए.. ...

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और सामाजिक विषयों के अध्येता हैं)

Friday, January 8, 2010

लड़ाकू विमान में प्रेजिडेंट की उड़ान का मतलब

आज, 8 जनवरी 2010 के नवभारत टाइम्स में संपादकीय पृष्ठ पर भी मेरा यह लेख पढ़ा जा सकता है। ऑनलाइन एडीशन का लिंक है-
लड़ाकू विमान में प्रेजिडेंट की उड़ान का मतलब- अनुराधा

अपने सिर को हमेशा साड़ी के पल्लू से ढक कर रखने वाली 74 वर्षीया राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा देवीसिंह पाटिल ने पिछले दिनों पूरे कॉम्बैट सूट में सुखोई फाइटर जेट में उड़ान भरी। इसके महीना भर बाद ही वे भारत के इकलौते विमानवाहक पोत आईएनएस विराट पर भी सवार हुईं। हमारी राष्ट्रपति की ये पहलकदमियां स्त्री शक्ति में बढ़ोतरी और उसमें देश के भरोसे की प्रतीक हैं।

राष्ट्रपति ने अपने इन कामों से इस भरोसे को और मजबूत किया है कि महिलाएं न सिर्फ फाइटर प्लेन उड़ा सकती हैं, बल्कि इस तरह के जटिल से जटिल मोर्चे पर सफलतापूर्वक काम कर सकती हैं। हमारे पड़ोसी देश पाकिस्तान ने अपनी वायु सेना में महिला लड़ाकू विमानचालकों की भर्ती की इजाजत दी हुई है, पर भारत में इस पर रोक है। हमारे यहां ऐसा क्यों है?

पिछले साल 13 दिसंबर को केंद्र सरकार ने एक मामले में दिल्ली हाई कोर्ट से कहा कि भारतीय थलसेना और वायुसेना में महिला अधिकारियों को स्थायी कमिशन देने की कोई संभावना नहीं है क्योंकि उनकी भर्ती के लिए जगह खाली नहीं है। उसके मुताबिक सेना में पहले से ही जरूरत से ज्यादा अधिकारी भर्ती हैं। ऐसे में अगर शॉर्ट सर्विस कमिशन (एसएससी) की महिला अधिकारियों को स्थायी कमिशन दिया जाएगा, तो उन्हें कहां काम दिया जाएगा?

हमारे देश में महिला सेना अधिकारियों को स्थायी कमिशन का विकल्प नहीं दिया जाता। एसएससी के जरिए भर्ती के बाद ज्यादा से ज्यादा 14 साल की नौकरी के बाद उन्हें सेना छोड़नी पड़ती है और फिर उन्हें कोई सिविल नौकरी ढूंढनी होती है, क्योंकि पुरुष अधिकारियों की तरह उन्हें सेवानिवृत्ति पर पेंशन वगैरह की सुविधाएं देने का भी कोई प्रावधान भारतीय सेना में नहीं है।

थल और वायुसेना की 20 महिला अधिकारियों ने यह मामला कोर्ट में दायर किया है कि उन्हें पुरुषों की तरह ही स्थायी कमिशन क्यों नहीं दिया जाता, जबकि वे भी पुरुषों की ही तरह हर परीक्षा और ट्रेनिंग से गुजरती हैं। इसके जवाब में सेना ने ए. वी. सिंह समिति की रिपोर्ट के हवाले से दलील दी कि फिलहाल युवा अधिकारियों की ग्राउंड ड्यूटी के लिए ज्यादा जरूरत है इसलिए महिलाओं को सेना में नहीं लिया जा सकता। सेना की ओर से कुछ दूसरे तर्क भी पेश किए गए, जैसे महिला अधिकारी हमेशा अपनी पसंद की पोस्टिंग चाहती हैं, जबकि पुरुष उतना हो-हल्ला नहीं करते। यह भी कहा गया कि अगर महिलाओं को सीमा पर तैनाती किया जाएगा, तो वहां उनके लिए ज्यादा खतरे हो सकते हैं। हालांकि डिविजन बेंच ने इन सभी तर्कों को नकारते हुए कहा कि कोई राय भावनाओं के आधार पर नहीं बनाई जाए। साथ ही सवाल किया कि क्या यह जरूरी है कि महिला अधिकारियों को फॉरवर्ड इलाकों में ही भेजा जाए। कई दूसरी ऐसी महत्वपूर्ण जगहें हैं जहां महिलाओं की तैनाती में कोई समस्या नहीं है।

महिलाओं की सेना में भर्ती के मसले पर वायुसेना के एयर मार्शल पी. के. बारबोरा ने भी हाल में एक टिप्पणी करके सनसनी फैला दी। उनके मत में महिलाओं को फाइटर पायलट बनाना आर्थिक रूप से फायदेमंद नहीं है। फाइटर पायलट की ट्रेनिंग पर बहुत खर्च आता है। भर्ती के कुछ साल बाद शादी करके वे मां बनना चाहें तो इससे वे कम से कम 10 महीने के लिए काम से दूर हो जाती हैं। इस कारण उन पर हुए खर्च के मुकाबले उनकी सेवाओं का पूरा फायदा नहीं लिया जा पाता है। सिर्फ दिखावे के लिए उनकी भर्ती नहीं की जानी चाहिए।

भारतीय सेना में महिलाओं की भूमिका लंबे समय तक डॉक्टर और नर्स तक ही सीमित रही है। 1992 में एविएशन, लॉजिस्टिक्स, कानून, इंजीनियरिंग, एग्जेक्यूटिव जैसे काडर में रेग्युलर अधिकारियों के तौर पर भर्ती के दरवाजे उनके लिए खुले। इन पदों के विज्ञापनों के जवाब में रिक्तियों से कई गुना ज्यादा अर्जियां पहुंचीं। जोश से भरपूर महिलाओं ने रोजगार के इस नए मोर्चे पर कामयाबी के झंडे गाड़े और कई शारीरिक गतिविधियों में पुरुषों से आगे रहीं। उनमें नेतृत्व के गुण थे और सहकर्मियों और अपने अधीनस्थ सैनिकों के साथ उनका व्यवहार सकारात्मक पाया गया।

झांसी की रानी लक्ष्मी बाई, रजिया सुल्तान, बेगम हजरत महल, जीनत महल, रानी चेन्नम्मा जैसे अनगिनत नाम हैं जो युद्धों में दुश्मनों के दांत खट्टे करने में इंच भर भी पुरुषों से पीछे नहीं रहीं। सुभाष चंद्र बोस की सेना में भी महिला ब्रिगेड ने कठिन जिम्मेदारियों को बखूबी पूरा किया था। विश्वयुद्ध रहे हों या हाल के इराक, अफगानिस्तान, फॉकलैंड युद्ध, मित्र देशों की जमीनी और हवाई सेनाओं की लड़ाकू टुकड़ियों में महिलाएं बहुतायत में रही हैं। हिटलर की बदनाम एसएस सेना ने महिला दुश्मनों के साथ जरा भी ढील नहीं बरती और उन्होंने भी पुरुषों के बराबर ही मार खाई।

महिलाएं मानसिक काम ज्यादा स्थिरचित्त होकर कर पाती हैं, इसलिए आज के तकनीक प्रधान युद्ध में उनकी भूमिका ज्यादा महत्वपूर्ण हो सकती है। फिर भी हमारे देश की सीमाओं की दुर्गम स्थितियों के मुताबिक सख्त शारीरिक तैयारी की जरूरत को हल्के में नहीं लिया जा सकता। महिला सैनिकों को भर्ती के समय और बाद में एक कैडेट के तौर पर पुरुषों के समान ही शारीरिक और मानसिक क्षमता से जुड़ी कठिन ट्रेनिंग और परीक्षाओं से होकर गुजरना पड़ता है। नौकरी के दौरान भी ऐसे अभ्यास लगातार चलते रहते हैं। ऐसे में वे युद्धक जिम्मेदारियों के लिए पुरुषों के मुकाबले मिसफिट कैसे मानी जा सकती हैं?

मेजर जनरल मृणाल सुमन( सेवानिवृत्त) ने अपने एक पर्चे में साफ किया है कि दरअसल ज्यादा बड़ी समस्या पुरुषों की तरफ से इस माहौल के लिए आनाकानी है। शारीरिक दमखम वाले किसी काम में एक महिला के अधीनस्थ होना भी उन्हें पसंद नहीं आता। ऊंचे पदों पर पहुंचने के बाद भी महिला अधिकारियों को पुरुष सैनिकों की इसी मानसिकता का शिकार होना पड़ता है।

हालांकि मेजर जनरल मृणाल का कहना है कि भारत में महिला सैनिकों को अभी ज्यादा समय नहीं हुआ है और उनके साथ जिम्मेदारी के बंटवारे में अब तक भेदभाव किया जा रहा है, इसलिए इस बारे में किसी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगा। पर मुद्दे की बात यही है कि बिना पूरी तरह परीक्षा किए सिर्फ भावनाओं के आधार पर महिलाओं से यह मौका छीनना अनुचित है।

Friday, January 1, 2010

आरएसएस के लोग सबसे ज्यादा अंतरजातीय विवाह करते हैं। आश्चर्य कैसा?

जनसत्ता के संपादकीय पेज पर छपे लेख पर कुछ प्रतिक्रियाएं आईं हैं। उन्हें प्रकाशित करने में विलंब हुआ, क्षमाप्रार्थी हूं। ये चर्चा महत्वपूर्ण है, इसलिए टिप्पणियां पोस्ट की शक्ल में यहां पेश हैं। जाति के नाश में आरएसएस की भूमिका पर आप भी विचार करें। अवसर मिले तो मूल लेख को भी पढ़ें। धन्यवाद।


Dipti said...
सिर्फ़ इस तरह के बयानों से कुछ फ़ायदा होगा। ये बात मुश्किल लग रही हैं। खैर, हमारे समाज की ख़ासकर मीडिया की हालत अगर देखनी हो तो कलर्स पर शुरु हुआ नया धारावाहिक ज़रूर देखे। इस धारावाहिक की टैग लाइन ही है- ब्राह्मण का बेटा कायस्थ की बेटी। समाज में आपको ऐसी बातों के समर्थन में बातें करते तो बहुत मिल जाएंगे लेकिन, अपनी ज़िंदगी में इसे अपनाते इसके बीस फ़ीसदी भी नहीं होंगे।

December 29, 2009 2:53 PM


अनुनाद सिंह said...
हिन्दू धर्म दुनिया का सबसे खुला, स्वतंत्र और उदार धर्म है। गहराई से देखने पर वह 'सत्य की खोज' का दूसरा नाम लगता है। इसका कोई एक सम्स्थापक नहीं है; इसका कोई 'एकमात्र' धर्मग्रन्थ नहीं है (कई हजार धर्मग्रन्थ हैं) ; इसमें कहीं कोई 'अन्तिम सत्य' कहने का दावा नहीं किया गया है (यही तो विज्ञान भी करता है; 'एकं सत् विप्रा बहुधा वदन्ति'); पूजा की कोई पद्धति नहीं 'फिक्स' की गयी है।

हिन्दू धर्म जितना खुला और स्वतंत्र है उतना ही अग्रगामी विचारों का स्वामी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी है। मैं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को हिन्दू धर्म का 'मूर्त रूप' मानता हूँ। मुझे कोई आश्चर्य नहीं है कि आरएसएस के लोग सबसे अधिक अन्तर्जातीय विवाह करते हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लोग वर्ण-व्यवस्था को तत्कालीन मनीषियों द्वारा आविष्कृत एक 'सामाजिक नवाचार' (सोसल इन्नोवेशन) मानते हैं (जिसे आधुनिक अर्थशास्त्र में श्रम-विभाजन या 'डिविजन आफ लेबर' कहते हैं) और इसलिये इस पर गर्व करते हैं। किन्तु यह भी मानते हैं कि कालान्तर में (सम्भवत: अंग्रेजी राज के दिनों में) यह व्यवस्था आर्थिक लक्ष्यों को कम और राजनीतिक लक्ष्यों और कलह को ज्यादा बढ़ा रही है। वैसे भी वर्तमान समय में श्रम-विभाजन शिक्षा और परीक्षा के आधार पर सरकारों एवं कम्पनियों द्वारा तय किया जा रहा है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लोग और उससे प्रेरित संस्थाएँ मलिन बस्तियों में काम कर रहीं हैं (और कोई 'ऐडवर्टिशमेन्ट' नहीं करतीं); वे लोग दूरस्थ वनवासियों के बीच 'एकल विद्यालय' चला रहे हैं। इसलिये जो लोग इस महान संस्था को करीब से जानते हैं उन्हें इस आह्वान में न तो कुछ 'आशचर्यजनक' दिखेगा न इसमें किसी 'षडयन्त्र' की गन्ध आयेगी।

December 29, 2009 5:18 PM


Suresh Chiplunkar said...
"...ये कहा है कि जाति के बंधनों की वजह से हिंदुत्व का विकास सैकड़ों वर्षों से रुका हुआ है बल्कि मोहन भागवत हिंदुओं के अंतरजातीय विवाह को जातिवाद की समस्या के समाधान के रूप में देख रहे हैं..." भागवत जी की इस बात से पूर्ण सहमत।
अन्तर्जातीय विवाह समय की आवश्यकता है… इसे बढ़ावा दिया जाना चाहिये…।
अब आप इसे इस्लाम और ईसाई धर्मों का आक्रामक प्रचार और धर्मान्तरण अभियान कहें अथवा मजबूरी… लेकिन हकीकत यही है कि "हिन्दू एकता" के लिये जो भी करना पड़े किया जाना चाहिये…। भागवत ने एक पहल की है, देखते हैं बात कितने गहरे उतरती है…

December 29, 2009 6:13 PM


Mired Mirage said...
यदि मोहन भागवत ने ऐसा कहा है तो बहुत खुशी की बात है. वैसे बहुत से लोग विवाह प्रेम के लिए करते हैं जाति के लिए नहीं. वही सही भी है.जातिवाद तोड़ने के लिए अन्तर्जातीय विवाह अचूक हैं.
घुघूती बासूती

December 29, 2009 9:37 PM


अशोक कुमार पाण्डेय said...
यह बस दिखावे का चेहरा है।ब्राह्मणवाद हिन्दुत्व की प्राणदायिनी शक्ति है भागवत इसे बदल नहीं सकते। संघ की पूरी पद्धति इसी से संचालित है अगर वाकई वह गंभीर हैं तो साफ़ साफ़ कहें कि वह मांग ग़लत थी जब गोलवलकर ने मनु स्मृति को संविधान की जगह रखने की मांग की थी।

मामला बस यूपी में मृतप्राय भाजपा के लिये संजीवनी की तलाश का लगता है।

December 30, 2009 2:11 PM


रंगनाथ सिंह said...
रोटी-बेटी का संबंध बनने लगा तो फिर जातिवाद में बचेगा क्या ?....और फिर मामला कथनी और करनी के बीच जाकर फंस जाता है।

December 30, 2009 4:03 PM

Tuesday, December 29, 2009

आरएसएस, अंतरजातीय विवाह और जाति का अंत

-दिलीप मंडल

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सर संघचालक मोहन भागवत कहते है कि हिंदू समाज को अब मिलकर जाति पर हल्ला बोल देना चाहिए। जाति का विरोध इस समय फैशन में है। हिंदू समाज में जिस भी व्यक्ति को जाति की चोट नहीं झेलनी पड़ती और किसी खास जाति का होने का नुकसान या अपमान नहीं उठाना पड़ता, वो आसानी से कह सकता है कि मैं जाति को नहीं मानता और भारत में जातिवाद खत्म हो रहा है। ऐसे लोग बसों में साथ चलने, रेस्टोरेंट में साथ खाने और साथ नौकरी करने आदि को जाति के अंत के संकेत के रूप में देख रहे हैं। लेकिन मोहन भागवत जब ये कहते हैं कि जाति का अंत होना चाहिए तो इस पूरी चर्चा के मायने बदल जाते हैं।

मोहन भागवत की आगरा में कही गई बातों को अगर मीडिया ने सही रिपोर्ट किया है (ये खबर दर्जनों जगह छपी है और आरएसएस ने इसका खंडन नहीं किया है) तो उन्होंने न सिर्फ ये कहा है कि जाति के बंधनों की वजह से हिंदुत्व का विकास सैकड़ों वर्षों से रुका हुआ है बल्कि मोहन भागवत हिंदुओं के अंतरजातीय विवाह को जातिवाद की समस्या के समाधान के रूप में देख रहे हैं। आरएसएस प्रमुख ने ये दावा भी किया है कि हाल के किसी सर्वे के मुताबिक अंतरजातीय शादियां करने वालों में आरएसएस से जुड़े लोग सबसे आगे हैं। ऐसा सर्वे कहां हुआ है, उसका विधि क्या थी और सैंपल साइज क्या था, इस बारे में जानना रोचक होगा।

आरएसएस आज अगर इस नतीजे पर पहुंचा है कि जातिवाद से हिंदुत्व का नुकसान हुआ है तो ये शुभ है लेकिन साथ ही बेहद आश्चर्यजनक भी है। उससे भी आश्चर्यजनक है आरएसएस द्वारा हिंदुओं के अंतरजातीय विवाह का समर्थन। आरएसएस से जुड़े किसी भी आधिकारिक साहित्य में अंतरजातीय विवाह का समर्थन नहीं मिलता। जातिवाद का विरोध करना एक बात है। काफी लोग ऐसा जबानी विरोध करते हैं। घनघोर जातिवादी लोग भी जाति के खिलाफ बोलते रहते हैं। लेकिन इस समय आरएसएस का जाति व्यवस्था की जड़ों पर हमला करना और रक्त शुद्धता की अवधारणा का खंडन करना बेहद महत्वपूर्ण है। ये मानने का कोई कारण नहीं है कि आरएसएस को ये मालूम नहीं है कि इसका क्या मतलब है। जाति व्यवस्था को विरोध करना दरअसल सनातम धर्म के मूल का खंडन करना है। हम सब जानते हैं कि कोई भी हिंदू सिर्फ हिंदू नहीं हो सकता। उसे वर्णव्यवस्था की सीढ़ी में कहीं न कहीं होना ही होगा। किसी जाति का होना होगा। उस जाति के ऊपर या नीचे या ऊपर और नीचे भी किसी न किसी जाति को होना होगा। ऋग्वेद से लेकर श्रीमद्भगवतगीता की अलग अलग व्याख्याएं हिंदू धर्म के इस अविकल सत्य को स्थापित करती हैं। इस बिंदु पर हिंदू धर्म के टीकाकारों में कोई मतभेद नहीं है।

यही वजह है कि किसी हिंदू का अन्य धर्म में जाना यानी धर्मांतरण संभव है, लेकिन किसी और धर्म के व्यक्ति का हिंदू धर्म में धर्मांतरण मुमकिन नहीं है क्योंकि उसे किस जाति में रखा जाए, इसकी समस्या होती है। किसी जाति का हुए बिना रोटी का संबंध तो फिर भी कायम हो सकता है लेकिन बेटी यानी शादी का संबंध कैसे कायम हो सकता है? धर्मांतरण के नाम पर हिंदुत्ववादी संगठन शुद्धिकरण करके कुछ लोगों की हिंदू धर्म में वापसी करा पाते हैं क्योंकि शुद्धिकरण करते समय ये पता होता है कि वो व्यक्ति या समूह पहले किस हिंदू जाति में था। मिसाल के तौर पर अगर किसी दलित ने या उसके पूर्वज ने इस्लाम या कोई और धर्म अपना लिया था, तो शुद्धिकरण कर उसे फिर से दलित जाति का हिस्सा बनाया जा सकता है। लेकिन अगर किसी अन्य देश के ईसाई या मुसलमान या यहूदी व्यक्ति का हिंदू बन पाना संभव नहीं है।

ऐसी कठोर जाति व्यवस्था में बंटे समाज के लिए अगर मोहन भागवत अंतरजातीय विवाह का मंत्र दे रहे हैं तो इसका स्वागत होना चाहिए। हिंदुओं ने जाति व्यवस्था की वजह से काफी तकलीफें सही हैं और देश के विकास में ये एक बड़ी बाधा रही है। मैकाले द्वारा अंग्रेजी शिक्षा को बढ़ावा दिए जाने तक देश के बहुसंख्यक लोगों के लिए शिक्षा के दरवाजे बंद थे क्योंकि गुरुकुलों में सभी जाति के बच्चों का स्वागत नहीं होता था। अभी भी खास जाति के बच्चों के लिए खासकर गांवों में शिक्षा प्राप्त करना आसान नहीं हैं। साथ ही उत्पादन कार्यों में जुटी जातियों को ज्ञान-विज्ञान की शिक्षा से दूर रखे जाने के कारण भारत में विज्ञान की जीवंत परंपरा बन ही नहीं पाई। ज्ञान का अगर कर्म से संबंध न हो तो ज्ञान का विकास नहीं होता है। यूरोप में वर्कशॉप से निकला अनुभव शिक्षा केंद्रों तक पहुंचा और शिक्षा केंद्रों के ज्ञान की परीक्षा कार्यशालाओं में हुई। भारत में जाति की जकड़बंदी के कारण ये मुमकिन ही नहीं था। ऊंची मानी गई जातियों के लिए मरे हुए को छुने पर धार्मिक निषेध के कारण यहां चिकित्साशास्त्र में शल्य क्रिया की विधा का विकास नहीं हो पाया! ऐसी कई समस्याएं भारत में ज्ञान के विकास में बाधक रही हैं।

ऐसी ही समस्याओं की विरासत हम आज भी ढो रहे हैं। विदेशी हमलावरों के लिए हम हमेशा आसान शिकार रहे क्योंकि चंद जातियों के अलावा बाकी विशाल आबादी के लिए अस्त्र शस्त्र के संधान की तो बात छोड़िए, उन्हें छूने पर भी पाबंदी थी। फुले और आंबेडकर की परंपरा ने इन समस्याओं को काफी पहले चिन्हित कर लिया था। अब अगर आरएसएस भी इसी वैचारिक रास्ते पर चलता है तो इससे बेहतर क्या हो सकता है? लेकिन ये रास्ता आरएसएस के लिए आसान नहीं होगा। संघ का मूल जनाधार हिंदू धर्म में इतने बड़े बदलाव के लिए अभी शायद ही तैयार है। कई लोगों को ये लग सकता है कि अंतरजातीय विवाह से जाति टूटेगी और बड़ी संख्या में जाति से बाहर शादियां होने लगीं, तो जाति और प्रकारांतर में हिंदू धर्म के अस्तित्व पर ही सवाल जरूर खड़ा हो जाएगा।

ये सच है कि शहरीकरण और महिलाओं की शिक्षा और नौकरियों में बढ़ती भागीदारी के कारण अंतरजातीय शादियों को काफी बल मिला है। खासकर शहरों और महानगरों में लोग अब अंतरजातीय शादियों पर पहले की तरह नहीं चौंकते। लेकिन समाज की मुख्यधारा में इसकी मान्यता स्थापित होने में समय लगेगा। साथ ही अंतरजातीय शादियों में भी इस बात का कई बार ध्यान रखा जाता है कि वर्णों की क्रमव्यवस्था यानी हायरार्की में ज्यादा दूरी न हो। इसलिए ब्राह्मण और कायस्थ की शादियां तो फिर भी होती दिखती हैं, दलित वर और ब्राह्मण वधु जैसे जोड़े अपेक्षाकृत कम बन रहे हैं। यानी अंतरजातीय विवाहों में भी जाति का ख्याल कई बार रखा जाता है। वैसे मुंबई के दादर में हुए एक बहुचर्चित शोध (शोधकर्ता : केविन मुंशी और मार्क रोजेनविग) से ये स्थापित हुआ कि अंग्रेजी शिक्षा और अंतरजातीय विवाह का भी रिश्ता है। इस शोध से पता चला कि जिनकी शिक्षा अंग्रेजी माध्यम से हुई उनमें से 31.6% ने जाति से बाहर शादी की जबकि मराठी माध्यम में शिक्षा प्राप्त करने वालों में अंतरजातीय विवाह का प्रतिशत 10% से भी कम था।

ऐसे में क्या ये माना जाए कि हिंदुत्ववादी संगठन भी समय की बदलती चाल को भांप रहे हैं। उनका जिस शहरी मध्यवर्ग में आधार है, उनके बीच शिक्षा की बदलती प्राथमिकताओं का असर, मुमकिन है कि, ऐसे संगठनों की विचारधारा पर भी पड़ रहा है। अगर सचमुच ऐसा हो रहा है तो ये फुले-आंबेडकर विचारधारा की जीत का जश्न मनाने का समय है। उम्मीद की जानी चाहिए कि आरएसएस अपने प्रमुख के इस विचार पर कायम रहेगा और हिंदू समाज मोहन भागवत के इन विचारों का समर्थन करेगा। हिंदू समाज में व्यापक स्वीकार्यता के बावजूद महात्मा गांधी भी कभी जाति व्यवस्था के अंत की बात नहीं कर पाए। अब अगर आरएसएस हिंदू धर्म की इस कुरीति को खत्म करने के लिए अभियान चलाता है तो ये न सिर्फ हिंदू धर्म और उसके मतावलंबियों के लिए बल्कि पूरे देश के लिए शुभ होगा। ऐसे अभियान की कमान अभी तक समाज में नीचे से हुई है। आरएसएस की पहल की वजह से अब इस अभियान को एक नई दिशा मिल सकती है। ऐसा कामना की जानी चाहिए कि आरएसएस इस अभियान के लिए साहस जुटा पाएगा और 21वीं सदी में ये संगठन अपने लिए एक नया रास्ता चुन पाएगा।

हालांकि इस पहल का स्वागत करते समय एक सावधानी बरतने की भी जरूरत है। जाति के अंत की बात हाल के वर्षों में सबसे ज्यादा उन लोगों ने की है, जो आरक्षण की संवैधानिक व्यवस्था का अंत देखना चाहते हैं। आरक्षण और जाति के आधार पर दूसरे विशेष अधिकारों के विरोधियों की तरफ से ये तर्क बार बार आता है कि समाज में जातपात अब है कहां। सभी तो बराबर हैं। इसलिए अब मेरिट को ही शिक्षा और नौकरियों का एकमात्र आधार माना जाए। इस बात का ध्यान रखना होगा कि जाति विरोध और जाति के अंत की आरएसएस की कामना का निहितार्थ कहीं ऐसा न हो। जब तक जाति है, और जाति के आधार पर अवसरों में भेदभाव है, तब तक जाति के आधार पर शासन की ओर से विशेष व्यवस्था और सुविधा की जरूरत होगी। इसलिए लोकसभा और विधानसभाओं के अलावा बाकी और किसी भी तरह के आरक्षण और जाति के आधार पर विशेष सुविधाओं की व्यवस्था के साथ समय की सीमा नहीं जोड़ी गई है। जब देश में बड़ी संख्या में अंतरजातीय शादियां होने लगेंगी और जाति के आधार पर भेदभाव का अंत हो जाएगा, तब जाति का अस्तित्व नहीं रहेगा और तब आरक्षण न जरूरत होगी न ही कोई इसकी मांग करेगा।

बहरहाल इस समय हिंदू धर्म के तमाम हितरक्षकों को मोहन भागवत के सुझावों और तर्कों पर विचार करना चाहिए। अगर
मोहन भागवत ऐसा कह रहे हैं तो लगता है कि जातिरहित समाज बनाने का समय सचमुच आ गया है!

(यह लेख जनसत्ता के संपादकीय पेज पर छपा है)

Tuesday, December 1, 2009

The Sweetest Little Magenta Flower Girl

By A. Surekha Rao

Hey Guys,

I thought I must share this exqusite experience I had this morning while returning from my morning walk, I came across this little girl standing by a flower plant outside what could have been her house. She might not have been more than four mind you.

Like I usually do when I see little kids, I tried to catch her eye and smile and say hello. Guess what ? This benevolent little girl beat me to it! Even before I could smile nd say hello...this little girl plucked a magenta flower,reached out with her tiny hand and gave me the flower with a most beautiful and radiant smile on her face.

I was not expecting something this exquisite to happen to me so i took an extra split second to take in the situation. My heart just melted at this exquisite gesture this little girl made to me. I took the flower with my eyes almost misting and hugged the sweetest little girl in the whole world. I was amazed at her incredible generosity of spirit at age four !!! I instantly fell in love with her.

This incident whose fragrance will not leave me till I die made me think...
What made a little girl reach out and give a flower to a veritable stranger?
Is it due to an innate fearlessness born out of innate love and trust ?

I am known amongst my friends as a very very freindly person but the sweet little flower girl made me realie that I am freindly only with firends or acquaintances!
I am wary of strangers and very suspicious of approaching strangers.

I wondered ....have we forgotten to trust? have we forgotten to reach out and be nice? have we forgetten to make a sweet gesture without expecting anything in return? have we forgotten to smile or be nice to strangers because we fear the consequences which are largely imaginary in nature? would the world be a better place if we exchanged smiles with strangers?

The sweetest little magenta flower girl taught me that if we make a sincere and a sweet gesture out of complete trust and generosity of spirit, then our gesture might almost always be reciprocated.

Thursday, November 26, 2009

क्या फर्क है प्रिंट और वेब पत्रकारिता ?

दिलीप मंडल

वेब इस समय दुनिया का सबसे तेजी से बढ़ता मीडियम है। लेकिन सवाल ये है कि क्या कभी ऐसा समय आएगा जब वेब पत्रकारिता प्रिंट को रिप्लेस कर देगी। यानी क्या आप ऐसे समय की कल्पना कर सकते हैं जब आप समाचारों के लिए पूरी तरह से वेब पर निर्भर हो जाएं।


शायद हां और शायद नही।


दरअसल वेब तेजी से जरूर बढ़ रहा है लेकिन भारत जैसे देश में जहां इस समय ब्राडबैंड के सिर्फ ७० लाख ग्राहक हैं, वहां इंटरनेट को एक लंबा सफर तय करना होगा। अभी विश्वसनीयता से लेकर पहुंच में प्रिंट पत्रकारिता काफी आगे है। अभी भी भारत में लिखे हुए शब्द की महत्ता निर्विवाद रूप से ज्यादा है और वेब को वो स्थिति हासिल करने में काफी मशक्कत करनी होगी।
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