Sunday, May 9, 2010
वह मारा जाएगा
देहरी लांघो
लेकिन धर्म नहीं
क्योंकि यही सत्य है
पढ़ो
खूब पढ़ो
लेकिन विवेक को मत जागृत होने दो
क्योंकि यही विष (शिव) है
हँसो
जितना जी चाहे
जिसके साथ जी चाहे
पर उसकी आवाज से
देवालयों की मूर्तियों को खलल ना पड़े
क्योंकि यही सुंदर है
याद रखो
देहरी ही सत्य है
अज्ञान ही शिव है
धर्म ही सुंदर है
सत्यं शिवं सुंदरम का अर्थ
प्रेम नहीं है
जो भी इस महान अर्थ को
बदलना चाहेगा
वह मारा जायेगा
चाहे वह मेरा ही अपना लहू क्यों न हो
(प्रेम (इंसान) की हत्या के खिलाफ हमारा भी प्रतिवाद दर्ज करें
झारखंडी प्रेस एंड जर्नलिस्ट एसोसिएशन, झारखंड)
akpankaj@gmail.com
Sunday, May 2, 2010
निरुपमा पाठक के लिए न्याय
Wednesday, April 28, 2010
श्यामाप्रसाद को हां है तो भीमराव को नहीं क्यों?
दिलीप मंडल
दिल्ली की सबसे ऊंची इमारत का नाम जनसंघ के संस्थापक श्यामाप्रसाद मुखर्जी के नाम पर रखा गया है। ये इमारत दिल्ली नगर निगम की है और इस समय दिल्ली नगर निगम में भारतीय जनता पार्टी का बहुमत है। इसलिए माना जा सकता है कि बीजेपी जिन लोगों से प्रेरणा लेती है और जिन्हें महान मानती है, उनके नाम पर किसी सरकारी इमारत का नाम रखने का उसे अधिकार है। इस बात पर न तो कांग्रेस ने सवाल उठाया है न ही वामपंथी दलों ने और न ही सपा, बसपा या राजद ने। सभी राजनीतिक पार्टियां इस राजनीतिक संस्कृति को मानती हैं कि सत्ता में होने के दौरान वे किसी सरकारी योजना या भवन, पार्क, सड़क, हवाई अड्डे या किसी भी संस्थान का नाम अपनी पसंद के किसी शख्स के नाम पर रख सकती हैं। इस मामले में राजनीतिक दलों के बीच आम सहमति है। इसलिए जिस जनसंघ की विचारधारा और परंपरा से सेकुलर दलों को इतना परहेज है, उसके संस्थापक के नाम पर किसी सरकारी इमारत का नाम रखे जाने को लेकर कहीं किसी तरह का विवाद नहीं है।
इस मामले में एकमात्र व्यतिक्रम या अपवाद या विवाद आंबेडकर और कांशीराम की स्मृति में बनाए गए पार्क और स्थल हैं। इस देश में हर दिन किसी न किसी नेता की स्मृति में कहीं न कहीं कोई शिलान्यास, कोई उद्घाटन या नामकरण होता है, लेकिन विवाद सिर्फ तभी होता है जब किसी दलित या वंचित नायक के नाम पर कोई काम किया जाता हो। ऐसा भी नहीं है कि विवाद सिर्फ तभी होता है, जब बहुजन समाज पार्टी किसी दलित नायक के नाम पर कोई काम करती है। कांग्रेस के शासनकाल में मराठवाड़ा विश्वविद्यालय का नाम भीमराव आंबेडकर के नाम पर रखे जाने को लेकर कई दशकों तक हंगामा चला और कई बार विरोध ने हिंसा का रूप भी ले लिया। लगभग दो दशक तक नामांतर और नामांतर विरोधी आंदोलन और हिंसा तथा आत्मदाह की घटनाओं के बाद जाकर 1994 में मराठवाड़ा विश्वविद्यालय का नाम बाबा साहब आंबेडकर मराठवाड़ा विश्वविद्यालय रखा जा सका। नामांतर विरोधी आंदोलन को लगभग सभी बड़े राजनीतिक दलों का खुला या प्रछन्न समर्थन हासिल था।
नामांतर आंदोलन के बाद देश में इस तरह का सबसे बड़ा विवाद उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी के शासन काल में बनाए जा रहे स्मारकों को लेकर है। इस विवाद में विरोधियों के पास मुख्य रूप में ये तर्क हैं कि उत्तर प्रदेश जैसे गरीब और पिछड़े राज्य में सरकार इतनी बड़ी रकम स्मारकों पर क्यों खर्च कर रही है। दूसरा तर्क ये दिया जाता है कि बहुजन समाज पार्टी सिर्फ अपनी विचारधारा के नायकों के नाम पर स्मारक क्यों बनवा रही है। यह आरोप भी लगाया जाता है बहुजन समाज पार्टी ये सब राजनीतिक फायदे के लिए कर रही है। ये सारे तर्क बेहद खोखले हैं। अगर इन्हें दूसरे दलों की सरकारों पर लागू करके देखा जाए, तो इनका खोखलापन साफ नजर आता है। राजघाट, गांधी स्मृति, शांति वन, वीर भूमि, शक्ति स्थल, तीनमूर्ति भवन, इंदिरा गांधी स्मृति, दीन दयाल उपाध्याय पार्क आदि-आदि हजारों स्मारकों पर आने वाले खर्च की अनदेखी करके ही बहुजन समाज पार्टी सरकार पर इस मामले में फिजूलखर्ची का आरोप लगाया जा सकता है।
कांग्रेस ने अपने पार्टी से जुड़े नायकों के नाम पर जो कुछ किया है, उस पर आए खर्च की बराबरी बहुजन समाज पार्टी शायद कभी नहीं कर पाएगी। इस देश में जितने गांधी पार्क और नेहरू पार्क हैं, उतने फुले, आंबेडकर और कांशीराम पार्क बीएसपी अगले कई दशक में नहीं बना पाएगी। ये बराबरी का मुकाबला नहीं है। बीजेपी भी अपने नायकों की प्रतिमाएं और स्मारक खड़े करने में पीछे नहीं है और ये सब सरकारी खर्च पर ही होता है। हेडगेवार, गोलवलकर, विनायक दामोदर सावरकर, दीनदयाल उपाध्याय और श्यामाप्रसाद मुखर्जी के नाम को चिरस्थायी बनाने की बीजेपी ने भी कम कोशिश नहीं की है। यहां तक कि अटल बिहारी वाजपेयी के नाम पर केंद्र सरकार का एक सूचना प्राद्योगिकी संस्थान ग्वालियर में है और हिमाचल प्रदेश में भी वाजपेयी के नाम पर एक माउंटेनियरिंग इंस्टिट्यूट है। अपने नायकों को स्थापित करने में कांग्रेस और बीजेपी की तुलना में समाजवादी पार्टी, आरजेडी, बीएसपी जैसी पार्टियां काफी पीछे हैं। देश के ज्यादातर सरकारी अस्पतालों, पार्कों, सड़कों, शिक्षा संस्थानों, पुलों, संग्रहालयों, चिड़ियाघरों पर कांग्रेस के नेताओं के नाम हैं और इस गढ़ में बीजेपी ने थोड़ी-बहुत सेंधमारी की है। ये संयोग हो सकता है कांग्रेस और बीजेपी जिन नायकों के नामों को चिरस्थायी बनाने के लिए उनके नाम पर कुछ करती है, उनमें लगभग सभी सवर्ण जातियों के हैं। जबकि बीएसपी ने जिन महापुरुषों के नाम पर स्मारक बनाए हैं, वे सभी अवर्ण हैं। सिर्फ इस एक बात को छोड़ दें तो कांग्रेस, बीजेपी और बीएसपी में कोई फर्क नहीं है।
कुछ लोगों को इस बात पर एतराज हो सकता है कि गांधी और नेहरू जैसे नेताओं को खास जाति या पार्टी से जोड़कर बताया जा रहा है। यहां सवाल उठता है कि आंबेडकर जैसे विद्वान और संविधान निर्माता को दलित नेता के खांचे में फिट किया जाता है और उनके स्मारकों की अनदेखी की जाती है(दिल्ली में जिस मकान में रहने के दौरान उनका देहांत हुआ, उसके बारे में कितने लोग जानते हैं और इसकी तुलना गांधी स्मृति या तीन मूर्ति भवन से करके देखें) तो जाति के प्रश्न की अनदेखी कैसे की जा सकती है। एक विश्वविद्यालय का नाम आंबेडकर के नाम पर रखने के सरकार के फैसले को अगर दो दशक तक इसलिए लंबित रखा जाता हो कि कुछ लोग इसके खिलाफ हैं, तो इसकी जाति के अलावा और किस आधार पर व्याख्या हो सकती है? जाति भारतीय समाज की एक हकीकत है और जिसने जाति की प्रताड़ना या भेदभाव नहीं झेला है, वही कह सकता है कि भारत में जाति का असर नहीं है। जाति का अस्तित्व और उसके प्रभाव को संविधान भी मानता है और कानून भी। जो जाति को नहीं मानते, उन्हें भी कोई न कोई जाति अपना मानती है।
ऐसे में सवाल सिर्फ इतना है कि गांधी, नेहरू, इंदिरा गांधी, हेडगेवार और श्यामाप्रसाद मुखर्जी की स्मृति को जिंदा रखने में अगर कोई बुराई नहीं है तो फुले, शाहूजी महाराज, आंबेडकर, कांशीराम की स्मृति को स्थायी बनाने के लिए प्रयास करने में कोई दोष कैसे निकाला जा सकता है? पिछड़ी और दलित जातियों के मुसलमानों के नायकों की भी स्थापना होनी चाहिए। बल्कि ये वे काम हैं, जो स्थगित थे और उन्हें अब पूरा किया जाना चाहिए। आखिर हर किसी को अपने नायक चाहिए। महाविमर्श के अंत के बाद अब कोई नायक हर किसी का नायक नहीं है। आज दलित और वंचित अपने नायकों की स्थापना कर रहे हैं। देश के लिए ये शुभ है। इससे घबराना नहीं चाहिए।
(यह लेख 28 अप्रैल को नवभारत टाइम्स के संपादकीय पेज पर छपा है)
Friday, March 26, 2010
मायावती की माला आपको बुरी क्यों लगती है?
उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री और बहुजन समाज पार्टी की अध्यक्ष कुमारी मायावती की माला को लेकर राजनीति और भद्र समाज में मचा शोर अकारण है। मायावती ने ऐसा कुछ भी नहीं किया है जो वर्तमान राजनीतिक संस्कृति और परंपराओं के विपरीत है। नेताओं को सोने चांदी से तौलने और रुपयों का हार पहनाने को लेकर ऐसा शोर पहले कभी नहीं मचा। नेताओं की आर्थिक हैसियत के खुलेआम प्रदर्शन का ये कोई अकेला मामला नहीं हैं। सड़क मार्ग से दो घंटे में पहुचना संभव होने के बावजूद जब बड़े नेता हेलिकॉप्टर से सभा के लिए पहुंचते हैं, तो इससे किसी को शिकायत नहीं होती। करोड़ों रुपए से लड़े जा रहे चुनाव के बारे में देश और समाज अभ्यस्त हो चुका है। मायावती प्रकरण में अलग यह है कि वर्तमान राजनीतिक संस्कृति का अब दलित क्षेत्र में विस्तार हो गया है। धन पर बुरी तरह निर्भर हो गए भारतीय लोकतंत्र का यह दलित आख्यान है जो दलित पुट की वजह से कम अभिजात्य है और कदाचित इस वजह से कई लोगों को अरुचिकर लग रहा है। साठ करोड़ रू का चारा घोटाला लगभग 30,000 करोड़ रू के टेलिकॉम घोटाले या ऐसे ही बड़े दूसरे कॉरपोरेट घोटालों की तुलना में लोकस्मृति में ज्यादा असर पैदा करता है, तो इसकी वजह घोटाले का भोंडापन ही है। मधु कोड़ा इस देश के सबसे भ्रष्ट नेताओं की लिस्ट में बहुत पीछे होने के बावजूद अपने भ्रष्टाचार के भोंडेपन की वजह से मध्यवर्ग की घृणा के पात्र बनते हैं, जो उन्हें बनना भी चाहिए, लेकिन हर तरह का भ्रष्टाचार समान स्तर की घृणा पैदा नहीं करता।
मायावती की माला को लेकर छिड़े विवाद से भारतीय राजनीति में धन के सवाल पर बहस शुरू होने की संभावना है और इसलिए आवश्यक है कि इस प्रकरण की गहराई तक जाकर पड़ताल की जाए। इस पड़ताल के दायरे में ये सवाल हो सकते हैं- क्या मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टियों और भारतीय मध्यवर्ग को माला प्रकरण को लेकर मायावती की निंदा करने का अधिकार है, क्या मायावती का वोट बैंक इस विवाद की वजह से नाराज होकर उनसे दूर जा सकता है, राजनीति और चुनाव में धन की संस्कृति का स्रोत क्या है और क्या उत्तर प्रदेश में मायावती की राजनीति का कोई दलित-वंचित विकल्प हो सकता है।
सबसे पहले तो इस बात की मीमांसा जरूरी है कि क्या मायावती कुछ ऐसा कर रही हैं, जो अनूठा है और इस वजह से चौंकानेवाला है। अगर मायावती के जन्मदिन पर हुए समारोह की इस आधार पर आलोचना की जाए कि राजनीति में ये धनबल का प्रदर्शन है, तो सिर्फ मायावती या बसपा ही इसके लिए दोषी कैसे हैं? धनबल भारतीय राजनीति की अस्थिमज्जा में इतने गहरे समा चुका है कि लगभग अथाह रुपयों के बिना संसदीय राजनीति करने की कल्पना भी नहीं की जा सकती। जिन लोगों को मायावती को पहनाई गई नोटों की माला को देखकर उबकाई आ रही है, उन्हें दरअसल उबकाई उस दिन भी आनी चाहिए थी जब ये पता चला था कि दुनिया के सबसे गरीब देशों में से एक, भारत की लोकसभा में 2009 के आम चुनाव के बाद 300 से ज्यादा करोड़पति (करोड़पति यानी वे, जिन्होंने चुनाव आयोग को दिए हलफनामे में अपनी जायदाद एक करोड़ रुपए से ज्यादा घोषित की है। उनकी वास्तविक हैसियत और अधिक हो सकती है) सांसद पहुंचे हैं। ये संख्या पिछली लोकसभा से दोगुनी है। लोकसभा के एक सांसद की औसत घोषित जायदाद 5 करोड़ रुपए से ज्यादा है और लोकसभा के सभी एमपी की सम्मिलित जायदाद 2,800 करोड़ रुपए से ज्यादा है।
राजनीति में धन के संक्रमण की बीमारी राष्ट्रव्यापी हो चली है। महाराष्ट्र में अक्टूबर 2009 के विधानसभा चुनाव में 184 करोड़पति विधायक चुनकर आए। महाराष्ट्र विधानसभा में कुल 288 सीटें हैं। हरियाणा में हर चार में से तीन विधायक करोड़पति है। हरियाणा में भी महाराष्ट्र के साथ ही विधानसभा चुनाव हुए। साथ ही ये बात भी साबित हो गई है कि जिस उम्मीदवार के पास ज्यादा पैसे हैं, उसके जीतने के मौके ज्यादा हैं। मिसाल के तौर पर, नेशनल इलेक्शन वाच ने आंकड़ों का अध्ययन करके बताया है कि महाराष्ट्र में अगर किसी के पास एक करोड़ रुपए से ज्यादा की जायदाद है तो 10 लाख रुपए या उससे कम जायदाद वाले के मुकाबले उसके जीतने के मौके 48 गुना ज्यादा हैं।
इस संदर्भ में भारत के पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन की पहल पर किए गए चुनाव सुधारों की चर्चा की जानी चाहिए। शेषन के मुख्य चुनाव आयुक्त रहने के दौरान उम्मीदवारों पर, चुनाव खर्च की सीमा के अंदर चुनाव लड़ते हुए दिखने का दबाव पहली बार बना। वे आर्थिक उदारीकरण (बाजार अर्थव्यवस्था) के भी शुरुआती वर्ष थे। शेषन से पहले भी चुनाव खर्च की सीमा तो थी, लेकिन इसे एक औपचारिकता माना जाता था। उम्मीदवार मनमाना खर्च करते थे और अपना खर्च तय सीमा के अंदर दिखा देते थे। इस समय तक चुनावों में तड़क-भड़क खूब होती थी। पोस्टरों और झंडों से गलियां पट जाती थीँ। लगभग हर दीवार पर किसी न किसी उम्मीदवार या पार्टी के नारे लिखे होते थे। झंडे-बैनर से लेकर जुलूसों में गाड़ियों और मोटरसाइकिलों की संख्या आदि से किसी उम्मीदवार को मिल रहे समर्थन का एक हद तक अंदाज लग जाता था। बसों में भरकर लोग आते और खूब बड़ी-बड़ी रैलियां हुआ करती थीं।
लेकिन चुनावी खर्च की सीमा को सख्ती से लागू किए जाने के बाद चुनाव में माहौल बनाने के ये तरीके बेअसर हो गए। मतदाताओं में संवाद कायम करने, उन तक पहुंचने के पुराने तरीके अब किसी काम के नहीं थे क्योंकि तय सीमा से ज्यादा गाड़ियां चुनाव प्रचार में शामिल नहीं हो सकती थीं, पोस्टर कहां लगाया जा सकता है और कहां नहीं और किसी की दीवार पर नारे लिखने से किसी उम्मीदवार को दिक्कत हो सकती है, जैसे नियमों ने चुनाव लड़ने के तरीके को निर्णायक रूप से बदल दिया। शेषन से पहले के दौर वाले चुनाव प्रचार के परंपरागत तरीकों में ऐसा लग सकता है कि काफी तड़क-भड़क होती होगी, लेकिन ये तरीके काफी हद तक सभी उम्मीदवारों की पहुंच के अंदर थे। अगर किसी उम्मीदवार को कार्यकर्ताओं का समर्थन हासिल होता था, तो उसके लिए दीवार लेखन करना, पोस्टर छापना, झंडे लगाना, बैनर टांगना, साइकिल-मोटरसाइकिल या गाड़ियों का जुलूस निकालना बहुत मुश्किल काम नहीं होता था और न ही इन कामों में करोड़ों रुपए खर्च होते थे।
परंपरागत तरीके के चुनाव प्रचार में उम्मीदवार समान धरातल पर होते थे और किसी उम्मीदवार के झंडे किसी की छत पर लगे रहें या पोस्टर किसी के घर की दीवार पर चिपके रहें, ये पैसे से ज्यादा उसे हासिल समर्थन से तय होता था। इन सब तरीकों को मुश्किल बना दिए जाने के बाद पैसे के कुछ नए खेल शुरू हो गए, जिनसे चुनावी खर्च कई गुना बढ़ गया। मिसाल के तौर पर, किसी इलाके के प्रभावशाली व्यक्ति को अपने पक्ष में करने के लिए किए गए खर्च का हिसाब न देने का रास्ता अब भी खुला है। चुनाव से पहले प्रशासन के सहयोग से मतदाताओं के बीच शराब पहले भी बांटी जाती थी और अब भी बांटी जाती है। चुनाव में खुद खर्च न कर किसी समाजसेवी या स्वंयसेवी संगठन के माध्यम से किसी विरोधी उम्मीदवार के खिलाफ अभियान चलाया जा सकता है, जिसका खर्च उम्मीदवार के चुनाव खर्च में शामिल नहीं होता। चुनाव पर खर्च करना नेताओं के लिए किसी निवेश की तरह है क्योंकि नेता बनना आमदनी के अनेकों नए रास्ते खोलता है। सांसदों और विधायकों के चुनाव आयोग में जमा आमदनी के हलफनामों का अध्ययन करके साबित किया जा चुका है कि जीते हुए उम्मीदवार अगले चुनाव तक काफी अमीर हो जाते हैं। मिसाल के तौर पर, उम्मीदवारों के हलफनामों के अध्ययन से पाया गया कि महाराष्ट्र में 2004 के विधानसभा चुनाव जीतने वाले एक औसत उम्मीदवार ने 2009 के चुनाव तक अपनी जायदाद में 3.5 करोड़ रुपए जोड़ लिए थे।
चुनाव जीतना जब इस कदर फायदे का सौदा हो तो जिताऊ पार्टियों के चुनावी टिकट पाने के लिए खर्च करने वालों की कमी कैसे हो सकती है। फर्क सिर्फ इतना है कि कांग्रेस-बीजेपी आदि में पैसे का ये खेल अभिजात्य सफाई के साथ किया जाता है जबकि बाकी पार्टियों में उपयुक्त राजनीतिक संस्कार न होने के कारण खेल खुल जाता है। साथ ही मुख्यधारा में बीएसपी, आरजेडी, जेएमएम जैसी कुछेक पार्टियां ऐसी बच गई हैं, जिनके आर्थिक स्रोतों में कॉरपोरेट पैसे की हिस्सेदारी काफी कम है। मायावती की माला की आलोचना में मुखर तीनों राजनीतिक पार्टियों, कांग्रेस, बीजेपी और सपा के कॉरपोरेट संबंध जगजाहिर हैं। कॉरपोरेट रिश्तों को निभाने में बड़ी पार्टियां ज्यादा विश्वसनीय मानी जाती हैं, इसलिए कंपनियों के रास्ते से आने वाले धन पर उनकी ही हिस्सेदारी होती है। दक्षिण भारत की राज्यस्तरीय कई पार्टियों ने भी कॉरपोरेट जगत के साथ अपने रिश्ते जोड़ लिए हैं। कॉरपोरेट संबंधों के बगैर जब कोई दल पैसे जुटाता है या पैसे जुटाने की कोशिश करता है, तो उसमें उसी तरह का भोंडापन नजर आता है, जिसके लिए बीएसपी, आरजेडी या झारखंड मुक्ति मोर्चा जैसी पार्टियां बदनाम मानी जाती हैं।
वामपंथी दलों के अपवाद को छोड़कर ढेर सारे पैसे के बगैर राजनीति में सफल होने का कोई महत्वपूर्ण मॉडल इस समय मौजूद नहीं है, इसलिए जो नेता पैसे जुटा सकता/सकती है, उसी की राजनीति चल सकती है। इस तंत्र को समझे बगैर ये अंदाजा नहीं लगाया जा सकता है कि मायावती पैसे जुटाने पर इतना जोर क्यों देती हैं और लालू प्रसाद या शिबू सोरेन पैसे के लिए इतने बेताब क्यों नजर आते हैं। जिन दलों को कंपनियों से पैसे मिलते हैं, वो इन सब गंदे दिखने वाले कामों से परे रहकर राजनीतिक कदाचार और सदाचार की बात कर सकते हैं। राजनीति के लिए धन जुटाने के कॉरपोरेट और गैर-कॉरपोरेट दोनों ही खेल में विजेता नेता और हारने वाली जनता होती है। वैसे तुलना करके देखें तो राजनीति और कॉरपोरेट का संबंध जनता के लिए ज्यादा खतरनाक होता है, क्योंकि इसका असर नीतियों पर होता है। निजी भ्रष्टाचार की तुलना में नीतियों में भ्रष्टाचार कई गुणा ज्यादा लोगों को प्रभावित करने में सक्षम होता है।
एक सवाल ये भी है कि क्या मायावती की समर्थक जनता को इस तरह के विवाद से कोई फर्क पड़ता है? शायद नहीं। दलितों में इस समय पहचान की जिस तरह की राजनीति चल रही है, उसमें नेताओं की समृद्धि कोई शिकायती मुद्दा नहीं है। मुमकिन है कि अपने नेता को इतना समृद्ध देख कर गरीब दलित भी खुश होते हों कि उनका नेता भी कम हैसियत वाला नहीं है। दलित नेताओं के पहनावे और तामझाम पर जोर को और गांधी और अंबेडकर के पहनावे में फर्क को इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए। दलितों को अपना नेता फकीर नहीं चाहिए क्योंकि ये तो उनके जीवन की असलियत है। वे तो इस स्थिति से उबरना चाहते हैं। खुद न भी सही तो प्रतीकों के जरिए ही वे अपना सशक्तिकरण देखते हैं और महसूस करते हैं। यहीं एक सवाल ये भी उठता है कि क्या दलित राजनीति किसी बेहतर राजनीतिक संस्कृति को सामने ला सकती है। इस सवाल के जवाब में यही कहा जा सकता है कि वर्तमान संसदीय राजनीति के दायरे में, जहां पैसे की खनक राजनीति की दिशा को निर्णायक रूप से तय करने लगी है, दलित राजनीति का कोई अलग रास्ता संभव नहीं है। उत्तर प्रदेश के पूर्वी हिस्से में संसदीय राजनीति के दायरे से बाहर वामपंथियों के कुछ समूह अलग तरह के राजनीतिक प्रयोग कर रहे हैं, जिनमें दलितों और आदिवासियों की अच्छी-खासी हिस्सेदारी है। लेकिन इनसे कांग्रेस, बीजेपी और समाजवादी पार्टी ही नहीं, बीएसपी को भी डर लगता है। इनका दमन माओवादी बताकर किया जा रहा है। ( ये लेख संपादन के बाद जनसत्ता के संपादकीय पेज पर छपा है।)
Monday, March 15, 2010
'औकात' तक सिमटता वजूद
मुंबई के सायन उपनगर का एक फ्लैट। 29 साल की रंजन तैयार हो रही है। रविवार होने की वजह से दफ्तर में तो छुट्टी है, पर रंजन जल्दी-जल्दी तैयार हो रही है। ऐसा लगता है, उसे कहीं पहुंचना है और देर हो रही है। काम वाली बाई घर साफ करते हुए उस कमरे में आती है। रंजन को तैयार होते देख बोलती है, 'आज तो संडे है, आज किधर जाने का है?'
रंजन उसे एक नजर देखती है, 'संगीता मुलुक से कब लौटने वाली है?' काम वाली बताती है, 'अबी 10 दिन हैं।' रंजन बोलती है, 'तुम कल से नहीं आना काम पर। मैं संगीता से बात कर लेगी।' इतना कहते हुए रंजन बैग उठाकर निकल जाती है।
दरअसल, संगीता रंजन के घर का कामकाज देखती है। उसे गांव जाना था, इसलिए उसने छुट्टी ली और अपनी जगह कुछ दिनों के लिए इसे रखवा गई। मगर, यह नई कामवाली अपने काम से काम रखने के बदले रंजन की जिंदगी में दिलचस्पी लेने लगी। अपनी निजता में यह दखलंदाजी रंजन को पसंद नहीं आई, उसने उसे चलता कर दिया। मगर, संगीता से उसके रिश्तों में कोई बदलाव नहीं आया। गांव से लौटने के बाद संगीता फिर रंजन के घर काम करने लगी।
मुंबई में दफ्तर में काम करने वाली एक कामकाजी लडक़ी और उस लडक़ी के घर काम करने वाली बाई के बीच, या किसी ईरानी रेस्तरां में कॉफी का ऑर्डर देने वाले ग्राहक और लेनेवाले वेटर के बीच या फिर कार में बैठे साहब और उनके लिए सोसाइटी का मेन गेट खोलते वाचमैन के बीच वैसा ही प्रफेशनल रिश्ता होता है जैसा किसी कंपनी के मालिक और उस कंपनी के कर्मचारियों के बीच होता है। यह रिश्ता दोनों पक्षों की जरूरत से निर्देशित होता है। इसमें न तो एक पक्ष में दूसरे के लिए अनावश्यक आदर का भाव होता है और न ही दया या सहानुभूति का। रंजन ने काम वाली बाई को निकालते समय यह नहीं सोचा कि मैं निकाल दूंगी तो इस बेचारी का क्या होगा, न ही उसने कामवाली के लिए हिकारत का भाव दर्शाया।
मगर, दिल्ली में ये रिश्ते इतने सुलझे हुए नहीं नजर आते। मिस्टर दीक्षित एक बड़ी कंपनी में ऊंचे पद पर हैं। वह जब भी अपनी बीएमडब्लू से घर लौटते हैं, चाहे ऑफिस से आ रहे हों, या परिवार के साथ कोई फिल्म देखकर या फिर अपने किसी दोस्त को एयर पोर्ट से रिसीव कर - अपनी पॉश सोसाइटी के सामने आकर कार के अंदर से जब वह कहते हैं, 'बहादुर गेट खोलो', तो आवाज का कडक़पन और आदेशात्मक लहजा छिपा नहीं रह पाता। बहादुर के कान भी इस कडक़पन के इस कदर आदी हो चुके लगते हैं कि अगर किसी आवाज में यह कडक़पन नहीं रहता, इसके बदले विनम्रता जैसी कोई चीज होती है तो बहादुर को उस आवाज पर शक हो जाता है और यह शक खुद उसकी आवाज में कडक़पन घोल देता है. कहां से आए हैं, किससे मिलना है, जैसे उसके सवालों में वही कडक़पन आ जाता है जो मिस्टर दीक्षित जैसों की आवाज की खासियत है।
आवाज में यह कडक़पन लाना जैसे दिल्ली के खाते-पीते घरों के लोगों की जरूरत बन गया है। चाहे ऑटो वालों से किराया कम करने को कहना हो या सब्जी वालों से मोलभाव करना हो- आवाज में यह कडक़पन हर जगह नजर आता है। अगर आपकी आवाज में कडक़पन नहीं तो आपकी औकात संदिग्ध है।
सवाल यह है कि 'औकात' इतनी जरूरी चीज क्यों हो जाती है दिल्ली में? मुंबई में यह क्यों नहीं होती? क्या ऐसा है कि मुंबई में इसे जताने के तरीके दूसरे हैं? या फिर यह कि दिल्ली में हमारा पूरा वजूद औकात तक सिमटकर रह गया है?
Wednesday, March 10, 2010
लोकविमर्श, असहमति का निषेध और षड्यंत्रपूर्ण शांति
मुंबई को कोई मुंबई न कहे या चेन्नई और कोलकाता को उनके पुराने नाम से पुकारे तो क्या ऐसे शख्स को देश या इन शहरों में रहने का हक नहीं होना चाहिए? इसी तरह किसी महिला के कपड़े की लंबाई कम हो या घेरा पतला तो क्या इस बात के लिए उस पर पत्थर फेंके जाने चाहिए? क्या कोई प्रेमी एक दूसरे को वेलंटाइन डे पर फूल भेंट करें या सार्वजनिक स्थानों पर कमर में हाथ डालकर घूमें तो ऐसी लड़की को इस बात के लिए मजबूर किया जाना चाहिए कि वो अपने साथी के हाथों में राखी बांधे? क्या फिल्मकार को इस बात का हक नहीं है कि वो ऐसी फिल्में बनाए, जिसके विचारों से लोग सहमत न हों और इसी तरह क्या लेखक और कवि को कोई भी रचना करने या चित्रकार को पेंटिंग बनाते और फोटोग्राफर को फोटो खीचने से पहले ये सोचना होगा कि समाज का सेंसर इसे पास करेगा या नहीं? कुछ लोगों के विरोध की वजह से क्या रचनाकर्मी और कलाकर्मी खुद ही अपने हाथों में हथकड़ी डाल लें?
ये सारे सवाल आज प्रासंगिक हैं और ऐसे ही सैकडों अन्य सवाल हैं जो आज पूछे जाने चाहिए क्योंकि इस समय विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर एक बार फिर से हमला तेज हो रहा है।
लोकतंत्र में लोकविमर्श यानी पब्लिक स्फेयर का महत्व निर्विवाद है। एक निजी व्यक्ति के जनता या समूह बनने और अपनी राजनीतिक इच्छा और विचारों को अभिव्यक्त करने की प्रक्रिया इस लोकविमर्श से ही उपजी है। आधुनिक लोकतंत्र की जन्मभूमि यूरोप में कॉफी हाउसों से लेकर चर्च और ट्रेड यूनियन से लेकर मास मीडिया तक इस लोकविमर्श के माध्यम बने और राजतंत्र से लोकतंत्र की दिशा में बढ़ने में इसका काफी योगदान रहा। लोकविमर्श का मूल स्वभाव आलोचनात्मक माना गया और इसके लोक उपयोगी तरीके से काम करने की शर्त ये है कि इस पर सरकार या बडे़ वित्तीय हितों का दबाव न हो। अगर लोकविमर्श में असहमति की गुंजाइश न हो तो फिर वो लोकविमर्श नहीं है।
जर्मन दार्शनिक हायबरमास के इन सिद्धातों को देश विदेश के लाखो विद्यार्थी पढ़ते हैं और इसकी तमाम तरह की आलोचनाओं के बावजूद लोकतांत्रिक प्रक्रिया में इसके महत्व को लेकर लगभग आम राय है। आज जबकि विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने की घटनाएं बढ़ रही हैं, तो इसे सिर्फ व्यक्ति के निजी अधिकारों का हनन मात्र नहीं माना जाना चाहिए। ये लोकविमर्श के दायरे को संकुचित करने की कार्रवाई है और प्रकारांतर में ये लोकतंत्र के लिए खतरनाक है। इसका विरोध इसी व्यापक परिप्रेक्ष्य में ही किया जाना चाहिए और इसी तरह का विरोध कारगर भी हो सकता है।
भारत में विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमले कई तरफ से हो रहे हैं। हालांकि मास मीडिया के मीडिया बाजार में तब्दील होने के दौर में सरकार की भूमिका घटी है। भारत में सरकार की ओर से लोकविमर्श पर नियंत्रण करने की सबसे बड़ी कोशिश इमरजेंसी के दौर में हुई थी, जब मीडिया सेंसरशिप लागू करके विरोध का गला घोंटने की कोशिश की गई। ये सेंसरशिप सिर्फ अखबारों और पत्रिताओं ही नहीं बल्कि हर तरह के प्रकाशनों पर लगाई गई थी। लेकिन उसके बाद से सरकारों ने कभी खुले तौर पर सेंसरशिप लागू करने की कोशिश नहीं की। ये बात और है कि सरकारों के पास कई ऐसे उपकरण हैं और 30 से ज्यादा ऐसे कानून हैं जिसके जरिए वो समाचारों, सूचनाओं और विचारों के प्रसार को रोक सकती है या रोकती है।
विचारों पर नियंत्रण का दूसरा और ज्यादा महत्वपूर्ण पहलू अब बाजार है। विचारों के लोकतंत्र पर ये ऐसा नियंत्रण है जो जोर जबर्दस्ती लागू नहीं किया जाता। संचार माध्यम इसे स्वेच्छा से लागू करते हैं क्योंकि इसके साथ उनका अर्थशास्त्र जुड़ा हुआ है। इस बारे में बड़ी संख्या में शोध कार्य हुए हैं, जिनसे पता चलता है कि संचार माध्यमों का अर्थशास्त्र किस तरह से एक फिल्टर यानी छननी का काम करता है। आर्थिक उदारीकरण के बाद भारत में ये फिल्टर ज्यादा असरदार हो गया है।
लेकिन इस समय विचारों पर लगे जिस पहरे की ज्यादा चर्चा है वो समाज के अतिवादियों की तरफ से आया है। किसी समाज में अलग अलग समय में अतिवादी विचारों के मानने वालों की संख्या और उनके विचारों के असर में कमी-बेसी होती रहती है। विचारों के लोकतंत्र से हर तरह के अतिवादी विचार को खतरा होता है। अतिवादी विचारधारा धर्म से लेकर जाति और राजनीतिक विचारों से जुड़ी हो सकती है। इनमें साझा बात ये है कि ये सहिष्णुता को अपना दुश्मन मानती हैं और इस मायने में ये सरासर अलोकतांत्रिक है। कोई भी परिपक्व लोकतंत्र विरोध के ढेर सारे स्वरों को सुनने की उदारता बरतता है। ये स्वर तीखे भी हों तो उसकी लोकतंत्र में गुंजाइश होती है और होनी चाहिए।
ऐसे में किसी फिल्म में मुंबई को मुंबई न कहने पर हंगामा करे, किसी चित्र से असहमति होने की वजह से चित्रकार को मारने का फतवा देने, किसी पत्रिका को माओवादी बताकर उसके संपादक को जेल में बंद कर देने, किसी के कम या अलग तरीके के कपड़े पहनने पर उसके साथ दुर्व्यवहार करने, वेलंटाइन डे पर कार्ड और फूल देने को भारतीय संस्कृति के खिलाफ बताते हुए दुकानों में तोड़फोड़ करने, फिल्मों से पोस्टर फाड़ने, जबरन गानों के बोल बदलवाने, किताबों को प्रतिबंधित करने, जलाने, नुक्कड़ नाटकों का प्रदर्शन रोकने जैसी लगातार हो रही घटनाएं ये बताती हैं कि भारतीय लोकतंत्र का शैशव काल अभी समाप्त नहीं हुआ है।
दरअसल इस तरह असहमति को कुचलने की कोशिश करने वाले सभी लोग इस बात की अनदेखी करते हैं कि असहमति के बगैर लोकतंत्र निर्जीव हो जाएगा। ऐसा करना खास तौर पर आपत्तिजनक है जब जब ऐसा काम वे राजनीतिक संगठन करते हैं जो लोकतांत्रिक प्रक्रिया में शामिल होते हैं और चुनाव जीतकर सरकार भी चलाते हैं। असहिष्णुता एक ऐसा विचार है, जिसके आसपास लोगों की गोलबंदी मुमकिन है, लेकिन इसके खतरों को समझना जरूरी है। लोकतांत्रिक विमर्श की गुंजाइश का कम होना अलग अलग समय में अलग अलग दलों के लिए मारक साबित हो सकता है। और ऐसा न भी हो तो लोकतंत्र का तेज इस वजह से कम होता ही है।
(राष्ट्रीय सहारा के हस्तक्षेप में 9 मार्च 2009 को प्रकाशित)
Sunday, February 28, 2010
पहले दिल में थे, अब बटुए में हैं
(मोनिका रांची, झारखंड में पब्लिक एजेंडा पत्रिका से जुड़ी हैं।)
मोहनदास करमचंद गांधी। हमारे और आपके लिए भले ही यह नाम आज देश का सर्वप्रिय और सबसे सम्मानित संस्था का हो, लेकिन इसके अनुसरण का हर मौका हाथ से जाता रहता है और लोग इसके मूक गवाह बने देखते रह जाते हैं।
गांधी की सामयिकता आज की तारीख में भौतिकता को छोड़कर कहीं नज़र नहीं आती। जिस सत्य के लिए गांधी ने जोहान्सबर्ग से लेकर साबरमती तक जुल्म सहे, उसी सत्य का आज बेशर्मी के साथ संहार हो रहा है। गांधी की जन्मभूमि गुजरात में ही उनके सबसे प्रबल हथियार "अहिंसा' की धार कुंद कर दी गयी। जिन-जिन बातों से गांधीजी ने देश को निषेधात्मक धारा में ले जाने की कोशिश की थी, उन्हीं रास्तों पर आज बलता के साथ लोग आगे बढ़ रहे हैं।
सवाल उठ रहे हैं कि आज की तारीख़ में गांधी हैं कहां? क्या गांधी की ज़रूरत देश को है? जवाब भी खुद देशवासी ही देते हैं- हां गांधी की ज़रूरत है, लेकिन मेरे घर में नहीं, पड़ोस में। कुल मिलाकर गांधी की सर्वव्यापकता को संकुचित करने में भारत ने कोई कसर नहीं छोड़ी है। आज गांधीजी की प्रासंगिकता कहीं सबसे ज़्यादा दिखती है, तो वह है नोट में। नोट असली है कि नकली, यह जांचने के औजार के रूप में इस्तेमाल होते हैं गांधीजी। नैन-नक्श, चश्मा, लाठी सब ठीक है तभी नोट की दूसरी तकनीकी बिंदुओं की जांच की जाती है। अगर सब कुछ ठीक है, तो गड्डियों में एक के ऊपर एक तह लगाकर गांधी को भी तिजोरियों की भेंट चढ़ा दिया जाता है।
और, आज गांधी सीमित हैं चौक-चौराहों तक। देश के हर भूभाग में एक गांधी चौक या एक गांधी चौराहा तो आपको ज़रूर मिल जायेगा। इन चौराहों पर "आधे गांधी' हैरत के साथ इस आधुनिक भारत के भागदौड़ को देखते नज़र आयेंगे। चौक-चौराहों में टिकाये गये गांधी देखते रहते हैं कि किस बेशर्मी के साथ उनकी प्रतिमा के सामने खड़े होकर पुलिसवाले ट्रैफिक के कथित नियमों को तोड़ने का हवाला देकर लोगों से पैसे ऐंठ रहे हैं।
पिछले 60 वर्षों में इस देश ने गांधी के नाम को सिर्फ भुनाया ही है। गांधीवाद को एक कवच की तरह पहना है। गांधीजी की पदयात्रा का अनुसरण आज भी होता है, लेकिन सिर्फ वोट मांगने के लिए। नेता एक शहर से दूसरे शहर और गांव की पगडंडियों में चलते आज भी नज़र आते हैं लेकिन सिर्फ चैनलों को बाइट देने के लिए। उनके साथ एसी गाड़ियों की लंबी कतार उन्हें आरामदेह यात्राएं कराने के लिए हमेशा साथ रहती हैं। गांधीजी स्वराज और सत्य के लिए जेल भी गये थे। आज भी लोग जेल जा रहे हैं और सच भी बोल रहे हैं कि हां, हमने खाये देश के करोड़ों रुपये। गांधीजी सूत कातते थे और खादी पहनते थे, हम भाषण कात रहे हैं और वाहवाही पहन रहे हैं।
गांधी आज एक मेहमान हो चुके हैं, जो साल में दो बार आते हैं - पहली बार दो अक्तूबर को, दूसरी बार तीस जनवरी को। गांधी जयंती पर हम खुश हो जाते हैं कि पता नहीं अगर ये सख्श न होता, तो हम किस अंग्रेज गवर्नर के यहां जूते साफ कर रहे होते और आज तक गुलामी की जंजीरों में जकड़े रहते। शुक्र है कि इस अर्द्धनग्न महापुरुष ने हमें आज़ाद तो कराया। और, साहब पुण्यतिथि को तो लोग ज़रूर आंसू बहाते हैं, इसलिए नहीं कि इस दिन गांधीजी दुनिया से विदा हुए थे, बल्कि इसलिए क्योंकि तीस जनवरी को सरकारी छुट्टी नहीं होती ना। लोग सोचते हैं और मन ही मन सरकार को कोसते हैं कि काश! आज छुट्टी होती, तो मल्टिप्लेक्स में एक मज़ेदार फिल्म देख आते और ब्रेकफास्ट से लेकर डिनर तक का मजा बाहर ही उठाते, लेकिन हाय रे सरकार छुट्टी नहीं देती। लोगों को तो इतने में भी संतोष नहीं।
देश में आज भी ऐसे एहसानफरामोशों की कमी नहीं, जो आज गांधी को इस बात के लिए कोसते हैं कि क्यों दिलाई हमें आजादी? अच्छे भले ब्रिटिश शासन में थे। कम से कम आज की तरह भ्रष्ट सरकारों से तो हम त्रस्त नहीं थे। अब उन्हें कौन समझाये कि गांधी ने आपको इसलिए आज़ादी नहीं दिलायी थी कि आप खुद भ्रष्ट लोगों को चुनकर संसद भेजें, बल्कि उन्होंने तो भारत और भारतवासियों के कल्याण के सिवा कुछ सोचा ही नहीं था। फिर, गांधी की जगह दिल से हटकर पर्स तक ही सीमित कैसे हो सकती है?
Wednesday, February 24, 2010
कॉमरेड, आपने मुसलमानों के साथ ये क्या किया?
(ये लेख संपादन के बाद 23 फरवरी जनसत्ता के संपादकीय पेज पर छपा है।)
अपने नाम में कम्युनिस्ट लगाने वाली पार्टियों का आग्रह होता है कि उन पर कोई और आरोप लगाइए लेकिन कम से कम उन्हें सांप्रदायिक मत कहिए। भारत में कम्युनिस्ट नाम से चल रही पार्टियों पर ये आरोप लगाने में उनके विरोधी भी परहेज करते हैं। लेकिन पहले ज्योति बसु और अब बुद्धदेव भट्टाचार्य के नेतृत्व में पश्चिम बंगाल सरकार का मॉडल लगातार इस धारणा को तोड़ रहा है कि वामपंथी हैं और तो अल्पसंख्यक विरोधी नहीं हो सकते। बल्कि पश्चिम बंगाल का पिछले 33 साल का अनुभव बताता है कि वामपंथी होने की आड़ में और मुसलमानों को सुरक्षा देने के नाम पर उन्हें ज्यादा सहजता से दबाकर रखा जा सकता है। उन्हें हर तरह के अवसरों से वंचित रखा जा सकता है। ये सब इतनी इतनी सहजता से हुआ है कि जिसे मारा जा रहा हो, उसे दशकों तक मारे जाने के दर्द का एहसास भी न हो। ये एक अलग तरह की हिंसा है, जिसका एहसास पश्चिम बंगाल के मुसलमानों को अब जाकर हुआ है। इसलिए सीपीएम मुसलमानों के वोट को लेकर इन दिनों इतनी चिंतित है। इसलिए पश्चिम बंगाल देश का पहला राज्य है, जिसने मुसलमानों की हालत पर विचार करने के लिए बने रंगनाथ मिश्रा आयोग की रिपोर्ट को सबसे पहले मान लिया है और मुसलमानों में पिछड़े वर्गों के लिए नौकरियों में 10 फीसदी आरक्षण देने की घोषणा की है।
पश्चिम बंगाल में एक चौथाई आबादी मुसलमान है। कहते हैं कि वाममोर्चा सरकार मुसलमानों की रक्षक है। ये सरकार मुसलमानों की पिछले 33 साल से रक्षा कर रही है, 23 साल तक उनकी रक्षा ज्योति बसु ने की और अब बुद्धदेव भट्टाचार्य यही कर रहे हैं। पश्चिम बंगाल में दंगे नहीं होते। दंगे बिहार में भी नहीं होते। मुसलमानों की आर्थिक और शैक्षणिक हालत दोनों राज्यों में बेहद खराब है। दंगे न होने को वाम मोर्चा के नेता और लालू प्रसाद यादव मेडल की तरह पहनते रहे। सवाल ये है कि क्या मुसलमानों को इसलिए खुश रहना चाहिए कि वो सुरक्षित हैं और इस नाते क्या वो ये भूल जाएं कि विकास और जीवन के तमाम मानदंडों पर वो पिछड़ रहे हैं? क्या सुरक्षा और विकास में से किसी समुदाय को एक ही चीज मिल सकती है? पश्चिम बंगाल में अब मुसलमानों का मिजाज थोड़ा उखड़ा-उखड़ा सा है। ये तब से शुरू हुआ है जब पश्चिम बंगाल सरकार ने बताया है कि एक चौथाई आबादी मुसलमानों की होने के बावजूद राज्य की नौकरियों में सिर्फ 2.1 फीसदी मुसलमान हैं। और पश्चिम बंगाल सरकार के अपने उपक्रमों यानी स्टेट पीएसयू में तो उच्च पदों पर सिर्फ 1.2 फीसदी मुसलमान हैं। पश्चिम बंगाल सरकार ने ये आंकड़ा सच्चर कमेटी को दिया और सच्चर कमेटी की रिपोर्ट में ये सब छप कर आ गया। पश्चिम बंगाल सरकार ये भी नहीं कह सकती कि राज्य सरकार की नौकरियों और स्टेट पीएसयू में मुसलमान इसलिए नहीं हैं क्योंकि केंद्र सरकार का उसे सहयोग नहीं मिलता। न ही वो ये कह सकती है कि उसे पूंजीवादी ढांचे में ही काम करना होता है और उसमें कई मजबूरियां होती हैं। जबकि केरल में मुस्लिम आबादी का प्रतिशत लगभग बराबर है पर वहां राज्य सरकार की नौकरियों में साढ़े दस फीसदी मुसलमान हैं। दंगा प्रदेश गुजरात में राज्य सरकार की नौकरियों में 5.4 फीसदी मुसलमान हैं जबकि गुजरात में 9.1 फीसदी मुसलमान हैं।
समस्या पश्चिम बंगाल की सामाजिक बनावट में हो सकती है, लेकिन कॉमरेड इसे 33 साल में भी क्यों नहीं बदल पाए। कॉमरेडों के पास कांग्रेस के इस आरोप का भी जवाब नहीं है कि वामपंथियों की सरकार बनने से पहले राज्य की नौकरियों में अब के मुकाबले ज्यादा मुसलमान थे। अब बात सिर्फ सरकारी नौकरियों की होती तो कई सफाई दी जा सकती थी। लेकिन शिक्षा, बैंको से दिया गया कर्ज, बैंकों में जमा धन, हर मानदंडों पर पश्चिम बंगाल के मुसलमानों का हाल बदहाल है। शिक्षा की बात करें तो पूरे देश में 40 फीसदी मुसलमान मीडिल पास करते हैं जबकि पश्चिम बंगाल में ये संख्या 26 फीसदी है। पूरे देश में 24 फीसदी मुसलमान मैट्रिक तक की पढ़ाई पूरी करते हैं लेकिन पश्चिम बंगाल में सिर्फ 12 फीसदी मुसलमान ही मैट्रिक तक की पढ़ाई पूरी कर पाते हैं। पश्चिम बंगाल सरकार का ये कहना काफी नहीं है कि मदरसों को वो काफी धन देती है, क्योंकि मदरसा शिक्षा रोजगार नहीं दिला सकती।
पश्चिम बंगाल में मुसलमान बैंकों में खाता तो खूब खुलवाते हैं (राज्य के 29 फासदी बैंक खाते मुसलमानों के हैं) लेकिन प्रायोरिटी सेक्टर लैंडिंग यानी सरकार के कहने पर जिन क्षेत्रों को अपेक्षाकृत सस्ता कर्ज मिलता है, उसमें मुसलमानों का हिस्सा सिर्फ 9.2 फीसदी है। पश्चिम बंगाल में औसतन एक बैंक खाते में 30,000 रुपए जमा हैं, जबकि औसत मुसलमान के खाते में सिर्फ 14,000 रुपए जमा हैं। सच्चर कमेटी की रिपोर्ट में ये आंकड़े विस्तार से हैं। मुश्किल ये है कि पश्चिम बंगाल में मुसलमान शिक्षा के क्षेत्र में पिछड़े हुए हैं, ड्रॉपआउट रेट बहुत ज्यादा है, सरकारी नौकरियां उन्हें मिलती नहीं हैं और निजी रोजगार करने के लिए बैंक लोन मिलना आसान नहीं है। इसे किसी समुदाय के खिलाफ हिंसा की श्रेणी में क्यों नहीं रखा जा सकता?
साथ ही पश्चिम बंगाल देश के उन राज्यों में है, जहां वंचित तबकों को सबसे कम रिजर्वेशन दिया जाता है। पश्चिम बंगाल में दलित, आदिवासी और ओबीसी को मिलाकर 35 प्रतिशत आरक्षण है। पिछड़े मुसलमानों के लिए 10 फीसदी आरक्षण की अभी घोषणा ही हुई है, उसे अभी लागू किया जाना है। वहां ओबीसी के लिए सिर्फ सात फीसदी आरक्षण है। अभी तक कानूनों के मुताबिक, मुसलमानों को आरक्षण इसी ओबीसी कोटे के तहत मिलता है। तमिलनाडु में ओबीसी कोटा 50 फीसदी, केरल में 40 फीसदी और कर्नाटक में 32 फीसदी है। इसलिए इन राज्यों में उन मुसलमानों के लिए रोजगार और शिक्षा के बेहतर मौके हैं, जो ओबीसी लिस्ट में शामिल हैं। मिसाल के तौर पर तमिलनाडु में मुसलमानों की लगभग पूरी आबादी(95 फीसदी) ही ओबीसी कटेगरी में आती है। आप समझ सकते हैं कि अगर बंगाल में ओबीसी को सिर्फ सात फीसदी आरक्षण दिया जा रहा है तो ये किस तरह मुसलमानों के हितों के भी खिलाफ गया। ये बात भी गौरतलब है कि ओबीसी आरक्षण लागू करने वाले बड़े राज्यों में पश्चिम बंगाल आखिरी था। और तो और पश्चिम बंगाल में उच्च शिक्षा में ओबीसी आरक्षण अभी भी लागू नहीं है।
काफी समय तक वहां कॉमरेड ये बोलते रहे कि पश्चिम बंगाल में वर्ग है, जाति तो है ही नहीं। कोलकाता के अखबारों के मेट्रीमोनियल पेज इस झूठ का हर दिन, हर हफ्ते, हर साल और साल दर साल पर्दाफाश करते रहते हैँ। पश्चिम बंगाल में नौकरियों से लेकर जीवन के हर क्षेत्र में चंद जातियों की वर्चस्व क्या किसी से छिपा है? राज्य में सीपीएम की सत्ता संरचना में भी मुसलमानों की निर्णायक पदों पर गैरमौजूदगी है। पश्चिम बंगाल कहा जाता है कि जिलों में जिला कलेक्टर से ज्यादा असरदार सीपीएम का डिस्ट्रिक्ट सेक्रेटरी होता है। इस महत्वपूर्ण पद पर आपको मुसलमान बिरले ही दिखेंगे। इस बारे में विस्तार से अध्ययन करने की जरूरत है कि ऐसा पार्टी में किन स्तरों पर है और ये समस्या कितनी गंभीर है।
बहरहाल एक रोचक घटना अक्टूबर, 2007 में हुई जब राज्य के मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने प्रदेश के सचिवालय में मुस्लिम संगठनों की एक बैठक बुलाई। बैठक में मिल्ली काउंसिल, जमीयत उलेमा-ए-बांग्ला, जमीयत उलेमा-ए-हिंद, पश्चिम बंगाल सरकार के दो मुस्लिम मंत्री और एक मुस्लिम सांसद शामिल हुए। बैठक की जो रिपोर्टिंग सीपीएम कीपत्रिका पीपुल्स डेमोक्रेसी के 21 अक्टूबर, 2007 के अंक में छपी है उसके मुताबिक मुख्यमंत्री ने कहा कि सच्चर कमेटी ने राज्य में भूमि सुधार की चर्चा नहीं की। उनका ये कहना आश्चर्यजनक है क्योंकि सच्चर कमेटी भूमि सुधारों का अध्ययन नहीं कर रही थी। उसे तो देश में अल्पसंख्यकों की नौकरियों और शिक्षा और बैंकिग में हिस्सेदारी का अध्ययन करना था। बुद्धदेव भट्टाचार्य ने आगे कहा- "ये तो मानना होगा कि सरकारी और प्राइवेट नौकरियों में उतने मुसलमान नहीं हैं, जितने होने चाहिए। इसका ध्यान रखा जा रहा है और आने वाले वर्षों में हालात बेहतर होंगे।"
सवाल ये उठता है कि पश्चिम बंगाल में मुसलमानों का अगर ऐसा बुरा हाल था, तो देश दुनिया में पश्चिम बंगाल सरकार की मुस्लिम परस्त छवि कैसे बनी। बीजेपी को आखिर तक समझ में नहीं आया कि पश्चिम बंगाल में सीपीएम न सिर्फ हिंदू पार्टी है और हिंदू सवर्ण वर्चस्व वाली पार्टी है, इसलिए उसे कभी भी वहां पैर जमाने का मौका नहीं मिला। पश्चिम बंगाल के हर तीन में से दो मंत्री या तो ब्राह्मण हैं या कायस्थ या वैद्य। शायद ये भी एक वजह है कि बीजेपी का हिंदुवाद पश्चिम बंगाल में नहीं चला क्य़ोंकि वह सीपीएम के सवर्ण हिंदुवाद का मुकाबला नहीं कर पाया।
दरअसल पश्चिम बंगाल के मुसलमानों में मध्यम वर्ग लगभग नदारद है। इसलिए नौकरियों से लेकर शिक्षा और बैंक लोन तक मिलने में हो रहे भेदभाव को लेकर उनमें आंदोलन का तेवर नहीं रहा। फिलस्तीन पर इजरायली हमले, डेनमार्क में कार्टून विवाद, इराक पर अमेरिकी हमले, तस्लीमा नसरीन के लेखन जैसे मुद्दों पर ही उनकी गोलबंदी वामपंथी पार्टियां करती रही हैं। ये सच है कि सीपीएम ने मुसलमानों की सुरक्षा सुनिश्चित करके उन्हें फौरी समस्या से बचा लिया। साथ ही मुसलमानों के हित में बोलने में सीपीएम की बराबरी इस समय मुख्यधाऱा की कोई भी पार्टी शायद ही कर सकती है। सच्चर कमेटी ने बेशक पश्चिम बंगाल सरकार को नंगा कर दिया, लेकिन रिपोर्ट आते ही सीपीएम ने मांग की थी कि सच्चर कमेटी की रिपोर्ट लागू की जाए।
पिछले साल हुए लोकसभा चुनाव से पहले जारी घोषणापत्र में भी सीपीएम ने अल्पसंख्यकों के लिए अलग से एक हिस्सा रखा जिसमें इक्वल ऑपुर्चुनिटी कमीशन बनाने, सच्चर कमेटी की रिपोर्ट लागू करने और मुस्लिम बहुल जिलों में रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य के क्षेक्ष में विशेष पहल करने की बात की। तो आप देख सकते हैं कि हकीकत और छवि का निर्माण किस तरह दो अलग अलग बातें हैं। पिछले लोकसभा चुनाव में सीपीएम का सिर्फ एक मुसलमान सांसद पश्चिम बंगाल से चुनाव जीत सका। मुस्लिम बहुल इलाकों में पार्टी को करारी हार का सामना करना पड़ा। पश्चिम बंगाल में बीजेपी का एक सक्षम चुनौती के रूप में मौजूद न होना अब सीपीएम के लिए मुसीबत है। भय और सुरक्षा की राजनीति की सीमाएं अब साफ नजर आने लगी हैं। उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह की भी ऐसी ही मुश्किल है। इन जगहों में मुसलमान अब भय और सुरक्षा के अलग दूसरे चुनावी गणित के आधार पर वोट देने की हालत में हैं। कॉमरेड सचमुच मुसीबत में हैं। विधानसभा चुनाव से पहले अब इतना समय नहीं है कि पश्चिम बंगाल में मुसलमानों के साथ न्याय किया जा सके। न ही पश्चिम बंगाल और सीपीएम का सामाजिक ढांचा इस तरह नौरी के सीमित अवसरों को मुसलमानों पर लुटाने की इजाजत देगा।
Sunday, February 14, 2010
ब्रूनो की बेटियां (कवि-आलोकधन्वा) पूर्व पुलिस अफसर के हरम में...
Saturday, February 13, 2010
संत वेलंटाइन और महाराज मनु का मुकाबला
दरअसल ये कभी न कभी होना ही था। इसमें देर सिर्फ इसलिए लगी कि भारत में औद्योगीकरण और शहरीकरण की रफ्तार कमजोर है। मुंबई और कोलकाता में जब कारखाने खुले तो कैंटीनों में साथ खाने का चलन शुरू हुआ और इस तरह रोटी ने जाति की सीमा लांघ ली। बसों में और ट्रेन-ट्राम आदि सार्वजनिक परिवहन के साधनों में साथ सफर करने, साथ बैठकर सिनेमा-थिएटर देखने, मेले-ठेलों-मॉल-बाजार में साथ घूमने आदि से छुआछूत के बंधन कमजोर पड़े। शहरों में रहने वाले ये हठ नहीं पाल सकते थे कि कोई छू गया तो नहाना होगा ना ही किसी के लिए ये संभव था कि पूरा हॉल बुक कराकर फिल्म देखे। तो इस तरह जो चीज हजारों साल में नहीं बदली वो दशकों में बदल गई।
इसके अलावा औद्योगीकरण ने कर्म और जाति के बंधनों को कमजोर कर दिया। भारत में जाति व्यवस्था सिर्फ ऊंच-नीच की यानी समाज में हायरार्की तय करने की व्यवस्था नहीं है। बल्कि जाति उत्पादन संबंधों और कर्मों को निर्धारित करने वाली व्यवस्था भी है। जाति व्यवस्था के तहत हर व्यक्ति की जन्म के साथ सिर्फ जाति तय नहीं होती, बल्कि उसका कर्म भी तय हो जाता है। भारत में हर जाति के साथ एक कर्म जुड़ा है। ऐसा लगभग दो हजार साल तक चला। तमाम सुधार आंदोलनों, भक्ति आंदोलनों और मुस्लिम और ईसाई शासन के झंझावातों को जाति की संस्था झेल गई। लेकिन ग्राम समाज से शहरी समाज में हो रहे संक्रमण और आधुनिकता ने वो कर दिखाया, जिसे बड़े-बड़े समाज सुधारक नहीं कर पाए थे।
आज शहरों में कोई ये नहीं कहेगा कि किसी जाति को कोई खास काम करना होगा। यहां तक कि शौचालय साफ करने के काम में भी सवर्ण जातियों के काफी लोग लगे हैं। सुलभ आंदोलन की बात करें,या सरकारी स्तर पर स्वीपर्स की नियुक्ति की या फिर फास्ट फूड ज्वायंट और मॉल्स की, सफाई के काम में अब सिर्फ दलित शायद ही कहीं हैं। देश में अब सबसे ज्यादा धन का सृजन सेवा क्षेत्र में हो रहा है और इस क्षेत्र में आने के लिए ब्राह्मणों से लेकर दलितों तक में बराबर की होड़ लगी है। सेवा शूद्रों का काम है, बोलने वाले अब हास्य के पात्र हैं। रिटेलिंग, बैंकिग, इंश्योरेंस से लेकर हेल्थकेयर और हॉस्पिटालिटी जैसे समाम सेक्टर में हर जाति समूह के लोग काम करते हैं।
जाति व्यवस्था मे एक के बाद एक दरारें लगातार आती गईं और अब इस पर निर्णायक प्रहार वहां हो रहा है, जिसकी शुद्धता के बिना जाति बच ही नहीं सकती। ये प्रहार विवाह संस्था के वर्णवादी स्वरूप पर हो रहा है। शहरों ने युवक-युवतियों के बीच संबंधों को नया स्तर प्रदान किया है। खासकर महिलाओं की आर्थिक आजादी ने उन्हें संबंधों के मामले में भी ज्यादा आजाद होने का अवसर दिया है। अलग अलग जाति के युवक युवतियों के लिए मिलने जुलने के अवसर भी अब पहले से काफी ज्यादा हैं। शिक्षा संस्थाओं से लेकर दफ्तरों और काम करने की तमाम जगहों से लेकर क्लब-पार्क और इंटरनेट तक अब प्रेम की नई-नई संभावनाएं प्रदान कर रहे हैं। जाति व्यवस्था को सख्ती से लागू करने वाली व्यवस्था भी शहरों में ढीली है।
अगर आप शहरों या महानगरों में रहते हैं तो शादी के ऐसे कार्ड आपके पास अक्सर पहुंच रहे होंगे,जिसमें शादी तय करने में परिवार या कुनबे की भूमिका नहीं होगी। इसका मतलब ये कतई नहीं है कि आधुनिकता अनिवार्य रूप से जाति का ध्वंस कर रही है। इंटरनेट युग ने जहां मिलने जुलने और रिश्ते बनाने के अबाध मौके उपलब्ध कराए हैं वहीं शादी की साइट्स ने जातिवादी होने की हर सुविधा प्रदान की है। अमूमन हर मेट्रिमोनियल साइट आपको जाति के अनुसार वर और वधु छांटने की सुविधा देती है। यहां तक की वर्चुअल स्पेस में भी आप आप अपनी जाति और गोत्र तक के ग्रुप बना सकते हैं। ऑर्कूट से लेकर फेसबुक तक में जातियों के ग्रुप बन गए हैं जहां एक ही जाति के लोग वर्चुअल स्पेस में मिलते बतियाते हैं।
ये जाति की जीवनी शक्ति और वक्त के मुताबिक उसकी अनुकूलन क्षमता का एक और प्रमाण है। दरअसल शादी के मामले में जाति के ऊपर प्यार की निर्णायक जीत अभी नहीं हुई है। जाति संस्था लगभग दो हजार से अगर जिंदा है और फलफूल रही है तो इसकी यही वजह है कि उसमें इतना लोच है कि वो समय के मुताबिक खुद को ढाल ले। इस बार स्थिति इस मायने में अलग है कि जाति पर इस बार का हमला किसी सुधारक की इच्छा या उपदेश की वजह से नहीं हो रहा है। इस बार जो चीज बदल रही है वो है सामंती उत्पादन संबंध। जाति व्यवस्था की प्राणवायु सामंती उत्पादन संबंध ही है। अगर उत्पादन के रिश्ते बदल जाएंगे तो जाति नहीं बचेगी। भारत इस समय तेजी से बदल रहा है। सर्विस और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर ने खेती को पीछे छोड़ दिया है। देश की जीडीपी यानी सकल घरेलू उत्पाद में खेती का हिस्सा घटकर 18 फीसदी से भी कम रह गया है। इस बदलाव का असर समाज पर भी हो रहा है। आपके पास आने वाले शादी के कार्डों में दिख रहे नाम अगर बदल रहे हैं तो इसका रिश्ता बदलते उत्पादन संबंधों से भी हैं। हर जाति के लोग, अगर अपने लिए तय काम नहीं करेंगे, और जाति के बाहर शादियां होने लगेंगी तो फिर जाति व्यवस्था में बचेगा ही क्या?
क्या आप इस बदलते समय की आहट सुन पा रहे हैं?

