Custom Search

Wednesday, October 22, 2008

मुख्यमंत्री लाख मना करें, महिलाएं तो निकलेंगी। अपनी सुरक्षा के कुछ टिप्स


बेंगलूरु में फिरौती के लिए उस महिला के अपहरण की घटना और सौम्या विश्वनाथन की हत्या जैसी घटनाओं के बीच देश की राजधानी और दूसरे शहरों की भी महिलाओं में अपनी सुरक्षा को लेकर चिंता की स्थिति और फिर राज्य की महिला मुख्यमंत्री का यह कहना कि "Driving at 3 AM alone in a city, which people believe is not very safe for women after dark...one should not be adventurous". इसके बाद अब सरकार की ओर से भी किसी पुख्ता कदम की उम्मीद नहीं की जा सकती।

ऐसे में, और वैसे भी जरूरी है कि हम अपनी सुरक्षा आप करने की पहल करें। अपराधों के खिलाफ कुछ अंतर्राष्ट्रीय संगठनों के सुरक्षा टिप्स के कुछ पॊइंट्स हम सब जानें, समझें और अमल में लाने की कोशिश करें। आखिर अपनी सुरक्षा की सबसे पहली जिम्मेदारी खुद की है।


पैदल चलते समय-


हमेशा सतर्क रहें। अपने आस-पास के लोगों, माहौल के बारे में सजग और चौकन्ने रहें, खास तौर पर अंधेरी, संकरी जगहों पर।

जहां तक हो सके, अंधेरी जगहों में न जाएं, रौशनी वाले इलाके में ही रहें।

हो सके तो पतली गलियों से न गुज़रें, चौड़े, खुले और आबादी वाले रास्तों से जाएं।

झाड़ियों, पगडंडियों, दरवाजों के पीछे कोई छुपा हो सकता है, इसलिए इनसे से दूर हट कर चलें।

पूरे आत्मविश्वास के साथ एक-समान चाल से चलें।

आस-पास चल रहे लोगों से नज़रें चुराने की कोशिश न करें। सहज रहें।

रास्ते में अजनबियों से बातचीत के जवाब में रुकें नहीं, चलते रहें।

दौड़ो! अगर कोई गले पड़ ही जाए तो विपरीत दिशा में दौड़ें। इससे हमारे आस-पास के लोग सजग हो जाएंगे और हमें मदद मिल पाएगी।

शोर मचाएं! खतरे की आशंका को भांपते ही ज्यादातर जानवर शोर मचाने लगते हैं। हम भी अपनी इस मूल प्रवृत्ति को जागृत करें और खतरे में औरों से मदद मांगें।

बस में यात्रा करते समय-

किसी खाली बस स्टॊप पर रहने से बचें।

बस के आने तक सड़क के एकदम किनारे पर खड़े होने से बचें।

सहयात्रियों के प्रति सतर्क रहें। एकदम खाली बस में चढ़ने के पहले दोबारा सोचें।

सहयात्री परेशान करे तो सीट बदल लें और ड्राइवर/कंडक्टर को बताएं।

खाली बस में जहां तक हो सके ड्राइवर के नज़दीक वाली सीट पर बैठें।

ताई कोन डो- हमारी कुहनी शरीर का सबसे मज़बूत हिस्सा है। दुश्मन ज्यादा करीब हो तो इसका इस्तेमाल करें।

अगर वह दो फुट की दूरी पर हो तो ताई कोन डो की एक और चाल है- अपने पैर के एड़ी से अंगुलियों तक के फ्लैट हिस्से से सामने वाले की टांगों के बीच नीचे से ऊपर की ओर जम कर आघात करें। अगला कितना भी मज़बूत हो, डगमगाएगा जरूर। तब तक हमें बचने का समय मिल जाएगा।

कार में-

कार में बैठने के बाद और उसे छोड़ते समय दरवाजों को अच्छी तरह बंद करके लॊक करें।

अच्छी रौशनी वाले इलाके में पार्क करें, कोने-किनारों में पार्किंग से बचें, खास तौर पर शाम और रात को।

पार्किंग स्थल में आने के पहले ही कार की चाबियां हाथ में रखें ताकि वहां ज्य़ादा समय न गुजारना पड़े।

कार में चढ़ने के बाद सबसे पहले दरवाजों को लॊक करें फिर ही उसका गियर लॊक आदि खोल कर चलने की कार्रवाई करें।

कइयों को आदत होती है- खरीददारी के बाद कार में बैठ कर सारे सामान, बिल और पैसों का हिसाब-किताब करने की। यह काम कार के दरवाजों को लॊक करने के बाद ही करें। बेहतर है, घर जा कर करें। हो सकता है कोई ताक में बैठा हो। उसके लिए तो यह सुनहरी अवसर होगा!

कार के अंदर आने के पहले देख कर सुनिश्चित कर लें कि पीछे और ड्राइवर के बगल की सीट पर कोई बैठा तो नहीं।

अगर आपकी कार के बगल में खड़े वाहन में संदेहास्पद पुरुष बैठा है तो सतर्क हो जाएं। चाहें तो वापस अपने दफ्तर/दुकान में जाएं और गार्ड/ पुलिस या किसी सहयोगी की मदद लें।

अगर लगे कि कोई आपकी कार का पीछा कर रहा है तो किसी सार्वजनिक स्थान, पुलिस थाने या फायर स्टेशन पर रुक जाएं।

औरतें फितरतन संवेदनशील होती हैं, पर रास्ते में अजनबी युवकों की खराब गाड़ी पर दया दिखाना भारी भी पड़ सकता है। रास्ते में किसी खराब हुए दोपहिया वाहनचालक की मदद के लिए वहां खुद न रुकें बल्कि मदद के लिए अपने सेल फोन से या पास के फोन बूथ से किसी को फोन करके बुलाएं।

Sunday, September 28, 2008

बेटियों के नाम

मैंने अपने को हमेशा एक वंचित बेटी समझा है जिसे पदार्थ के रूप में तो समृद्धि हमेशा मिली लेकिन भावनात्मक संतुष्टि की तलाश में परिवार के बाहर सहृदय लोगों का मुंह देखना पड़ा। इसमें मां की गलती नहीं है कि वे मुझे उम्र के उस बदलावों भरे तूफानी दौर में दिलासा नहीं दे पाईं, जिसकी मुझे सख्त जरूरत थी। दरअसल मां ने भी जो सीखा था, वही व्यवहार मेरे साथ किया। लेकिन आज की मांएं यह बेहतर समझती हैं कि अपनी बेटी को उस कठिन समय में संभालना, जानकारी देना, मजबूती देना और भरोसा दिलाना हर मां के लिए एक बड़ी जिम्मेदारी होती है। अपनी आत्मकथात्मक पुस्तक ‘इंद्रधनुष के पीछे-पीछे: एक कैंसर विजेता की डायरी’ के कुछ संबंधित हिस्से आपके साथ बांट रही हूं।

“मन के कोने में एक बात छुपी हुई है जिसे संकोच के परदे हटा कर बाहर लाने की पूरी कोशिश करती हूं- इस बात को कहने का यह, शायद जीवन का एकमात्र, मौका मैं खोना नहीं चाहती। मैं नहीं जानती, ऐसा कुछ मेरे जमाने में हर किशोर होती लड़की को सहना पड़ा होगा या नहीं। लेकिन मेरे दिलो-दिमाग में वे बातें गहरी खुदी हुई हैं। अच्छा लगता है आज की किशोरियों की मांओं यानी अपनी पीढ़ी की परिचित औरतों को अपनी बेटियों के सामान्य विकास की परवाह करता देख कर।

मैं उस समय चौदह साल की थी और अपने आप से ही जूझ रही थी- शरीर और मन के बदलावों से। लगता था सारी दुनिया की नज़रें मुझ पर हैं। हर जगह, हर समय बंदिश है, कुछ अपने संकोच की, कुछ मां की हिदायतों की। मन करता था, किसी ऐसी जगह जा कर रहा जाए जहां मन-मुताबिक हाथों-पैरों और दिलो-दिमाग को पूरी तरह ढीला छोड़कर कुछ देर जिया जा सके। छातियों के बढ़ने के दर्द को सहा पर कभी किसी से कह नहीं पाई। मां ने कभी इन सब विषयों पर बात नहीं की। मुझसे बड़ी एक बहन भी थी, लेकिन कभी खयाल नहीं आया कि उससे ही कुछ पूछा जाए। उस स्तर पर उससे कभी बातचीत ही नहीं होती थी। मां ने कभी बात तो नहीं की लेकिन कभी शाम को कॉलोनी की ही सहेलियों के घर से लौटने में देरी हो तो ताने जरूर दिए- लाज-शर्म नहीं है। और जबाव मेरी आवेश भरी आंखों में होता था- हां, तो मैं क्या करूं। इसमें मेरी क्या गलती है। और एक बार नहीं, अनेक बार मैंने मनाया कि मैं लड़की रहूं भी तो इन छातियों के साथ नहीं। उन्हें छुपाने की कोशिश में कसी हुई शमीज पहनने से लेकर स्कर्ट या मिडी में टक-इन की हुई शर्ट को ढीला रखते हुए उसके नीचे पहनी शमीज़ को खींच-खींच कर रखने जैसे न जाने कितने उपाय किए लेकिन उनका आकार नहीं घटा, बल्कि बढ़ता ही गया।...

...लेकिन स्तन क्या इतने ही अवांछनीय और शर्मिंदगी का विषय हैं कि उनके बारे में चर्चा भी सहज होकर न की जा सके? दरअसल यह बात मुझे काफी देर हो जाने के बाद समझ में आई कि ये शर्मिंदगी का विषय तब हैं, जब छोटी-छोटी अनभिज्ञताओं की वजह से नवजात शिशु दूध न पी पाए। समय पर उनका वास्तविक इस्तेमाल न हो पाए।

समान कपड़ों और बालों वाले समूह में स्त्री-पुरुष की पहचान करनी हो तो नजर सबसे पहले सीने की तरफ जाती है। यह स्त्रीत्व का बाहरी निशान है। मेडिकल तथ्य यह है कि इसका आकार-प्रकार बच्चे को दूध पिलाने का अपना मकसद पूरा करने में आड़े नहीं आता। लेकिन पुरुष प्रधान समाज में इसे ही स्त्रीत्व मान लिया जाता है।

एक तरफ तो बार्बी डॉल जैसे अवास्तविक आदर्श हैं और मर्लिन मुनरो जैसी फैंटसी, जिनसे बराबरी की भावना समाज बचपन से ही हमारे मन में लगातार भरता रहता है। और इसी लक्ष्य को पाने की कोशिश में हम कभी अपने शरीर के इस हिस्से को जैसा है, उसी रूप में स्वीकार नहीं कर पातीं। उसमें हमेशा कमी-बेशी नजर आती है। हमें हमेशा याद दिलाया जाता है कि यही हमारे नारीत्व का केंद्र है और इसे आदर्श रूप में रखना है।

दूसरी तरफ हमें उसी पर शर्मिंदा होना भी सिखाया जाता है। शो बिजनेस से जुड़ी औरतें शरीर के इस हिस्से का प्रदर्शन कर सकती हैं। लेकिन सामान्य ' भद्र' महिला से उम्मीद की जाती है कि वह लोगों के बीच इसे ठीक ढंग से ढक-छुपा कर रखे। 'प्लेबॉय' और 'कॉस्मोपॉलिटन' के कवर पेज पर इस प्रदर्शन का स्वागत है लेकिन आम औरत का सार्वजनिक रूप से इस तरह के गैर-इरादतन व्यवहार का अंश मात्र भी निंदनीय और दंडनीय है।...

...स्तन कैंसर के शुरुआती लक्षण भी उन्हीं दिनों उभर रहे थे। अगर मैं इस बारे में जानती होती या डॉक्टर ध्यान देते तो सब समझा जा सकता था। अब (कैंसर के बारे में) इतना कुछ पढ़ने-जानने के बाद साफ-साफ एक ही दिशा (स्तन में कैंसर होने) की ओर इशारा करती उन घटनाओं का सिलसिला जोड़ने में कोई कठिनाई नहीं होती।“

Thursday, September 25, 2008

शिमला में है लड़कियों का पहला कॉलेज, सौ साल पुराना ये कॉलेज क्या बंद हो जाएगा?


देश का पहला लड़कियों का कॉलेज सेंट बीड्’स, जल्दी ही बंद हो जाएगा। राष्ट्रीय बालिका दिवस पर ये खबर आई है। 1904 में बने शिमला के इस कॉलेज के प्रशासन ने सरकार से कहा है कि अगर उन्हें मिल रही आर्थिक मदद को बढ़ाया नहीं गया तो कॉलेज बंद करना ही होगा। कॉलेज बंदी की योजना बनने भी लगी है। दरअसल इस साल मार्च में सरकार ने एक नियम बना कर निजी कॉलेजों को मदद 95 फीसदी से घटा कर 50 फीसदी कर दी।

प्रिंसिपल मौली अब्राहम का कहना है कि फीस बढ़ा कर पैसे की तंगी को कुछ हद तक कम किया जा सकता है। लेकिन हम लड़कियों को सस्ती शिक्षा के अपने मकसद से हटना नहीं चाहते। 1970 से कॉलेज की फीस 70 रुपए प्रतिमाह तय है।दिल्ली के प्रतिष्ठित जीजस एंड मैरी का सहयोगी संस्थान सेंट बीड्’स राज्य का एकमात्र कॉलेज है जिसे एन ए ए सी का ए प्लस का दर्जा मिला हुआ है।

दिलचस्प बात ये है कि 1967 में जब दिल्ली में नया जीजस एंड मैरी कॉलेज बना तो यह तय हुआ कि शिमला के इस कॉलेज को बंद कर दिया जाए। तब हिमाचल सरकार और स्थानीय लोगों के कहने पर इसे बंद करने का पैसला टाल दिया गया। डाक विभाग ने संस्थान के 100 साल होने पर डाक टिकट भी जारी किया है।

इस कॉलेज से जुड़ी कुछ मशहूर हस्तियां हैं- हिमाचल की पहली महिला आई पी एस अधिकारी सतवंत अटवाल त्रिवेदी, पहली महिला हिमाचल पुलिस अधिकारी पुनीता कुमार, मिस इंडिया अंजना कुथलिया, फिल्मी हस्ती प्रिटी ज़िंटा।

Tuesday, September 16, 2008

बच्चों की देखभाल के लिए दो साल की छुट्टी

सरकारी दफ्तरों में काम करने वाली महिलाओं के लिए अच्छी खबर है। पता नहीं क्यों, अखबारों ने इन्हें खास तवज्जो नहीं दी, लेकिन है यह काम की खबर।

अब महिलाओं को अब साढ़े चार के बजाए छह महीने की मैटरनिटी लीव मिलेगी। उससे भी ज्यादा दिलचस्प और खुशी की बात है कि उन्हें अपने बच्चों के पालन के लिए अलग से दो साल की सवेतन छुट्टी मिलेगी और इसे वे किसी भी समय, टुकड़ों में भी, ले सकती हैं। शर्त बस ये है कि बच्चे/बच्चों की उम्र 18 साल से ज्यादा न हुई हो। उन्हें इस छुट्टी के दौरान तनख्वाह तो मिलती रहेगी ही, उनकी सीनियॉरिटी भी बनी रहेगी। यह पहली सितंबर से लागू है।

अब कोई इसे चुनावी हथकंडा कहे, पर सरकारी कामकाजी महिलाओं के लिए काफी सुविधा हो गई है। इसका मतलब यह है कि वे बच्चों की परीक्षा के समय उन्हें पढ़ाने, हारी-बीमारी में देखभाल, उसे किसी हॉबी आदि के अभ्यास या ट्रेनिंग, प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए शहर से बाहर ले जाने या घर में बच्चे की किसी और जरूरत के लिए भी छुट्टी ले सकती हैं।

उम्मीद करें कि केंद्र सरकार के इस नियम को और दफ्तरों में भी लागू किया जाएगा।

Thursday, September 11, 2008

यह था मॉनसून

अरिंदम बारह साल के हैं। आज अचानक उन्हें यह अहसास हुआ कि वे तो आशुकवि हैं! फिर क्या था, धड़ाधड़ कविताएँ रचने लगे। बाहर बारिश की झड़ी थी (दिल्ली की बात है ये) और उनकी कॉपी में कविताओं की। फिर एक कविता मॉनसून पर भी लिखी गई जो कि अब आपकी नज़र है। दाद जी खोल कर दीजिएगा, (अरिंदम की) उम्र का तकाज़ा है।

आसमां रो रहा था
बादल गुर्रा रहे थे
धरती नहा रही थी
यह था मॉनसून

बच्चे भीग रहे थे
फसलें उग रही थीं
चादर आसमां को ढक रही थी
यह था मॉनसून

Tuesday, August 12, 2008

महमूद दरवेश को आखिरी सलाम!


महमूद दरवेश का बीते शनिवार निधन हो गया। उनकी 67 साल की जिंदगी और पहाड़ से भारी मौत के बारे में हिंदी में कम छपा। वैसे अरबी भाषा के वो हाल के दशकों के सबसे चर्चित कवि रहे। उनके बारे में आप इस लिंक पर क्लिक करके जानकारी ले सकते हैं।

Saturday, July 26, 2008

कबाड़खाना मना रहा है इब्ने सफी बी.ए. का जन्मदिन

बोकारो स्टील सिटी में हमारे घर में पुरानी किताबों का एक कमरा हुआ करता था। दिनमान-धर्मयुग-इलस्ट्रेटेड विकली के बाइंड किए अंकों के बीच उस कमरे में वो किताबें भी थीं, जो हमारे पिताजी कभी पढ़ा करते थे। उसी कमरे में मेरा परिचय हुआ इब्ने सफी बी.ए. साहेब से।

उपमहाद्वीप में जासूसी उपन्यास लेखन के दिग्गज इब्ने सफी साहेब की आज जयंती है। उनका निधन भी इसी दिन हुआ था। अधपकी उम्र में मौत से पहले तक सफी साहेब लिखने में जुटे रहे। कबाड़खाना पहुंचें इस लिंक पर क्लिक करके

Wednesday, July 16, 2008

गंगा तट पर परंपरा से टकराती/जुगलबंदी करती आधुनिकता और कुछ अबूझ पहेली

पहाड़ों से दोस्ती है और गंगा से अपनापा है, सो साल में एक से ज्यादा बार गंगा दर्शन करने जरूर जाता हूं। पिछले दिनों भी गया था। हरिद्वार के पास राजाजी नेशनल पार्क के चिल्ला जीएमवीएन गेस्ट हाउस में एक बार फिर ठहरना हुआ। भीमागौड़ा बराज से इन दिनों पानी उफन रहा है, मानो गंगा को किसी बात से शिकायत है या फिर नाराजगी! कौन बताएगा? गंगा के गुस्से में शोर है, पर उसे शब्द कौन देगा। भाई राजेन टोडरिया जी का टिहरी विस्थापन पर उपन्यास जब आए, तो सबको पढना चाहिए।

बहरहाल इस बार की गंगा यात्रा में बाकी सबकुछ तो सामान्य ही था। गंगा का शीतल पानी, देश भर के लोगों को अद्भुत जमावड़ा। कहीं कहीं परंपरा से टकराती आधुनिकता और ज्यादातर मामलों में परंपरा और आधुनिकता की जुगलबंदी। गलबहियां डाले घूमती आधुनिकता और पंरपरा और हर बाबा के हाथ में मोबाइल। वक्त बदल रहा है और बहुत तेजी से बदल रहा है। कुछ तो समझ में आता है और बहुत सारा अबूझ रह जाता है। ऐसी ही एक अबूझ बात के बारे में आप सबका मार्गदर्शन चाहिए।

उस दिन (रविवार) हर की पैड़ी (पौड़ी कहने वाले कम नहीं हैं) में स्नान कर रहे हजारों पुरुषों के खाली बदन में से सिर्फ एक जनेऊधारी मुझे क्यों दिखा? कई घंटे तक वहां रहने के बाद में मुझे साफ दिख रहा था स्नान करने वालों में जनेऊ धारण करने वाले लोग नदारद हैं।

इसकी क्या व्याख्याएं हो सकती हैं।
क्या अवर्ण लोगों में आस्था के प्रति रुझान बढ़ा है?
क्या इस युग में आस्था और परंपरा के वाहक सवर्ण नहीं बल्कि अवर्ण हैं?
क्या आस्था का सवर्ण प्रभुत्व वाला व्यवसाय अवर्ण जनसमुदाय के बूते चल रहा है?
क्या अवर्ण लोगों के लिए ये समृद्धि का दौर है और तीर्थ यात्रा या तफरीह के लिए वो ज्यादा संख्या में घरों से बाहर निकल रहे हैं?
क्या आधुनिकता को अपनाने में सवर्ण आगे हैं और पुरानी परंपराओं का ढोने का जिम्मा अब अवर्णों का है।

सबसे पहले तो हरिद्वार का कोई पत्रकार/ब्लॉगर/साहित्यकार/फोटोग्राफर ये बताए कि जो मुझे दिखा वो तथ्य है या नजरों का फेर या वो है जो मैं देखना चाहता था। अगर तथ्य वो नहीं हैं जो उस खास दिन और खास घंटों में मुझे दिखा, तो फिर इस प्रकरण को बंद समझा जा सकता है। लेकिन अगर वो सच है तो समाज में कुछ तो बदल गया है और कुछ और है जो बदल रहा है। - दिलीप मंडल

Tuesday, July 8, 2008

मुमकिन है कैंसर के साथ जीना !

कैंसर का खौफ अब पहले से कम हो रहा है। कैंसर के बावजूद अब कई लोग उसी तरह लंबी जिंदगी जी रहे हैं जैसे कि हार्ट की बीमारी या डायबिटीज के मरीज जीते हैं। बीमारी का इलाज न हो तो भी उसका मैनेजमेंट कई बार मुमकिन हो पाता है। कैंसर का मतलब जीवन का अंत नहीं है, इस बात को रेखांकित करता एक लेख आज नवभारत टाइम्स के संपादकीय पन्ने पर मुख्य लेख के रूप में छपा है। लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

ये लेख आर अनुराधा ने लिखा है, जिनकी राजकमल-राधाकृष्ण से छपी किताब इंद्रधनुष के पीछे -पीछे, एक कैंसर विजेता की डायरी बेस्टसेलर रही है। अनुराधा के ब्लॉग का नाम है इंद्रधनुष
Custom Search