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Tuesday, March 11, 2008

वो कहते हैं हमसे...(भाग-1)

(यह लघुकथा मैंने 1987 में लिखी थी। आज के समय और माहौल में कितनी रेलेवेन्ट है, ये आप बताएं- आर. अनुराधा)

दृष्य एक: " नीलू बेटे, आज तुम्हारा नतीजा निकला है। अपना रोल नंबर तो लाना अखबार से मिलान कर लूं। फर्स्ट, सैकेंड, थर्ड- तीनों लड़कियां। भई वाह! लड़कियां तो लड़कों को हर मोर्चे पर मात दे रही हैं।"
" पापा मैं पत्रकारिता में प्रवेश लेना चाहती हूं।"
"अरे भई, एम एस सी करो, पी एच डी करो और ठाठ से कॉलेज में पढ़ाओ। पत्रकारों को बहुत भाग-दौड़ करनी पड़ती है। यह तुम्हारे बस की बात नहीं। इसे तो लड़कों के लिए ही रहने दो।"
दृष्य दो: " नीलू, जरा दुकान से मेरी दवाएं तो ला दे। "
" भैया को भेज दो न मां, मैं अकेले नहीं जाना चाहती"
"आजकल तो औरतें मर्दों के सारे काम करती हैं, और तुझे अकेले बाजार तक जाने में हिचक हो रही है। चल उठ फटाफट। बहानों की जरूरत नहीं है। "
दृष्य तीन: "कहां जा रही हो? "
"यहीं, सरिता के घर तक। "
" भैया को साथ ले जाना, जमाना बहुत खराब है आजकल।"

Monday, March 10, 2008

सौ को मारो और फिर थोड़ा सुस्ता लो, फिर सौ को मारो...

उरी एवनेरी

कहानी पुरानी है। जार की सेना का एक यहूदी सैनिक तुर्कों के खिलाफ युद्ध के लिए जा रहा था। उसकी मां ने उसे विदा करते हुए कहा- बेटा, ज्यादा थकान से बचना। एक तुर्क को मार कर थोड़ा सुस्ता लेना। फिर एक और तुर्क को मारकर फिर सुस्ता लेना।

बेटे ने पूछा - लेकिन मां, अगर तुर्क फौजियों ने मुझे मार डाला तो?

मां बोली- क्या बात करते हो, वो तुम्हें क्यों मारेंगे? तुमने उनका क्या बिगाड़ा है?

ये कोई मजाक नहीं है। ये मनोविज्ञान है। इजराएल-फिलस्तीन के बीच अभी जो चल रहा है अगर उसे युद्ध मान लें तो इस युद्ध में इजराएल के दो सैनिक और एक नागरिक की मौत हुई है। जबकि इजराइली हमलों में 120 से ज्यादा फिलस्तीनी जानें गई हैं। इनमें ज्यादातर बच्चे और नागरिक हैं। इजराएली प्रधानमंत्री ओलमार्ट को शिकायत है कि इजराइली स्कूल में फायरिंग से हुई मौत पर गाजा में फिलस्तीनियों ने जश्न क्यों मनाया। सचमुच क्या भोलापन है? सचमुच हर मौत की बराबर कीमत नहीं होती।

इजराएल में यही हो रहा है। वो सौ फिलस्तीनियों को मारते हैं, फिर सुस्ताते हैं। इस बीच कोई फिलस्तीनी हमला होता है और दो-चार इजराएली मारे जाते हैं। और इजराइल के लोगों को शिकायत है कि वो हमें क्यों मार रहे हैं।

(लेखक इजरायली नागरिक हैं और शांति आंदोलन के कार्यकर्ता हैं। सामग्री का स्रोत - काउंटरपंच)

Sunday, March 9, 2008

अमेरिकी मीडिया ओबामा के खिलाफ चुनाव लड़ रहा है?

(कहते हैं कि अमेरिका के पिछले राष्ट्रपति चुनाव में मीडिया ने जॉर्ज डब्ल्यू बुश के लिए चुनाव लड़ा था। वहां के सबसे पॉपुलर न्यूज चैनल फॉक्स ने रिपब्लिकन पार्टी के लिए खुलकर अभियान चलाया था। इस बार भी ऐसा ही कुछ देखने को मिल रहा है। हालांकि इस बार मीडिया का एक हिस्सा सचेत रूप से ऐसे किसी भी दुष्प्रचार से दूर रहने की कोशिश रहा है। नीचे यूट्यूब का एक वीडियो है। इसे देखिए। अपनी राय बनाइए-बदलिए-या उसे और मजबूत कीजिए। भारत के लिए इसका संदर्भ ढूंढिए। -दिलीप मंडल)

Saturday, March 8, 2008

काले हैं तो क्या हुआ ओबामा हैं!

-दिलीप मंडल

नीचे लगे दोनों वीडियो को देखिए। दोनों यूट्यूब पर हैं। दोनों में एक प्रमुख किरदार बराक ओबामा हैं। अमेरिकी ब्लॉग जगत में इन दिनों बहस छिड़ी है कि क्लिंटन ने जो एड जारी किया है, उसमें ओबामा को क्या जानबूझकर ज्यादा काला दिखाया गया है। क्या ये मानवीय भूल है या जानबूझकर की गई शरारत या कोई साजिश?



ओबामा के चमड़े का रंग, उसके पिता का अश्वेत होना, नाम में हुसैन का होना, उनकी माता के चरित्र का पोस्टमार्टम - ये सब मिलकर एक पूरा कोलाज बनता है। क्या अमेरिका अपने नस्लवादी अतीत से पीछा छुड़ा पाया है?


क्या भारत के लिए इस चर्चा का कोई संदर्भ है। मायावती की राष्ट्रीय राजनीति में हैसियत बढ़ती है तो क्या वो ऐसे ही सवालों से रूबरू नहीं होंगी? मंडल कमीशन की रिपोर्ट लागू करने वाले सीताराम केसरी का किस्सा याद है आपको? और जगजीवन राम? अजित जोगी, शिबू सोरेन? तहलका कांड से बंगारू लक्ष्मण का राजनीति कैरियर खत्म हो गया, लेकिन जया जेटली-जॉर्ज फर्नांडिस तो फिर से नैतिकता की बात करने लगे हैं। वी पी सिंह और अर्जुन सिंह का मीडिया में विलेन बनना क्या अपने आप हो गया?


वाजपेयी के चरित्र की मीमांसा मीडिया में क्यों नहीं होती। नरसिंह राव का निजी जीवन भी निजी ही रह गया। सार्वजनिक जीवन जी रहे तमाम लोगों को निजी जीवन जीने की ऐसी ही खुली छूट क्यों नहीं मिलती। सुरेश राम का स्कैंडल उछालते समय क्या मीडिया के सामने ये सवाल नहीं था कि ये किसी का निजी मामला है। हवाला कांड में 40 से ज्यादा नेता फंसे लेकिन आडवाणी और शरद यादव का क्या एक तरह का मीडिया ट्रायल हुआ। प्रमोद महाजन जैसे नेता की कमीज उजली की उजली कैसे रह जाती है। लालू यादव जब तक सवर्ण न्यायपालिका और अफसरशाही के सामने दंडवत नहीं हो गए तब तक उनकी कैसी दुर्दशा होती रही?


मेरे पास किसी नतीजे तक पहुंचने के लिए न पूरे तथ्य हैं न तर्क। लेकिन ये बात मैं पक्के तौर पर जानता हूं कि देश में जो नेता सर्वाधिक भ्रष्ट हैं, उनकी छवि सबसे बुरी नहीं है। मीडिया में हर पाप एक तराजू पर नहीं तुलता। कहीं कुछ तो घपला है।

Thursday, March 6, 2008

ब्रांडेड भिखारियों की दुकान


- सौरभ के. स्वतंत्र

पटना का हर्ताली चौक हो या दिल्ली का जंतर-मंतर ! इसके आगोश मे आने के बाद कार वाले लोग बेकार और बेकार लोग आबाद हो जाते हैं. एक दिन मैं भी बेकार के मानिंद जंतर-मंतर पहुँचा. जिन्दाबाद-मुर्दाबाद के नारों से गूंजता वातावरण बड़ा ही रमणीय लगा. कहीं लोग धरना देते वायलिन, ढोलक की थाप पार धुन निकल कर आपना समय काट रहे थे तो कहीं सोकर .

तभी मेरी मुलाकात एक बम्बैया बाबू से हुई. अभी जीवन के १७-१८ बसंत देखे होंगे जनाब ने. पर इरादा एकदम बुलंद था. इनकी मांग थी की रेहड़ी-पटरी पर सब्जी बेचने वालों के साथ न्याय किया जाए. जब मैंने पूछा की भइया इ सब्जी बेचने वालों को कौन सी न्याय की जरुरत आन पड़ी. तब उसने विस्तार से बताया- बम्बई मे सब्जी की दुकान थी साहब..बहुत अच्छी चल रेली थी. दो टाइम का रोटी भी आराम से मिल जाता था. भाई लोगो का हफ्ता भी चुकता हो जाता था साहब..लाइफ एकदम स्मूथ चल रेला था ... साहेब प्रॉब्लम तब आया जब ये मोबाइल बेचने वाले मामू लोग ने सब्जी का बड़ा-बड़ा दुकान खोल लिया...दुकान बोले तो एकदम झकास...एकदम सीसा-वीसा लगाके..

...जब वही फ्रेश-फ्रेश सब्जी उधर मामू लोग एयर कन्डीसन दुकान मे हमारे ही दम मे बेच रेला है तब हमारे कस्टमर लोगो को भी उधर ही जाने को मांगता है....तब हमारे पेट पर लात पड़ने का है न साहब....तब मैंने सोचा कमाई-धमायी तो सब चौपट ही गया. अब भाई लोगो को फोकट मे हफ्ता देने से बढ़िया ...न्याय के लिए आवाज़ उठाई जाए ...तभी से मैं इधर जंतर-मंतर पर एक साल से धरना दे रहा है.. पर इधर कोई सुनने को मांगता ही नही .

अब मैं भी क्या कहता बम्बैया भाई से....सांत्वना देना ही उचित समझा और उसकी पीडा़ सुन मैं यह कहने को विवश हो गया की तेरी मांग एकदम उचित है...बोले तो एकदम उचित .

अभी मैं इन जनाब की व्यथा सुन आगे बढ़ा ही था कि एक भिखारी मेरे पीछे पड़ गया...और कहने लगा- साब दे दो ना साब बच्चा भूखा है...साब एक रुपया दे दो... मैं भी थोड़ा बम्बैया बन बैठा और उसी लहजे मे उस से कहा अभी तेरे को इधर से निकलने का...और बड़ा साहब लोगो से पैसा नही मांगने का...बड़ा साहब तेरे हाथ मे इतना चिल्लर पैसा देख लिया न तब समझो तेरा कम फिनिश.

...फिर बड़ा साहब लोग रोड पर अपना ब्रांडेड भिखारी परफ्यूम लगाके दौड़ाने लगेगा .फिर तेरे को कौन भीख देगा... तेरे शरीर से तो बदबू आ रेली है बाप..फिर तू भी इस बम्बैया बाबू के माफिक इधर जंतर-मंतर और हर्ताली चौक पर धरना देता नजर आएगा..इसलिए इधर से अभी निकल लेने का..वो देखो बड़ा साहब आ रेला है .. और भिखारी तेज कदमों से वहा से निकल गया ...

Tuesday, March 4, 2008

अविनाश: कम्युनिटी ब्लॉग के कुशल संपादक

अविनाश की ताकत ये है कि आप उसके बनाए ब्लॉग पर जाकर उसे गाली दे सकते हैं, उसकी भर्त्सना कर सकते हैं और फिर भी उस ब्लॉग पर बने रह सकते हैं। ब्लॉग का लोकतंत्र अपने सबसे मौलिक रूप में जिस एक जगह नजर आता है, वो जगह अविनाश ने बनाई है। मोहल्ला भी ऐसा जिसमें एक दूसरे से 180 डिग्री की दिशा में सोचने वाले साथ साथ एक दूसरे को चाहते हुए भी और कोसते हुए भी रह सकते हैं। अविनाश के लिए असहमति अश्लील शब्द नहीं है।

शंकर की बारात सजाने का दम कम लोगों में होता है। अविनाश में है। उनका बनाया मोहल्ला ऐसा है जहां अक्सर कोई बेनामी आकर ऐसी हरकत कर देता है, जिसे शायद ही कोई और ब्लॉग मॉडरेटर बर्दाश्त करे। लेकिन अविनाश के बनाए हम सबके मोहल्ला में कमेंट मॉडरेशन नहीं है। बहुत ही अझेल हुआ तभी अविनाश कमेंट के साथ संपादकी दिखाते हैं। उन्हें ऐसा करते मैंने इतने दिनों में सिर्फ एक बार देखा है।

अविनाश ने जिन लोगों को ब्लॉगिंग के शुरुआती गुर सिखाए हैं, उनमें से कुछ आज उनके प्रशंसक हैं तो कुछ उनसे सहज मानवीय स्वभाव के तहत जलते-कुढ़ते हैं। अविनाश वनिला नहीं है। अविनाश के बारे में आपकी राय ये नहीं हो सकती कि - हैं कोई। आप उन्हें पसंद या नापसंद करने को मजबूर होते हैं। सामयिक विषयों पर उनकी प्रखर राय है। लेकिन उनकी राय से असहमत होकर भी जब आप मोहल्ला पर कुछ लिखते हैं तो अविनाश आपसे टकराते नहीं हैं, बल्कि आपके लिखे को सजाते हैं, उसमें से चर्चा के सूत्र निकालते हैं। ठीक उसी तरह जैसा कि किसी संपादक को करना चाहिए।

अविनाश दास नाम के आदमी को मैं जुलाई 2007 से पहले नहीं जानता था। मेरा बिहार/झारखंड पहले ही पीछे छूट गया था। फिर प्रिंट की पत्रकारिता से संपादकीय और फीचर पन्नों पर लेखन के अलावा ज्यादा रिश्ता नहीं रहा। टीवी में नौकरी करता हूं, पर इस दुनिया से भी कभी एकाकार नहीं हो पाया। इसलिए अविनाश को न जानना कुछ अस्वाभाविक भी नहीं है। अब तक मैं अविनाश से सिर्फ दो बार मिला हूं। एक बार राजकिशोर जी के निवास पर और दूसरी बार अशोक पांडे के अस्थायी निवास पर। दोनों बार कुछ मिनट के लिए। लेकिन संपादक के जो गुण मुझे अविनाश में दिखे हैं उससे मुझे थोड़ी जलन सी होती है। कई लोग मोहल्ला में अविनाश जैसे संपादक की वजह से ही लिखते हैं। दिलीप मंडल उनमें शामिल हैं।

BITCHOLOGY

Here is an interesting poem, in English though, I came across very recently. This poem, that crossed several e-mail boxes before reaching me, was originally sent by FunAndFunOnly group on Yahoo!. Nevertheless, this caught my attention and I thought of sharing it with all of you, so that more women can feel strong identifying themselves with the protagonist of the poem and more men can realize what women in their lives may be going through, inside and outside, in this world.

-R. Anuradha



When I stand up for
myself and my beliefs,
they call me a
bitch.

When I stand up for
those I love,
they call me a
bitch.

When I speak my mind, think my own thoughts
or do things my own way, they call me a
bitch.

Being a bitch
means I won't
compromise what's
in my heart.
It means I live my life MY way.
It means I won't allow anyone to step on me.

When I refuse to
tolerate injustice and
speak against it, I am
defined as a
bitch.

The same thing happens when I take time for
myself instead of being everyone's maid, or when I act a little selfish.

It means I have the courage and strength to allow myself to be who I truly am and won't become anyone else's idea of what they think I "should" be.
I am outspoken,
opinionated and determined. I want what I want and there is nothing wrong with that!
So try to stomp on me,
try to douse my inner flame, try to squash every ounce of beauty I hold within me.
You won't succeed.

And if that makes me a bitch ,
so be it.
I embrace the title and
am proud to bear it.

B - Babe
I - In
T - Total
C - Control of
H - Herself

B = Beautiful
I = Intelligent
T = Talented
C = Charming
H = Hell of a Woman

B = Beautiful
I = Individual
T = That
C = Can
H = Handle anything

Sunday, March 2, 2008

आखिर ये आपकी सेहत का मामला है!

-दिलीप मंडल

आप पहले ये देख चुके हैं कि जिस एड्स से साल में दो हजार से कम लोग मरते हैं और साल दर साल जिससे मरने वालों की संख्या लगभग स्थिर है उस एड्स से देश में लगभग सवा लाख से ज्यादा सेल्फ हेल्प ग्रुप लड़ रहे हैं। एड्स का कारोबार चलता रहे इसमें तमाम एनजीओ की दिलचस्पी है। एड्स का कारोबार चलता रहे इसमें एनजीओ के अलावा फार्मा सेक्टर की काफी दिलचस्पी है। ऐसी ही एक दिलचस्पी की कहानी आपके लिए यहां पेश है।

एड्स की दवा का अनुसंधान करने वाली दुनिया की एक प्रमुख कंपनी है जायलीड साइसेंस। इस कंपनी की वेबसाइट पर जाइए तो आपको कुछ रोचक चीजें दिखेंगी।



इस कंपनी को अमेरिकी में राजनतिक रूप से सबसे प्रभावशाली कंपनी माना जाता है। डॉनल्ड रम्सफेल्ड अमेरिका के रक्षा मंत्री बनने से पहले इस कपनी के चेयरमैन थे। देखिए रम्सफेल्ड की इस पद पर नियुक्ति की प्रेस रिलीज । रम्सफेल्ड के पास अब भी इस कंपनी के शेयर हैं। इस कंपनी के बोर्ड को देखिए। इसमें जॉर्ज शुल्ज हैं जो अमेरिका के विदेश मंत्री रहे हैं। बोर्ड में हैं कार्ला एंडरसन हिल हैं जो जॉर्ज बुश के पिता के राष्ट्रपति रहने के दौरान अमेरिका की ट्रेड रिप्रेजेंटेटिव थी और नॉर्थ अमेरिका ट्रेड ट्रिटी यानी नाफ्टा में अपने देश की मुख्य वार्ताकार थीं। जायलीड के बोर्ड में शामिल गायले विलसन कैलिफोर्निया के पूर्व गवर्नर पीट विल्सन की पत्नी हैं। एटीने एफ डेविगनॉन सुएज ट्रेक्टेबेल के वाइस चेयरमैन हैं और बुश के राष्ट्रपति पद के अभियान में उन्होंने काफी सहयोग किया था। कुल मिलाकर कंपनी के बोर्ड पर कंजर्वेटिव पार्टी के नेताओं का दबदबा है।

इसके बाद आप जायलीड के शेयरों का कारनामा देखिए। 1997 में जब रम्सफेल्ड जायलीड के चेयरमैन बने तो इस कंपनी के शेयर थे सात डॉलर पर। अभी ये शेयर 45 से 50 डॉलर के बीच ट्रेड कर रहे हैं। कंपनी के शेयर में बढ़त ऐसे दौर में हुई है जब बाकी अमेरिकी इंडेक्स बेहद सुस्त चाल से चले हैं। इस कंपनी का मार्केट कैपिटलाइजेशन 40 अरब डॉलर यानी 16,000 करोड़ रुपए है। ये कितनी बड़ी कंपनी है इसका अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि इस साल के बजट में भारत सरकार का स्वास्थ्य पर कुल खर्च 16,534 करोड़ रुपए है। देखिए चिदंबरम के बजट भाषण का प्वांयट 30। और एड्स की दवाओं का कारोबार कर रही जायलीड दुनिया की सबसे बड़ी कंपनी नहीं है। ऐसी बड़ी कंपनियां ही दुनिया भर में सरकारों के लिए स्वास्थ्य का एजेंडा तय कर रही हैं। हमारी आपकी हैसियत इस खेल में कितनी है, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है।

Saturday, March 1, 2008

राज ठाकरे ने तो वक्त को पहचान लिया, हम कब पहचानेंगे?

प्रणव प्रियदर्शी

राज ठाकरे और राज ठाकरे जैसों का इस्तेमाल करने वाले जिस सच को समझ कर अपनी रणनीति मे जरूरी बदलाव कर रहे हैं, उस सच को हम क्यों नही पहचान पा रहे? बाल ठाकरे के समय ट्रेड यूनियनों के पास ताकत हुआ करती थी, इसीलिए उस ताकत को छिन्न-भिन्न करने की जरूरत थी. अब परिस्थिति बदल गयी है. युनियने बेकार सी हो गयी हैं. मजदूरों के लिए नयी रियायतें हासिल करना तो दूर, कठिन संघर्ष के बाद हासिल पुरानी सुविधाएं भी एक-एक कर छिनती जा रही हैं और युनियने कुछ बोलने तक की स्थिति मे नही रह गयी हैं. ऐसे मे यूनियनों की शक्तिहीनता, उनकी बेचारगी जगजाहिर है. फिर भला मरे हुए को मारने की किसी को भी क्या पडी है.

राज ठाकरे भी जानते हैं कि उस काम के लिए उन्हें कोई शाबाशी नही देगा जिसकी जरूरत ही नही है. इसीलिए उन्होने अपने लिए नया काम सोचा. उन्हें मालूम था कि सरकार और कंपनियों के पास अब नौकरियां नाम मात्र को ही हैं. लेकिन बेरोजगार युवक यह बात मानने को तैयार नही. उन्हें तो हर हाल मे नौकरी चाहिए. स्वाभाविक रूप से सरकार और कंपनियों के खिलाफ बेरोजगार लोगों का गुस्सा बढ़ता जा रहा है. सो राज ठाकरे ने इस गुस्से को दूसरी तरफ मोड़ने का काम अपने हाथ मे लिया. उन्होने सरकार और कंपनियों को नौकरिया क्रियेट करने की जिम्मेदारी से मुक्त करते हुए यह कहा कि उनकी पार्टी मराठी युवकों को खुद रोजगार देगी. फिर उत्तर भारतीयों को विभिन्न रोजगारों से बेदखल कर उनके रोजगार अपने हाथ मे ले लेने का आह्वान मराठी युवकों से किया. (देखिए पिछला पोस्ट : बाल ठाकरे से आगे बढ़ गए है राज ठाकरे)

नतीजा सामने है. सरकार और कंपनिया एक तरफ है. नौकरियों के लिए जनता आपस मे ही एक दूसरे को मार काट रही है. वही जनता जो अगर सबको नौकरी की मांग पर संयुक्त आन्दोलन छेड़ देती तो सरकार और उद्योग के कर्ता-धर्ताओं के हाथ-पाँव फूल गए होते. लेकिन भगवान् भला करे राज ठाकरे और उनकी राजनीति का, अब ये लोग चैन की सांस लेते हुए और दो-चार जगह 'सेज' के प्रस्ताव लाकर जमीन अधिग्रहण करवा सकते हैं. जनता उनके खिलाफ नही उठने वाली. वह पर प्रान्तीयों को खदेड़ने मे लगी है.

बहरहाल, बात यह हो रही थी कि यह तथ्य हम कब समझेंगे? हम जो जनता की समस्याओं को उठाने का दावा करते है, समस्याओं का विश्लेषण करते हैं. हम यह क्यों नही समझते कि मूल प्रश्न सबको बुनियादी जरूरते बिना शर्त पूरी करने की गारंटी देने का है. हर तरह के भेदभाव मिटाने का है. और यह काम 'प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व' से नही होगा. नौकरियों मे हर जाति, धर्म, लिंग, क्षेत्र, भाषा की सांकेतिक उपस्थिति या आनुपातिक उपस्थिति सुनिश्चित करने से नही होगा.

इसके लिए हर जाति, धर्म, लिंग, क्षेत्र, भाषा के वंचितों, पीडितों को एक साथ साझा लड़ाई लड़नी और जीतनी होगी.

सच है कि यह एक बेहद लम्बी लड़ाई है जो अभी ढंग से शुरू भी नही हुयी है. अभी एक तरफा हमलों का दौर है. इन हमलों से ही दूसरा पक्ष उठने, संगठित होने और लड़ने की प्रेरणा लेगा.

सवाल है कि तब तक क्या किया जाये? जवाब भी सीधा, सहज है. दूसरे पक्ष को उस लम्बी निर्णायक लड़ाई के लिए तैयार किया जाये. यह बताया जाये कि जरूरत आपसी भेदभाव भूल कर हाथ से हाथ जोड़ कर श्रृंखला बनाने मे है. यह तर्क फूहड़ है कि जब तक दुश्मन हमला नही कर देता और फौज उस लड़ाई मे नही उलझ जाती तब तक सैनिको को आपस मे ही थोडी मार-काट कर लेने दी जाये.

(अगली किस्त : कितना जरूरी है जाति का सवाल?)

लविंग की जीत और अमेरिका का प्रायश्चित

-दिलीप मंडल

सीनेटर ओबामा अश्वेत पिता और श्वेत मां की संतान हैं। अमेरिका अपने इतिहास के एक रोचक मोड़ पर खड़ा है। ये लगभग तय हो चला है कि वहां का राष्ट्रपति या तो मिली जुली नस्ल का होगा या फिर एक महिला। ये शायद अमेरिका का पश्चाताप है या फिर प्रायश्चित।

ऐसे समय में बात करते हैं रिचर्ड लविंग और मिलड्रेड जेटर की। एक श्वेत और एक अश्वेत। दोनों ने लगभग उसी कालखंड (1958) में शादी की थी जब ओबामा के माता-पिता की शादी हुई थी। लविंग और जेटर वर्जीनिया में शादी नहीं कर सकते थे क्योंकि वहां अलग अलग नस्ल के लोगों के बीच शादी पर पाबंदी थी। उस समय अमेरिका के 22 राज्यों में नस्लीय शुद्धता के सख्त कानून थे। पर ये शादी हुई। दोनों ने भागकर कोलंबिया में शादी की और लौटकर वर्जीनिया आए।

यहां पुलिस उनका इंतजार कर रही थी। घर पर छापा पड़ा। नवविवाहित जोड़ा गिरफ्तार कर लिया गया। मुकदमा चला। पांच साल तक कैद की सजा का प्रावधान था। लविंग दंपति को कहना पड़ा कि उससे भूल हुई है। दोनों को एक साल कैद की सजा सुनाई गई। बाद में रहमदिल जूरी ने उन्हें राज्य से बाहर जाने की सजा सुनाई और आदेश दिया कि वो 25 साल तक वर्जीनिया नहीं लौटेंगे। इस परिवार को वाशिंगटन में बसना पड़ा।

देखते हैं कि जूरी ने लविंग दंपति के खिलाफ किस आधार पर फैसला सुनाया:

( Almighty God created the races white, black, yellow, malay and red, and he placed them on separate continents. And but for the interference with his arrangement there would be no cause for such marriages. The fact that he separated the races shows that he did not intend for the races to mix.)

लेकिन लविंग का मुकदमा सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा और आज से लगभग तीस साल पहले अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया की नस्लीय शुद्धता के ऐसे कानून गैरकानूनी हैं।

अमेरिकी जनगणना के आंकड़े बताते हैं कि 2005 में वहां 84 लाख से ज्यादा लोग ऐसे हैं जिन्होंने नस्ल का ख्याल किए बगैर शादियां की हैं। इस जानकारी का स्रोत।
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