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Thursday, May 1, 2008

क्योंकि सपना अभी मरा नही है

साथियो आज मई दिवस है. लगातार प्रतिकूल होते समय मे हम रिजेक्ट समूह के लोग अपने आपको बनाए रखने की जद्दोजहद से ही नही उबर पा रहे. ऐसे मे एक नज़र उन पंक्तियों पर डालना उपयोगी हो सकता है जो हममे नया जोश भरती रही हैं, हमे आसन्न खतरों से आगाह करती रही हैं और जो घात लगा कर बैठे दुश्मन की अगली चाल का संकेत देती रही हैं. प्रस्तुत हैं ऐसी ही कुछ पंक्तियाँ इस उम्मीद के साथ कि शायद इनसे हमे थोडी सी ऊर्जा मिल जाये जो हमारे संघर्ष की उम्र कुछ पल और बढा दे और शायद वही कुछ पल हमारी जीत के साक्षी बन जाएं.

1)
मेहनत की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती
पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती
ग़द्दारी और लोभ की मुट्ठी सबसे ख़तरनाक नहीं होती

बैठे-बिठाए पकड़े जाना बुरा तो है
सहमी-सी चुप में जकड़े जाना बुरा तो है
सबसे ख़तरनाक नहीं होता

कपट के शोर में सही होते हुए भी दब जाना बुरा तो है
जुगनुओं की लौ में पढ़ना
मुट्ठियां भींचकर बस वक्त निकाल लेना बुरा तो है
सबसे ख़तरनाक नहीं होता

सबसे ख़तरनाक होता है मुर्दा शांति से भर जाना
न होना तड़प का, सब सहन कर जाना
घर से निकलना काम पर
और काम से घर लौट आना
सबसे ख़तरनाक होता है
हमारे सपनों का मर जाना
- पाश

2)
चैन की बाँसुरी बजाइये आप
शहर जलता है और गाइये आप
हैं तटस्थ या कि आप नीरो हैं
असली सूरत ज़रा दिखाइये आप
- गोरख पाण्डेय

3)
सबकी बात न माना कर
खुद को भी पहचाना कर

दुनिया से लडना है तो
अपनी ओर निशाना कर
-कुंवर बेचैन

4
वे शायरों की कलम बेज़ुबान कर देंगे
जो मुँह से बोलेगा उसका ‘निदान’ कर देंगे

कई मुखौटों में मिलते है उनके शुभचिंतक
तुम्हारे दोस्त, उन्हें सावधान कर देंगे
- जहीर कुरैशी

5
तुम्हारे साथ रहकर
अक्सर मुझे लगा है
कि हम असमर्थताओं से नहीं
सम्भावनाओं से घिरे हैं

हर दीवार में द्वार बन सकता है
और हर द्वार से पूरा का पूरा
पहाड़ गुज़र सकता है।

शक्ति अगर सीमित है
तो हर चीज़ अशक्त भी है,

भुजाएँ अगर छोटी हैं,
तो सागर भी सिमटा हुआ है,

सामर्थ्य केवल इच्छा का दूसरा नाम है,
जीवन और मृत्यु के बीच जो भूमि है
वह नियति की नहीं मेरी है।
-सर्वेश्वर दयाल सक्सेना

6
...क्योंकि सपना है अभी भी
इसलिए तलवार टूटी अश्व घायल
कोहरे डूबी दिशाएं
कौन दुश्मन, कौन अपने लोग, सब कुछ धुंध धूमिल
किन्तु कायम युद्ध का संकल्प है अपना अभी भी
...क्योंकि सपना है अभी भी!
- धर्मवीर भारती

9 comments:

swapandarshi said...

Thanks for such nice poems.
ghar se kaam ke beech ke uljhan me ek rahat kee tarah

दिनेशराय द्विवेदी said...

आप ने शानदार नजीरें दी हैं वाकई उत्साहित करेंगी शभी को।

yunus said...

बहुत बढि़या । बहुत अच्‍छे ।

masha said...

bhai, beshak sapne abhi mare nahi hai. hum unhe marne denge bhi nahi. marne se pehle apne ghar ke nanhe gamalo mein un sapno ke beech jarur daal jayenge. dekhna, sapno ki komal bel bhir ug jayegi. masha

pranava priyadarshee said...

बहुत सही कहा माशा. सपनो को हम मरने नही देंगे. कुछ नही तो अगली पीढ़ी मे उसके बीज जरूर डाल जायेंगे, ताकि हमरे बाद भी सपनो की फसलें लहलहाती रहें.
मगर मैं इसमे इतनी सी बात अपनी तरफ से जोड़ना चाहूँगा कि वे बीज नये सपनो के होंगे. हम अभी से क्यों माने कि हमारे सपने पूरे नही होंगे?
बेशक मौजूदा दौर बेहद कठिन है, लेकिन हम इससे उबरेंगे. आगे बढेंगे. बेहतर दुनिया के अपने सपनो को अपने इसी जीवनकाल मे साकार करेंगे. उसे और बेहतर करने की जिम्मेदारी अगली पीढ़ी पर होगी जिसे वह अपने ढंग से, हमसे भी बेहतर ढंग से पूरा करेगी.

दिलीप मंडल said...

सही समय पर बढ़िया कविताएं। धन्यवाद।

विजयशंकर चतुर्वेदी said...

मई दिवस पर कवितांशों का यह अच्छा संकलन है. यह और बढ़िया बन पड़ता अगर इसमें धर्मवीर भारती की कविता के अंश न होते. उनके यहाँ दोस्त-दुश्मन की पहचान धूमिल है. वह किसी पर भी तलवार चला देना चाहते हैं क्योंकि युद्ध का संकल्प कर लिया है. युद्ध किससे करना है यह तय नहीं है. कोई मोहम्मद तुगलक ही इस तरह की बात कर सकता है.

और 'अभी भी' ग़लत प्रयोग है, होना चाहिए 'अब भी'.

vimal verma said...

क्या बात है दिलीप भाई,बहुत कुछ याद दिला दिया....इन सारी कविताओं से हमेशा बल तो मिलता रहेगा...चुनाव कविताओं का बहुत बेहतर है...बह्त बहुत शुक्रिया

bharat bhushan said...

complete poetry of Paash in Hindi, Punjabi and English and much more about his life and times is available at my blog on http://paash.wordpress.com

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