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Saturday, November 3, 2007

विश्व हिन्दी सम्मेलन पर एक टिप्पणी

(न्यूयार्क मे हुए आठवें विश्व हिन्दी सम्मेलन पर छपा कम नही है, लेकिन अधिकांश का फोकस इसी बात पर रहा है कि वहाँ जो गए वे साम्प्रदायिक थे या नही और जो नही गए उन्हें बुलाना जरूरी था या नही. इस विश्व सम्मेलन के मूल्यांकन की कसौटियां क्या होनी चाहिए, किन आसान उपायों से इसे ज्यादा उपयोगी बनाया जा सकता था और ऐसा किये जाने के मार्ग मे क्या बाधाएं थीं और हैं इस पर ढंग से विचार-विमर्श नही हो सका. कम से कम मीडिया मे तो ऐसे विमर्श की झलक नही मिली. इसीलिए जब वरिष्ठ पत्रकार राहुल देव का विश्लेषण उनके ब्लौग सम्यक भारत पर नज़र आया तो उसे रिजेक्ट माल के पाठकों के साथ बांटना जरूरी लगा. राहुल देव न केवल उस सम्मेलन मे शामिल हुए थे बल्कि सीमित रूप मे ही सही उसकी तैयारियों से भी जुडे थे. इसीलिए उनका विश्लेषण विशेष महत्वपूर्ण हो जाता है. - प्रणव)

राहुल देव

जिस विशाल स्तर पर, जिन बड़े उद्देश्यों के साथ, जिन विराट सरकारी संसाधनों के बल पर सम्मेलन होता है उनको देखते हुए उसे मिलने वाली कवरेज और उससे पैदा होने वाला विमर्श भी व्यापक होना चाहिए। लेकिन ऐसा पिछले सम्मेलनों के बाद भी नहीं हुआ, इस आठवें के बाद भी नहीं। यह इन सम्मेलनों की एक बडी असफलता भी है और इतर असफलताओं पर टिप्पणी भी।

सम्मेलन के लिए कितनी, कैसे और कैसी समितियां, उप-समितियां बनीं, उनमें क्या हुआ, क्या नहीं, क्यों – इनका सविस्तार वर्णन कई ज्यादा अधिकारी और बड़े लोग कर चुके हैं। यह नाचीज़ भी दो में जगह पा गया था। वेबसाइट उप-समिति में अध्यक्ष के और मीडिया उप-समिति में सदस्य के रूप में। और यकीन मानिए मुझे आज तक नहीं मालूम मेरा चयन किसने और क्यों किया। न ही इस बारे में मेरी किसी से बात हुई।

मीडिया उप-समिति में साफ और एकाधिक बार यह सुझाव दिया गया कि कम से कम इस बार हिन्दी मीडिया के अलावा दूसरी भाषाओं के मीडिया को भी बुलाना और ले जाना चाहिए। बाकायदा सूची बनाई गई हिन्दीतर भाषाओं के संपादकों की। वे चलते तो न केवल सभी बड़े भाषायी पाठक वर्गों तक सम्मेलन की खबरें पहुँचती बल्कि सम्मेलन में उनका महत्वपूर्ण बौद्धिक योगदान भी होता। आखिर वैश्वीकरण के प्रभावों से अकेली हिन्दी नहीं सारी भाषाएं जूझ रही हैं। सबमें यह विमर्श चल रहा है। उसका लाभ हिन्दी को क्यों नहीं उठाना चाहिए?
पिछले सम्मेलनों के अनुभव के आधार पर मैंने यह भी स्पष्ट चेतावनी दी थी कि यदि हम चाहते हैं कि अमरीकी मीडिया भी इस सम्मेलन को कवर करे तो इसके लिए अलग से और भारी प्रयास करने होंगे। पोर्ट ऑफ स्पेन और लंदन सम्मेलनों का अनुभव यही था कि उन देशों के मुख्य अखबारों, चैनलों ने विश्व की दूसरी सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा के विश्व सम्मेलन को कोई घास नहीं डाली थी। और इसकी सारी जिम्मेदारी सिर्फ उनकी नहीं थी। उन्हें लाने, बुलाने के प्रयास कभी ठीक से नहीं किए गए।
इस बार सम्मेलन न्यूयार्क में था, संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में उसका उद्घाटन होना था, महासचिव बान की मून उसमें योजनानुसार अचानक शामिल होने वाले थे (विदेश मंत्रालय के अधिकारियों और विदेश राज्य मंत्री द्वारा यही संकेत बार बार दिए गए)। आज तक यही कहा जा रहा है सरकारी, छद्म सरकारी हिंदी सेवियों द्वारा कि यह सब बहुत सोच समझ कर, मेहनत और दूरदृष्टि के साथ इसी लिए किया गया था कि हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा बनाने की पृष्ठभूमि तैयार की जा रही है।

अगर ऐसा था तो हमारे सुजान, सर्वज्ञ विदेश मंत्रालय के अधिकारियों और दूतावास के लोगों को पता होना चाहिए था कि न्यूयार्क अमरीकी मीडिया की राजधानी है और वहाँ के बड़े अखबारों और चैनलों में आना न केवल अमरीका और संयुक्त राष्ट्र बल्कि पूरी दुनिया की सरकारों पर बड़ा असर डालता है। उनमें छपना, कवर किया जाना जितना महत्वपूर्ण है उतना ही कठिन भी, खासतौर पर विकासशील देशों के लोगों और कार्यक्रमों के लिए। इसलिए कुछ ज्यादा ही ठोस कोशिशों की जरूरत थी विश्व हिन्दी सम्मेलन के बारे में छपवाने की।

सुझावों के बावजूद इसके कोई प्रयास हुए इसकी कोई दूर तक खबर नहीं है। जबकि न्यूयार्क में ही साजा (साउथ एशियन जर्नलिस्ट एसोसियेशन) का मुख्यालय है और अमरीकी मीडिया में काम करने वाले दक्षिण एशियाई मूल के लगभग सभी पत्रकार इसके सदस्य हैं। खूब सक्रिय संस्था है। लगभग हर महीने ही किसी न किसी भारतीय मेहमान, लेखक, चिंतक, विषय आदि पर कार्यक्रम करती रहती है। उसके कई सदस्य न्यूयार्क के बड़े अखबारों, चैनलों में अच्छे पदों पर हैं। ठीक से बुलाया जाता तो वे आते। उनमें से शायद ही कोई तीन दिन में एक बार भी दिखा।

सम्मेलन की विषयवस्तु, उसके कंटेंट याने वहाँ जो हुआ, जो कहा, सुना और पढ़ा गया उसकी बात करें तो उत्तर भारत के किसी भी प्रमुख शहर में होने वाले किसी हिन्दी सम्मेलन से वह ज्यादा अलग या बेहतर नहीं था। हिन्दी के काफी मूर्धन्य वहाँ थे। लेकिन जितने थे उससे ज्यादा नहीं थे। बहुत से बुलाए नहीं गए। कुछ बुलाए गए तो आए नहीं। उनके न आने के कारणों और औचित्य अनौचित्य पर टिप्पणियाँ पहले ही हो चुकी हैं। मैं उसे बहुत महत्वपूर्ण नहीं मानता। सब सुपात्र सब बार नहीं जा सकते। कोई न कोई छूटता ही है। महत्वपूर्ण है जो वहाँ थे उन्होने क्या किया। उनका जाना सार्थक था कि नहीं।
सम्मेलन स्थल में प्रवेश से पहले तो हम सब न्यूयार्क में होते थे। उस होने को महसूस करते थे। इस महामहानगर की छवियाँ, ध्वनियाँ, गति, लोग, जगहें, गन्ध, हवा एक अलग और स्पष्ट अनुभव सहज ही बनाते थे। लेकिन एक बार आप अन्दर गए तो न्यूयार्क तिरोहित हो जाता था। आप कहीं भी हो सकते थे – दिल्ली, भोपाल, जयपुर, लखनऊ, इंदौर..... मंच पर वही परिचित चेहरे, भाषा, वही महाविद्यालयी पर्चे, वही सनातन विषय और वही पुरानी, परिचित बातें, भाषण।

लेकिन सबसे बड़ा शून्य मेरी दृष्टि में था एक भी हिन्दीतर भाषाविद, साहित्यकार, विद्वान की अनुपस्थिति। हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र की भाषा बनाने की दिशा में बड़े मील के पत्थर के रूप में प्रचारित किए जा रहे इस सम्मेलन में संयुक्त राष्ट्र से, यूनेस्को से बहुत अच्छे, वरिष्ठ अधिकारियों को बुलाया जाना चाहिए था। उनसे हमें बहुत कुछ सीखने, जानने को मिल सकता था। न्यूयार्क और उसके आसपास इतने प्रसिद्ध, विश्वस्तरीय विश्वविद्यालय हैं, थिंक टैंक हैं, साहित्यिक, बौद्धिक संस्थाएं हैं, दर्जनों विश्वप्रसिद्ध लेखक, चिंतक, भाषाविद, अकादमियाँ हैं। क्या हिन्दी को अपने विकास, वर्तमान, भविष्य़ आदि के बारे में दुनिया की दूसरी भाषाओं से, अंग्रेजी से किसी विचार-विनिमय, किसी विमर्श, जानकारी और अनुभव के किसी आदान-प्रदान की जरूरत नहीं? एक ऐसे शहर में जिसमें संसार की सभी प्रमुख संस्कृतियों, देशों, भाषाओं, विचारधाराओं, विमर्शों और विषय़ों के बीच लगभग निरंतर संवाद और साहचर्य की प्रक्रिया चलती ही रहती है, उस शहर के उस जबर्दस्त रचनात्मक, बौद्धिक ऊर्जा क्षेत्र के बीचोंबीच रहते हुए हमारी हिन्दी का कुंभ लगा लेकिन डुबकी लगायी सबने एक वैश्विक वैचारिक संगम में नहीं वही दिल्ली या भोपाल की बासी हो चली तलैया में।

बहुत चर्चा होती है आजकल हिन्दी में हो रही तकनीकी प्रगति की, खासतौर पर आईटी में। इस नाचीज ने सुझाव दिया था कि हम अमरीका के ह्रदय में सम्मेलन कर रहे हैं। हमें भारत में आ चुकी और आने की इच्छा रखने वाली हर बडी आईटी कंपनी को निमंत्रित करना चाहिए सम्मेलन में शामिल होने और हिन्दी के प्रतिनिधि जगत को यह बताने के लिए कि वे हिन्दी, दूसरी भारतीय भाषाओं और संसार की दूसरी भाषाओं में, उनके लिए क्या कर रहे हैं, क्या सोच रहे हैं। हिन्दी को यह जानने की जरूरत है कि जापानी,.रूसी, फ्रेंच, चीनी, कोरियाई, अरबी, स्पैनिश आदि पर वैश्वीकरण का क्या असर पड रहा है। वे अंग्रेजी के बढते प्रभाव और प्रसार को कैसे देखती हैं, किन रणनीतियों को अपना रही हैं? इन भाषाओं में तकनीकी विकास की दशा और दिशा क्या है? उनकी सरकारें उनके लिए क्या कर रही है? गैर-सरकारी स्तर पर क्या हो रहा है? क्या हिन्दी उसके अनुभव से कुछ सीख सकती है? इस कंपनियों की इन प्रक्रियाओं में क्या भूमिका है?
माइक्रोसॉफ्ट, आईबीएम, सिस्को, ओरैकल, गूगल, याहू, डेल, एओएल, ऐपल – दुनिया की सबसे बडी ये कंपनियां अमरीकी हैं। ये सब भारतीय बाजार की मलाई खाने के लिए भारत में डेरे जमा चुकी हैं। सब दावा करती हैं कि वे भारतीय भाषाओं में काम करना चाहती हैं। कि भारत उनके लिए बहुत महत्वपूर्ण है। यह मौका था उन्हें भारत और भारतीय भाषाओं के प्रति अपनी गंभीरता साबित करने का।
भारत से आईटी मंत्रालय के लोग, सरकारी संस्थान सीडैक के लोग और बालेन्दु दधीच – इन सबने मिल कर सम्मेलन में एक प्रदर्शनी लगाई हिन्दी में सॉफ्टवेयर के नए, पुराने प्रयोगों, सुविधाओं आदि के बारे में। प्रदर्शनी अच्छी थी। छोटी थी। भारत में भी उसी आकार की होती है। लेकिन क्या उसमें कुछ विश्वस्तरीय था? क्या अच्छा नहीं होता कि हिन्दी के उस वैश्विक मंच पर आईटी के इन वैश्विक दिग्गजों को बुला कर उनमें और भारतीय विशेषज्ञों के बीच हिन्दी पर केन्द्रित विमर्श, आदान प्रदान होता, साझा शोध की दिशाएं तलाशी जातीं? उनसे हिन्दी और भारतीय भाषाओं के लिए कुछ वायदे करा लिए जाते?

सुझाया था कि हमारे आईटी मंत्री, विदेश मंत्री या विदेश सचिव – ये बिल गेट्स और दूसरी अमरीकी आईटी महाकाय विभूतियों को निजी निमंत्रण दें सम्मेलन में आने का। सोचिए इससे अच्छा क्या अवसर होता इन सबको और उनकी कंपनियों के उच्चतम स्तरों को हिन्दी से परिचित कराने का, उसके विकास से उन्हें जोडने का? ये सब जब भारत आते हैं तो प्रचार के लिए ही सही गलियों, गाँवों और झुग्गी-झोपडियों में एनजीओ-परिक्रमा करते ही करते हैं। क्योंकि कितने भी बडे हों बिल गेट्स, उनकी और इन सभी कंपनियों को भारतीय बाजार की, भारतीय प्रतिभा की और भारत सरकार के सहयोग और बडे ठेकों की जरूरत है। वे आते। या अपने बडे अधिकारियों को भेजते। लाभ हिन्दी को ही होता। ठीक से साधा जाता तो करोडों डालर की कीमत का हो सकता था। उनकी संवेदनाओं, सोच और योजनाओं में हिन्दी को शामिल करा पाते तो संभावित लाभ गणनातीत हो सकता था। शोध, सहयोग और भारतीय भाषाओं में तकनीकी विकास की नई दिशाएं खुल सकती थीं।

ऐसा कुछ नहीं हुआ। क्यों? क्योंकि जो दृश्य-अदृश्य लोग और खेमे सचमुच चीजें तय कर रहे थे, जो हमेशा तय करते हैं, उनमें न तो इस तरह के कामों के लिए जरूरी दृष्टि है, न दिलचस्पी। सुझाव मान भी लिया जाता तो उसे ठीक से अमल में लाना दूभर होता। क्योंकि वैसी मानसिक, व्यवस्थागत और तकनीकी तैयारी नहीं थी।

इस समय सारे संसार के भाषाविदों में सबसे चर्चित मुद्दा अंग्रेजी का वैश्विक विस्तार और अन्य भाषाओं पर उसका प्रभाव है। पश्चिमी विद्वान ही उसे हत्यारी भाषा, विध्वंसक भाषा, अकेली विश्व भाषा जैसे विशेषण दे रहे हैं। अमीर पश्चिमी देशों में अंग्रेजी के बढते प्रभाव से अपनी भाषाओं को बचाने की रणनीतियों पर गंभीर विमर्श हो रहा है। अगले 200-300 सालों में दुनिया की आधी से ज्यादा भाषाओं की मृत्यु और सारी दुनिया पर अंग्रेजी के एकछत्र राज की भविष्यवाणियाँ की जा चुकी हैं। भारत में उसकी सबसे पहले और सबसे बुरी मार हिन्दी पर पडेगी, पड रही है। इस चुनौती की प्रकृति, उसके विभिन्न आयामों, निपटने की रणनीतियों की जरूरत – इन बातों का स्पर्श भी बहुत कम हुआ सम्मेलन में। अपवाद रहे उपन्यासकार मृदुला गर्ग का भाषण और माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलपति अच्युतानंद मिश्र का वक्तव्य।

मैंने अपने सत्र में एक प्रश्न रखा था सबके सामने। यह कहते हुए कि यहां जितने लोग बैठे हैं हिन्दी के लिए समर्पित, समर्थ, संपन्न् और विशिष्ट हैं। सबके सब हिन्दी के लिए, उसके कारण ही यहां सारी दुनिया से आए हैं। उस हिन्दी का भविष्य यहां बैठे एक एक व्यक्ति के घर में हर रोज लिखा जा रहा है। फिर प्रश्न रखा सबके सामने – यहाँ बैठे सभी हिन्दी प्रेमियों, हिन्दी सेवियों, हिन्दी जीवियों में से जिसके बच्चे या नाती-पोते हिन्दी के पाठक हों कृपया हाथ उठा दें।
एक भी हाथ नहीं उठा। मेरा भी नहीं।
यह विश्व भाषा हिन्दी के विश्व सम्मेलन पर फिलहाल मेरी अंतिम टिप्पणी है।
(१ नवम्बर २००७ को पोस्ट की गयी राहुल देव की टिप्पणी के कुछ अंश ही हम यहाँ दे पाए. यह पूरी टिप्पणी आप www.samyakbharat.blogspot.com पर देख सकते हैं.)

2 comments:

परमजीत बाली said...

एक कड़वी सच्चाई ब्यान की है...जान कर मन को दुख हुआ....

"हिन्दी का भविष्य यहां बैठे एक एक व्यक्ति के घर में हर रोज लिखा जा रहा है। फिर प्रश्न रखा सबके सामने – यहाँ बैठे सभी हिन्दी प्रेमियों, हिन्दी सेवियों, हिन्दी जीवियों में से जिसके बच्चे या नाती-पोते हिन्दी के पाठक हों कृपया हाथ उठा दें।
एक भी हाथ नहीं उठा। मेरा भी नहीं। "

रजनीश मंगला said...

बहुत अच्छा लिखा है आपने। हिन्दी के लिए जो होना चाहिए, पहले ground level पर होना चाहिए, सीधे और केवल बड़े सम्मेलनों को निशाना बनाने से कुछ नहीं होगा। पहले तो हिन्दी में बहुत सारा तकनीकी साहित्य उपलब्ध करवाना ज़रूरी है। ये सम्मेलन की बजाय कुछ लोग घर में बैठ कर भी कर सकते हैं।

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