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Tuesday, December 4, 2007

बंदरिया अपने मरे बच्चे को सड़ जाने तक सीने से चिपटाए रखती है

बदलते समय में जाति व्यवस्था बचेगी या नहीं और बचेगी तो भी क्या वो अपना मूल स्वरूप कायम रख पाएगी? इस सवाल पर अब लोग खुलकर बात कर रहे हैं और ये जोखिम ले रहे हैं कि कोई उन्हें जातिवादी कह देगा। इस विमर्श को आगे बढ़ाते हैं। सबसे पहले देखिए प्रसाद की टिप्पणी के अंश:

pooja prasad said...

दुबे जी सुलभ मे काम कर रहे हैं क्योंकि ये उनकी आर्थिक ज़रूरत है, भले ही इस बात उन्हें कोफ्त न होती हो, वे सामान्य रहते हों. मगर गौर ये भी करें की जनेऊ धारी वे अब भी है (बात यहाँ सिर्फ परम्पराओं की नही है, उन प्रतीकों को चिपटाए रखने और उन पर मान करने की है जो उन्हें सुनहरे अतीत की तरह प्यारा है).

मुझे पूजा प्रसाद की इस बात में दम लगता है कि जाति के संस्कार आसानी से जाने वाले नहीं हैं। लेकिन मेरा निवेदन सिर्फ इतना है कि विचार को अगर आप भावजगत से उत्पन्न अमूर्त चीज नहीं मानते हैं, तो जाति को आप अविनाशी नहीं कहेंगे। विचार अगर वस्तु-सापेक्ष है तो जाति के अनश्वर-अव्यय होने की उम्मीद पाले लोगों को निराशा होगी।

वर्ण व्यवस्था भारतीय संदर्भ में कबिलाई समाज से सामंती उत्पादन प्रणाली में संक्रमण के साथ अस्तित्व में आयी। इसलिए इसे उत्तरवैदिक परंपरा का मानते हैं। वेदों में जाति या वर्ण विभाजन का उल्लेख नहीं है। जाति को हम आप जिन अर्थों में जानते हैं उसका मूल पाठ उपनिषद, ब्राह्मण ग्रंथों और विशेष रूप में गीता में मिलेगा। जाति की कभी सकारात्मक भूमिका भी रही होगी। पशुपालन और कृषि के सामंती प्रोडक्शन सिस्टम में कर्मविभाजन की ये विधि कारगर रही होगी।

लेकिन अब पूंजीवादी उत्पादन संबंधों के प्रभावी होने से दौर में सामंती विचार परंपरा के लिए अपना अस्तित्व बचाए रख पाना आसान नहीं होगा। आप ये देख सकते हैं देश के सकल घरेलू उत्पाद में कृषि का योगदान 25 फीसदी से भी कम रह गया है। ऐसे में उत्पादन प्रक्रिया में 25 फीसदी की हिस्सेदारी रखने वाली उत्पादन व्यवस्था, विचार जगत में बड़ा हिस्सा कब्जा करके नहीं रख सकती। जाति को अब खत्म होना ही होगा। इसे बचाए रखने के लिए टाइम मशीन में बैठकर पीछे जाना होगा।

वस्तु का विचार से संबंध (और वस्तुगत आधार के बदलने पर विचारों के अंत) को आप शहरी संदर्भ में छुआछूत के अंत के रूप में देख सकते हैं। छुआछूत शहरी भारत में इसलिए खत्म नहीं हुआ कि गांधी जी ऐसा चाहते थे। जब देश में कल कारखानों का दौर शुरू हुआ, तो उसके साथ सामुहिक तरीके से काम करने, भोजन करने से लेकर साथ यात्रा करने तक की जरूरत आई। ऐसी स्थितियों में छुआछूत का पालन करना असंभव था। अब मुंबई की लोकल ट्रेन में अगर कोई चाहे भी तो छुआछूत के नियमों का पालन कैसे करे? इसी तरह जाति भी खत्म होगी। लेकिन किसी की सदिच्छा से नहीं। न किसी के बचाने से ये बचेगी। जाति इसलिए खत्म होगी क्योंकि जाति की इमारत जिस जमीन (सामंती उत्पादन संबंध) पर खडी़ थी वो खिसक रही है।

जाति के खत्म होने पर उसके अवशेष शायद जल्द खत्म न हों। इवोल्यूशन के बारे में एक थ्योरी ये रही है कि बंदर से आदमी बनने की प्रक्रिया में पूंछ तो झड़ गई लेकिन स्पाइन के अंत में उससे अवशेष रह गए। वैसा ही भारतीय संदर्भ में जाति का हाल है। तो पूजा जी, इस बात से परेशान न हों कि दुबे जी जीवका के लिए पब्लिट टॉयलेट तो साफ करते हैं, लेकिन जनेऊ से लिपटे अपने संस्कार को उसी तरह सीने से लगाए रहते हैं जैसे कि बंदरिया अपने मरे बच्चे को सड़ जाने तक सीने से चिपटाए रखती है। ये पूंछ भी जल्द ही झड़ जाएगी। - दिलीप मंडल

1 comment:

संजय तिवारी said...

बराबरी सचमुच बहुत गूढ़ शब्द है.

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