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Monday, December 24, 2007

हे मोदी की जीत पर पुलकित होने वालों...

...चुनाव हिटलर ने भी जीता था, चुनाव बुद्धदेव भी जीतते हैं। जीतना और सही होना समानार्थी नहीं है! आप कहेंगे सही और गलत कौन तय करेगा? सही और गलत तो हमेशा समय की प्रभावशाली धारा ही तय करती है। लेकिन हम में से हरेक को सही और गलत की अपनी अपनी परिभाषाएं बनाने का अधिकार है और नहीं है तो होना चाहिए।

मेरी परिभाषा कहती है कि मोदी जिस बुनियाद पर खड़े हैं, मोदी जिसके लिए देश और दुनिया में जाने जाते हैं, लोकतंत्र में उस विचार की नैतिक सत्ता नहीं है। चुनाव तो शाहबुद्दीन भी जीतता है, सूरजभान भी जीतता है, मदन भैया भी जीत जाता है, गवली भी जीतता है, सारे डॉन चुनाव जीतते हैं, शराब माफिया, तस्कर सभी तो चुनाव जीतते हैं, तो क्या आप उनकी भी इसलिए जय जयकार करेंगे कि उन्होंने जनादेश हासिल कर लिया है। दुनिया के ज्यादातर तानाशाह चुनाव जीत कर ही तो आते हैं। तो लगाइए हिटलर जिंदाबाद के नारे।

जो मोदी गोधरा कांड के बाद की हिंसा को सही ठहराता है, वो मोदी धिक्कार के ही योग्य है और शर्म आनी चाहिए उन लोगों को जो हिटलर के लिए जिंदाबाद करते हैं। (ये नहीं भूलना चाहिए कि गोधरा कांड की निंदा करने में में जिन्हें शर्म आती है, उनसे मोदी को ताकत मिलती है।) लोकतंत्र में राजकाज को जिस नैतिक बल के आधार पर चलना चाहिए, वो बल मोदी उस समय खो देते हैं जब वो सोहराबुद्दीन की एनकाउंटर में हत्या को सही ठहराते हैं। सोहराबुद्दीन अपराधी था, व्यापारयों से हफ्ता वसूली करता था तो भी क्या पूरे देश में जिन पर भी ऐसे आरोप हैं उन्हें पुलिस गोली मार दे। और कौन साबित करेगा कि ये आरोप सही हैं। क्या इसके लिए शहरों में जनमत संग्रह कराएंगे?

मोदी की आलोचना करने का मतलब ये नहीं है कि कांग्रेस कोई पाक साफ है। मोदी के काल में जितना बड़ा दंगा हुआ, उससे बड़े दंगे कांग्रेस ने कराए हैं। गुजरात में भी और गुजरात के बाहर भी। दंगे कभी मुसलमानों के खिलाफ तो कभी सिखों के खिलाफ। दंगे कराने में मोदी तो कांग्रेसियों के मुकाबले बच्चे हैं। अभी के दिनों को देखें तो हत्या एं कभी पूर्वोत्तर में कराई जाती है तो कहीं नक्सली के नाम पर आदिवासियों का संहार कर रही है कांग्रेस। वामपंथियों का कारनामा आप पश्चिम बंगाल में लगातार देख ही रहे हैं। ऐसे लोग जब मोदी की निंदा करते हैं तो वो प्रहसन से ज्यादा कुछ नहीं है।

तेल निकालने वाली जाति के मोदी के खिलाफ इस बार कांग्रेस ने सवर्ण गोलबंदी की कोशिश की थी। कांग्रेस गुजरात में सेकुलर राजनीति के लिए नहीं जानी जाती है। इस बार भी वो सेकुलर राजनीति नहीं कर रही थी। वो जाति की राजनीति कर रही थी। मोदी भी पटेल वर्चस्व के खिलाफ जाति की ही राजनीति कर रहे थे। जाति की राजनीति में मोदी ने कांग्रेस को पीट दिया। सांप्रदायिक नारों के साथ मोदी ने सवर्णों के बड़े हिस्से को भी गोलबंद कर लिया और केशुभाई से लेकर गोवर्धन झड़फिया और कांग्रेसी मुंह ताकते रह गए।

बहरहाल मोदी की जीत के समय में भी मैं मोदी की निंदा करता हूं। वैसी तमाम विचारधाराओं के क्षय की कामना करता हूं जो किसी समुदाय के खिलाफ घृणा पर कायम है। मोदी और बुद्धदेव जीवन पर्यंत चुनाव जीतते रहे तो भी मैं उनसे असहमत होने के अपने अधिकार का इस्तेमाल करना चाहता हूं। जो भी नेता और व्यक्ति ऐसा देश बनाना चाहते हैं, जहां हमारे बच्चे और बच्चियां चैन से न जी सकें, उनके और उनके विचार के नाश की कामना करता हूं। - दिलीप मंडल

7 comments:

vijayshankar said...

यह नरेन्द्र मोदी नामक व्यक्ति की नहीं बल्कि उस घृणित विचारधारा की कामयाबी है जो बरसों से हमारे देश में अपने दशों मुखों के साथ सक्रिय है. गुजरात में इस विचारधारा ने एक ऐसी कौम का 'ब्रेन वाश' कर दिया, जो अपने व्यवसाय के अलावा दूसरी चीजों पर ज्यादा ध्यान न देने के लिए जानी जाती है. वहाँ गुजरात और मोदी एक दूसरे का पर्याय बनाने में इस हत्यारी विचारधारा को कामयाबी मिली. माहौल ऐसा बनाया गया कि अगर मोदी हारा तो गुजरात हार जायेगा, गुजराती कौम हार जायेगी.

लेकिन क्या इसके लिए हम सब जिम्मेदार नहीं हैं? ब्रेख्त ने कहा था- 'और एक दिन वे उसके लिए आए, उसे बचाने वाला कोई नही था.' यह हालत धीरे-धीरे हमने ही नहीं बन जाने दी है.? हमारे लिए जरूरी था और है कि जहाँ भी रहो, अपने तरीके से किसी हत्यारे तर्क को तेज़ धार तर्क से चीर दो. अब भी देर नहीं हुई है. गुजरातियों ने जो किया है उसका खामियाजा पूरा देश न भुगते इसका इंतजाम करना होगा. लोगों की आँख में उंगली डालकर दिखाना होगा कि हजारों मुसलमानों, ईसाइयों को गला काट कर मारनेवाली विचारधारा पता नहीं किसके विकास के साबुन से खून के छींटे धोना चाहती है. अगर भारत में आत्मा बची है तो वह ऐसे हत्यारों का बीज ही ख़त्म कर देगी|

Rahul said...

मोदी की निंदा करने बाले शायद विझीपत मानसिकता बाला हि कोई व्यक्ती हो सकता है
Internet ब्लाग क्या मील गया है मुर्खो की बाढ आ गई है कुछ अच्छा लिखो समाज को बनाओ

गुजरात में विकास के सोपान किस खूबी से तय किए जा रहे हैं और औद्योगिक, आर्थिक, सांस्कृतिक क्रांति जन-जन को स्वाभिमान के भाव से कैसे भर रही है,वहीं अपने-अपने क्षेत्र की प्रमुख विभूतियों ने गुजरात सरकार की दूरदृष्टिपूर्ण सोच की तारीफ की है। तत्कालीन राष्ट्रपति डा. अब्दुल कलाम, प्रतिपक्ष के नेता श्री लालकृष्ण आडवाणी, वाणिज्य मंत्री श्री कमलनाथ, शीर्ष उद्योगपति रतन टाटा, मुकेश अंबानी और कुमारमंगलम बिरला ने गुजरात में पूंजी निवेश को समझदारी भरा कदम कहा है और यह भी कि खुशहाल वातावरण देने में गुजरात का कोई सानी नहीं है।

गुजरात के ही अनेक आम मुस्लिमों ने इस वृत्तचित्र में कहा है कि वे खुद को गुजरात में सुरक्षित महसूस करते हैं और राज्य की प्रगति में हिस्सेदारी कर रहे हैं।

मुकेश अंबानी के शब्दों में, 'गुजरात में पिछले एक साल में रिलायंस ने एक भी मानव श्रम दिवस का घंटा गंवाया नहीं है।' रतन टाटा कहते हैं, 'गुजरात सबसे अधिक प्रगतिशील राज्य है।' कुमारमंगलम बिरला तो मोदी के दमदार नेतृत्व से अभिभूत हैं जबकि केन्द्रीय वाणिज्य मंत्री कमलनाथ कहते हैं, 'गुजरात को सामने रखकर हम भारत को प्रस्तुत करते हैं।'

अभय तिवारी said...

बहुत सही!

Nitesh S said...

मुझे मोदी की जीत से ना खुशी है ना गम. सोचता हूँ में वहाँ पर वोट देने जाता तो किसे चुनता?
उस मोदी को जिसके बारे में आपने इतना लिखा है? या फिर कांग्रेस जो की उससे भी ज्यादा घटिया पार्टी है?
क्या हममे ये अधिकार नहीं है की हम लिखित मे इन्हे सरकार चलने मे नालायक घोषित कर सकें?

हिटलर को चुनने वालों के पास कोई दूसरा "ओप्शन" रहा हो, पर भारत मे इसकी कमी है,
अंततः लोगो ने उसे ही चुना जो कम हानिकारक है.

इधर खाई उधर कूवां.

Srijan Shilpi said...

नैतिकता और सच्चाई लोकतंत्र के बहुमत की मोहताज नहीं होती। वैसे, मोदी के पक्ष में अब भी गुजरात के सत्तर फीसदी मतदाता नहीं हैं। यह हमारी चुनाव प्रक्रिया और उससे संबंधित नियमों की खामी है कि तीस फीसदी से भी कम वोट पाकर कोई राजनेता सत्ता पर काबिज हो जाता है।

मोदी ने 2002 में दंगाइयों को तीन दिनों तक राक्षस बन जाने की जो छूट दी, उसके लिए मोदी के खिलाफ यदि क़ानून और अदालत कोई कार्रवाई नहीं कर पाता, तो यह क़ानून की कमजोरी है। मोदी से ज्यादा वे आईएएस और आईपीएस अधिकारी गुनहगार हैं जिनके ऊपर दंगों को रोकने और क़ानून-व्यवस्था बहाल करने की प्रत्यक्ष जिम्मेदारी थी। यदि जिले के एसपी और डीएम अपनी ड्यूटी को ईमानदारी से निभाते तो मोदी चाहकर भी उनका कुछ बिगाड़ न पाते। ज्यादा से ज्यादा उनका ट्रांसफर ही न होता। लेकिन गुजरात के कैरियरवादी नौकरशाहों ने संविधान और क़ानून के विरोध में काम किया और वे पूरी तरह से बचे हुए हैं। उनकी करतूतों के बारे में कोई भी कुछ नहीं बोल रहा।

जेपी नारायण said...

मोदी से बुद्धदेव तक, गुजरात से नंदीग्राम तक...
कई बातें हैं!

हरिमोहन सिंह said...

मोदी मोदी मोदी जहॉं देखो शोर मचा है , कोई पक्ष में तो कोई विपक्ष में ।
लेकिन मोदी पैदा क्‍यो होता है उसको ताकत कहॉं से मिलती है और असल में मोदी है क्‍या ।
शायद लगातार अपमानित होने की भावना मोदी को ताकत देती है
अपने देश शहर के कुछ हिस्‍सो में जाने बसने में लगने वाला डर मोदी को पैदा करता है
कबूतर की तरह आखें बन्‍द करके बिल्‍ली गायब नहीं होती ।

आजादी के बाद हॉं बाद में बहुत बाद में अपने शहरों में बने नये शरणार्थियों से मिलो जिन्‍हे अपना घर बदलना पडा हो तब पता लगेगा कि मोदी पैदा क्‍यों होता है शेष बाद में

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