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Sunday, December 16, 2007

ब्लॉगर बड़ा या साहित्यकार?

हिंदी में मठाधीशी साहित्य का अंत और ब्लॉग युग की शुरुआत

बरसों पहले एक बात कही थी भाई राजेंद्र धोड़पकर ने। बात चुभी सो अब भी याद है (इसलिए सबसे कहता हूं कि चापलूसी का इतिहास नहीं लिखा जाएगा, ब्लॉग पर ले टिप्पणी - दे टिप्पणी मत करो)। उन्होंने न जाने किस संदर्भ में कहा था कि - "हिंदी का साहित्य पाठकों से आजाद है।" यानी पाठक किसी रचना के बारे में क्या सोचते हैं, इसकी चिंता न हिंदी के साहित्यकार को है, न प्रकाशक को।

हिंदी के ज्यादातर महान साहित्य का प्रिंट ऑर्डर पांच सौ (या ज्यादा से ज्यादा हजार का) होता है। किताबें हार्ड बाउंड छपती हैं। कीमत ऊंची रखी जाती है क्योंकि उन्हें आम पाठक को तो बेचने का इरादा ही नहीं होता है। प्रकाशन जगत से जुड़े मित्रों की सूचनाओं के आधार पर 500 किताबें कुछ इस तरह खपती हैं - 100 जाती हैं समीक्षकों को। समीक्षक तारीफ में जोई सोई कछु गा देते हैं। उसके बाद 50 से 100 कॉपी लेखक को मेहनताने के तौर पर मिलती है। बाकी साढ़े तीन सौ में से ज्यादातर को हर प्रकाशक अपने संपर्कों और ताल तिकड़म के हिसाब से सरकारी लाइब्रेरी में खपा देता है। वहां कई बार किताबों के पैकेट खुलते तक नहीं है। या फिर किसी रैक में किताबों को पाठक के इंतजार धूल खाते रहना होता है।

ज्यादातर मामलों में इसी तरह हिंदी की एक महान साहित्यिक रचना का सफर पूरा होता है। इस पर चमत्कार ये कि ऐसे साहित्कारों को रैकेट के जरिए पुरस्कार भी मिल जाते हैं। हिंदी सम्मेलनों के लिए विदेश यात्रा का मौका भी। हिंदी सेवा का पुण्य लाभ बोनस में मिलता है। जनवादी और प्रगतिशील लेखक इस मामले में संघी लेखकों से कोसों आगे हैं।

कई किताबों को छापने के लिए प्रकाशक लेखक को पैसे देते नहीं, उनसे पैसे लेते हैं। कई बार ये पैसा इस गारंटी के रूप में होता है कि लेखक किताबें बिकवाने की गारंटी लेगा। इसलिए अफसरों के कविता संग्रह आसानी से छप और खप जाते हैं।

इसके मुकाबले क्या हिंदी का ब्लॉगर क्या बेहतर स्थिति में नहीं है। ब्लॉग की पाठक संख्या का मुकाबला हिंदी का स्थापित मठाधीशी साहित्य नहीं कर सकता। ब्लॉगर्स के सामने बेहतर, ज्यादा विचारोत्तेजक, रोचक लिखने की चुनौती होती है, वरना उन्हें पढ़ेगा कौन। नेट की दुनिया में ब्लॉगर्स तिकड़म के जरिए पाठक नहीं जुटा सकता। टिप्पणियों के जरिए एक दूसरे की पीठ खुजाने के शुरुआती दौर का बचपना अब खत्म होने को है। ब्लॉग की संख्या बढ़ने के साथ उसकी बाकी विसंगतियां खत्म होने की उम्मीद की जा सकती है।

हिंदी साहित्य के मुकाबले ब्लॉग की दुनिया में ज्यादा ट्रांसपेरेंसी है। ब्लॉगर्स के गैंग नहीं हैं। गैंग बनाने की कोशिशें तो हो रही हैं, लेकिन गैंग बनाने वाले चारो खान चित होकर गिर रहे हैं। साहित्य की दुनिया में गंदगी ज्यादा है। चाटुकारिता ही चाटुकारिता है। किसी मठ में सिर झुकाए बिना जम पाना मुश्किल है। ब्लॉग की दुनिया में ज्यादा लोकतंत्र है।

ब्लॉग ज्यादा कंटेप्ररी हैं। उनमें करेंसी है, तात्कालिकता है। साहित्य की तरह पोंगापंथ यहां कम है। ब्लॉग में जातिवाद, क्षेत्रवाद, रिश्तेदारवाद, प्रेयसीवाद आदि की गुंजाइश नहीं है। जबकि हिंदी साहित्य की, इन वादों के बगैर कल्पना भी नहीं की जा सकती।

मठाधीशी साहित्य के पाठक लगातार घटे हैं। याद है आपको कि हिंदी का आखिरी बेस्टसेलर कब आया था? हिंदी में अगर कोई किताब गलती से ज्यादा बिकने लगती है तो सारे समीक्षक और साहित्यकार मिलकर फौरन उसे पल्प करार देते हैं और लेखक को जाति-निकाला दे देते हैं। मुझे चांद चाहिए के साथ ये दुर्घटना हो चुकी है।

राधाकृष्ण प्रकाशन से छपी आर अनुराधा (रिजेक्टमाल की संस्थापक सदस्य) की किताब इंद्रधनुष के पीछे-पीछे - एक कैंसर विजेता की डायरी की दूसरी आवृति आ गई है और उसपर फिल्म भी बन गई है, लेकिन दिवंगत कमलेश्वर उन चंद साहित्यकारों में थे, जिन्होंने इसकी खुलकर प्रशंसा की। बाकी समीक्षक ऐसी रचनाओं पर एक अजीब सी चुप्पी साध लेते हैं।

इसके मुकाबले ब्लॉग के पाठकों की संख्या में तो विस्फोट होना है। अभी ये तेजी से बढ़ रही है। ब्रॉडबैंड के विस्तार और हिंदी में फोंट की समस्या के समाधान के बारे में जानकारी फैलने के साथ ही हिंदी ब्लॉग और भी बढ़ेगा।

ब्लॉग तकनीकी रूप से श्रेष्ठ है। हाइपर लिंक की सुविधा इसे विश्वसनीय बनाती है। संदर्भ देना ब्लॉग में आसान है।

ये मेरे फुटकर विचार है। आलोचना का स्वागत है। साधुवाद वाली टिप्पणी मैं लेता नहीं हूं और देता भी नहीं हूं। - दिलीप मंडल

10 comments:

अजित वडनेरकर said...

अनुराधाजी की इस पुस्तक की दूसरी आवृत्ति आ गई और मुझे खबर तक नहीं...यूं मैं किताबों की दुकानों पर अक्सर मंडराया करता हूं। मेरे शहर में तो शर्तिया किसी जगह यह नही है। स्मिता (मेरी पत्नी) ने एक बार, जब मैं दिल्ली मे ही था , उनके किसी संस्मरण को पढ़ा था महिलाओं की पत्रिका में । वे उनके अनुभवों और परिजनों की भावना से काफी प्रभावित थीं।
चलिए , जानकारी मिली। अब उन्हें गिफ्ट करता हूं।

Sanjeeva Tiwari said...

अरे वाह भाई, मन की बात आज कह दी है आपने । हमारी तो हिम्‍मत ही नही होती थी य‍ह बात कहने की, बरसों से आस्‍था के कील को हमारे पिलपिले दिमाग में गाडने का प्रयास हमारे मनीषी कर रहे हैं पर कबखत बार बार निकल ही जाती थी । आज आपने कहा है पिलपिले दिमाग में गडे आस्‍था के कीलों की कहानी ।
बडा चाहे जो भी जो सहज व सुलभ होगा वही जन मन में बसेगा । धन्‍यवाद ।

आरंभ

mahashakti said...

आज ब्‍लाग भी एक परिधि में बंध कर रह गया है। कुछ सीमित लोगों तक, शायद बड़े नामो तक। अक्‍सर देखने में आता है कि हिन्‍दी ब्‍लाग को कुछ लोगों अपने तक ही सीमित करना चाहते है। ब्‍लाग एक विधा तो जरूर है किन्‍तु अभी इसे भविष्‍य में काफी कुछ करना है। अभी शैशवास्‍था में भी एक दूसरे की गला काटी जा रही है। अभी आये तो काफी रास्‍ते तय करने है।

आपके ब्‍लाग पर आकर काफी अच्‍छा पढ़ने को मिला, आप बधाई के पात्र है।

मिहिरभोज said...

बंधु साधुवाद वाली टिप्पणी तो मै जबरदस्ती दे रहा हूं आपकी मर्जी हो तो न लेना,बाकी ये फॉंट समस्या के लिअ आपने दो तीन बार लिख दिया कुछ बताइये कहां मिलेगी जानकारी

आनंद said...

मैं आपकी बात से सहमत हूँ "हिंदी साहित्य के मुकाबले ब्लॉग की दुनिया में ज्यादा ट्रांसपेरेंसी है।" क्‍योंकि पढ़ने लिखने की दृष्टि से यह काफ़ी सुविधाजनक और आसान है। लेखक और पाठक के बीच में प्रकाशक या संपादक जैसे समीकरण नहीं आते। - आनंद

Raviratlami said...

मुझे आज तक ये समझ में नहीं आया कि हि्न्दी ब्लॉग जगत् में गैंग, माफिया या गला-काट जैसी बातें कहां, किधर, कैसी, क्यों हो रही हैं और कौन कर रहा है गैंग बाजी. किसके दिमाग की उपज है यह?

बंधु, यदि उम्दा लिखोगे, नियमित, सारगर्भित लिखोगे तो आपके लेखन को किसी गैंग किसी माफिया की कोई आवश्यकता नहीं होगी. मनीष,रवीश, यूनुस ज्ञानदत्त जैसे लोग आए और आते ही हिन्दी ब्लॉग जगत् में छा गए. क्या उनके लेखन को गैंग की संज्ञा दी जा सकती है? इस तरह आप भी लिखें तो हो सकता है कि आपका भी गैंग बन जाए.

सवाल ये है कि महीने में चार कबाड़ा पोस्ट ठेल देने के बाद ये बातें की जाएँ कि पाठक पढ़ते नहीं टिप्पणी करते नहीं और गैंग बना लिया गया है तो यह तो पूरा का पूरा कुतर्क ही है.

फिर, ब्लॉगरों से किसने कहा कि कालजयी रचनाएँ मत लिखो. धुँआधार, मजेदार, शानदार मत लिखो. ऐसा लिखो कि आज का पाठक भले ही तवज्जो न दे, यह दस और सौ वर्षों बाद गर्व से पढ़ा जाए. पर, क्या तब भी गैंग और माफ़िया की बातें की जाएंगी?

संजय तिवारी said...

हाल-फिलहाल हिन्दी की एक बेस्टसेलर किताब दिखती है जो एक लाख से ऊपर छप चुकी है और उसका नाम है आज भी खरे हैं तालाब. सौभाग्य से वह किसी प्रकाशक ने नहीं छापी है.

विनीत कुमार said...

aapki baat se bilkul sahmat, hindi me likhne se jyada khapne me taakat jhoki jaati hai,aur bikne ke liyae sirf lekhak nahi,saath me kuch aur hona hoga.blog apne aukaat aur haisiat se chalta hai.

vijayshankar said...

मैं आपकी इस बात से शब्दशः सहमत हूँ कि 'ब्लॉग की दुनिया में ज्यादा लोकतंत्र है।' लेकिन यह बयान पूरी तरह सच नहीं है कि 'किसी मठ में सिर झुकाए बिना जम पाना मुश्किल है" (साहित्य में)| वैसे भी जमने की चिंता में खपने वालों को असली साहित्य से क्या प्रयोजन है? वे तो साहित्य के कैरियरिस्ट होते हैं. लेकिन जिन्हें अपने लक्ष्यित समाज के साहित्य से लगाव है, वे 'अहो रूपम, अहो ध्वनिः' के जंजाल में वैसे भी नहीं पड़ते.

आपका यह कहना भी फिलहाल आंशिक तौर पर ही सच है कि 'ब्लॉग में जातिवाद, क्षेत्रवाद, रिश्तेदारवाद, प्रेयसीवाद आदि की गुंजाइश नहीं है।' शायद आपने दीगर हिन्दी ब्लॉग की खुर्दबीन नहीं की. मैं कई बार वहाँ जाता हूँ. वह दिन दूर नहीं जब प्रेयसीवाद इतना बढ़ेगा कि ब्लॉग के चलते ब्लॉगवीरों के तलाक होने लगेंगे.

लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि मैं ऐसा होते देखना चाहता हूँ. मैं तो चाहता हूँ कि ब्लॉग एक ऐसा मंच बने जहाँ सच्चे कद्रदान मिलें. कविता, कहानी, राजनीतिक-सामाजिक-सांस्कृतिक मुद्दों पर व्यापक बहस-मुबाहिसा हो. सतही समझ रसातल में चली जाए और कोई भी फैसला लेने से पहले लोग वैज्ञानिक सोच से काम लेने लगें.

आपने हिन्दी के तथाकथित 'बेस्ट सेलरों' की भी अच्छी कलाई उतारी है और इस पूरे तंत्र का पर्दाफाश किया है.

Anonymous said...

Kathgodam ke station par AH wheeler walse se baat kar raha tha. usne kaha ki yahan to hindi kitabein khoob bikti hai lekin prakashak kitabein hi nahi bhejte hain. agar aapko hindi prakashan ke baare mein jaankari hai to batayein ki iska kya karan hai?

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