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Wednesday, January 2, 2008

आदर्श हिंदू उस चूहे की तरह होगा...

...जो अपने बिल में रहे और दूसरों से संपर्क रखने से परहेज करे। - भारतीय संविधान के निर्माता डॉक्टर भीमराव आंबेडकर , एनहिलेशन ऑफ कास्ट में

- हिंदू समाज जब जातिहीन बनेगा, तभी उसमें अपनी रक्षा करने की क्षमता आएगी। - उसी भाषण से

- हिंदू समाज लगातर बदलता रहा है। कई बार उसमें भारी बदलाव आए हैं। कहां हैं वेदों में वर्णित इंद्र, कहां हैं वरुण, कहां हैं ब्रह्मा और कहां हैं मित्र। वो गायब हो गए। ...ब्राह्मणों ने न सिर्फ वैदिक देवताओं को छोड़ा बल्कि फायदा देखकर वो मुस्लिम पीर तक के उपासक बन गए। - डॉक्टर आंबेडकर, रिडल्स इन हिंदूइज्म की प्रस्तावना में

इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के एंथ्रोपॉलोजिस्ट वी एस सहाय ने ये दावा किया है कि जाति व्यवस्था की वजह से ही प्रचीन भारतीय सभ्यता इतने झंझावातों को झेलकर जिंदा है। जाति प्रथा की वजह से भारतीय सभ्यता-संस्कृति के अक्षय होने के बारे में इस दावे में अगर कुछ नया है तो सिर्फ इतना कि इस निष्कर्ष तक पहुंचने के साधन अलग होंगे। वरना समाजशास्त्रीय और ऐतिहासिक सामग्री के आधार पर शोधकर्ता कई दशक पहले ऐसी बात कह गए हैं। नीचे लिखी पंक्तियां पढ़िए -

दो हजार वर्ष पूर्व आर्य समाज का राज यंत्र शक, यवन, मेद, पारसिक आदि ने छीन लिया था। जातिबद्ध आर्य समाज उस संकट को सही सलामत पार गया। सात सौ वर्ष पूर्व मुसलमानों ने राज यंत्र हथिया लिया, तब भी आर्य समाज साबित रहा। इस प्रकार जाति व्यवस्था आठ-दस हजार वर्षों से हमारे लिए हितकारी रही है। बुद्धिभ्रंश होकर उस लाभदायक संस्था को हम साहसपूर्वक त्याग दें, अन्य प्राचीन एवं अर्वाचीन साम्राज्यों की भांति हमारे वंश का, संस्कृति का और अंत में हमारे समाज का नामशेषता की सीमा तक ध्वंस हो जाएगा। (राजवाड़े लेख संग्रह, अध्याय 4, पेज 51)

भारतीय संस्कृति के अव्यय और अक्षय होने के बारे में ये निष्कर्ष महापंडित विश्वनाथ काशीनाथ राजवाड़े का है। हिंदू समाज में अहिंदुओं का समावेश विषय पर उनका ये निबंध भारतीय इतिहास संशोधक मंडल के चतुर्थ सम्मेलन वृत्त में मूल रूप में छपा है। इस लेख को आप साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशिक राजवाड़े लेख संग्रह में पढ़ सकते हैं। इसी निबंध का एक और अंश देखिए-

ईरान, अफगानिस्तान और बलूचिस्तान में हिंदुस्तान की भांति जाति संस्था उस काल में नहीं थी, इसी कारण इस्लामी उत्पात के सामने उन्हें बुरी तरह झुकना पड़ा। जैसा उनका नाश हुआ वैसा, हिंदुस्तान का नहीं हुआ। इसका श्रेय हिंदू समाज की जाति संस्था को देना चाहिए। जब तक हिंदू जाति संस्था है, तब तक बाह्यजनों के कितने ही आक्रमण हों, कैसे ही उत्पात हों, उनकी शुद्धता और संस्कृति भंग नहीं होगी, इसके विपरीत उत्पात करने वालों के समाज और संस्कृति में अवश्य परिवर्तन होगा। (अध्याय4, पेज-57)

लेकिन इतिहास के इस महान अध्येता के इन तर्कों को जाति व्यवस्था के पक्ष में इस्तेमाल करने की कामना करने वालों को सावधान रहना चाहिए । क्योंकि राजवाड़े भविष्य में एक ऐसे भारतीय समाज की कल्पना करते हैं जो एकजातीय होगा। फिर राजवाड़े का कालखंड सहाय जी से लगभग एक शताब्दी पहले का है। उस समय इस बात के संकेत तो मिलने लगे थे कि सामंती उत्पादन संबंध की अवनति हो रही है। लेकिन उन संबंधों के निर्णायक रूप से खत्म होना आज जिस तरह स्पष्ट दिख रहा था, वो तब नहीं था। इसलिए एक सदी पहले जाति और उसके सामाजिक सांस्कृतिक संबंधों की जो व्याख्या की गई थी, उसे आज दोहराया जाए, तो कौन सुनेगा और कौन गुणेगा।

इतिहास और भारतीय धर्मग्रंथों के एक और निर्विवाद टीकाकार तर्कतीर्थ लक्ष्मणशास्त्री जोशी को पढ़िए। 16 खंडों में प्रकाशित धर्मकोश के संपादक और 1951 में पुनर्निर्मित सोमनाथ मंदिर के प्रथम प्रधान पुरोहित जोशी जी अपनी चर्चित कृति वैदिक संस्कृति के विकास में लिखते हैं-

वर्णपरिवर्तन की क्रिया के शिथिल पड़ने तथा अंत में रुक जाने की वजह से जातिभेद की नींव डाली गई। परिवर्तन की क्रिया के अवरोध का एक महत्वपूर्ण आर्थिक कारण भी है। यह है ग्राम संस्था के पोषक ग्रामोद्योगों की वंश परंपरा से चली आनेवाली स्थिरता। सिंधु संस्कृति के विध्वंश के उपरांत भारतवर्ष में नगर संस्कृति को प्रधानता किसी भी समय न मिली। ग्राम अथवा देहात से संबद्ध अर्थशास्त्र का निरंतर बने रहना जातिभेद की उत्पत्ति में सहायक बना। (अध्याय 3, पेज 128)

जाति और उत्पादन संबंधों के बीच रिश्तों को नकारने वालों को ये बात ध्यान से पढ़नी चाहिए। जोशी जी अपनी इसी किताब में आगे आधुनिक भारत का सास्कृतिक आंदोलन में लिखते हैं-

अंग्रेजी राज्य या शासन की नीति तथा सुधारों का दृष्टिकोण परस्पर पूरक ही थे। अंग्रेजी शासन के कानून के मुताबिक इस देश की समूची प्रजा का स्तर समान ही माना गया है। (अध्याय 6, पेज 272), मेरी टिप्पणी - गौरतलब है कि मैकाले के नेतृत्व में लॉ कमीशन ने पहली बार ये माना कि अपराध के दंड में जाति की कोई भूमिका नहीं है और हर व्यक्ति कानून की दृष्टि में समान है। उससे पहले तक हर जाति को समान अपराध के लिए अलग अलग दंड देने का विधान था। लॉ कमीशन की रिपोर्ट के आधार पर ही देश में आईपीसी और सीआरपीसी के आधार पर अपराधों की मींमांसा और दंड संहिता का विधान हुआ।

जोशी जी आगे लिखते हैं-

अंग्रेजी कानून ने निरुपाय होकर उस धारा को अपनाया जो हिंदू धर्म की श्रुतियों, स्मृतियों तथा पुराणों में ग्रंथित कानून के विरुद्ध थी। उसने सती की प्रथा का प्रतिबंध (1829) किया। (मेरी टिप्पणी - हिंदू शासकों ने अपनी रियासतों में कई और साल तक इस जघन्य प्रथा को जिंदा रखा। एक बात और। सती के खिलाफ अंग्रेजों से पहले एक मुस्लिम शासक ने सख्ती बरती थी। हिंदू मानस में उस बादशाह को सामूहिक घृणा का पात्र बना दिया गया है। जी हां, औरंगजेब ने 1663 में ये अपने अधिकारियों को आदेश दिया था की उसकी राज्यसीमा के अंदर कहीं भी किसी औरत को जिंदा जलने न दिया जाए। मैकाले और औरंगजेब में दो समानताएं हैं। दोनों ने स्थापित हिंदू मान्यताओं को ठेस पहुंचाई और भारतीय इतिहास में दोनों ही विलेन हैं) सन् 1832 और 1850 के कायदे के अनुसार धर्म परिवर्तन करने के बाद भी व्यक्ति को अपने संबंधियों की संपत्ति में उत्तराधिकारी बनाया गया। सन् 1840 में गुलामों के व्यापार को रोकने वाला कानून मंजूर हुआ। 1856 में पुनर्विवाह के कायदे को मंजूर करके हिंदू धर्म के नारी जीवन संबंधी मूलभूत तत्व को भारी ठेस पहुंचाई गई। 1865 में वह क्रांतिकारी कानून जिसे इंडियन सक्सेशन एक्ट कहा जाता है-पास किया गया, जो भारत के किसी भी जाति या धर्म के व्यक्ति को अन्यजातीय या अन्यधर्मी व्यक्ति से ववाह करने की अनुमति देता है। इस कानून ने जातिभेद और धर्मभेद की जड़ को ही उखाड़ दिया। ( अध्याय 6, पेज 273)

इसी किताब में इस बात की विस्तार से चर्चा की गई है कि पीनल कोड ने किस तरह भारतीय समाज को जमातों की जड़ता से मुक्त किया। अंग्रेजी शिक्षा औऱ अंग्रेजी कानून एक दूसरे के पूरक बने।

वर्णाश्रम व्यवस्था आधारित भारतीय सभ्यता को एक झटका अंग्रेजी राज में लगा। उसे दूसरा बड़ा और संभवत: निर्णायक झटका अब बदलते उत्पादन संबंधों की वजह से लग रहा है। सहाय जी का शोध इस बदलते समय पर कोई रोशनी डाल पाएगा क्या? और विधवा विवाह का निषेध, अंतर्जातीय विवाह पर पाबंदी और रक्त शुद्धता की अवधारणा, अस्पृश्यता, कर्म और जाति का संबंध यानी हर जाति के लिए खास कर्म का प्रावधान, बेटी का पैतृक संपत्ति में उत्तराधिकार का निषेध, कर्मकांड की प्रधानता, वैश्यों, शूद्रों और अंत्यजों के साथ औरतों की अवमानना - क्या इन सारे तत्वों को निकाल देने के बाद भी प्राचीन हिंदू सभ्यता में कुछ बचता है? और फिर सवाल है कि क्या वो इन तत्वों को बचाना चाहते हैं? - दिलीप मंडल

4 comments:

दिनेशराय द्विवेदी said...

चूहे आलेख पढ़ेंगे? आप का आलेख सिर्फ इंसानों के लिए है न?

satyendra... said...

लिखने दीजिए मंडल जी। जो लिखा जा चुका है उसे भी पड़ा रहने दीजिए। परिवर्तन भारतीय संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा है। जाति बदलता है। धर्म बदलता है और सब कुछ सनातन चलता रहता है। यहां की संस्कृति को सब कुछ स्वीकार्य है। जो पिछड़ता है, रिजेक्ट हो जाता है।

vijayshankar said...

दिलीप भाई ,
कोई भी टिप्पणी करने से पहले सहाय जी का शोध पढ़ना अनिवार्य होगा. उनकी इस प्रस्थापना का आधार क्या है, यह जानना पड़ेगा. फ़िर केन्द्र बिन्दु पर विचार करना पड़ेगा कि यह जातिप्रथा आखिरकार 'कौन सी भारतीय संस्कृति' बचा कर रख पायी है? क्या यह महज मनुस्मृति वाली वर्णव्यवस्था लेती आयी है या लोकायत और चारवाक दर्शन की परम्परा, जिसमें लोक की भागेदारी थी. कौन जाने यह राजशाही, सामंती और अब अर्ध-सामंती (तथाकथित लोकतांत्रिक व्यवस्था) दौर तक बहती चली आ रही घ्रणित जातिप्रथा की अजस्र धारा से पुलकित होनेवाली कोई बात है. सहायजी के तर्कों और विवरणों को देखकर ही इस बारे में कोई बात निर्णायक ढंग से कही जा सकती है. फ़िर इस विश्लेषण में भी जाना होगा कि उपर्युक्त समाजव्यवस्थाओं में जातियों का स्वरूप कैसा था और कैसे बदलता रहा तथा इन कालखंडों में भारतीय संस्कृति क्या-क्या रूप लेती रही. इसके लिए सहायजी से भी ज्यादा गंभीर शोध की दरकार होगी.

जाति के बारे में अम्बेडकर या जोशी के क्या मत हैं यह सहायजी के शोध की काट नहीं हो सकते. कौन जाने शोध में सहायजी ने इन्हीं जैसी कई विभूतियों के तर्कों का अपने हक़ में इस्तेमाल किया हो.

एक बात और शक करने लायक है, 'अमर उजाला' की उस रपट में जिस तरह सहायजी को सर्टिफिकेट देकर महिमामंडित करने और उनके दक्षिण भारत में जाकर अपने शोध पर मुहर लगवाने की बात सामने आती है, उससे कई प्रश्न मन में उठते हैं. सच्चाई सामने आना आवश्यक है.

हर्षवर्धन said...

दिलीपजी
शुक्रिया। अगर मेरी वजह से जाति व्यवस्था पर आपको फिर से थोड़ा पढ़ने-लिखने-सोचने की इच्छा जागी। आपने काफी शोधपरक बातें लिखी हैं। जहां तक जाति प्रथा की बात है तो, मेरी सोच साफ है ....
एकदम सही है। जाति प्रथा में मुझे भी ज्यादातर बुराइयां ही दिखती हैं। लेकिन, सवाल ये है कि समाज को चलाने के लिए किस व्यवस्था को किस संदर्भ में आत्मसात करना है ये भी देखना होगा। और सवाल सिर्फ जाति का ही नहीं होता। ज्यादा अमीर कम अमीर को बड़ा अफसर छोटे अफसर के साथ, ज्यादा पढ़ा लिखा- कम पढ़े लिखे के साथ और दूसरे ऐसे किसी भी तरह से श्रेष्ठजन (पता नहीं ये शब्द कितना सहीं है?) अपने से कमतर समझे जाने वाले हर व्यक्ति के साथ जो व्यवहार करते हैं। वो, जाति प्रथा से कम खतरनाक तो नहीं होता है। खैर अच्छा है बहस आगे बढ़ाइए।

दूसरी बात इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्रोफेसर सहाय के शोध में साफ-साफ लिखा है कि कर्म आधारित जाति प्रथा की वजह से सभ्यता बची है। यानी हर जाति के अलग कर्म नहीं, अलग कर्म करने वालों के लिए अलग जातियां। आपकी इन बातों से मैं जरूर सहमत हूं कि जाति प्रथा में कई बुराइयां हैं जो, दूर होनी चाहिए। और, जहां तक रही आदर्श हिंदू के बिल के चूहे की तरह की तो, मुझे लगता है कि आदर्श हिंदू से ज्यादा खुली अवधारणा का शायद ही कोई होगा।

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