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Monday, January 14, 2008

गालियों पर बात करने से कौन डरता है?

एक ब्लॉग है गालियों से परहेज कैसा। इसे जीतेंद्र कुमार चलाते हैं। अभी इसमें सिर्फ तीन पोस्ट है। और गुस्से में की गई चंद टिप्पणियां। अरसे से मैं भी इस विषय पर काम करना चाहता था। जीतेंद्र ने शुरू किया है। उन्हें शुभकामनाएं। इस तरह के काम का हिंदी समाज अभ्यस्त नहीं है। इसलिए लोग चौंक रहे हैं। लेकिन चौंकने का काम आम तौर पर अलसाए और ऊंघ रहे लोग करते हैं। इसलिए जीतेंद्र जी से निवेदन है कि ऐसे लोगों की बातों का बुरा न मानें और अपने काम में किसी संन्यासी वाले धैर्य के साथ जुटे रहें।

अपनी चपलता और चंचलता के कारण ऐसा धीर-गंभीर काम मुझसे हो नहीं पाता। इसलिए अजित वडनेरकर की सफलता की कामना भी मैं करता रहता हूं। अजित वो काम कर रहे हैं, जो त्रिलोचन करना चाहते थे। लेकिन हिंदी के मठ मालिकों ने उसमें दिलचस्पी नहीं ली (कीड़े पड़ें उन मठ मालिकों को - लीजिए हो गई एक वेज गाली, लेकिन जीतेंद्र जी आप नॉनवेज गालियों को छोड़िएगा नहीं)।

गाली जैसे महत्वपूर्ण विषय पर दरअसल बहुत कम काम हुआ है। मुझे अभी तक सिर्फ एक किताब मिली है (किताबों से मेरा नाता थोड़ा कमजोर सा है) जिसमें इसकी कुछ झलक दिखी थी। किताब का नाम है भोजपुरी लोकोक्ति कोश। इसे बिहार हिंदी ग्रंथ अकादमी ने छापा है। अब शायद उपलब्ध भी नहीं है। ये किताब कई साल पहले किसी पुस्तक मेले या फिर दरियागंज की पुरानी किताबों की मंडी से मुझे मिली थी। उसके कुछ टुकड़े आप आने वाले दिनों में पढ़ेंगे। उस किताब से मुझे पहली बार गालियों के समाजशास्त्र के बारे में जानकारी मिली।

गालियां, किसे, क्यों और क्या लक्ष्य करके दी जाती हैं, इस पर से जीतेंद्र कुमार अगर परदा उठा पाते हैं, तो हिंदी और हिंदी समाज के लिए ये उनका अमूल्य और अभिनव योगदान होगा। स्थायी महत्व का काम कर रहे हैं जीतेंद्र । चलिए हम सब उन्हें शुभकामनाएं दें।

2 comments:

अजित वडनेरकर said...

वाकई बढ़िया काम कर रहे हैं जीतेंद्र जी। गुजरात के एक सज्जन ने भी इस विषय पर काम शुरू किया था। हमारे परम मित्र और वरिष्ठ पत्रकार डाक्टर हर्षदेव (नवभारत टाइम्स,दिल्ली) भी इस विषय पर विस्तृत शोध में लगे हैं और आगरा, बनारस, दिल्ली की गलियों में खाक छानते फिर रहे हैं। सभी गाली शोधकों को बधाई। लिंग से उपजे कुछ शब्दों के संदर्भ में एक मूल्यवान शोध मेरे हाथ लगा है। बहुसंख्यक गालियों में भी यह शब्द इस्तेमाल होता है। जल्दी ही सफर में आप सब इसे देखेंगे।
दिलीप भाई, हमारा उत्साह बढ़ाने के लिए धन्यवाद .....

आशीष महर्षि said...

हमारे साथ दिक्‍कत यही है कि हममें एक साथ दो आदमी रहता है, जिंतेद्र जी का काम कोई जिगर वाला ही कर सकता है, सबके बस में यह बात कहां है साहब

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