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Thursday, January 17, 2008

अथ पत्रकार कथा

फिल्म प्यासा के पॉपुलर गीत की पैरोडी मुझे ई-मेल के जरिए मिली। और सहमति के तौर पर मैंने इसे कई पत्रकार-गैर पत्रकार परिचितों को फॉरवर्ड किया। और आश्चर्य, इस पर कुछ ही घंटों के भीतर कई प्रतिक्रियाएं मिलीं, जबकि आम तौर पर माना जाता है कि फॉरवर्ड की हुई मेल्स सिर्फ पढ़ने और आगे फिर फॉरवर्ड कर देने के लिए होती हैं। इनमें से दो प्रतिक्रयाएं तो इस पैरोडी को आगे बढ़ाते हुए पदों के रूप में थीं। पहले पढ़िए मूल पैरोडी-

ये मीटिंग्स, ये स्टोरीज़ ये फीचर की दुनिया
ये इंसां के दुश्मन क्वार्क की दुनिया
ये डेडलाइन के भूखे एडीटर्स की दुनिया
ये पेज अगर बन भी जाए तो क्या है.

यहां एक खिलौना है सब-एडीटर की हस्ती
ये बस्ती है मुर्दा रिपोर्टर्स की बस्ती
यहां पर तो रेजेज से इंफ्लेशन ही सस्ती
ये अपरेजल अगर हो भी जाए तो क्या है.

हर एक क्प्यूटर है घायल, हर एक न्यूज बासी
डिजाइनर्स में उलझन फोटोग्राफर्स में उदासी
ये आफिस है या प्रॉपर्टी मैनेजमेंट की
सर्कुलेशन अगर बढ़ भी जाए तो क्या है.

जला दो, जला दो, फूंक डालो ये मॉनीटर
मेरे नाम का बस, हटा दो ये यूज़र
तुम्हारा है तुम ही संभालो ये कंप्यूटर
ये पेपर अगर चल भी जाए तो क्या है.

पत्रकार पम्मी बर्थवाल की कलम (ओह! की-बोर्ड) ने इसे आगे बढ़ाया-

ये चैनल का ड्रामा छिछोरी सी मस्ती
यहां मौत बिकती जिंदगी फिर भी सस्ती
नए-नए चैनल पर बासी से चेहरे
उबासी भरे और उदासी से गहरे
कोई चैनल अगर चल भी जाए तो क्या है.

भारतीय सेना में इंजीनियर कर्नल रामाराव भी खुद को रोक न पाए, अपनी बहन मुनिया को ये कहने से-

यही है, यही है, यही है वो दुनिया
जिसके पीछे पागल है ये सारी दुनिया
तेरे रोने से कुछ न होगा ये समझ ले
हंस ले, हंसा ले, जैसी भी है अपनाले रे मुनिया.

आपकी प्रतिक्रिया की भी बेसब्री से प्रतीक्षा है।

- आर. आनुराधा

3 comments:

sushant jha said...

मैं मीडिया का एक छात्र....
मीडिया की पढ़ाई के लिए दिल्ली आया था और अपने कुछ अलग ही अनुभव रहे इस चकाचौंध भरी दुनिया के.... आप भी मज़ा लीजिये मेरे इन अनुभवों का.....


माँ की बासी रोटी से भी फीका खाकर
खुश होने का अभिनय कर 'टिप' देकर जाना..
घर का चौका छूटा, होटलों की मेज़ों पर,
सीख रहा हूँ, मुँह के भीतर, चम्मच से चावल सरकाना
बाबूजी का आधा वेतन कार्ड घुसाकर जेब में भरना,
गर्लफ्रेंड के साथ ज़रा सी दूरी पर भी ऑटो करना,
और बहुत कुछ सीख रहा हूँ....

सीख रहा हूँ नया ककहरा, जादू-मंतर,
सीख रहा हूँ, "माँ की गाली" का अंग्रेज़ी रूपांतर,
सीख रहा हूँ, बिस्तर की सिलवट को कैसे ख़बर बनायें,
सीख रहा हूँ, माँ कैसे बाज़ार में आए,
टोन-टोटके, सांप-भूत मेरे अध्याय...
नया दौर है, भूख-गरीबी भांड में जाए..
और बहुत कुछ सीख रहा हूँ.....

सस्ती चप्पल, सीधी-सादी कद-काठी क्या काम आएगी,
सीख रहा हूँ "सबसे तेज़" दिव्य नरों संग उठाना-चलना..
माँ हैं "ममी", पिता "डेड" हैं समझ चुका हूँ,
सीख रहा हूँ, हाक़ीम की अँगुली दबते ही रंग बदलना..
सास-बहू के गढ़ विज्ञापन, हिट हो जाना, माल कमाना..
नटनागर आसा बापू को किसी "तेज़" चैनल का ब्रांड बनाना....
और बहुत कुछ सीख रहा हूँ....

अंग्रेज़ी में गिटपिट करना, बातें गढ़ना, जीन्स पहनना,
सीख रहा हूँ, सिगरेट के धुएँ जैसी लहराती बोली,
तन कर चलना, बिना बात इतराते रहना..
"टैटू कल्चर' सीखा, भूला चंदन-रोली...
पेशेवर बनने की ज़िद है, सब चलता है..
किसे पड़ी है, पूरब में सूरत ढलता है.....

मैं मीडिया का एक छात्र
बनने आया था ख़बरनवीस
बन कर रह गया
एक बाज़ारू ख़बर मात्र....

निखिल आनन्द गिरि

(गत २ नवम्बर २००७ को अशोक चक्रधर के अखाड़े में इसी कविता के लिए निखिल आनन्द गिरि को तृतीय पुरस्कार प्राप्त हुआ था। )

साभार- निखिल आनन्द गिरि |

vijayshankar said...

this guy has a potentional, iskee aakhiree 10 laaine mjhe theek naheen lageen,

Anonymous said...

Anuradha ji, is kavita ko mujhe zee news me kaam karne wale priyadarshan ne bheji thi. jise likha ya sangrahit kiya hai anshul shukla ne, jo etv hyderabad me kaam karte hai, mere blog par ye kavita chaspa bhi hai.

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