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Tuesday, February 12, 2008

दंडवते या लालू यादव? किसने किया सामाजिक न्याय

आज से लगभग तीन दशक पहले एक मराठी ब्राह्मण नेता मधु दंडवते रेल मंत्री बने थे। उन्होंने फैसला किया कि सेकेंड क्लास के कोच में हर सीट पर दो इंच फोम होगा। उनके इस आदेश के बाद से लकड़ी की सीट वाले कोच बनने बंद हो गए। अब आपको शायद याद भी नहीं होगा कि कुछ साल पहले तक गर्मी के मौसम में भी सेकेंड क्लास पैसेंजर्स को भारी भरकम होलडॉल से पहचाना जा सकता था। सेकेंड क्लास में सफर करने वालों की दुनिया बदल देने वाले मधु दंडवते ने ऐसा करके सामाजिक न्याय किया या नहीं? मधु दंडवते ने ही कोंकण रेलवे की शुरुआत की थी, जिसका फायदा आज करोड़ों लोग उठा रहे हैं। मधु दंडवते ने पैसा नहीं बनाया। वो कभी मीडिया के स्टार भी नहीं रहे।

उनके मुकाबले रखिए लालू यादव को। सामाजिक न्याय के चैंपियन और पिछड़ी यादव जाति के नेता। उनकी पूरी कोशिश इन दिनों कॉरपोरेट जगत में लोकप्रिय होने की है। रेलवे की जमीन कॉरपोरेट सेक्टर को देकर और मालढुलाई के निजीकरण से वो अपना वो रेलवे की कमाई का लक्ष्य हासिल करना चाहते हैं। रेलवे की चर्चा अब लोककल्याण, नई गाड़ियां चलाने, पुलों की मरम्मत, नई लाइनें बिछाने, रेलवे ट्रैक के बिजलीकरण जैसी बातों के लिए नहीं होती। रेलवे की चर्चा अब लाभ कमाने, डिविडेंड देने, रेलवे के कॉरपोरेटीकरण, पब्लिक-प्राइवेट-पार्टनरशिप, रेलवे की जमीन बेचने, कैटरिंग के निजीकरण, माल ढुलाई में निजी कंपनियों की भूमिका बढ़ाने और साथ ही सुपरफास्ट चार्ज, कैंसिलेशन चार्ज, तत्काल चार्ज जैसे पिछले दरवाजे से टिकट महंगा करने जैसी बातों के लिए होती है।

लालू यादव आज मीडिया की नजरों के तारे हैं। लालू यादव अब आरक्षण की बात नहीं करते। एम्स में वेणुगोपाल बनाम रामदॉस की लड़ाई में वो वेणुगोपाल के साथ हैं। न्यायपालिका के जातिवादी स्वभाव के बारे में पूछने पर वो कहते हैं कि जज देवता होता है। कैबिनेट की बैठक में वो पहले मंत्री थे जिन्होंने कहा था कि उच्च शिक्षा में आरक्षण इंस्टॉलमेंट में लागू किया जाना चाहिए। बिहार की पंचायतों में अतिपिछड़ों और महिलाओं को आरक्षण देने का फैसला उन्हें पसंद नहीं है। पसमांदा मुसलमानों की बात से उन्हें चिढ़ होती है।

लालू यादव सामाजिक न्याय नहीं कर रहे हैं, वो सामाजिक न्याय की राजनीति भी नहीं कर रहे हैं। ये बात बहुत लोगों को चौंका सकती है और वामपंथ की ओर झुके हुए दिल्ली-मुंबई के बुद्धिजीवियों को ये रहस्य आसानी से समझ में भी नहीं आएगा, कि ये क्या बात हो रही है। लालू यादव के भदेसपन और गंवई अंदाज को सामाजिक न्याय का दूसरा रूप मानने वालों को ये बात जरूर चौंकाएगी। लेकिन लालू यादव-रावड़ी देवी के लंबे शासनकाल में बिहार में सामाजिक न्याय के नाम पर जिस तरह विकासविरोध की राजनीति हुई, उसका असर अब लालू यादव की राजनीति पर नजर आ रहा है।

लालू यादव के नारों की चमक अब बिहार में फीकी पड़ चुकी है। लालू यादव जब पहले चुटकुला कहते थे कि बिजली आने से भैंस की शॉक लग जाएगा, या सड़क बनी तो गाड़ियों की धूल आपको फांकनी होगी, तो लोग खूब मजा लेते थे। अब इन चुटकुलों पर बिहार में कोई नहीं हंसता। लालू यादव अब बिहार में ऐसे चुटकुले कहते भी नहीं हैं। वो बिहार की हकीकत को बुद्धिजीवियों से बेहतर जानते हैं। बिहार में पिछड़ों की राजनीति अब नीतीश कुमार कर रहे हैं।
-दिलीप मंडल

2 comments:

panditji said...

bilkul sahi sawal uthaya hai. Lalu ki rail ke bare me vo sab log jante hai, jo kareeb se railway board ko cover karte rahe hai. lalu ne railway ko kaise kamau banaya, iss potha likha ja sakta hai. Pichale darvaje se kaise paisa badhaya gaya, kaise kamai bahdhi, ye mahakavya ka vishay hai. mauka laga to mai tafsil de likhunga.
Umesh Chaturvedi

दिलीप मंडल said...

जरूर, हम साभार छापना चाहेंगे।

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