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Saturday, February 16, 2008

कल्लू चमार से दो और बातें

- दिलीप मंडल

संजय, आप जब कहते हैं कि आप गाली देना जानते हैं और जब आप गालियां देगें तो मेरे जैसों के कान फट जाएंगे तो आपकी इस बात से असहमत होने का कोई कारण नजर नहीं आता। गालियों का जो संसार है वो अपने मूल स्वभाव में स्त्री और वंचित विरोधी है। इसलिए आप जब कहते हैं कि आप कान फाड़ने वाली गालियां दे सकते हैं तो मानना ही पड़ेगा कि आप ऐसा कर सकते हैं।


यहां बात करते हैं लोकोक्तियों की। लोकोक्तियां कब गाली बन जाती हैं, कई बार पता ही नहीं चलता। भाषा विज्ञानी शशिशेखर तिवारी ने 45 साल पहले 1963 में आगरा विश्वविद्यालय में डॉक्टरेट की उपाधि के लिए जो शोध प्रबंध दिया था, उसे पढ़ते हुए लोकोक्तियों (गालियां इनमें शामिल हैं) के समाजशास्त्र के बारे में जानने को मिला। यहां मैं शशिशेखर तिवारी के पुस्तकाकार छपे उसी शोध प्रबंध के कुछ हिस्से रख रहा हूं। पहले देखिए महिलाओं के बारे में -

1. बिन मारे बेटी मरे, खाड़े ऊंख बिकाय।
बिन मारे मुदई मरे, ता पर देव सहाय।।

यानी, जिसकी पुत्री की (बचपन में) मृत्यु हो जाए, खेत में ईंख बिक जाए और बिना मारे दुश्मन मर जाए, तो समझना चाहिए कि देवता उसके सहायक हैं।

2. खेती, बेटी, नित्ते गाय, जे ना देखे तेकर जाए

यानी, जो अपनी खेती, बेटी और गाय पर प्रतिदिन नजर नहीं रखता, उसकी ये चीजें नष्ट हो जाती हैं।

3. जे पेट के आस उसे बिआईल बेटी

यानी जिस गर्भ से पुत्र होने की आशा थी, उसी से बेटी उत्पन्न हुई।

और कुछ जाति संबंधी

1. भादो भैंईंसा, चइत चमार

यानी भादो में भैंस और चैत में चमार खा-पी कर मस्त हो जाते हैं।

2. चमार के मनवले डांगर ना मरी

यानी चमार के मनाने से बैल नहीं मरेंगे।

3. दुसाध जात खाये नीचे, ताके ऊंचे

यानी दुसाध जाति दूसरों के यहां नीचे बैठकर खाती है, लेकिन उसकी नजर चोरी के उद्देश्य से घर की ऊंची जगहों पर दौड़ती रहती है।

4. चमारे के बेटी नांव रजरनियां

चमार की बेटी है, किंतु नाम है राजरानी।

5. कायथ के कुछ लेले देले, बराह्मण खिलवले, रजपूत के बोध बाध, नान्ह लतियवले

कायस्थ कुछ लेन-देन करने से, ब्राह्मण कुछ खिलाने पिलाने से, राजपूत तारीफ करने से और निम्न जाति के लोग दंड देने से ठीक रहते हैं।

6. अहीर बुझावे से ही मरद

मर्द वही है जो अहीर को तथ्य बोध करा दे

शोधकर्ता शशिशेखर तिवारी कहते हैं कि लोकोक्तियों के आधार पर भारतीय जाति व्यवस्था का अध्ययन उपादेय है। इस सिलसिले में वो रिजले की किताब पिपुल्स ऑफ इंडियाऔर डबल्यू क्रूक की किताब नेटिव्स ऑफ नॉदर्न इंडिया का जिक्र करके हैं। क्या किसी को मालूम है कि ये किताबें कहां मिल सकती हैं?

3 comments:

Mired Mirage said...

अब क्या कहा जाए ? यही कह सकते हैं कि यदि भाषा पर थोड़ा भी ध्यान रखा जाए तो सभी पाठक व पाठिकाएँ सबकुछ पढ़ सकेगीं ।
घुघूती बासूती

Ek ziddi dhun said...

dil baithne lagta hai, soch-sochkar, jo log bahas karne ka drama kar rahe hain, ve nasamajh nahi hain balki poore samajhdaar hain aur dhoortta aur anyay ke barkrar rahne mein hee unkee mauj hai..kaise ekjut ho jaate hain jara sa sach sunkar...oh ye kaise, padhe-likhe aur progressive bane ghoomte hai.n, range siyaar..

अजित वडनेरकर said...

अजित वडनेरकर said...
सचमुच बेहतरीन प्रस्तुति। इसे पढ़ने से रह गया था। ज्ञानवर्धक। शब्दों के सफर में कभी संदर्भ में काम आएगी । सहेज ली है। शुक्रिया....
( दरअसल इसे होना तो यहां चाहिए था, मगर पेस्ट हो गई मोहल्ले पर । अभी नज़र पड़ी । अब मोहल्लेवाली को डिलीट करता हूं तो मस्ताने बेनामियों के पेट में मरोड़ उठेगी। इसलिए बेहतर समझा कि टिप्पणी को सही जगह पहुंचा दूं।

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