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Wednesday, February 20, 2008

ब्लॉग और टीआरपी का कीड़ा

अश्लील और बेहूदी सनक का मंच नहीं है ब्लॉग

ब्लॉग, एक माध्यम के रूप में, हिंदी संसार की नई चीज है। इसलिए इसका व्याकरण, इसके तौर तरीके, इसका अनुशासन, इसके अपराध और दंड के नियम अभी गढ़े जाने हैं। हम सब भाग्यशली हैं कि ऐसे रोचक दौर में हम ब्लॉग जगत के पार्ट हैं। इतिहास को बनते हुए देखना रोमांचक है, पर इतिहास का हिस्सा बनना और भी रोमांचक है। मेरी राय में तो ब्लॉग व्याकरण मुक्त माध्यम के रूप में ही इवॉल्व होगा। और जिनकी आवाज नहीं सुनी जाती, उनकी आवाज यहां सबसे ज्यादा सुनाई देगी। इस बारे में कल मैंने जो पोस्ट डाली थी उस पर कुछ टिप्पणियां आई हैं। आप भी देखिए और शामिल हो जाइए इस रोचक चर्चा में।


लिखने और पढ़ने वाले बनें लोकतांत्रिक
Dipti said...

इस माध्यम के लोकतांत्रिक होने से ज़्यादा अहम है यहाँ लिखने और पढ़नेवालों का लोकतांत्रिक होना। माध्यम समाचार पत्र हो या टीवी न्यूज़ चैनल। हर जगह, हम जैसे और हम ही है। फिर ऐसा क्यों, कि जब ब्लॉग में लिखा तो इतनी खुलकर बात की। और जब चैनल की सीढ़ियाँ चढ़ी तो कुछ और कहने लगे। मुझे लगता है हम बहुत ख़तरनाक लोग है। जो एक होते हुए भी दो तरह की बातें एक साथ कर लेते हैं। शायद ऐसा इसलिए कि अभी ब्लॉग को टीआरपी और मुनाफ़े का कीड़ा नहीं काटा है?
-दीप्ति

ही डंडा,आप तराज़ू,आप ही बैठा तोलता

vimal verma said...

मार्के की बात कही है आपने ...ब्लॉग के बारे में इतना कि आप ही डंडा,आप तराज़ू,आप ही बैठा तोलता....वाकई ब्लॉग ने सोच को एक नया आयाम दिया है...कभी अखबारों,पत्र पत्रिकाओं,साहित्य में हम अपने समय को पहचानने की कोशिश करते थे..पर ब्लॉग ने तो गूंगो को भी ज़ुबान दे दी है... जो अच्छा लगे उसे अपनाओ,जो बुरा लगे उसे जाने दो ।

गुडी गुडी कहने की मजबूरी को बाय-बाय

Mired Mirage said...

ठीक कह रहे हैं । शायद सबसे बड़ी बात यह है कि वे लोग भी जिनसे हर समय मुस्कराने और गुडी गुड बने रहने की अपेक्षा की जाती रही है , वे कुछ समय के लिये यह मुस्कान और गुडी गुड का लेबल उतार फेंक सकते हैं ।
मेरे खयाल से तो आप नई पीढ़ी वाले या घर से बाहर निकलने वाले तो वैसे भी अपनी बात कह लेते , परन्तु मेरी उम्र के लोग, विशेषकर गृहणियाँ क्या आप सबके विचार जानने व अपने प्रस्तुत करने का स्वप्न भी देख सकती थीं ? या फिर संसार में क्या हो रहा है , लोग क्या सोचते हैं, क्या विचार करते हैं जान सकती थीं ?
नेट स्वयं में संसार के लिए मेरी खिड़की थी परन्तु ब्लॉगिंग एक मंच भी हो गई ।
घुघूती बासूती

बात बैलेंस्ड है

सुजाता said...

एपावरमेंट के साथ जो जवाबदेही होनी चाहिए, उसका कोई संस्थागत रूप यहां नहीं है। ये जवाबदेही आप अपने ऊपर खुद ही तय कर सकते हैं।

****
बहुत सही बात । अच्छी बैलेंसड पोस्ट।

ब्लॉग को दूषित करने की कोशिश होगी

Ek ziddi dhun said...


बात दरअसल ये है की जो डेमोक्रेसी का ढोंग करते हैं, वे ही इसे बर्दाश्त नही कर पाते । दूसरी ओर दलित-वंचित तबके के लिए डेमोक्रेसी चाहत और जरूरत की तरह है और जब वो इसमें जरा भी झूठी-सच्ची भागीदारी पाते दिखायी देते हैं तो तूफ़ान सा मच जाता है और ताक़तवर तबका बेशर्म होकर हिंसा पर उतर आता है (कथित आरक्षण विरोधी आन्दोलन के नाम पर अश्लीलता इसका ताज़ा उदाहरण है)। फिर कोर्ट, अखबार आदि सब एकजुट हैं ही। कोई कहे की इनमें दलितों की भागीदारी नही है, तो ये एकतरफा होंगे ही, तो इसमें क्या झूठ? रही बात दिलीप मंडल क्यों गिनती कर रहे हैं अखबारों में दलितों की, तो व्यंग्य में इसे यों समझो हिंसक लोगो कि ये भी आपके ही काम आएगा।
दरअसल इस मुश्किल लड़ाई में दुनिया भर के न्याय के पक्षधर इसीलिए वैकल्पिक मीडिया की बात कर रहे हैं। ज़ाहिर है, इन ताक़तवर लोगो की बेशरम एकजुटता के बीच कोई भी वैकल्पिक मीडिया सीमित प्रभाव वाला ही होगा, ब्लॉग भी ऐसे एक वैकल्पिक मीडिया के रूप में हो सकता है। पर बात ये है की ऐसी हर कोशिश को विरोधी तब्बका दूषित बनने की कोशिश करेगा ही और ऐसे धूर्त हमले करेगा जैसे दिलीप मंडल पर हो रहे हैं। लेकिन उनसे ज्यादा खतरा अपने ही बीच के रेंज सियारों का है, जो डेमोक्रेसी के नाम पर इसे अश्लील और बेहूदी सनक का मंच बनने की कोशिश करते हैं। ज्ञानोदय विवाद में हम देख ही चुके हैं और अपने बीच के कई बुद्धिजीवियों के ब्लॉग से भी ये जाहिर है।

कमजोर आवाज को यहां मिल पाएगा स्वर

anuradha said...

ब्लॉगिंग कई लोगों के लिए कई स्तरों पर अपनी निजी बात कहने का सार्वजनिक मंच है। मजे की बात ये कि इसमें आप गुमनाम रहकर भी अपने विचार जाहिर कर सकते हैं। ऐसे खुले माहौल में, जाहिर है- 'मैं तुम्हारा जॉकी नंबर भी जानता हूं' का दंभ भरने का लालच कम ही लोग दबा पाते हैं। इसलिए किसी खास व्यक्ति को लक्ष्य करके लिखे गए चिट्ठे भी सबके सामने होते हैं। ऐसे माध्यम में थोड़ी-बहुत कीच-उछाली तो होगी ही। इसकी चिंता करने की जरूरत उन्हीं को होनी चाहिए जो भीतर से मैले हैं। एक और बात। ब्लॉग आपस में एक दूसरे की पीठ खुजलाई का माध्यम मात्र नहीं बल्कि इससे आगे, जनमत को बनाने, उभारने और कमजोर आवाजों को शब्द देने का साधन बने तो बेहतर।

2 comments:

आशीष said...

अनुराधा जी से पूरी तरह सहमत। वाकई में ब्लॉगिंग लोगों के लिए अपनी निजी बात कहने का सार्वजनिक मंच है। यह कोई वेबसाइट नहीं है जहां हम इस पर अंकुश लगाने की बात करें। यदि हमें किसी का ब्‍लॉग पंसद नहीं है तो हम क्‍यों जाते हैं उसके ब्‍लॉग पर। हमने ब्‍लॉग को एक वेब पोर्टल के रुप में मानकर उस पर अंकुश्‍ा क्‍यों लगाना चाहते हैं

vijayshankar said...

'आप ही डंडा, आप तराज़ू, आप ही बैठा तोलता'- यह लोकोक्ति मुझे बेहद अच्छी लगी. जीवन में पहली बार सुन रहा हूँ. दीप्ति जी को ऐसी चीजों का अधिकाधिक इस्तेमाल करना चाहिए. यह एक व्यापक और जनपक्षीय राजनीति है.

उनका यह कहना- 'मुझे लगता है हम बहुत ख़तरनाक लोग है।' मार्क्सवादी सौन्दर्यबोध का अच्छा उदाहरण है. बात में सच्चाई तो है ही. बधाई!.
आख़िरी वाक्य में उन्होंने खड़ी बोली का व्याकरण रद्द कर दिया है; इसके मैं सख्त ख़िलाफ़ हूँ.

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